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टिकट टिकट बस एक ही जुबां पर शब्द

Written By बरुण सखाजी on शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2013 | 7:14 pm

वह कुनमुना रहा है, कुछ भी नहीं मुंह से निकलता। बस कह रहा टिकट टिकट। भारी ज्वर है, दर्द है, सिर में भी भारी तनाव और दबाव है। शरीर अकड़ा जा रहा है, वक्त निकला जा रहा है। बस एक ही शब्द जुबां पर टिकट टिकट। लोग आसपास जमा हैं, ऐसा मर्ज है जिसका कोई संसार में डॉक्टर नहीं होता, सो कोई डॉक्टर भी नहीं है, आसपास। सब अपने अनुभवों से उसे सलाह दे रहे हैं, कह रहे हैं टिकट लाओ। भाई। मगर कोई समझता नहीं, किसी ने कहा डाक टिकट लाकर दो। दी गई। मगर वह चुप नहीं हुआ। बस डाक टिकट में बनी देश के पहले प्रधानमंत्री की तस्वीर देखकर इशारा करता रहा। कोई नहीं समझा, किस नेता की बात कर रहा है। बुखार बढ़ता जा रहा है, दर्द भी चरम पर है, हाथ पैरों में तो सूजन भी आने लगी। फिर मुंह से निकला टिकट टिकट।
कुछ और भी विद्वान वहां जमा हैं, किसी ने कहा पगला गए हो, वह टिकट मांग रहा है, बस की टिकट लाकर दो। दी गई। वह चुप नहीं हुआ। फिर कोई भीड़ से बोला, भाई ट्रेन की टिकट की बात कर रहा है, फिर वह झल्लाया, चिल्लाया टिकट टिकट। कोई है नहीं जो समझ पाता। इंसान है तो यही सोच रहा है, अधिक बुखार होने से यह बड़ बड़ा रहा है। फिर एक बार लोगों ने कहा प्लेन की टिकट दो। फिर भी चुप नहीं हुआ। सब हार गए, परेशान हो गए, सरप्राइज हो गए। आखिर यह चुप कैसे होगा।
कुछ ने कहा इसे इसके हाल पर छोड़ दो, शायद कुछ दिन बाद ठीक हो जाए। मगर ऐसा कैसे होता, भीड़ थी, तो सलाह देगी ही। फिर एक सलाह दी गई। भीड़ से कोई चिल्लाया, भैया वह विधानसभा की टिकट मांग रहा है। इतना सुनना था, कि मरीज का कुनमुनाना बंद हुआ, थोड़ा आराम लगा। किसी ने कहा कौन देगा, वह फिर दहाड़ मारकर रोने लगा।
आखिर इलाज तो हर चीज का है, न। बस पहचान भर हो जाए, कि मर्ज क्या है। सियासी बीमारियों के डॉक्टर को बुलाया गया। उसने आते ही कहा-
मरीज का नाम?
जी कमल विहारी।
उम्र?
55 साल।
कब से राजनीति में है?
करीब 50 साल से।
ठीक है तो अभी तो वह नौजवान है। पार्टी कौन सी है?
जी ढिमकापा।
बहुत बढिय़ा। (डॉक्टर ने जांच की) फिर बोला, इनके पैरों में जकडऩ है, सिर में दर्द है, पेट भी ठीक नहीं है, बुखार बहुत तेज है, चलो में कुछ दवाएं लिखता हूं ये कैसे भी अरेंज करना होंगी, वरना प्रत्याशी घोषणा के बाद यह बागी हो जाएगा। दवाएं हैं, राज्य पार्टी प्रभारी पेट की खराबी के लिए, जल्द से जल्द इनकी उनसे मुलाकात करवाएं। पैरों के दर्द के लिए समर्थकों को बुलाएं। सिरदर्द के लिए विरोधियों को विभाजित बनाएं रखें, वे एक न हो पाएं। बुखार इनका नहीं उतरेगा, जबतक यह लड़ न लें। देखिए ये दवाएं न मिल पाएं, तो फिर प्रत्याशी घोषणा के बाद मिलिए। निर्दलीय, बागी, दूसरी छोटी मोटी पार्टी आदि में शामिल करवा कर इनका ऑपरेशन करना होगा। ये लड़ेंगे नहीं तब तक टिकट टिकट चिल्लाएंगे। चूंकि यह बीमारी इतनी बढ़ चुकी है, कि ऑपरेशन ही लगता है करना होगा।
सब सरप्राइज अरे ये क्या?
सखाजी
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