नियम व निति निर्देशिका::: AIBA के सदस्यगण से यह आशा की जाती है कि वह निम्नलिखित नियमों का अक्षरशः पालन करेंगे और यह अनुपालित न करने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से AIBA की सदस्यता से निलम्बित किया जा सकता है: *कोई भी सदस्य अपनी पोस्ट/लेख को केवल ड्राफ्ट में ही सेव करेगा/करेगी. *पोस्ट/लेख को किसी भी दशा में पब्लिश नहीं करेगा/करेगी. इन दो नियमों का पालन करना सभी सदस्यों के लिए अनिवार्य है. द्वारा:- ADMIN, AIBA

अंग शल्यक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अंग शल्यक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शूर्पणखा काव्य उपन्यास--अन्तिम सर्ग ९..परिणति...अंतिम भाग -दो ...डा श्याम गुप्त....

Written By shyam gupta on रविवार, 8 मई 2011 | 8:18 pm


शूर्पणखा काव्य उपन्यास--अन्तिम सर्ग ९..परिणति...अंतिम भाग -दो .....

(शूर्पणखा काव्य उपन्यास-- नारी विमर्श पर अगीत विधा खंड काव्य .....रचयिता -डा श्याम गुप्त )

         
        पिछली पोस्ट नवम सर्ग.परिणति के भाग एक.. --अपनी दुर्दशा  का कारण राम,- लक्ष्मण व  सीता की सुन्दरता का वर्णन करके , खर-दूषण बध का प्रसन्ग भी बताती है । प्रस्तुत है द्वितीय व अंतिम भाग..१९ .छंद से ३६  तक......
१९-
सुनकर लंकापति की भगिनी ,
लघु भ्राता ने परिहास सहित;
श्रुति-नासा हीन किया मुझको |
उनका  उद्देश्य  यही   शायद,
पृथ्वी को दैत्य विहीन करें ;
मुझको लगता है, हे रावण !
२०-
खर-दूषण-त्रिशिरा,यह सुनकर,
जब   बदला   लेने   को पहुंचे ;
उनका भी सारी सैन्य  सहित,
वध कर डाला क्षण भर में ही |
खर दूषण त्रिशिरा वध सुनकर ,
क्रोधाविष्ट होगया रावण ||
२१-
तू भगिनी वीर दशानन की,
चिंतित मत हो प्रिय शूर्पणखा |
अति कुशल अंग शल्यक१ द्वारा,
वह रूप पुनः सज जाएगा |
सचिवों को कहा तुरंत अभी,
उपचार व्यवस्था करवाएं ||
२२-
वह राम तुझे अपनाएगा,
या मृत्यु-दंड भागी होगा |
वह नारी सीता, रावण के,
अन्तः पुर की शोभा होगी |
लक्ष्मण को तेरा दास्य-भाव ,
या मृत्यु दंड चुनना होगा ||
२३-
विविध भांति निज बल-पौरुष का,
वर्णन करके शूर्पणखा को ;
समझा कर के शांत कराया |
अपने भवन गया फिर रावण ,
खिन्न मना हो चिंतातुर था ;
नींद नहीं आयी आँखों में ||
२४-
अंतर्द्वंद्व चल रहा मन में,
सीता, वही जनक तनया हैं;
धनुष यज्ञ२ जिसके कारण था |
दशरथ-नंदन राम वही हैं,
धनुष भंग करके शंकर का,
परशुराम का मान हर लिया ||
२५-
सुर गन्धर्व दनुज नर, जग में,
एसा   नहीं   वीर    है   कोई ;
मेरे  ही  समान  वलशाली,
खर दूषण का जो वध करदे |
क्या हरि का अवतार होगया,
देवों का प्रिय करने के हित ||
२६-
यदि एसा है तो निश्चय ही ,
मुझको वैर बढ़ाना होगा |
संसारी छल-छंद , द्वंद्व हित,
पाप-पंक में डूब गया तन |
तामस भाव भरा मानस में ,
नहीं हुआ परमार्थ-धर्म कुछ ||
२७-
समय नहीं अब बचा धर्म हित,
तामस तन से भक्ति न होती;
अहं भाव से डूबा तन मन |
निकट आगया है लगता अब,
रावण के उद्धार का समय ;
मुनि का शाप३ समाप्त होरहा ||
२८-
शायद उचित समय यही है,
शूर्पणखा पर किये गए उस;
अन्याय४  से उऋण  होने का |
पश्चाताप अग्नि जो जलती-
मन में, कुछ तो शीतल होगी ;
बदला भी लेना ही होगा ||
२९-
यदि वे हरि  अवतार नहीं तो,
बध कर  दोनों भूप सुतों को ;
उस नारी को हर लाऊंगा |
लंका अधिपति की भगिनी के,
अपमान के परिष्कार हित ;
कठिन दंड तो देना होगा ||
३०-
अथवा प्रभु के वाणों से ही,
मारा जाऊं , तर जाऊंगा |
तामस तन से मुक्ति मिलेगी,
वीर-व्रती जग में कहलाऊँ |
हो उद्धार निशाचर कुल का,
निश्चय ही यह उचित समय है ||
३१-
ज्ञान अहं के तम में भटके,
पाप-पंक में डूबे नर का -
तो प्रारब्ध यही होता है |
प्रभु के हाथों मुक्ति मिले तो,
प्रायश्चित है यह रावण का ;
रावणत्व के अहं भाव का  ||
३२-
निश्चय कर वैर बढाने की,
मन में योज़ना बना डाली |
वह यातुधान मारीचि बना-
कंचन मृग, पंचवटी आया |
बनी भूमिका सिया हरण की -
एवं लंका के विनाश की ||
३३-
मंदोदरी बोली, शूर्पणखा !
क्यों तूने अनुचित कर्म किया ?
अपने को करवाया कुरूप,
अपमान कराया लंका का |
लंकेश हठी कब मानेगा ,
कुल नाश होगया निश्चित है ||
३४-
भाभी   मंदोंदरि ! क्षमा करें-
फल मिला मुझे निज कर्मों का |
भ्राता रावण के साथ सभी,
राक्षस कुल को भी तो अपने ;
कर्मों का भोग भोगना है ,
शायद नियति का खेल यही है ||
३५-
मानव अपने कर्मों से ही,
अपना भवितव्य बनाता है |
हम तो बस केवल हैं निमित्त ,
रचती है नियति ही घटनाएँ-
जब कर्मों के समुचित फल का,
वह ईश सजाता है विधान ||
३६-
यह मातृभूमि  भी क्षमा करे,
मुंह नहीं दिखाने लायक मैं |
गुमनाम किसी अनजान डगर-
पर जीवन होजाए निःशेष |
इतिहास भुला देना मुझको,
थी एक अभागिन शूर्पणखा ||       -------इति...       ---शूर्पणखा काव्य-उपन्यास .......

कुंजिका---  १= प्लास्टिक सर्जन व  अंगों को शल्य क्रिया द्वारा ठीक करने में कुशल अस्थि व अंग शल्यक...कटे हुए  नाक व कान  आदि को प्लास्टिक शल्य द्वारा ठीक करने की सबसे प्राचीन व भारतीय विधि को आज भी अपनाया जाता है जिसे --इन्डियन मेथड  या  शुश्रुत की विधि कहा जाता है | २=  सीता स्वयंबर में स्वयं रावण ने भी शिव-धनुष उठाने का असफल प्रयास किया था अतः वह राम के कौशल से परिचित था....   ३=  नारद-मोह प्रकरण में जय विजय नामक द्वार पालों ने नारद का उपहास किया था अतः नारद के श्राप से वे रावण व कुम्भकर्ण बने थे, अनुनय करने पर नारद जी ने कहा था की विष्णु के अवतारी भाव से ही दोनों का श्राप समाप्त होगा |...   ४= राजनीति के  कारण शूर्पणखा के पति के ह्त्या रावण द्वारा की गयी थी ..परन्तु इस  घटना के कारण रावण को मन ही मन स्वयं को दोषी मानता था और भगिनी के प्रति अन्याय |








Founder

Founder
Saleem Khan