नियम व निति निर्देशिका::: AIBA के सदस्यगण से यह आशा की जाती है कि वह निम्नलिखित नियमों का अक्षरशः पालन करेंगे और यह अनुपालित न करने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से AIBA की सदस्यता से निलम्बित किया जा सकता है: *कोई भी सदस्य अपनी पोस्ट/लेख को केवल ड्राफ्ट में ही सेव करेगा/करेगी. *पोस्ट/लेख को किसी भी दशा में पब्लिश नहीं करेगा/करेगी. इन दो नियमों का पालन करना सभी सदस्यों के लिए अनिवार्य है. द्वारा:- ADMIN, AIBA

baal jharokha लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
baal jharokha लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

कुत्ता !! - सांप उन्हें ना काटे

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on सोमवार, 13 जून 2011 | 1:06 pm




 जब जब कोई नेता या
भूला भटका-अधिकारी आता
गाँव गली की सैर वो करने
शहर कभी जब ऊब भागता
अम्मा अपना लिए पुलिंदा
गठरी लिए पहुँचती धम से
देखो साहब ! अब आये हो
क्या करने ?? जब बुधिया मर गयी !
झुग्गी उसकी जली साल से
भूखे कुढ़ कुढ़ के मरती थी
बच्चे नंगे घूम रहे हैं
खेत पे कब्ज़ा "उसने" की है
पटवारी भी कल आया था
भरी जेब फिर फुर्र हुआ था
पुलिस -सिपाही थाने वाले 
"वहीँ" बैठ पी जाते पानी !!
थोडा खेत बचा भी जिसमे 
मेहनत कर -कर वो मरती थी  
"नील-गाय " ने सब कुछ खाया
मेड काटते --मारे -कोई
काट- काट- चक-रोड मिलाये
सूखे- हरे पेड़- जो कुछ थे
होली- में उसने कटवाये
प्राइमरी का सूखा नल है
बच्चे- प्यासे गाँव  -भटकते
सुन्दर 'सर' जो कल बनवाया 
टूटी सीढ़ी -सभी -धंसा है
रात में बिजली भी ना आती 
साँप लोटते घर आँगन 
अस्पताल की दवा  है  नकली
कोई डाक्टर- नर्स नहीं है
दो दिन -दर्शन कर के जाते -
कुत्ता -  सांप उन्हें ना काटे
कितना - क्या मै गठरी खोलूं ??
 या जी भर बोलो -  मै- रो लूं
अधिकारी बस आँख दिखाता
हाथ जोड़ ले जा फुसलाता 
नेता जी भी उठ- कर - जोरे 
मधुर वचन मुस्काते बोले !
अम्मा !! अब मै यहीं रहूँगा 
इसी क्षेत्र से फिर आऊँगा 
अब की सब मिल अगर जिताए !
कभी  ये फिर दर्द सताए !!
जीतूँगा दिल्ली जाऊँगा
प्रश्न सभी मै वहां उठाऊँ !
अगर पा गया उत्तर सब का
तो फिर प्रश्न रहे कैसे माँ ????
अब जाओ तुम मडई अपनी !
पानी -टंकी-सडक -गली की
चिंता सब हम को है करनी !!
 मुँह बिचका नेता ने देखा
अधिकारी को उल्टा’- ठोंका
इसे रोंक ना सकते - मुरदों
दरी बिछाए”- बैठे -गुरगों
अगली बार जो बुढ़िया आई  
मै तेरी फिर करूँ दवाई !
याद तुझे आएगी नानी
सुबह दिखेगा काला पानी !!!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
13.06.2011

आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on गुरुवार, 2 जून 2011 | 11:47 am


आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला
picture-of-the-sun-rising_4
(फोटो गूगल /नेट से साभार )
सहमा ठगा सा खड़ा झांकता था
आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला
कल पुर्जों ने गैस विषैली थी छोड़ी
लाश सडती पड़ी कूड़े कचरों की ढेरी
रक्त जैसे हों गंगा पशु पक्षी न कोई
पेड़ हिलने लगे मस्त झोंके ने आँखें जो खोली
व्योम नीला दिखा शिशु ने रो के बुलाया
आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला —
घबराहट अगर दिल बदल दो अब हैं दुनिया निराली
पाप हर दिन में हो हर समय रात काली
द्रौपदी चीखती -खून बहता -हर तरफ है शिकारी
न्याय सस्ता ,खून बिकता, जेल जाते भिखारी
घर से भागा युवा संग विधवा के फेरे रचाया
आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला —
धन हो इज्जत लूटे रखे अब जमीं ना सुरक्षित
खून सर चढ़ के बोले उलटी गोली चले यही माथे पे अंकित
घर जो अपना ही जलता दौड़ लाये क्या मुरख करे रोज संचित
प्यार गरिमा को भूले छू पाए क्या -खुद को -रह जाये ना वंचित
एक अपराधी भागा अस्त्र फेंके यहाँ आज माथा है टेका
आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला —
भूल माने जो- पथ शाम फिर लौट आये -न जाए
डाल बाँहों का हार -प्यार देकर चलो साथ स्वागत जताए
चीखती हर दिशा मौन क्यों हम खड़े ? आह सुनकर तो धाएं
भूख से लड़खड़ा पथ भटक जा रहे बाँट टुकड़े चलो साहस बढ़ाएं
स्वच्छ परिवेश रख -फूल मन को समझ
ध्यान इतना कहीं ये न मुरझाये
देख सूरज न कल का कहीं लौट जाए —-
आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला
सहमा ठगा सा खड़ा झांकता था
आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
२.६.२०११

खटमल देखो -बढे जा रहे- बड़े प्रभावी

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on मंगलवार, 19 अप्रैल 2011 | 8:18 am




खटमल देखो -बढे जा रहे
बड़े प्रभावी
महिमा न्यारी
मोटा इनका पेट
लगे सेठ हैं -या हैं नेता
कोई रोंक न टोंक
खून चूसते उन्हें पिलाते
रक्त बीज सा  बढ़ते  जाते
रात ही क्या -अब दिन में निकलें
फिरते मूंछे ताने !!

सौ-सौ उनके पीछे घूमें
पकड़ो तो हम जानें

चार दिशाओं में ये भागें
देखो इनकी चाल
अगर रसायन-बम भी डालें
मरते बस दो -चार

ना ट्रैफिक की परवा इनको
ना नस-बंदी मानें
चूस भरे जो बोतल हैं ये
दान दिए बढ़ जाएँ

हमने फिर कुछ सोची युक्ति
पानी खौला  कल डालेंगे
रात में सारे छू मंतर थे
कैसे बड़े गुप्तचर निकले
सोच सोच मै पागल होता
कौन बताया कैसे जानूं

कोई दुश्मन बीच हमारे
थाली मेरे खाता -सोता

कहें भ्रमर आओ सब मिल के
चारों दिशा खड़े हो जाओ
हाथ जोड़ लो -घेरा डालो
सौ सौ को तुम मसलो मारो !!

यही अंत है भले तुम्हे ये
बुरा लगे है मन छू जाये
हाथ तुम्हारा सने खून से
कितनी सारी बदबू आये

या फिर इनका
डी एन ए तुम चेंज करा दो
पिछली पीढ़ी को ही इनके
भाई मेरे बदल तू डालो

बचपन ही से प्यार इन्हें तुम
नफरत ना -
पृथ्वी अपनी -अपनी संस्कृति
सभी सिखा दो
कहें भ्रमर खटमल ना इनको
कुछ और  बना दो -

सुन्दर सी एक ज्योति धरा दो  
कर में इनके
ले मशाल ये भी बढ़ जाएँ 
कल को जीतें 
मन सब का ये- विश्व विजय
कर- घर तेरे फिर -फिर फिर आवें !!

दुनिया देखे -खटमल - खटमल
कह के फिर ना लोग तेरी
आत्मा को सालें  !!!
 या फिर आत्मा को हे बंधू
कल का सपना इनका देखे
आज से ही मजबूत बना ले !! 


सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
१६.०४.2011

हे ‘माँ’ तू है कितनी ‘भोली’-‘दर्द’ हुआ तो चुप के ‘रो’ ली

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on रविवार, 10 अप्रैल 2011 | 10:08 am


 हेमाँ’ तू है कितनीभोली’-‘दर्द’ हुआ तो चुप केरो’ ली
हेमाँ’ !!  मुझको क्षमा करे तू
मुझको गुस्सा तुझ पर आता !
कुछ भी यहाँ बनाती जाती
अर्थ -हीन है -रस -विहीन जो
आग भरी है जिनके दिल में
‘होली’ उन्हें जलाना आता
रंग जिन्हेंकाला’ ही भाता
जो जाने हीरा’-मोती’
‘कौआ’   -‘कोयला’ बस मन भाता
‘धवल ‘–‘चांदनी’-‘श्वेत’-‘ दिवस’ ना
‘अँधियारा’-‘रजनी’- ही भाता
तोड़ फोड़ करपुष्पों’ को वे
‘राह’ में फेंके जाते
रोज एकफुलवारी’ नोचे
सभा  मेंनाच’- ‘नचाते’
‘चीर’-‘हरण’ कर घूमे जाता  
नहींकृष्ण’ अब- ‘कंस’ कहे -है
हँस -हँस  घूमे
छुरा’ घोंप केसीने’ में
वो अपनीमाँ’ के
‘बाप’ के अपने
‘बदनाम’ करे है
‘मानवता’ को लूटे
चोर-सिपाही तंत्री मंत्री 
‘घर’ –‘आँगन’ से ‘संसद’ तक 
जो खड़ा हुआ हैरक्षक’-‘भक्षक’ 
‘माँ’   तूने उसे बनाया 
‘पाल’ –‘पोष’  कर 'आँचल' अपने
तूनेदूध’ पिलाया 
‘गढ़ने’ में क्या ‘भूल’ हुयी माँ
कहाँ –कभी- क्या तुमने सोचा??



 वो 'त्रिशूल' क्यों आज 'शूलहै
याद करो कुछबचपन’ के दिन
‘आग’ लगाया था उसनेघर’
बढ़ी नदी में कूदा
गुडिया तोड़फेंक’ देता वो
कभी जलाताहोली’
बिन- मौसम के बरस वो जाता
थाली देता फेंक
उनकी जेब थी खाली होती
नौकर पर लगती थी चोरी
‘लात’ मारता था जब तुझको 
‘दर्द’ तुम्हे था होता ??
कहती थीअनजान’ तू उसको 
बड़ाभरम’ ये होता
‘कान’ पकड़ ना उसे सिखाया
तूने तो बसचाँद’ दिखाया
‘लोरी’ गा-गा उसे सुलाया
हेमाँ’ तू है कितनी भोली !!
‘पुचकारे’ -  गोदी’ में भर के
"दर्द' हुआ तो चुप के –‘रो’ ली !!
मै हूँ तेरालाल’ वही माँ
लौट नहीं अब पाऊँ !!
गुस्सा तुझ पर मुझको आता
अब ना कुछ कर पाऊँ 
‘काटे’ सेकदली’ फले
कैसे मै समझाऊँ !!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर
..२०११

Founder

Founder
Saleem Khan