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क्या लिखूँ, कैसे लिखूँ,

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013 | 7:19 pm

क्या लिखूँ, कैसे लिखूँ,
कुछ समझ आता नहीं,
जिन्दगी के यह हालात,
मैं किसी को बतलाता नहीं,

बड़ी बेबसी है,
बड़ी बेकसी है,
दिल में बहुत जगह है,
हर गम दिल की पनाह है,

हाज़िर न प्यार करूँ,
जाहिर न इनकार करूँ,
कैसे लिखूँ अपने मौजू को,
किस-किस का इंतज़ार करूँ,

कलम भी है, कागज़ भी है,
स्याही भी है, मेज भी है,
लिख न कुछ पा रहा हूँ,
हर गम आपसे छुपा रहा हूँ,

आँशु ही बह रहे हैं,
हालात वो सब कह रहे हैं,
पता आपका लिख रहे हैं,
चिट्ठी डाकखाने में डाल रहे हैं,

     ..........   पप्पू परिहार


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विज्ञान तो आना ही चाहिए....

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on बुधवार, 2 अक्टूबर 2013 | 2:41 am

आज के जमाने में विज्ञान आपको जरूर आना चाहिए। अगर विज्ञान नहीं आता तो, कम से कम विज्ञान समझना तो आना ही चाहिए। विज्ञान वैसा नहीं कि एक पौधे का अध्ययन करने लग गए। विज्ञान वैसा भी नहीं कि विज्ञानिक  बन गए। मुझे विज्ञान नहीं आता था। कभी नहीं आया, तो मैंने जिल्लत भी खूब झेली। इसलिए मैं चाहता हूं कि अब आने वाली हर पीढ़ी को विज्ञान आए।
एक बार तो मेरी दीदी के ससुर ने मुझे बिल्कुल ही बेज्जत कर दिया था। ऐसे नहीं कि यह कहा हो, तुम्हें विज्ञान क्यों नहीं आता, बल्कि दूसरे तरीके से। हुआ यूं कि हम लोग आंगन में बैठे थे, कि तभी बरामदे में टेलीफोन घनघनाया। तो वे गए उस पर बात करने लगे, थोड़ी देर बाद आए, तो बोले, रवि बड़े पीछे रह गए। रवि उनके छोटे भाई के छोटे बेटे हैं, उन्होंने आगे कहा, रवि ने बारहवीं तक तो मन लगाकर पढ़ाई की फिर भटक गए। बीए कर बैठे। आज कल विज्ञान के बिना होता है भला कुछ। अब मुझे काटो तो खून नहीं। क्या बोलता, इसलिए हूं...हूं करके मुस्कुराया कुछ यूं जैसे गरीब आदमी भव्यता देखकर स्माइली चेहरा लिए और दीन सा लगने लग जाता है।
इसलिए मैं कहता हूं विज्ञान जरूर समझो और सीखो। यह सोचते-सोचते मेरी आंख लग गई। यूं तो मुझे कभी सपने नहीं आते, मगर आज आ गया। यह सपना डरावना था, सुहावना था, मजेदार था, कह तो नहीं सकता। मगर देखने के बाद विज्ञान भाई का महत्व समझ लिया और यह भी जान लिया, कि विज्ञान भाई का भरपूर इस्तेमाल करने से भी वे खुश रहते हैं।
सपने में देखा, कि मैं मुंबई में हूं। वहां पहुंचने में मुझे 16 घंटों से भी ज्यादा का वक्त लगा है। वहीं मेरे साथ एक मेरे ही जैसी हैसियत वाले और भी गए थे, तो वे जरा में पंहुच गए। मुझे लगा, वे शायद फ्लाइट से आए होंगे। लेकिन मन मानने ही तैयार नहीं हुआ। चूंकि वे खटारा सी मोटरसाइकिल से ऑफिस आते हैं, और पत्रकारों की सेवा आजकल कौन करता है, अखबार मालिक ही सेवाएं लेने के लिए तत्पर हैं तो। फिर ऐसा हो कैसे सकता है, कि वे फ्लाइट से आएं।
तभी वहां किसी शख्स ने कहा वे कूदकर आए हैं। मुझे लगा ये कैसे आना हुआ। आजतक तो मैं बैलगाड़ी, घोड़े की पीठ, साइकिल, मोटरसाइकिल, ऑटो, बस, रेल या हवाई से ही सफर के बारे में सुनता आया हूं, यह कूदकर आना क्या हुआ। तब किसी ने कहा आपको नहीं पता? मैंने अज्ञानता में सिर हिलाया, ठीक वैसे ही जैसे 11वीं में रसायन पढ़ते वक्त हिलाता था। बस फर्क इतना था, कि 11वीं क्लास में जब रसायन नहीं समझ आती तो न में सिर हिलाने से भी मैडम दोबारा नहीं समझाती, बल्कि दीन, बुद्धिहीन सोचकर अगले चैप्टर की ओर बढ़ जाती। मैं भी अपनी राह पकड़ लेता, चलो अच्छा हुआ, वह समझाती भी तो कौन अपन को समझ में आने वाली थी। फिर कहीं वह यह पूछती कि क्या समझ में नहीं आया तब तो अपन मर ही जाते। क्या बताते?
किंतु यहां वाले विज्ञानी ने समझाया। उन्होंने कहा आज कल स्वप्न टेक्निक आ गई न। इसमें एक परोगराम होता है, दिमाग में। बस तो उसे एक्टिवेट कर दो फिर जैसे ही नींद लगेगी, जो कुछ भी आपने उस परोगराम में सेट किया है, उसके मुताबिक आप वहां पहुंचा जाओगे। बस इसे ही कूदना कहते हैं।
हमें यकीन नहीं हुआ, तो उन्होंने एक्सपैरीमेंट करके बताया। वे सोफे पर बैठे और हाथ माथे पर लगाकर कुछ करने लगे और अगले 5 मिनट में वैपोराइज होने लगे। बस क्या था, देखते ही देखते वहां सोफे पर बैठा वह पूरा खासा आदमी गायब हो गया। वह देखकर मैंने भी माथा रगड़ा, कुछ नहीं हुआ। थोड़ी देर बाद वह भाई सामने रखे एक सोफे पर जमने लगा। मुझे याद आया जैसे धार्मिक धारावाहिकों में लोग गायब होते हैं, वैसे ही कुछ हुआ। तब वे पूरे आ चुके थे, तो बोले, देखा। इसे कोई चमत्कार न समझें, बस एक छोटा सा एप मैं दूंगा उसे आप कान में डराप की तरह डाल लेना, वह दिमाग में जाएगा और इंस्टॉल हो जाएगा। फिर मैं आपको ऑपरेटिंग बता दूंगा।
हमारा मुंह खुला है तो बंद नहीं हो रहा था। दिमाग मे एक एप्लीकेशन कान से डरॉप के जरिए भी इंस्टॉल हो सकती है।
हमने उन सज्जन से कहा आप तो महान हैं, तो वे बोले। इसमें महान कैसा? मैंने थोड़े ही बनाया है, यह तो बाजार में मिलता है। बस हमें यूज करना है। तब मुझे समझ में आया कि विज्ञान को यूज करना भी एक तरह का विज्ञानी बनने जैसा है। हमें इस एप के बारे में बताने वाला शख्स हमें कुछ पलों के लिए तो भगवान लगा, ठीक उसी तरह जैसे बॉयो पढ़ाने वाले व्यासजी लगते थे। चूंकि उन्हें वह आता था, जो हमें नहीं आता था और हमें जो आता था, वह उन्हें न आए यह हो नहीं सकता था। यानी गाली, क्लास बंक,बहाने, स्कूल न जाने के 100 तरीके आदि। व्यासजी के बारे में ऐसी ही किंवदंतियां थी, उस वक्त कि वे बहुत बड़े विज्ञानी होते, अगर स्टेशन पर सोए नहीं होते। हमें लगता था सही होगा, चूंकि उन्हें बॉयो आती भी थी। विज्ञानी और किसे कहते हैं? अब करीब 15 सालों बाद क्लियर हो रहा है, कि विज्ञान को मानना ही उसे समझना है, सीखना है, इस्तेमाल ही उसका सही ज्ञान है।
- सखाजी


दो मुसीबतें और आन पड़ी कांग्रेस पर

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on सोमवार, 30 सितंबर 2013 | 1:39 pm

कांग्रेस के लिए दो मुसीबतें और आन पड़ी हैं। अपने 9.6 सालों के कार्यकाल में कांग्रेस ने जितनी मुसीबतें नहीं फेस की होंगी, उतनी वे इसके अंतिम महीनों में फेस करने जा रही है। 

पूरे देश में बने एंटी कांग्रेस माहौल के साथ ही अभी तक कांग्रेस को उम्मीद थी, कि उसकी सहयोगी पार्टियां और छोटे-छोटे दल, निर्दलीय आदि मिलाकर वह दम भर सकती है। लेकिन अब अध्यादेश का वापस होना और लालू को सजा कांग्रेस के लिए उल्टे पड़ रहे हैं। इन दो मुसीबतों से कांग्रेस कैसे निपटेगी और क्या होगा उसका अब राजनैतिक पैंतरा, चलिए जानते हैं।

ऐसे जीत सकती है कांग्रेस

कांग्रेस को 2014 आम चुनाव में अपनी 150 सीटें जरूर मिलने की उम्मीद है, साथ में सपा भी 15 के ऊपर रह सकती है, बसपा भी इतनी ही सीटों पर रह सकती है, एनसीपी भी करीब इतनी ही सीटों पर जीत सकती है। यानी भरोसेमंद एनसीपी और सौदेबाज सपा, बसपा को मिलाकर कांग्रेस 200 तक पहुंचने का कैल्कुलेशन लिए बैठी है। अब उसे जेडीयू और भाजपा की तकरार से थोड़ी बहुत उम्मीद यानी दहाई अंकों की उम्मीद लालू और पासवान से भी है। यानी वह 210 तक पहुंच जाती है। तमिल में एंटी गवर्नमेंट फैक्टर के चलते थोड़े बहुत आंकड़े डीएमके के फेवर में आते हैं, तो वहां भी वह दहाई अंकों के साथ आ सकती है। यानी कांग्रेस पहुंचती है करीब 220 तक। अब आंध्रा में जाकर देखें तो कांग्रेस के अपने परखे हुए अस्त्र सीबीआई पर भरोसा है, खुदा न खास्ता जगन रेड्डी दहाई अंकों तक पहुंच गए तो फिर वह 230 तक पहुंच जाएगी। जगन अस न बस, इधर उधर से कांग्रेस को ही समर्थन देने में भलाई समझेंगे। चूंकि भाजपा उन्हें सीबीआई के चंगुल से मुक्त करवाने का वादा नहीं कर सकती, कांग्रेस ऐसा कर सकती है। लेकिन इसके बाद भी कांग्रेस बहुतम से करीब 42 सीटें दूर रहेगी। कांग्रेस को उम्मीद है कि बीजू जनता दल भी दहाई अंकों तक पहुंचेगी, चूंकि वहां कोई एंटी गवर्नमेंट फैक्टर नहीं है और नवीन पटनायक  की छवि भी अच्छी है। इन सबसे ऊपर सेकुलर नवीन का झुकाव भी कांग्रेसी ही है। ऐसे करके कांग्रेस अभी के आंकड़ों के हिसाब से 240 का आंकड़ा पार कर सकती है।
आरबीआई के गवर्नर रघुराम राजन के जरिए (पिछड़े राज्यों का फॉर्मूला) जेडीयू की दहाई सीटें भी आती हैं, तो वह कांग्रेस के पाले में आ ही सकती हैं, भले ही बाहर से समर्थन जैसे ड्रामे ही क्यों न हों। यानी कांग्रेस पहुंचती है 250 सीटों तक। अब उसे 22 सीटों के लिए या तो लेफ्ट का सहारा लेना है या निर्दलीयों के साथ ममता को मनाना होगा। यह तो रहा कांग्रेस का कैल्कुलेशन। जो यह साबित करता है, कि कांग्रेस खुद से ज्यादा अपने सहयोगियों और संभावित सहयोगियों को जिताने पर ध्यान दे रही है।

नहीं तो होवित्जर तोप है ही

इसके बाद कांग्रेस के पास एक होवित्जर तोप तो है ही, कि आइए शरदजी, नवीन पटनायकजी, करुणानिधिजी, ममताजी, नीतीशजी, मुलायमजी, मायावतीजी। बनिए बारी-बारी से 3-3 महीनें प्रधानमंत्री, कांग्रेस आपको समर्थन देगी बाहर से। ठीक गुजराल और देवगौड़ा की तरह। चंद्रशेखर और वीपी सिंह की तरह। सबकी बारी आएगी। सबको पीएम बनना है। कांग्रेस इस वक्त अपनी सीटों से ज्यादा आशान्वित नहीं है, बल्कि यह ज्यादा ध्यान दे रही है, कि भाजपा किसी सूरत में न आ पाए। ताकि करप्शन, अनिर्णय जैसी  बात थोथा प्रचार साबित हो सकें।

हाय ये दो मुसीबतें

लेकिन अब दो बड़ी मुसीबतें आन पड़ी हैं। पहली तो अध्यादेश को लेकर बने माहौल और राहुल की सियासी ड्रामाई एक्टिविटी। दूसरी लालू जैसे लोगों को सजा। पहला कारण अध्यादेश अगर वापस आता है, तो सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन के हिसाब से सजायाफ्ता सारे प्रत्याशी चुनाव से बाहर हो जाएंगे। ऐसे में कांग्रेस के सहयोगियों को ज्यादा नुकसान होना है। यानी वह सारे प्रत्याशी जो जीतने का दमखम रखते हैं, टिकटों से ही महरूम रह जाएंगे। ऐसे में भाजपा को फायदा मिल सकता है। वहीं लालू को हुई सजा के बाद से आम लोगों में क्षेत्रीय क्षत्रपों पर से भरोसा भी पूरी तरह से उठेगा और विरोधी प्रचारित भी खूब कर सकेंगे कि माया का कॉरीडोर आज नहीं तो कल ले जाएगा जेल, तो आय से अधिक संपत्ति मुलायम को आज नहीं कल दिलाएगी सजा। यानी भाजपा को लाभ। मोदी की आंधी चल ही रही है, तब भाजपा के लिए बल्ले बल्ले है। बशर्ते भाजपा कोई गलती न करे।
- सखाजी

भगवा की छतरी में ठुसने की कोशिश

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on मंगलवार, 17 सितंबर 2013 | 1:01 pm

आखिर पाप तो पाप है न। हम जानते हैं वही राम चरित्र मानस समाज में ब्राह्मणों को अतिश्रेष्ठ बताती है और वही राम चरित्र मानस ब्राह्मण रावण को महापापी बताती है। यानी पाप तो पा है न? कितने ही श्रेष्ठ कोई खास वर्ग, संप्रदाय, टैग, तमगा वाले लोग हों, लेकिन वे अगर अनैतिक करेंगे तो वे पहले अनैतिक ही होंगे न?

File- When police arrested Asaram.
आसाराम बार-बार भगवा की छतरी के नीचे जा घुसने या यूं कहिए ठुसने की कोशिश में रहते हैं। कभी कहते हैं सरकार बदलेगी तो देख लूंगा, तो कभी कहते हैं मेरे समर्थकों पर मेरा वश नहीं। इधर भगवा की छतरी नैतिकता के आधार पर इतनी सिकुड़ रही है कि उसमें उसके ही लोग नहीं समा रहे। आसाराम है सच में झांसाराम। रामजेठमलानी की वकालत से केस को वे खिंचवा लेंगे साथ में उनके संघी कनेक्शन के जरिए सेफ्टी कवर भी बनवा सकते हैं। जैसा कि इंदौर के विजयवर्गीय वर्ग ने उन्हें शुरुआत में दिया था। ऐसे कवर में घुसे आसाराम ईश्वर पर जरा भी भरोसा नहीं करते, उन्हें अपनी शक्ति, अनुरक्ति और राजनैतिक संरक्षण पर ही पूरा भरोसा है।

खैर है टीवी मीडिया है देश में

आसाराम बार-बार इस छतरी की आस में बोलते हैं, ललकारते हैं। नितांत व्यक्तिगत वासना की इस लड़ाई को वे राजनैतिक रंग, धर्म का रंग, संप्रदाय का रंग, संत का रंग, भक्ति का रंग, समर्थकों का रंग जो भी रंग चढ़े, देना चाहते हैं। बस उनकी रंग रंगीली तासीर पर असर न पड़े। वो तो खैर है देश में टीवी मीडिया है (खासकर इंडिया न्यूज), जिसने इनके नकली संतत्व को उभारा। वरना तो वे इस खोल में ही पूरी जिंदगी जी गए होते।

भरोसा कहां से लाओगे

यह किसी भी धर्म, सपं्रदाय के लिए भारी वेदना और पीड़ा की बात होती है, कि उसके समुदाय के अगुवा और पहरूआ स्तर के लोग ऐसे कुकृत्य करें। कई बार इन धर्म संप्रदाय के संगठनात्मक धड़े डैमेज कंट्रोल करते हुए मामले को दवा जरूर देते हैं, लेकिन फिर भी वे उस व्यक्ति से व्यक्तिगत रूप से तो फट ही जाते हैं। यानी भरोसा तो आदमी खो ही देता है। पिछले दिनों रायपुर के बसस्टैंड एरिया में कुछ पोस्टर चिपके मिले, जिनमें आसारामनुमा हिंदू संतों की तस्वीरें थी और उनके कुकृत्यों का चिट्ठा लिखा था। थोड़ा सा लोग उत्तेजित हुए। चूंकि यहां पर भगवा की छतरी बार-बार ऐसा प्रदर्शित कर रही है, कि ऐसे लोगों को मेरी ओर से कोई छाया नहीं। फिर भी अन्य संप्रदाय के लोग ऐसी हरकते करें तो क्या होना चाहिए? वो तो खैर है कि प्रशासन ने इसे तुरंत कंट्रोल किया और असर को खत्म कर दिया। इसकी एक वजह रायपुर जैसा भगवा प्रधान शहर भी है, जो अपनी ओर से हिंसक रिएक्ट नहीं करना जानता। कुछ ऐसा ही कांची मठ के शंकराचार्य पर लगे आरोपों के दौरान हुआ था। भोपाल के जहांगीराबाद (अल्पसंख्यक प्रधान मुहल्ला) एरिया में, जहां पर द बॉस को ऐसा अधिकार किसने दिया लिखा था। इस पर भी हल्के से तनाव का माहौल बना, लेकिन बाद में वह सैटल कर लिया गया। चूंकि यह पोस्टर वहां लगे थे, जहां पर रिएक्शन नहीं बल्कि सैम एक्शन आना था।

रामायण कहती है पाप तो पाप है

आखिर पाप तो पाप है न। हम जानते हैं वही राम चरित्र मानस समाज में ब्राह्मणों को अतिश्रेष्ठ बताती है और वही राम चरित्र मानस ब्राह्मण रावण को महापापी बताती है। यानी पाप तो पा है न? कितने ही श्रेष्ठ कोई खास वर्ग, संप्रदाय, टैग, तमगा वाले लोग हों, लेकिन वे अगर अनैतिक करेंगे तो वे पहले अनैतिक ही होंगे न? रावण पापी था, व्याभिचारी था, अत्याचारी था, साथ में विद्वान और जाति से ब्राह्मण भी था। किंतु ब्राह्मण होना उसके लिए महज एक जाति भर था, सजा जाति या किसी खास टैग से होकर नहीं तय हो सकती, वह तो कर्मों से ही होगी।
आसाराम के मामले में भी यही हो रहा है और होना भी चाहिए। यह कोई अन्य संप्रदाय के कहने की न जरूरत है न उनकी नैतिकता ही कहती है कि ऐसा हो। चूंकि यह जोर जोर से उसी संप्रदाय के लोग पहले से ही कहते आए हैं और कह रहे हैं। हर मामलों में। चाहे वह किसी का भी क्यों न हो, बाद में वह पाक साफ भी निकल गए हैं, लेकिन फिर भी जांच, पड़ताल होती रहने दी है।

सही हो रहा है इस मामले में

पाप का तुलनात्मक अध्ययन भी नहीं किया जाता कि आसाराम को इतना सता रहे हैं, जामा मस्जिद के इमाम आराम फरमा रहे हैं। इमाम पर भी कई आरोप लगे हैं, लेकिन उनकी गिरफ्तारी नहीं की जा सकी। यहां तक कि दिल्ली पुलिस ने हाई कोर्ट को भी लिखकर दे दिया था, कि वह उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकती। लेकिन यह अल्हदा बात है, एक संप्रदाय के लिए संगठनात्मक तौर से आगे बढऩा जितना जरूरी है उतना ही जरूरी है कि वह स्वच्छ साफ और अपने लक्ष्य पर केंद्रित हो कर काम करे। आसाराम के मामले में भगवा वालों की छतरी कुछ ऐसा ही कर रही है, लेकिन जरूरत है साफ-साफ खुलकर करने की, कि आसाराम जो भी कहें, करें, व्यक्तिगत सीमा में ही करें, इसे न तो हिंदू रूप दें न संत। न भाजपा, न कांग्रेस न काला न गोरा, न इमाम न निजाम।
- सखाजी

Life is Just a Life: तू मुरली का संगीत नहीं तो क्या होगी Tu murali ka s...

Written By नीरज द्विवेदी on रविवार, 15 सितंबर 2013 | 3:51 pm

Life is Just a Life: तू मुरली का संगीत नहीं तो क्या होगी Tu murali ka s...: मैं गायक , तू प्यार भरा एक गीत नहीं तो क्या होगी , मैं बंशीधर , तू मुरली का संगीत नहीं तो क्या होगी ? तू तारापति ...

मोदी-राहुल रोमांच से महरूम रह जाएंगे हम

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on शुक्रवार, 13 सितंबर 2013 | 10:00 pm

अब इतना तो पक्का है कि कांग्रेस के प्रत्याशी राहुल गांधी नहीं होंगे। कांग्रेस कुछ दांएं बाएं करेगी। जैसा कि वह करती है। पीएम के कैंडीडेशन के लिए वह कुछ नहीं बोलेगी। माहौल राहुल के नाम का बनने देगी। चूंकि ऐसे में अगर राहुल का नाम घोषित करती है, तो मोदी वर्सस राहुल बहुत ही औपचारिक रूप से होने लगेगा। जबकि हालात देश में ऐसे हैं कि मोदी न भी होते तो भी बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर सकती है। ऐसे में राहुल की हार अगर मीडिया ने प्रचारित कर दिया, तो कांग्रेस की पारसमणि काला पत्थर बन जाएगी, अश्वमेघ खत्म हो जाएगा, तिलिस्म टूट जाएगा, बंद मुट्ठी खुल जाएगी। अब ऐसे में मोदी के आने से कांग्रेस थोड़ा चिंतित होगी। चूंकि लोगों के बीच वह भरोसे के संकट से जूझ रही है। मोदी के बारे में एक ही बात बार-बार कहकर भी चुनाव नहीं जीता जा सकता। कांग्रेस इसे यूं भी नहीं ले सकती कि जीते तो जीते, वरना 10 साल तो राज किया ही है। यह बात सच है कि कांग्रेस इस बात को मानकर चल भी रही है कि वह जरूरी सीटें नहीं जीतेगी, लेकिन उसका कॉन्फिडेंस है कि भाजपा भी नहीं जीतेगी, जरूरी सीटें। ऐसे में जिसके पास जीती हुई पार्टियां हैं, वह इनके साथ आ जाएंगे। दरअसल कांग्रेस यहां पर वोटर्स ओरिएंटेड  इलेक्शन इक्वेशन नहीं गढ़ रही, बल्कि इलेक्टेड पॉलीटिकल पार्टीज का इक्वेशन बिठा रही है। यह भारतीय लोकतंत्र का एक ऐसा हिस्सा है, जो जनादेश को दरकिनार तक करने के लिए काफी है। कांग्रेस यूं भी इस तरह की जोड़ तोड़ ऐसे, जैसे, तैसे भी हो कर सकती है। बहरहाल मोदी वर्सस राहुल रोमांच तो हमें देखने को नहीं मिलेगा।
सखाजी

बीच बस्ती में जरजर पीपल का पेड़ आडवाणी...

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on गुरुवार, 12 सितंबर 2013 | 1:47 pm

आखिरकार मोदी भाजपा के पर्याय तो बन ही गए हैं, फिर चाहे पार्टी लोकसभा हारे या जीते। मोदी कम से कम पार्टी की दर्द हरने वाली बूटी न बन पाएं तो न सही, दर्द कम करने वाली और विरोधी को दर्द देने वाली मजबूत और परखी हुई जड़ी तो बन ही गए हैं।

Courtesy: Majul's creative caricature.
अब आडवाणी भाजपा में एक पीपल का पेड़ हैं। इस पीपल के पेड़ के आसपास घनी बस्ती है। यह पेड़ खतरनाक है। जरजर भी हो रहा है और आंधी तूफान में गिरकर बड़ा नुकसान भी पहुंचा सकता है। संघ एक तरह का प्रशासक है, जिसकी जिम्मेदारी है कि इस पेड़ के आसपास से वह या तो घनी बस्ती कहीं शिफ्ट करे या इस पेड़ का कद छोटा करे। घनी बस्ती को शिफ्ट करना नामुमकिन है। पीपल के पेड़ को छोटा करना कठिन। यानी दोनों ही चीजें हैं मुश्किल ही, किंतु फिर भी नामुमकिन से अच्छा है कठिन को चुना जाए। मोदी गोवा, मोदी दिल्ली दोनों ही आंधियां थी।

गिर रहीं हैं डालियां

आडवाणी नाम के पीपल की कुछ डालें गिरीं या गिर रही हैं। बस्ती में अभी तक कोई हताहत नहीं हुआ, पर लोग आशंकित हैं। हां एक शत्रुघ्न सिन्हा नाम की झोपड़ी ने जरूर शिकायत की थी, कि पीपल की डगाल यहां गिर रही है। लेकिन बड़ा कोई नुकसान नहीं हुआ।

डालियां काटना है, ताकि बंदर न बैठें

अगले दो महीनों में आडवाणी के कद को कतरना संघ की और भाजपा की दोनों की मजबूरी है। ये जितने बड़े रहेंगे, उतने बंदर (समर्थक) इनकी डालियों पर बैठे रहेंगे। इनकी डालियां काटना होंगी। चूंकि पीपल जन्मजात भारी भरकम और बड़ा होता है, लेकिन इमारती लकड़ी नहीं दे पाता। पूज्यनीय होता है, छायादार होता है, खूबसूरत नागरीय वनों की शोभा होता है, जन्म जन्मांतर तक हाईली ऑक्सीजेनरेटर रहता है, लेकिन घरों के पास फिर भी शाों में यह वर्जित है।

क्या करेंगे, कैसे करेंगे

अगले विधानसभा चुनावों में आडवाणी को पार्टी कम से कम प्रचार सभाएं देगी। कम रैलियां देगी। भाजपा की अंदरूनी एकाधिक मीटिंग में मार्जनाइज करेगी। चूंकि पार्टी को एक सुपर हिट रीजन भी मिल गया, कि आडवाणी स्वयं नहीं आए कहेंगे तो मीडिया मान भी जाएगा। अब जब विधानसभा की आंधी चलेगी, जिसमें एक के बाद एक सभाएं मोदी करेंगे। सतत बोलेंगे, यहां, वहां, ये वो। लोग मोदी की खुमारी में डूब जाएंगे। जब विधानसभा की धुंधलापन, कुहांसा छटेगा, तब तक आडवाणी जी का कद इतनाभर रह जाएगा कि वे अगर गिरे तो 100 मीटर भी प्रभावित नहीं कर पाएंगे।

मोदी तो नेता बन ही गए, अब हारो या जीतो

मोदी का भाजपा की ओर से पीएम प्रत्याशी बनना तय है। अब इसका औपचारिक एलान आज हो या आज से महीनों बाद। फर्क नहीं पड़ता। मोदी के सामने खुद को साबित करने से लेकर सबको लेकर चलने, विरोधियों का मुंह बंद करने, दंगों के दाग को छुड़ाने जैसी कई सारी विकराल चुनौतियां बराबर ही रहेंगी। हां अगर उन्हें ठेका दे दिया जाता है, तो शायद कुछ कम हो सकती हैं। आखिरकार मोदी भाजपा के पर्याय तो बन ही गए हैं, फिर चाहे पार्टी लोकसभा हारे या जीते। मोदी कम से कम पार्टी की दर्द हरने वाली बूटी न बन पाएं तो न सही, दर्द कम करने वाली और विरोधी को दर्द देने वाली मजबूत और परखी हुई जड़ी तो बन ही गए हैं।

वे कहते हैं कि वे समर्थक हैं, पर कैसे मानें?

बहरहाल आडवाणी बड़ा रोड़ा हैं। पिछले दिनों आडवाणी के एक करीबी मित्र और सिंधी समाज के बड़े नेता के बारे में जानने का मौका मिला, उनके मुताबिक आडवाणी भी चाहते हैं कि मोदी ही पीएम के लिए एप्रोप्रिएट हैं। लेकिन वक्त थोड़ा अभी वैसा नहीं है, कि उन्हें घोषित किया जाए। यह उनका एक तरह से न्यूट्रल टाइप का बयान था। मसलन वे आडवाणी को छोडऩा नहीं चाहते थे और मोदी भाजपा के भविष्य हैं तो उनसे पंगा लेना नहीं चाहते थे। तभी शायद उन्होंने आडवाणी के एक स्पोक्समैन की तरह यह बोला। किंतु सवाल है कि देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के शीर्ष नेता और दुनिया के सबसे बड़े वैचारिक संगठन के शीर्षतम व्यक्ति आडवाणीजी इतना भी कम्युनिकेट नहीं कर  पा रहे हैं कि मैं पीएम की रेस में नहीं हूं, बल्कि सिर्फ इतना कह रहा हूं, कि मोदी की घोषणा इतने जल्दी मत करो और इसलिए मत करो। अगर इतना साफ वे कम्युनिकेट नहीं कर पा रहे हैं, तो यह बात सही हो ही नहीं सकती कि वे चाहते हैं पीएम मोदी बनें। खैर।
-सखाजी

Life is Just a Life: UP की जलन Burning UP Mujjafarnagar Riots

Written By नीरज द्विवेदी on सोमवार, 9 सितंबर 2013 | 9:28 pm

Life is Just a Life: UP की जलन Burning UP Mujjafarnagar Riots: जलने दो मुज्जफ़रनगर को जलने दो, पलने दो UP में जहरीले साँप पलने दो, रोक दोगे इन्हें तो वोटबैंक कैसे बनेगा, मरते कटते हैं कायर मरने द...

Life is Just a Life: ढलता सूरज dhalta suraj

Written By नीरज द्विवेदी on गुरुवार, 29 अगस्त 2013 | 3:29 pm

Life is Just a Life: ढलता सूरज dhalta suraj: डगमगाती चाल , टूटी अस्थियों की ढाल , कुछ बुदबुदाते होंठ , कुछ सहेज रक्खीं चोट , कांपती जर्जर जरा , हर श्वांस  में अनुभव भरा , ...

श्याम हमारे नान्हे कान्हा मनमोहन हैं भाई

Written By SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR5 on बुधवार, 28 अगस्त 2013 | 8:42 pm





श्याम हमारे नान्हे कान्हा मनमोहन हैं भाई

हमारे सभी प्यारे दुलारे कान्हा गोपियों राधे माँ  को प्रभु कृष्ण के  जन्म पर ढेर सारी हार्दिक शुभ कामनाएं सब मंगल हो
आइये एक बार खुले दिल से जोर से बोलें 
प्रभु श्री कृष्ण की जय
हरे कृष्ण -हरे राम राम राम हरे हरे
और रात के बारह बजे तक कान्हा के संग बाल गोपाल बन के  ध्यान और आराधना में डूब जाएँ


श्याम हमारे नान्हे कान्हा मनमोहन हैं भाई
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मोर पंख संग रत्न जड़े हैं
कारे घुंघराले हैं बाल
माथे तिलक चाँद सोहे है
सूरज सम चमके है भाल
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सुन्दर भृकुटी मन-मोहक है
मोर पंख ज्यों घेरे नैना
तीन लोक दर्शन अँखियन में
अजब जादुई वशीकरण कान्हा के नैना
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मुख-मण्डल यों आभा बिखरी
मन-मोहन खिंचते सब आयें
कोई दधि  ले माखन कोई
आतुर छू लें कैसे दर्शन पायें
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कर्ण कपोल गाल पे कुण्डल
हहर -हहर जाए भक्तन  मन
लाल होंठ ज्यों बोल पड़ेंगे
खुले दिखे मुख जीव जगत सब
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दमकत लपकत हार गले है
ज्यों दामिनि  छवि धरती -अम्बर
दर्द मोह माया सब भूले
प्रभु चरणों सब मिलता सम्बल
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रंग -बिरंगे पट आच्छादित
मुरली  खोंसे हैं करधन
गाय, ग्वाल सखियाँ आह्लादित
पुलकि-पुलकि हैं  खिले सभी मन
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श्याम हमारे नान्हे कान्हा मन-मोहन हैं भाई
मातु देवकी यसुदा माता आज धन्य हर माई
पूत जने ललना यों लायक घर घर बाजे थाली
गद-गद ढोल नगाड़े तासे, मथुरा वृन्दावन काशी
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर'
५ .० ५ - ५ . ३ ५ मध्याह्न
कृष्ण जन्माष्टमी
प्रतापगढ़

कुल्लू हिमाचल



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Life is Just a Life: कन्हा - रास नहीं अब समर चाहिये Kanha - Raas nahi a...

Life is Just a Life: कन्हा - रास नहीं अब समर चाहिये Kanha - Raas nahi a...: हे कृष्ण तुम्हारी लीलाएं कुछ प्रेमपगी कुछ शोणितमय, कुछ माखनचोरी गौपालन कुछ त्यागमयी कुछ अन्त्योदय। कुछ चोरी सीनाजोरी कर कुछ गो...

Life is Just a Life: खोखला भाषण - १५ अगस्त २०१३ Khokhla Bhashan - 15 Au...

Written By नीरज द्विवेदी on गुरुवार, 15 अगस्त 2013 | 2:24 pm

Life is Just a Life: खोखला भाषण - १५ अगस्त २०१३ Khokhla Bhashan - 15 Au...: खोखला भाषण - १५ अगस्त २०१३

देखीं आज कतारें दिल्ली में रंगों की मूक इशारों की,
PM के भाषण में गयी सुनाई  ख़ामोशी दरबारों की,

भारत के  ठेकेदारों ने  कायरता  इस कदर दिखाई,
टूटी चीखों  के आगे मरता आवाहन न पड़ा सुनाई,
न जाने किस आज़ादी की भारत को दी गयी बधाई,
लालकिले को वीरों के कटे सिरों की याद नहीं आई,

दिल्ली में होती तार तार बहनों की चीख नहीं देखी,
सतरंगी वादों पर पलती  भारत की भूख नहीं देखी,
सीमा पर हो गए शहीदों की माँओं का दर्द नहीं देखा,
वीरों की ललनाओं के  सिंदूरों का सन्दर्भ नहीं देखा,

वो काश्मीर जहाँ केसर में ....

हर चश्म ए दीदार खुदा तेरे नूर से है

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on मंगलवार, 6 अगस्त 2013 | 12:42 pm

Durgashakti Nagpal
यह वास्तव में कांग्रेस के सेकुलरिज्म की जीत है, जो उसने भाजपा के हिंदूवाद के साथ मिलकर देश में पैदा किया है, कि हर मामले के मूल, तना, फल, पत्ती से लेकर पुंकेसर तक धर्म रमा, जमा है। यूं कहिए कि हर चश्म ए दीदार खुदा तेरे नूर से है। हर घटना, व्यक्ति, बात, विचार, आचार, खाना, मरना सब कुछ धर्म के चश्मे से ही देखा जाता है। मामला बहुत छोटा है दुर्गाशक्ति नागपाल का निलंबन। लेकिन इसने जो पैर फैलाए हैं, वह देश के लिए घातक हंै। यूपी की सरकार जैसे यह मान रही है कि यूपी उनका कोई पर्सनल राज्य है, तो वहीं केंद्र से सोनिया ने महिला अफसर होने के नाते चिमटी काटने की कोशिश भी कुछ ऐसी ही धारणा की उपज है। भाजपा इसमें क्या करे वह तय नहीं कर पा रही, सामान्य प्रोटेस्ट के अलावा कोई वैचारिक पृष्ठ इसका उसके पास है नहीं।
ऐसे में जिसको जो मिल रहा है वह किए जा रहा है। जिक्र है कि रायपुर में भी अधिकारी की जाति नागपाल के बारे में तहकीकात की जा रही है, कि वह अगर सिंधी है तो सिंधी समाज की सियासी विंग इसमें एक एंगल यह जोड़ दे या फिर वह ठाकुर है तो क्षत्रिय समाज की विंग कुछ करने लगे। यानी दुर्गाशक्ति नागपाल कम से कम यूपी राज्य सरकार की अफसर तो नहीं है। वह यूपी सरकार की नजरों में आतातायी हिंदू अफसर है, जो मुस्लिमों पर कुल्हाड़ी लेकर वार करने को तत्पर है, तो सोनिया की नजरों में पीडि़त महिला अफसर, भाजपा की नजरों में कुछ नहीं है, तो सिंधियों की नजरों में सिंधी, ठाकुरों के नजरों में ठाकुर, तो पंजाबियों की नजरों में पंजाबी है। कुछ आजीवन छात्रों की नजरों में वह चश्माधारी पढ़ाकू मैरिटोरियस है, जो उसे मैरिटोरियस कहकर यह बताना और जताना चाहते हैं कि देश में पढ़ाकुओं की कद्र नहीं है।
यह कोई नई बात नहीं है, देश में लगभग हर मामले को इसी दूरबीन से ताड़ा जाता है, फिर उसमें संभावनाएं देखी जाती हैं। ऐसा होता ही है, तो होने दीजिए। इसे रोकने के लिए कुछ तथाकथित लिख्खाड़ों और विचारों के गुब्बारों को फूटना होगा, अपने कंफर्ट से बाहर आना होगा, वह चूंकि संभव ही नहीं है, तो जाने दीजिए।
बेशक यह कांग्रेस के यूरोपियन शब्द सेकुलर से उपजी गंदगी है, लेकिन इसमें भाजपा की भूमिका भी कम नहीं है। चूंकि वे दूसरी तरफ एक अजीब सी बात रचते गए, अपने फायदे के लिए गढ़ते गए। अंतराल में सेकुलरिज्म को खतरा संप्रदायवाद से नहीं रहा, बल्कि हिंदूवाद से हो गया।
-सखाजी

Sahitya Surbhi: फैले मुहब्बत करो ये दुआ

Written By डॉ. दिलबागसिंह विर्क on शनिवार, 3 अगस्त 2013 | 8:30 pm

Sahitya Surbhi: फैले मुहब्बत करो ये दुआ:                  दर्द देगी यहाँ साफगोई सदा                 सीख लो बात को तुम घुमाना जरा ।                          तुम गलत मानते, ब...

तीसरे मोर्चे की कवायद

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on गुरुवार, 1 अगस्त 2013 | 9:53 pm

Third front rehearsal in CG is dangerous.
छत्तीसगढ़ सियासी तौर पर बाई पोलर ही है। ऐसा रहना किसी भी डेमोक्रेसी के लिए सशर्त अच्छा है। सशर्त यानी अमेरिका जैसा टू पार्टी सिस्टम नहीं, बल्कि टू पावरफुल पार्टीज सिस्टम, जहां पर तीसरी और चौथी शक्तियां भी हो सकती हैं, किंतु वह महीन और कमजोर हों। लेकिन उनमें भी यह संभावना हमेशा बनी रहनी चाहिए कि वे कभी, किसी भी वक्त इन दो पॉवरफुल पार्टीज में से किसी एक का स्थान हासिल कर सकती हैं। छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस के अलावा तीसरी शक्ति का कोई उदय नहीं है, कहने को भले ही 2003 में एक सीट एनसीपी और दो सीटें बीएसपी के पास थीं, ऐसे ही 2008 में भी एनसीपी की सीट नहीं रही, लेकिन बीएसपी बरकरार रही। किंतु इसका तब तक कोई मायना नहीं, जब तक कि यह 4-5 का आंकड़ा क्रॉस नहीं करती।
इन दिनों तीसरे मोर्चे की कवायद देखने को मिल रही है। इसमें तमाम मुहल्ला और उधारी सियासी दल जोरआजमाइश कर रहे हैं। यह राज्य के लिए खराब है। चूंकि इन दिनों जोगी भी मार्जनाइज हैं। ऐसे में कहीं इस तथाकथित तीसरे मोर्चे ने ताकत पकड़ ली और हर पार्टी कहीं न कहीं बीजेपी कांग्रेस की वोट काटू बन गईं, तब जोगी अपने परिवार के बूते 3 सीटों के साथ कांग्रेस से अलग होकर इनसे जुड़ सकते हैं। और कहीं अगर तीसरे मोर्चे की तमाम पार्टियों में से एक या दो दलों ने भी सीटें हासिल कर लीं, तब फिर देखिए राज्य में न होने लगें सियासी सौदे। और फिर जब इस तीसरे मोर्चे का गुरु और महात्मा सियासत के चतुर सुजान जोगी होंगे, तब तो और भी खतरनाक हालात यहां बन जाएंगे। यूं शांत कहे जाने वाले इस राज्य में सियासी उखाड़ फेंक ठीक नहीं है।
मीडिया के कवरेज और तवज्जो को देखते हुए तीसरे मोर्चे की कम से कम विजुएलिटी तो बढ़ ही रही है। यह अलहदा बात है कि वह कनेक्टिविटी लेवल पर वह कितना क्या कर पाते हैं। मीडिया का आज का तवज्जो, कल पर भारी पड़ सकता है।
-सखाजी

चरणदास महंत के बाद मजबूत होगी कांग्रेस

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on बुधवार, 31 जुलाई 2013 | 6:58 pm

Charan Das Mahant, Prez. Cg Congres.
छत्तीसगढ़ में भाजपा के 10 सालों से काबिज होने की दो मुख्य वजहें हैं। पहली तो यहां पर कांग्रेस का वेरी वर्नाकुलर सियासी होना और आपसी झगड़ा है, तो दूसरी वजह भाजपा सरकार के खिलाफ मोटा मोटी स्तर पर कोई नकारात्मक लहर का न होना। इनमें से एक वजह तो खत्म सी होती दिख रही है और दूसरी किसी भी वक्त खत्म हो सकती है। पहली वजह आपसी झगड़े को चरणदास महंत के पूर्णकालिक अध्यक्ष बनने से जोड़कर देखा जाना चाहिए। यह समझना होगा कि जोगी की अपनी ताकत थी, राहुल गांधी से उनका सीधा व्यक्तिगत कनेक्शन। लेकिन पिछले तीन महीनों में देखा गया है, कि उनकी स्थिति साल 2003 के नतीजों के बाद जैसी है। उस वक्त जोगी छत्तीसगढ़ में हारे थे, विधायकों की खरीदपरोख्त के कारण पार्टी की छवि पर भी भारी पड़े थे, तो सोनिया गांधी ने पूरी तरह से उनका 10 जनपथ में प्रवेश बंद कर दिया था। यह अखबारी सुर्खियां भी थीं। ठीक इसी वक्त मध्यप्रदेश के तत्कालीन सीएम दिज्विजय सिंह के साथ भी हुआ था। उन्हें एमपी की जनता की मूर्खता पर इतना भरोसा था, कि वे 2003 में हारने पर 10 सालों तक सियासी सन्यास की घोषणा कर चुके थे। परंतु हमने पिछले 10 सालों में दिज्विजय सिंह का कद इतना बढ़ते हुए देखा है, जितना कि उनका सीएम के तौर पर नहीं था। इसे ही सियासी सन्यास कहते होंगे?
जोगी पर आते हैं। जोगी बहुत ही ताकतवर और उम्दा सीएम साबित हो सकते थे। किंतु वे तिकड़मों में लगे रहे। और छत्तीसगढ़ के 3 सालों में वे यूं हो गए कि जैसे उनके न रहते हुए कोई और माइका लाल सीएम नहीं बन सकता। और इसी जद्दोजहद ने राज्य में कांग्रेस की डे टू डे कमजोर कर डाला। साल 2008 में भी कांग्रेस की बागडोर महंत के हाथ में थी, किंतु दो कार्यकारी साथ में थे। माहौल जोगी के लिए था। यानी जोगी की 10 जनपथ में पैठ को यूं समझा जा सकता है, कि कांग्रेस 10 सालों तक सरकार से बाहर खड़ी रही, लेकिन भरोसा जोगी के प्रति खत्म नहीं हुआ।
अब लेकिन जोगी को भी हाई कमान ने पूरी तरह से एहसास करवा दिया कि आप जो कुछ भी हैं, वह पार्टी के लिए ठीक नहीं है। आपका पूरा परिवार है, तीन सीटें आप अकेले परिवार के बूते जीत सकते हो, कुछ और सीटों पर विधायकों को जितवा सकते हो। किंतु कांग्रेस को एक जुट नहीं कर सकते। ऐसे में अच्छा होगा जोगी जी आप जरा साइड लाइन हो जाइए। चरणदास महंत के स्वागत और सत्कार के बाद स्ट्रेटजी को देखें तो मुमकिन है, कि पार्टी और मजबूत हो।
दूसरा कारण भाजपा की कोई नकारात्मक छवि न होना है, यह बड़ी बात है। किंतु छवियों का क्या, रातों रात बदल जाती हैं। यानी कहने का मतलब भाजपा की राह अब जरा कांटों भरी होने को है। फिर विकास का जो मामला है, वह भी करीब-करीब लोग समझ ही सकते हैं, कि राज्य में इतनी संपदा है कि कोई भी सरकार होती अगर वह काम करने की मंशा रखती है, तो उसको यहां लोकप्रिय बनना कठिन नहीं है। खैर यह देखना होगा कि बीजेपी अपने फेवर में बने गुब्बारी माहौल को पंक्चर होने से कैसे बचाती है।
- सखाजी

Life is Just a Life: इंटों के जंगल Enton Ke Jangal

Written By नीरज द्विवेदी on शुक्रवार, 19 जुलाई 2013 | 9:22 am

Life is Just a Life: इंटों के जंगल Enton Ke Jangal: Kedarnath Tragedy, India, 2013: Image from Jagran.com बारिश की बूँदों यहाँ बरस लो, बेशर्मी से बार बार, खाली हो जाना अबकी, हो चुकी ...

क्यों जी क्यों न कहें हिंदू राष्ट्रवादी

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on शनिवार, 13 जुलाई 2013 | 11:16 pm

N.D. Modi, CM, Gujrat
मोदी इस देश का सबसे बड़ा विवाद हो गए हैं। कल एक मित्र ने कहा दिल खुश हो गया, किसी ने सालों बाद मुझे एहसास कराया कि मैं हिंदू हूं। और इससे ज्यादा जरूरी यह एहसास कराया कि हिंदू होना कोई खराब बात नहीं है। वरना देश में सेकुलर का मतलब हमेशा ही गैर हिंदू रहा है। यहां तक कि कुछ लोगों ने तो हिंदू शब्द तक को अपने जीवन दर्शन से निकाल फेंका है। इस माहौल से संसार की सबसे ज्यादा उदार और सहिष्णु जाति हिंदू ऐसी हो गई जैसे आतंकी कौम हो। इसके हत्थे कोई चढ़ा कि मरा। खासकर मुस्लमान। हुआ भी यूं कि सियासी फायदों को हिंदू इसे ऐसा ही साबित करना चाहते थे।
मोदी ने हिंदू राष्ट्रवादी क्या बतलाया खुद को दिल्ली में आग लग गई। यूपी की छुटभैया पार्टियां और नेता तो जैसे मान बैठे कि अब वे मरे। एक तथाकथित सेकुलर पार्टी के शिवानंद तिवारी तो यहां तक कह गए कि यह आदमी पागल है, इसके दिमाग का इलाज होना चाहिए, यह अगर देश की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठ गया तो बंटाढार हो जाएगा। यह वही सेकुलर हैं जो ओबैसी के भाषण पर चुप्पी साधे बैठे रहते हैं, जब मोदी ने दो शब्द बोल दिए तो ही सेकुलरिज्म खतरे में पड़ गया?
दूसरी बात मोदी ने उदाहरण जरूर गलत चुन लिया। इसमें कोई डिफेंड की जरूरत नहीं है। उन्हें पूरी जिम्मेदारी से अपना दर्द जताना चाहिए था। यह तो चिढ़ाने वाला दर्द हुआ। दरअसल हर किसी की भावनाओं का अकार और मिश्रण अलग-अलग होता है। लोग आमतौर पर औसतन भावनाओं को मानवीय भावनाएं कहते हैं। मोदी साहब को बेशक यहां पर दर्द हुआ होगा, हम मानते हैं। किंतु तरीका और उदाहरण दोनों ही सर्वथा गलत हैं। हालांकि इससे देश का सेकुलर स्ट्रक्चर खतरे में नहीं पडऩे वाला, चूंकि आदमी को कुल अंत में हिंसा और नरसंहारों का दर्द तो है ही न?
अजीबो गरीब सियासी चालों में मोदी का बयान पार्टी लेवल पर तो उन्हें माइलेज दे जाएगा, किंतु यह समझने की बात है कि सालों से भरा बैठा हिंदू फिर भी इस नाम पर वोट नहीं देने वाला। चूंकि वह मूर्ख नहीं। उसके लिए देश प्रथम है। वह सियासत और सल्तनत में फर्क करना जानता है। अमित शाह उधर मंदिर की घंटियां बजा रहे हैं तो इधर मोदी बाबू मुसलमानों को आंखे तरेर रहे हैं। अगर ऐसे में वे जीत भी जाएं, प्रधानमंत्री बन भी जाएं, तो विवाद उनका पीछा नहीं छोडऩे वाले। बहरहाल हिंदू राष्ट्रवादी होने पर सबको गर्व होना ही चाहिए, जिन्हें नहीं है तो वे या तो स्वशक्ति से वाकिफ नहीं हैं या फिर वे चापलूस, चाटूकार हैं। (यह टिप्पणी सिर्फ हिंदुओं पर ही लागू है)
- सखाजी

राघवजी उफ राघवजी

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on मंगलवार, 9 जुलाई 2013 | 1:19 pm

Raghawjee
राघवजी के लिए खासतौर से एनडीटीवी के रवीश जी ने एक खूबसूरत पत्र लिखा है। इस पत्र को पढऩे के लिए लिंक नीचे दे रहा हूं और इस पर मेरी महाकाव्य प्रतिक्रिया इस प्रकार है। महाकाव्य इसलिए कि यह खुद एक ब्लॉग का रूप धारण कर चुकी है।
संग्रहणीय पत्र, रवीश जी का राघवजी के नाम पत्र। अद्भुत लाइन अपने मूसली पावर को वैचारिक धार दो। वास्तव में रवीश के गुपचुप समलैंगिकता के विरोध को दर्शाता है। शोज भी किए हैं आपने, समर्थन या विरोध के लिए नहीं, बल्कि कम से कम एक विचार कायम करने के लिए। जानने के लिए कि आखिर यह बीमारी है या वृत्ति या फिर वास्तव में 11वां रस है। खैर राघव जी मेरे लिए इसलिए सम्मानिय हैं, क्योंकि जब सबसे पहली राजनैतिक जागरुकता मैंने हासिल की थी, उस वक्त राघवजी हमारे सांसद हुआ करते थे। चुनावों में हम क्लासें छोडक़र झंडे लिए नारे लगाते फिरते थे, वह भी बहुत शौक से। नारा था राघवजी ने खेली कबड्डी प्रतापभानु की फट गई चड्डी। (प्रतापभानु शर्मा उस वक्त के राघवजी के सामने खड़े कांग्रेसी प्रत्याशी थे) मजे की बात यह है कि यह नारा बिल्कुल घर वालों या किसी महिला से छुपकर ही लगाया जाता था। जिस समाज में चड्डी फटना कहना तक वर्जित हो, उस समाज के राघवजी आप प्रतिनिधि थे। अजब। गजब। सर। और एक और नारा हम लोग राघवजी के समर्थन में लगाते थे। कमस राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे। मैंने सुना और अपनी मां से पूछा, कि यह कहां मंदिर बनाने की बात कह रहे हैं, चूंकि मेरे लिए वह सिर्फ नारा नहीं था, नतीजे था। मां जानती थी, तो उसने कहा कुछ नहीं बेटा अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। यब बात 1990 के पहले की है।
राघवजी इसलिए भी खास हैं, चूंकि वे उस दौर के नेता हैं, जब बीजेपी के पास देशभर में सीटें नहीं हुआ करती थीं। यानी गिनी चुनी बस। उस वक्त राघवजी के पद पूजन किए जाते थे। हालांकि वे उस समय नौजवान थे। नौजवान तो आज भी हैं!
- सखाजी
http://naisadak.blogspot.in/2013/07/blog-post_9.html

Sahitya Surbhi: गाँव (कविता )

Written By डॉ. दिलबागसिंह विर्क on रविवार, 7 जुलाई 2013 | 5:52 pm

Sahitya Surbhi: गाँव (कविता ):           मेरा गाँव           जैसा मेरे बचपन के दिनों में था           वैसा अब नहीं रहा           वह खो गया है कहीं           आज के गाँव...

Life is Just a Life: एक कोशिश शब्द पकाने की Ek Koshish Shabd Pakane Ki

Life is Just a Life: एक कोशिश शब्द पकाने की Ek Koshish Shabd Pakane Ki: कोई शब्द पकाता है, पर पेट नहीं भरता, कोई रोज हराता है अधिकार नहीं करता … मिट्टी की दुनिया में, रोटी की चाहत से, कोई रोज टूटत...

Life is Just a Life: गोबर Gobar

Written By नीरज द्विवेदी on गुरुवार, 4 जुलाई 2013 | 5:19 pm

Life is Just a Life: गोबर Gobar: बजबजाता रहता है अक्सर गोबर मस्तिष्क में … विचारों का हर तरह के गंदे, सड़े, गले, बुरे और कुछ अनजान अपरिचित बड़ी मुश्किल से रोकत...

Life is Just a Life: अश्रु और अकेलापन, Asru aur Akelapan

Written By नीरज द्विवेदी on रविवार, 30 जून 2013 | 5:22 pm

Life is Just a Life: अश्रु और अकेलापन, Asru aur Akelapan: अकेले में, सुकून से, आँखों के खाली होने का, दिल के हलके होने का, रोने का भी अपना अलग मजा है … ये दो चार अनजान सी बूँदें ...

Life is Just a Life: जीवन क्या है? Jeevan Kya Hai?

Life is Just a Life: जीवन क्या है? Jeevan Kya Hai?: जीवन क्या है, आसमान   के एक टुकडे   का, मीठा पानी, गिरा जमीं पर, चला खड़ा हो, कहने को एक नयी कहानी, थोडा हंसकर  ज्यादा रोया, जो भी प...

Life is Just a Life: खामोश पलकें Khamosh Palakein

Written By नीरज द्विवेदी on शनिवार, 29 जून 2013 | 8:53 am

Life is Just a Life: खामोश पलकें Khamosh Palakein: तेरा इन खामोश पलकों, संग गुप चुप मुस्कुराना, आँख से कुछ कर इशारे, तेरा मुड कर रूठ जाना। शबनम सा चुपके से बरसना, और फूलों की पन...

Founder

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Saleem Khan