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खारे सागर में डूबे हम गोता लायें मोती ढूंढें

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on बुधवार, 20 अप्रैल 2011 | 9:09 am

















(photo with thanks from other source)


आओ आज चलें उस दुनिया
खारे सागर में डूबे हम
गोता लायें मोती ढूंढें
ताज में अपने -सिंहासन में
अपने जड़ के

इस उफान में
हहर- हहर कर उठी तरंगे
चली बदलने दुनिया को जो
स्वागत उनका
आओ हाथ मिला कर -कर लें
बड़ी पुनीत है आत्मा उसकी
आओ करें समर्पण हम अब
गोदी उसकी इस अथाह में
भुला के सब कुछ
चैन से फिर सो जाएँ
तभी कल्पना मूर्त हमारी
शांति -लहर -ये रहे झुलाती
थपकी देकर
ऊपर नीचे
तन्हाई की गहराई में
जहाँ स्याह अँधियारा पलता
चाँद दिखाती
उजियारा कुछ
धवल चांदनी
दिल में अपने भर लायें
सपनों के इक राज महल में
कोई दीप जला जाये
उजियारा कर कोई प्रेयसी
जूही चंपा बेला जैसी
खुश्बू  देती
अन्तरंग महका जाये
जल तरंग की-परियां जल की
व्यथा वेदना हर जाएँ
आओ खुद को करें सुवासित
अंतर अपना पुष्प सरीखा
धवल -चांदनी वेद ज्ञान से
आज आत्मा को हम अपनी
अमृत तुल्य  बना डालें
हो गंगा सी -जिसमे आकर
खारा सागर -तर जाये

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५
..२०११ जल पी बी

इससे अच्छा ‘कालिख’ पोतो इसपे ये चुप हो जायेगा

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on सोमवार, 18 अप्रैल 2011 | 11:53 am


इससे अच्छा कालिख पोतो इसपे
ये चुप हो जायेगा

दर्पण में कुछ धूल जमी थी
अंतर्मन बोला -साफ करूँ
चमकाऊँ कुछ
बढे रौशनी
दूर -दूर तक फैले
देख रौशनी वे भी जागे
पड़े अभी जो मैले 
कुछ कुरेद कर देखा मैंने 
बिम्ब’- हमारा-बड़ा ‘भयावह 
कुछ कहता था 
अट्टहास कर हमपे हँसता 
पल छिन तो मै लड़ा जोर से  
 गुण अपना बतलाया
उसने मेरा भूत दिखाकर
गूंगा मुझे बनाया
कलई – ‘पोल खोलते भाई
वर्तमान-से आगे आया
डरा बहुत मै
निज चेहरे से
कहीं न दुनिया देखे
कहीं उठा न लें वे पत्थर
जो मुझको हैं पूजे
कहीं अगर ये साफ़ हो गया
स्वच्छ -छवि दिखलायेगा
इससे अच्छा कालिख इसपे-
पोतो - ये चुप हो जायेगा
अगर तोड़ता उसको मै तो
बनते कई ‘हजार !
इससे अच्छा गाड़ इसे मै
घूमूँ अब दरबार !!
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर5
10.04.2011

हे ‘माँ’ तू है कितनी ‘भोली’-‘दर्द’ हुआ तो चुप के ‘रो’ ली

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on रविवार, 10 अप्रैल 2011 | 10:08 am


 हेमाँ’ तू है कितनीभोली’-‘दर्द’ हुआ तो चुप केरो’ ली
हेमाँ’ !!  मुझको क्षमा करे तू
मुझको गुस्सा तुझ पर आता !
कुछ भी यहाँ बनाती जाती
अर्थ -हीन है -रस -विहीन जो
आग भरी है जिनके दिल में
‘होली’ उन्हें जलाना आता
रंग जिन्हेंकाला’ ही भाता
जो जाने हीरा’-मोती’
‘कौआ’   -‘कोयला’ बस मन भाता
‘धवल ‘–‘चांदनी’-‘श्वेत’-‘ दिवस’ ना
‘अँधियारा’-‘रजनी’- ही भाता
तोड़ फोड़ करपुष्पों’ को वे
‘राह’ में फेंके जाते
रोज एकफुलवारी’ नोचे
सभा  मेंनाच’- ‘नचाते’
‘चीर’-‘हरण’ कर घूमे जाता  
नहींकृष्ण’ अब- ‘कंस’ कहे -है
हँस -हँस  घूमे
छुरा’ घोंप केसीने’ में
वो अपनीमाँ’ के
‘बाप’ के अपने
‘बदनाम’ करे है
‘मानवता’ को लूटे
चोर-सिपाही तंत्री मंत्री 
‘घर’ –‘आँगन’ से ‘संसद’ तक 
जो खड़ा हुआ हैरक्षक’-‘भक्षक’ 
‘माँ’   तूने उसे बनाया 
‘पाल’ –‘पोष’  कर 'आँचल' अपने
तूनेदूध’ पिलाया 
‘गढ़ने’ में क्या ‘भूल’ हुयी माँ
कहाँ –कभी- क्या तुमने सोचा??



 वो 'त्रिशूल' क्यों आज 'शूलहै
याद करो कुछबचपन’ के दिन
‘आग’ लगाया था उसनेघर’
बढ़ी नदी में कूदा
गुडिया तोड़फेंक’ देता वो
कभी जलाताहोली’
बिन- मौसम के बरस वो जाता
थाली देता फेंक
उनकी जेब थी खाली होती
नौकर पर लगती थी चोरी
‘लात’ मारता था जब तुझको 
‘दर्द’ तुम्हे था होता ??
कहती थीअनजान’ तू उसको 
बड़ाभरम’ ये होता
‘कान’ पकड़ ना उसे सिखाया
तूने तो बसचाँद’ दिखाया
‘लोरी’ गा-गा उसे सुलाया
हेमाँ’ तू है कितनी भोली !!
‘पुचकारे’ -  गोदी’ में भर के
"दर्द' हुआ तो चुप के –‘रो’ ली !!
मै हूँ तेरालाल’ वही माँ
लौट नहीं अब पाऊँ !!
गुस्सा तुझ पर मुझको आता
अब ना कुछ कर पाऊँ 
‘काटे’ सेकदली’ फले
कैसे मै समझाऊँ !!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर
..२०११

छवि ‘माँ’ की धूमिल करते जो -‘पाप’ कर रहे सौ-सौ

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011 | 5:20 pm


छविमाँ’ की धूमिल करते जो -‘पाप’ कर रहे सौ-सौ


                                     ( फोटो साभार और धन्यवाद के साथ अन्य स्रोत से लिया गया )

 माटी’ के 'लाल' हमारे
'शक्ति' रूपिणी 'नारी'
आओहाथ’ बढाओ अपना
‘चीख’ सुनो हे भाई
‘माँ’ ने तुम्हे पुकारा है अब
‘रखवाले’ सब आओ
छविमाँ’ की धूमिल करते जो
‘पाप’ कर रहे सौ-सौ
कोई नोच -खसोट रहा है
‘महल’ बनाये नौ -सौ
कहीं एकभूखा’ मरता है
‘बिन व्याही’-बेटी’ बैठी
फटी -धरा है
बीज -नहीं है
 मराकृषक’ लेकर्ज’ कहीं है
‘विधवा’ घररोती’ बैठी
भरा हुआ धन देश हमारे
‘सोने की चिड़िया’ हम अब भी
आओ करेंशिकार’ उसी का
जोचिड़िया की घात’ में बैठा
बीच हमारे
‘जाल’ बिछाए
‘दाना डाले’
‘फंसा’ रहा है
‘कैद’ में कर के
‘गला दबा’ के
‘डरा’ रहा है
'उड़ा' जा रहा -उस 'सागर के पार' !!                                                                                         आओ उसको हम दिखला  दें
‘ताकत’ अपनी –‘माँ’ की भक्ति
बड़े हमारेलम्बे हाथ’ !
हमशक्ति’ हैं !
‘काली’ भी हम !
गला काटकर
मुंड-माल ले -पहने चाहें !!
‘भैरव’ भी हम
‘रौद्र रूप’ हम धारण करके
‘तांडव’ भी करना जानें
अगर तीसरा- नेत्र
हमारा-शिव हो -शिव हो
‘शिव’ की खातिर
खुला तो कांपेगी -धरती फिर
काँप उठे सारा संसार !!

अगरप्रलय’ ना अब भी चाहो
तोधारा’ के साथ बढ़ो
चूम गगन -फहरा दोझंडा’
आजतिरंगा’
दूषितमन’ का दहन करो !!!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भरमार
..२०११

Founder

Founder
Saleem Khan