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विज्ञान तो आना ही चाहिए....

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on बुधवार, 2 अक्टूबर 2013 | 2:41 am

आज के जमाने में विज्ञान आपको जरूर आना चाहिए। अगर विज्ञान नहीं आता तो, कम से कम विज्ञान समझना तो आना ही चाहिए। विज्ञान वैसा नहीं कि एक पौधे का अध्ययन करने लग गए। विज्ञान वैसा भी नहीं कि विज्ञानिक  बन गए। मुझे विज्ञान नहीं आता था। कभी नहीं आया, तो मैंने जिल्लत भी खूब झेली। इसलिए मैं चाहता हूं कि अब आने वाली हर पीढ़ी को विज्ञान आए।
एक बार तो मेरी दीदी के ससुर ने मुझे बिल्कुल ही बेज्जत कर दिया था। ऐसे नहीं कि यह कहा हो, तुम्हें विज्ञान क्यों नहीं आता, बल्कि दूसरे तरीके से। हुआ यूं कि हम लोग आंगन में बैठे थे, कि तभी बरामदे में टेलीफोन घनघनाया। तो वे गए उस पर बात करने लगे, थोड़ी देर बाद आए, तो बोले, रवि बड़े पीछे रह गए। रवि उनके छोटे भाई के छोटे बेटे हैं, उन्होंने आगे कहा, रवि ने बारहवीं तक तो मन लगाकर पढ़ाई की फिर भटक गए। बीए कर बैठे। आज कल विज्ञान के बिना होता है भला कुछ। अब मुझे काटो तो खून नहीं। क्या बोलता, इसलिए हूं...हूं करके मुस्कुराया कुछ यूं जैसे गरीब आदमी भव्यता देखकर स्माइली चेहरा लिए और दीन सा लगने लग जाता है।
इसलिए मैं कहता हूं विज्ञान जरूर समझो और सीखो। यह सोचते-सोचते मेरी आंख लग गई। यूं तो मुझे कभी सपने नहीं आते, मगर आज आ गया। यह सपना डरावना था, सुहावना था, मजेदार था, कह तो नहीं सकता। मगर देखने के बाद विज्ञान भाई का महत्व समझ लिया और यह भी जान लिया, कि विज्ञान भाई का भरपूर इस्तेमाल करने से भी वे खुश रहते हैं।
सपने में देखा, कि मैं मुंबई में हूं। वहां पहुंचने में मुझे 16 घंटों से भी ज्यादा का वक्त लगा है। वहीं मेरे साथ एक मेरे ही जैसी हैसियत वाले और भी गए थे, तो वे जरा में पंहुच गए। मुझे लगा, वे शायद फ्लाइट से आए होंगे। लेकिन मन मानने ही तैयार नहीं हुआ। चूंकि वे खटारा सी मोटरसाइकिल से ऑफिस आते हैं, और पत्रकारों की सेवा आजकल कौन करता है, अखबार मालिक ही सेवाएं लेने के लिए तत्पर हैं तो। फिर ऐसा हो कैसे सकता है, कि वे फ्लाइट से आएं।
तभी वहां किसी शख्स ने कहा वे कूदकर आए हैं। मुझे लगा ये कैसे आना हुआ। आजतक तो मैं बैलगाड़ी, घोड़े की पीठ, साइकिल, मोटरसाइकिल, ऑटो, बस, रेल या हवाई से ही सफर के बारे में सुनता आया हूं, यह कूदकर आना क्या हुआ। तब किसी ने कहा आपको नहीं पता? मैंने अज्ञानता में सिर हिलाया, ठीक वैसे ही जैसे 11वीं में रसायन पढ़ते वक्त हिलाता था। बस फर्क इतना था, कि 11वीं क्लास में जब रसायन नहीं समझ आती तो न में सिर हिलाने से भी मैडम दोबारा नहीं समझाती, बल्कि दीन, बुद्धिहीन सोचकर अगले चैप्टर की ओर बढ़ जाती। मैं भी अपनी राह पकड़ लेता, चलो अच्छा हुआ, वह समझाती भी तो कौन अपन को समझ में आने वाली थी। फिर कहीं वह यह पूछती कि क्या समझ में नहीं आया तब तो अपन मर ही जाते। क्या बताते?
किंतु यहां वाले विज्ञानी ने समझाया। उन्होंने कहा आज कल स्वप्न टेक्निक आ गई न। इसमें एक परोगराम होता है, दिमाग में। बस तो उसे एक्टिवेट कर दो फिर जैसे ही नींद लगेगी, जो कुछ भी आपने उस परोगराम में सेट किया है, उसके मुताबिक आप वहां पहुंचा जाओगे। बस इसे ही कूदना कहते हैं।
हमें यकीन नहीं हुआ, तो उन्होंने एक्सपैरीमेंट करके बताया। वे सोफे पर बैठे और हाथ माथे पर लगाकर कुछ करने लगे और अगले 5 मिनट में वैपोराइज होने लगे। बस क्या था, देखते ही देखते वहां सोफे पर बैठा वह पूरा खासा आदमी गायब हो गया। वह देखकर मैंने भी माथा रगड़ा, कुछ नहीं हुआ। थोड़ी देर बाद वह भाई सामने रखे एक सोफे पर जमने लगा। मुझे याद आया जैसे धार्मिक धारावाहिकों में लोग गायब होते हैं, वैसे ही कुछ हुआ। तब वे पूरे आ चुके थे, तो बोले, देखा। इसे कोई चमत्कार न समझें, बस एक छोटा सा एप मैं दूंगा उसे आप कान में डराप की तरह डाल लेना, वह दिमाग में जाएगा और इंस्टॉल हो जाएगा। फिर मैं आपको ऑपरेटिंग बता दूंगा।
हमारा मुंह खुला है तो बंद नहीं हो रहा था। दिमाग मे एक एप्लीकेशन कान से डरॉप के जरिए भी इंस्टॉल हो सकती है।
हमने उन सज्जन से कहा आप तो महान हैं, तो वे बोले। इसमें महान कैसा? मैंने थोड़े ही बनाया है, यह तो बाजार में मिलता है। बस हमें यूज करना है। तब मुझे समझ में आया कि विज्ञान को यूज करना भी एक तरह का विज्ञानी बनने जैसा है। हमें इस एप के बारे में बताने वाला शख्स हमें कुछ पलों के लिए तो भगवान लगा, ठीक उसी तरह जैसे बॉयो पढ़ाने वाले व्यासजी लगते थे। चूंकि उन्हें वह आता था, जो हमें नहीं आता था और हमें जो आता था, वह उन्हें न आए यह हो नहीं सकता था। यानी गाली, क्लास बंक,बहाने, स्कूल न जाने के 100 तरीके आदि। व्यासजी के बारे में ऐसी ही किंवदंतियां थी, उस वक्त कि वे बहुत बड़े विज्ञानी होते, अगर स्टेशन पर सोए नहीं होते। हमें लगता था सही होगा, चूंकि उन्हें बॉयो आती भी थी। विज्ञानी और किसे कहते हैं? अब करीब 15 सालों बाद क्लियर हो रहा है, कि विज्ञान को मानना ही उसे समझना है, सीखना है, इस्तेमाल ही उसका सही ज्ञान है।
- सखाजी


अमन का पैग़ाम टी. वी. और सय्यद मुहम्मद मासूम साहब की वेबसाइट्स से क्यों नाराज़ हैं नफ़रत की फ़ज़ा बनाने वाले ?

Written By DR. ANWER JAMAL on रविवार, 10 जुलाई 2011 | 7:40 am

‘अमन का पैग़ाम‘ आज एक कसौटी की शक्ल अख्तियार कर चुका है। कोई भी नफ़रत फैलाने वाला इस ब्लॉग पर नहीं आता है और अगर आ भी जाए तो ‘अमन का पैग़ाम‘ के साथ दो क़दम भी नहीं चल पाता। बहुत बड़े समझे जाने वाले बहुत से नाम ऐसे हैं जो कि यहां कभी नज़र ही नहीं आए।
सय्यद मुहम्मद मासूम साहब को ब्लॉग जगत में एस. एम. मासूम के नाम से जाना जाता है। वह ख़ुद तो मुंबई में रहते हैं लेकिन उनका दिल जौनपुर में रहता है। जौनपुर से अपना ताल्लुक़ क़ायम रखने के लिए उन्होंने ब्लॉग भी बनाया है और एक वेबसाइट भी बनाई हुई है, जिन पर जौनपुर के मंदिर-मस्जिद से लेकर जौनपुर की मूली और मिठाई तक के बारे में जानकारी मिल जाती है।
इसके बावजूद ब्लॉग जगत में उनकी पहचान ‘अमन के पैग़ाम‘ की वजह से है।
हालांकि ब्लॉग तो उनके कई हैं
1.      हक़ और बातिल
2.      बेज़बान
3.      ब्लॉग संसार
और इसके अलावा कई वेबसाइट्स भी हैं  और यू ट्यूब पर अमन का पैग़ाम टी. वी. भी है।
इसके बावजूद जब भी जनाब मासूम साहब का नाम लिया जाता है तो उनके नाम के साथ ‘अमन का पैग़ाम‘ ब्लॉग ही याद आता है।
आखि़र इसकी वजह क्या है ?
यह जानने के लिए देखें निम्न लिंक :
http://www.hamarivani.com/user_profile.php?userid=692&blog_id=1001

इनाम महाघोटाले के छल का शिकार, चर्चित युवा ब्लॉगर सलीम ख़ान Interview (Hot News)

Written By DR. ANWER JAMAL on शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011 | 10:17 am


me
अस्सलामु अलैकुम !
स्वच्छ
ws
Sent at 8:12 AM on Friday
me
जनाब सलीम ख़ान साहब ! हिंदी ब्लॉगर्स को परिकल्पना समूह की तरफ़ वर्ष 2010 में ईनाम दिये जाने की जो घोषणा हुई थी, क्या उसमें आपका नाम मौजूद था ?
Sent at 8:14 AM on Friday
स्वच्छ
नहीं, मैंने देखा था लेकिन मेरा उसमें कहीं भी नाम नहीं है जबकि मैं पिछली मर्तबा आयोजकों में से था
Sent at 8:15 AM on Friday
me
आपको किस शीर्षक के अंतर्गत ईनाम दिया जा रहा था ?
स्वच्छ
मुझे  वर्ष  के  सर्वाधिक  चर्चित  ब्लॉगर  अंतर्गत   ईनाम  दिया गया  था. 
Sent at 8:18 AM on Friday
me
अब जो नई सूची हिंदी ब्लॉगर्स के सामने पेश की जा रही है, क्या उसमें आपका नाम मौजूद है ?
स्वच्छ
nahin
me
तो क्या आप यह कहना चाहते हैं कि इस सम्मान समारोह के आयोजकों ने ईनाम की मूल सूची ही बदल डाली है ?
स्वच्छ
पिछली मर्तबा जब घोषणा हुई थी उसमें मेरा नाम सर्वाधीक चर्चित ब्लॉगर में नाम था और मैं संयोजकों में से था मगर अबकी लिस्ट में मेरा नाम ही ग़ायब है
me
आप क्या समझते हैं कि आपके साथ ऐसा क्यों किया गया ?
Sent at 8:22 AM on Friday
स्वच्छ
मुझे नहीं मालूम, मगर कहीं न कहीं गहरी साज़िश  हुई है. रविन्द्र मेरे सहयोगियों में से हैं, मेरे ही शहर के ही हैं, लखनऊ ब्लॉगर्स एसोशियेशन और परिकल्पना व लोक संघर्ष के बैनर तहत उक्त इनमता दिया जा रहा था जिसके सर्वेसर्वा रविन्द्र थे और मुझे सम्मान भी मिला. बा जब इनाम की बात हो रही है तो उसमें मेरा नाम ही नहीं है.
me
सुना है कि परिकल्पना समूह वाले श्री रवीन्द्र प्रभात जी लखनऊ के नहीं हैं लेकिन उन्हें लखनऊ के लोगों ने हर तरह से सम्मान दिया है, तब उन्होंने लखनऊ के ही एक आदमी का नाम सम्मान सूची से क्यों निकाल दिया ?
Sent at 8:24 AM on Friday
स्वच्छ
हाँ, मूल रूप से वह लखनऊ के नहीं है. और मेरे द्वारा  लखनऊ ब्लॉगर्स एसोशियेशन के अध्यक्ष  बनाये  जाने  के पूर्व  उन्हें  कम  ही लोग  जानते  थे.
हाँ, मूल रूप से वह लखनऊ के नहीं है. और मेरे द्वारा लखनऊ ब्लॉगर्स एसोशियेशन के अध्यक्ष बनाये जाने के पूर्व उन्हें कम ही लोग जानते थे.
me
क्या आपको हिंदी ब्लॉगर्स को दिए जा रहे सम्मान समारोह में आने के लिए निमंत्रित किया गया है ?, किसी तरह का कोई निमंत्रण पत्र आपको दस्ती या फिर ईमेल से भेजा गया हो, जैसा कि सभी हिंदी ब्लॉगर्स को भेजा गया है ?
स्वच्छ
नहीं मुझे कोई निमंत्रण नहीं मिला
Sent at 8:29 AM on Friday
स्वच्छ
आखिर किस मुहँ से वो मुझे निमंत्रित करते.  उनके इस निंदनीय कृत्य के पीछे उनके सीने में तो पूर्वाग्रह बसा है
me
बड़े ताज्जुब की बात है ख़ान साहब। क्या कभी श्री रवीन्द्र प्रभात जी ने आपको फ़ोन भी नहीं किया बुलाने के लिए ?
स्वच्छ
नहीं
Sent at 8:31 AM on Friday
me
क्या आपने उनके साथ कभी अशिष्ट व्यवहार किया ? या उनका कोई हक़ आपने मारा हो ? क्या कभी उन्होंने आपसे आपके किसी व्यवहार की कोई शिकायत की ? जिससे आपके प्रति उनकी नाराज़गी का पता चलता हो।
Sent at 8:33 AM on Friday
स्वच्छ
नहीं ऐसा सलीम कर ही नहीं सकता. मैं सदैव सत्य के साथ रहा, व्यक्ति विशेष के प्रति लगाव मेरा तभी रहा जब वह सत्य पर हो. मैंने रविन्द्र जी का कभी कोई हक नहीं मारा बल्कि वे तो स्वयं ही लखनऊ ब्लॉगर्स एसोशियेशन का दामन छोड़ कर भाग गए.
और आज तक न फ़ोन किया और न ही कोई मेल. इसे आप क्या कहेंगे भगौड़ा और क्या?, 
लेकिन मैं उन्हीने भगौड़ा नहीं कहूँगा
me
चलिए श्री रवीन्द्र जी ने आपको निमंत्रित नहीं किया न सही लेकिन श्री अविनाश वाचस्पति जी तो आपको नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते, क्या उन्होंने भी आपको नहीं बुलाया

स्वच्छ
श्री अविनाश वाचस्पति जी  ने कोई निमंत्रण नहीं दिया और न ही फोन  किया.  श्री अविनाश वाचस्पति जी  का मैं सम्मान करता हूँ, chat  पर कई मर्तबा बात हुई जिसमें उन्होंने जीवन में कभी भी किसी भी ब्लॉग पर या अपने ब्लॉग पर टिपण्णी न करने की कसमें खाईं थीं और मैंने उन्हीने समझाया था.
me
अगर दोनों ने ही आपको इतने चर्चित सम्मेलन में नहीं बुलाया है तो क्या यह हिंदी ब्लागर्स के दरम्यान गुटबाज़ी को रेखांकित नहीं करता ?
Sent at 8:39 AM on Friday
स्वच्छ
यकीनन ऐसा ही है क्यूंकि अगर ऐसा नहीं होता तो वे मुझे अवश्य बुलाते अथवा सम्मान देते. हालंकि मैं सम्मान का भूखा नहीं. क्यूंकि न जाने कितने ब्लॉगर्स इस लिस्ट में शामिल नहीं. लेकिन मेरी शिकायत यह है की मैन्न्स्वयम आयोजकों में से था. और मेरा ही नाम ग़ायब है ये तो ऐसे ही हुआ की अपने शादी के कार्ड में अपने बाप का नाम ही नहीं लिखा.
मैन्न्स्वयम= मैं स्वयं
Sent at 8:43 AM on Friday
me
क्या आपने किसी पोस्ट के माध्यम से यह सब ब्लॉग जगत को कभी बताया है ?
क्या आम हिंदी ब्लॉगर यह सब जानता है कि आपके साथ यह सब अन्याय किया गया
?
Sent at 8:45 AM on Friday
स्वच्छ
नहीं मेरी ऐसी आदत नहीं है लेकिन जब अपने मुझसे पूछा तो बता दिया. अब आम ब्लॉगर्स को तो पता चलना ही चाहिए की ब्लॉग जगत में भी गुटबाजी चल रही है
me
कोई संदेश जो आप ‘ब्लॉग की ख़बरें‘ के माध्यम से हिंदी ब्लॉग जगत को देना चाहें ?
Sent at 8:47 AM on Friday
स्वच्छ
जी हाँ, ब्लॉग जगत को सीधी राह पर और सार्थक सन्देश देने के नाम पर जो इनाम की बंदरबांट हुई है वह वाकई चिंतनीय है हिंदी ब्लॉग जगत के हित में नहीं है. यहाँ सब नेताओं की तरह मौक़ापरस्त  हो गए हैं. जब सलीम नाम की सीढ़ी की ज़रूरत थी तो आयोजक बना कर चर्चा में आ गए. जब सलीम की ज़रुरत थी तो साइंस ब्लॉग में उसे शामिल किया फिर लिखने की पॉवर ही छीन ली. यह सब क्या है???? लेकिन मैं इन्तिज़ार करूँगा और प्रयासरत भी रहूँगा हिंदी की सेवा के लिए. आपने मुझे तीसरी बार जगाया है हिंदी सम्मान कीई घालमेल से अवगत कराया. वैसे मैं अवगत कराऊंगा. लगता है इसीलिए मुझे हमारिवानी से निकलवा दिया और मेरे ही चेले शाहनवाज़ को मेरे खिलाफ कर दिया.
Sent at 8:51 AM on Friday
me
ख़ान साहब ! आपका शुक्रिया कि आपने अपना क़ीमती समय हमारे ‘वर्चुअल न्यूज़पेपर‘ को दिया।
स्वच्छ
शुक्रिया
me
ख़ान साहब ! जो सच आज तक हिंदी ब्लॉग जगत से छिपा रहा है, उसे ‘ब्लॉग की ख़बरें‘ हिंदी ब्लॉगर्स के सामने रखकर यह ज़रूर पूछेगा कि आप सभी विचारशील लोग हैं, सारे हालात को सामने रखकर सोचिए कि ब्लॉगिंग के नाम पर गुट बनाना और अपनी रंजिंशें निकालना ब्लॉग जगत को किस ओर ले जा रहा है ?
ऐसे लोगों को मार्गदर्शक और सिरमौर बनाना ‘हिंदी ब्लॉगिंग के भविष्य‘ के लिए फ़ायदेमंद कहा जाएगा या फिर घातक ?
bye
Khuda Hafiz
स्वच्छ
यकीन एक डॉक्टर के ओपरेशन की माफिक फायदेमंद होगा'
Sent at 8:54 AM on Friday
स्वच्छ
चलते चलते मैं आपको यह भी बता दूं कि http://utsav.parikalpnaa.com/ पर अभी भी मेरा नाम आयोजन समिति में चमक रहा है
Sent at 8:56 AM on Friday
me
आपने यह भी एक हैरतअंगेज़ तथ्य उजागर किया है। आपके इंटरव्यू के लिए हम आपके शुक्रगुज़ार हैं।
Sent at 8:57 AM on Friday
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तो साहिबान ! जो सच अब तक था पर्दे के पीछे, अब वह आ चुका है मंज़रे आम पर, आप सबके सामने। एक ऐसा सच जिसे कहने से टालते रहे जनाब सलीम ख़ान साहब आज तक और जो लोग उनके साथ अन्याय करते रहे उन्होंने भी यह सच आपके सामने आने नहीं दिया आज तक। 
यह है आज हिंदी ब्लॉगिंग का नंगा सच, जिसे आप देख पा रहे हैं ‘ब्लॉग की ख़बरें‘ पर। पहला वर्चुअल समाचार पत्र, जो आपको बाख़बर रखता है हिंदी ब्लॉगिंग के सच से, सच जो कड़वा होता है, सच जो असहनीय होता है, लेकिन सच ही अमृत होता है। हिंदी ब्लॉगिंग की आत्मा का हनन हो नहीं सकता जब तक कि सच बोलने के लिए ‘ब्लॉग की ख़बरें‘ मौजूद है और इसके ज़रिये सच जानने के ख्वाहिशमंद ब्लॉगर्स मौजूद हैं।
जनाब सलीम ख़ान साहब को सर्वाधिक चर्चित ब्लॉगर के शीर्षक के तहत पुरस्कृत किया जा रहा था और अब उनका चर्चा कहीं भी नहीं है ?
जबकि उनका नाम आयोजन समिति में अब भी चमक रहा है। जिसका फ़ोटो भी आप देख सकते हैं और दिए गए लिंक पर जाकर प्रमाणित भी कर सकते हैं।
जिन ब्लॉगर्स को सम्मानित किया जा रहा है, उनमें से अधिकतर ने हिंदी ब्लॉगिंग को अपना यादगार योगदान दिया है। उनका हम भी सम्मान करते हैं। उनका काम ही उनका सम्मान है, उनके काम को सम्मान मिलना ही चाहिए लेकिन सम्मान की आड़ में व्यक्तिगत रंजिंशें निकालना कहां तक उचित है ?
आज यही सवाल हम सबके सामने है।
विचारशील ब्लॉगर्स विचार करें कि अपने व्यापार के लिए, अपनी लिखी किताब की पब्लिसिटी के लिए सम्मानित ब्लॉगर्स को अपनी तुच्छ रंजिश और अपनी राजनीति के लिए इस्तेमाल करना कहां तक उचित है ?
अपना जवाब आप टिप्पणियों के माध्यम से खुलकर दें ताकि आइंदा आयोजित होने वाले कार्यक्रम गंदी गुटबाज़ी के मनहूस साये से दूर रहें।
ऐसी ही रोचक और खोजपूर्ण रिपोर्ट लाता रहेगा ‘ब्लॉग की ख़बरें‘।
हिंदी ब्लॉग जगत का सबसे पहला और सबसे विश्वसनीय अख़बार
जो लिखता सदा सच ।
जय हिंद ! 
(यह इंटरव्यू Chat पर लिया गया ताकि संदेह की कोई गुंजाइश ही न रहे.)     

Founder

Founder
Saleem Khan