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भगवान किसका ?

Written By Safat Alam Taimi on बुधवार, 7 नवंबर 2012 | 4:43 pm


भारत वह देश है जहां विभिन्न विश्वास रखने वाले लोग विधमान हैं. इसके बावजूद वे परस्पर मिलजुल कर रहते हैं और यही इस देश की सराहनीय विशेषता है. लेकिन कभी कभी ऐसी दुर्घटनाएं भी सामने आती हैं जो प्रश्न चिन्ह खड़ा कर देती हैं. ऐसा नहीं है कि यह घटना अचानक उत्पन्न होती है, बल्कि उनका प्राचीन पृष्ठभूमि है. इसी प्रकार की एक घटना झुंझुनूं में खेतड़ी थाना क्षेत्र के बड़ाऊ गांव का है. जहां दलित जाति के दो नवविवाहित जोड़ों को मंदिर से धक्केमार कर बाहर निकालने का मामला प्रकाश में आया है। पीड़ितों का आरोप है कि विरोध करने पर उनके साथ गाली गलौच भी किया गया. इस संबंध में मंदिर के पुचारी एवं तीन महिलाओं सहित 8 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने बताया कि बड़ाउ गांव का निवासी अशोक कुमार मीघवाल और छोटे भाई गुलाब की बारात माधव गढ़ गई थी. 25 अक्तूबर को वे शादी कर के लौटे 26 अक्तूबर की सुबह लगभग 10 बजे दोनों नवविवाहित जोड़े धोक लगाने गांव के मंदिर गए। मंदिर में पुजारी घीसाराम स्वामी सहित कुछ लोगों ने उनको पूजा अर्चना करने से रोका. नवविवाहित जोड़ों और उनके साथ आए लोगों ने जब इस बात का विरोद्ध किया तो पुजारी और अन्य लोगों ने उनके साथ गाली गलौच की और धक्के मार कर मंदिर से बाहर निकाल दिया।
रविवार रात इस सिलसिले में पीड़ित अशोक कुमार मेघवाल ने मंदिर के पुजारी घीसाराम स्वामी, गंगा स्वामी, अनिल स्वामी, पप्पू शर्मा तथा सियाराम स्वामी के साथ ही महिलाओं के खिलाफ मामला दर्ज कराया. इस मामले में फिलहाल किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है. पुलिस मामले की जांच कर रही है.
घटना की पृष्ठभूमि में यह बड़ा सवाल उठता है कि मंदिरों में "भगवान" किसके हैं? मानव के या विशेष वर्ग के? जब आस्था द्वार आप हिंदू हैं और वह भी जिनको धक्के मार कर बाहर किया जा रहा है तो ऐसा मआमला क्यों ? पता यह चला कि यह "भगवान" हिंदुओं के नहीं बल्कि विशेष जाति के हैं जो दिन रात उनकी सेवा में लगे रहते हैं. जिनको चाहें पूजा करने की अनुमति दें और जिनको चाहें पूजा करने से रोक दें।
ऐसी ही स्थिति में इस्लाम की ज़रूरत महसूस होती है जो यह नारा देता है कि प्रत्येक मानव का पैदा करने वाला एक है और एक ही माता पिता से सब की रचना हुई है। ईश्वर भी एक और माता पिता भी एक...तो फिर जातिवाद क्यों कर। इस्लाम सारे संसार का धर्म है जहाँ कोई भेदभाव नहीं। जो हर प्रकार के जातिवाद का खंडन करता है। जो इनसान के माथा का भी सम्मान करता है कि इसे मात्र अपने रचयिता और पालनकर्ता के सामने टेका जाए किसी अन्य के सामने नहीं।    

अमन का पैग़ाम टी. वी. और सय्यद मुहम्मद मासूम साहब की वेबसाइट्स से क्यों नाराज़ हैं नफ़रत की फ़ज़ा बनाने वाले ?

Written By DR. ANWER JAMAL on रविवार, 10 जुलाई 2011 | 7:40 am

‘अमन का पैग़ाम‘ आज एक कसौटी की शक्ल अख्तियार कर चुका है। कोई भी नफ़रत फैलाने वाला इस ब्लॉग पर नहीं आता है और अगर आ भी जाए तो ‘अमन का पैग़ाम‘ के साथ दो क़दम भी नहीं चल पाता। बहुत बड़े समझे जाने वाले बहुत से नाम ऐसे हैं जो कि यहां कभी नज़र ही नहीं आए।
सय्यद मुहम्मद मासूम साहब को ब्लॉग जगत में एस. एम. मासूम के नाम से जाना जाता है। वह ख़ुद तो मुंबई में रहते हैं लेकिन उनका दिल जौनपुर में रहता है। जौनपुर से अपना ताल्लुक़ क़ायम रखने के लिए उन्होंने ब्लॉग भी बनाया है और एक वेबसाइट भी बनाई हुई है, जिन पर जौनपुर के मंदिर-मस्जिद से लेकर जौनपुर की मूली और मिठाई तक के बारे में जानकारी मिल जाती है।
इसके बावजूद ब्लॉग जगत में उनकी पहचान ‘अमन के पैग़ाम‘ की वजह से है।
हालांकि ब्लॉग तो उनके कई हैं
1.      हक़ और बातिल
2.      बेज़बान
3.      ब्लॉग संसार
और इसके अलावा कई वेबसाइट्स भी हैं  और यू ट्यूब पर अमन का पैग़ाम टी. वी. भी है।
इसके बावजूद जब भी जनाब मासूम साहब का नाम लिया जाता है तो उनके नाम के साथ ‘अमन का पैग़ाम‘ ब्लॉग ही याद आता है।
आखि़र इसकी वजह क्या है ?
यह जानने के लिए देखें निम्न लिंक :
http://www.hamarivani.com/user_profile.php?userid=692&blog_id=1001

यूरोप का इस्लामीकरण, इस सदी के अंत तक : एक संभावना - Harikrishnn Nigam

Written By DR. ANWER JAMAL on गुरुवार, 21 अप्रैल 2011 | 6:59 pm


पश्चिम में यदि द्रुतगति से फैलने वाली आज की यदि कोई आस्था है तो वह है इस्लाम और इसीलिए उन्होंने इस चौंकाने वाली संभावना को रेखांकित किया है कि इस सदी के अंत तक यूरोप इस्लामी रंग को अपना सकता है, चाहे संगठित चर्च संप्रदायों के साथ-साथ उग्रवाद के संबंध में कितनी ही वैचारिक उठापठक की जाए। जनगणनाओं के विश्लेषणों, या जनसांख्यिकी दबाव भी यही सिद्ध करते हैं कि जिन पर तर्कों के जाल में यदि चाहें तो हम लोगों को भ्रमित करते रह सकते हैं। सहसा विश्वास नहीं होता है कि चर्च की यूरोप जैसी अभेद्य हृदयस्थली को, इस्लाम के विरूद्ध प्रचार के बावजूद, बर्नार्ड लिविस जैसे विश्वप्रसिद्ध विचारक भी मानते हैं, इस सदी के अंत तक, मुस्लिम आस्था नियंत्रित कर सकेगी। कभी-कभी ऐसा लगता है कि बर्नार्ड लिविस का यह प्रश्न उठाना आज के विकास क्रम के लिए श्रेयस्कर है क्योंकि इसके द्वारा विश्व राजनीति का मानचित्र फिर बदला सकता है। हाल में फ्रांसीसी समाचार एजेन्सी एएफपी और एसोसिएटेड प्रेस द्वारा प्रसारित ‘द फोरम आन रिलिजन एंड पब्लिक लाइफ’ के एक तीन वर्षीय अध्ययन से यह तथ्य उजागर हुआ है कि आज विश्वभर में हर चार में से एक व्यक्ति इस्लामी आस्था को मानता है। दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम जनसंख्या वाले 90 देशों में भारत का स्थान आज तीसरा है। हमारे देश के ऊपर मात्र इण्डोनेशिया और पाकिस्तान ही हैं। चाहे बांग्लादेश हो या मिस्र, ईरान, तुर्की और अल्जीरिया या मोरक्को हो वहां मुसलमानों की संख्या भारत से कम है। हमारे देश में उनकी संख्या 16 करोड़ है। इसी अध्ययन में यह तथ्य भी उजागर हुआ है कि जर्मनी में लेबनान से अधिक मुस्लिम नागरिक हैं, चीन में इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले सीरिया से अधिक हैं और रूस, जार्डन और लीबिया की कुल मिलाकर मुस्लिम जनसंसख्या अधिक है। आज यह अवधारणा कि इसलाम धर्मावलंबी अरब मूल में है ध्वस्त हो चुकी है और यह पूरी तरह से एक वैश्विक समुदाय है।  - हरिकृष्ण निगम
इस लेख को पूरा पढ़ना बहुत से राज़ सामने ले आता है . लिंक यह है :

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Saleem Khan