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Life is Just a Life: क्षणिका – एहसास

Written By नीरज द्विवेदी on रविवार, 2 फ़रवरी 2014 | 1:21 pm

Life is Just a Life: क्षणिका – एहसास: क्षणिका – एहसास

बापस कर दो मुझे
मेरे एहसास
मेरी स्वांस
थक चुका हूँ मैं
नाचते नाचते
शब्दों के इशारों पर
पन्नों के सहारों पर
कठपुतली की तरह … नीरज 

खबरगंगा: आदिवासी पंचायतों की वैधानिकता का सवाल

Written By devendra gautam on शनिवार, 1 फ़रवरी 2014 | 10:43 pm

आदिवासी पंचायतों की वैधानिकता का सवाल

वीरभूम जिले में पंचायत के  आदेश पर घटित सामुहिक बलात्कार कांड पर पश्चिम बंगाल के  राज्यपाल एमके० नारायणन ने देश भर में इस तरह के गैर कानूनी अदालत को  बंद करने की अपील की है। 

DEVENDRAउन्होंने यह अपील राज्यपाल की हैसियत से की है अथवा एक संवेदनशील भारतीय नागरिक की हैसियत से अपने अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का प्रयोग करते हुए यह तो  पता नहीं लेकिन इसके  अंदर प्रशासनिक नज़रिये की जगह इस घटना से उपजा हुआ क्षोभ और आक्रोश ही दिखाई  पड़ रहा है। यदि उनकी अपील पर देश के  तमाम राज्यों  की सरकारें  अमल करती हैं तों ¨ यह सत्ता के विकेन्द्रीकरण की अवधारणा और पंचायती राज व्यवस्था की परिकल्पना के  विपरीत होगा ।
निश्चित रूप से यह घटना अ्त्यंत निंदनीय, अमानवीय और  शर्मनाक है। इसकी जितनी भी भर्त्सना  की जाये कम है। लेकिन इस एक फैसले से किसी एक पूरी संस्था के  वजूद के   नकारा जाना उचित नहीं है। बल्कि इस संस्था की गड़बडियों के  दुरुस्त करने पर विचार किया जाना चाहिए। भुक्तभोगी आदिवासी युवती का दोष सिर्फ इतना था कि वह समुदाय के  बाहर के  युवक से प्रेम करती थी। प्रेम करना किसी मायने में अपराध की श्रेणी में नहीं आता। इक्कीसवीं सदी में भी इतनी दकियानुसी सोच  का विद्यमान होना  इस बात की अलामत है कि पिछड़े समाजों के  ऊपर उठाने की अबतक की तमाम सरकारी गैर सरकारी को¨शिशें व्यर्थ गई हैं।
युवती का मां-बाप का दोष यह था कि वे गरीब थे और पंचायत के  25 हजार रुपये का दंड भरने की उनकी हैसियत नहीं थी। जाहिर तौर  पर पंच स्थानीय थे और उन्हें भुक्तभोगी परिवार की माली हालत की जानकारी रही होगी। फिर इतनी बड़ी रकम का दंड  लगाना उनकी कुत्सित मानसिकता का ही परिचायक था। माता पिता के  दंड भरने में असमर्थता जताने पर पंचायत ने आदिवासी युवती के  साथ सामुहिक बलात्कार का फरमान जारी कर दिया गया और  उसके आस पडोस के  ग्रामीण इसे अंजाम देने लगे। यह फरमान गैर कानूनी ही नहीं क्रूर और  पूरी तरह आपराधिक माना जाना चाहिए। इसे सामंती दबंगई का एक नमूना ही कहा जा सकता है। घटना के  कई दिन¨ बाद इस अपराध के लिए बलात्कार के 13 आरोपियों  के¨ न्यायिक हिरासत में लिया गया।
गिरफ्तारी में विलंब होने पर जिले के पुलिस कप्तान का तबादला कर दिया गया। लेकिन उन पंचों के कटघरे में खड़ा नहीं किया गया जिन्होंने यह शर्मनाक फैसला सुनाया था। उनकी भी गिरफ्तारी हो¨नी चाहिए। उनपर भी मुकदमा चलाया जाना चाहिए। इस घटना के लिए वे भी उतना ही दोषी हैं जितना उनके फैसले के अमली जामा पहनाने वाले युवती के आस-पडोस  के ग्राणीण। यदि राज्यपाल महोदय ने फरमान जारी करने वाले पंचों  की भी गिरफ्तारी का आदेश दिया होता तो  इसका स्वागत किया जाता। इसका संदेश दूर-दूर तक जाता। पंचायती राज के लिए यह एक नज़ीर बनता। तमा्म जातीय पंचायतों  के गैर कानूनी करार दिया जाना कहीं से भी उचित नहीं है।
आदिवासियों  की पड़हा पंचायत और  मानकी मुंडा प्रशासन के  ब्रिटिश सरकार के  जमाने में ही कानूनी मान्यता मिल गई थी। इसके लिए आदिवासी इलाके में कितने ही आंदोलन हुए। कुर्बानियां दी गईं। उन्हें एक सिरे से गैरकानूनी कहकर प्रतिबंधित कर देना न उचित है न संभव। जिस पंचायत ने यह क्रूर फैसला दिया उसकी कुछ न कुछ वैधानिक हैसियत तो अवश्य रही होगी। वे आदिवासियों  की पारंपरिक व्यवस्था के  तहत मान्यता प्राप्त पंच रहे हैं अथवा पंचायती राज व्यवस्था के  तहत चुने हुए मुखिया सरपंच। गांव समाज के खुद मुख्तार नेता रहे है अथवा ज¨ भी रहे है। उनका जो  भी स्वरूप रहा हो  लेकिन उन्हें पूरी तरह गैरकानूनी तो  नहीं करार दिया जा सकता।
आदिवासी पंचायतें कठोर  दंड देने के  लिए जरूर चर्चे में रही हैं। उनके  यहां डायन-विसाही के आरोप  में महिलाओं  को  मैला पिलाने, नंगा घुमाने का चलन रहा है लेकिन स्त्रियों की आबरू से खेलना उनकी संस्कृति या पारंपरिक दंड संहिता में शामिल नहीं रहा है। संभवतः यह पहला मौका है जब पूर्वांचल के किसी आदिवासी पंचायत ने हरियाणा की खाफ पंचायतो  की तर्ज पर फैसला किया है। इसके  पीछे कौन सी मानसिकता काम कर रही थी। आदिवासी समाज के  अंदर यह विकृति किधर से आयातित है रही है, इस पर गंभीरतापूर्वक विचार किये जाने की जरूरत है।
एक कड़वा सच यह भी है कि हमारे देश की न्याय व्यवस्था इतनी पेंचीदी है कि छोटे –छोटे  मामलें  का फैसला आने में भी कई-कई साल लग जाते हैं। न्याय मिलता भी है त¨ इतने विलंब से कि उससे संतुष्टि या असंतुष्टि के  भाव ही तिर¨हित ह¨ जाते हैं। फरियादी अदालते  के चक्कर लगाता-लगाता पूरी जवानी काटकर बूढ़ा है जाता है।
कभी-कभी तो  फैसला आने तक उसकी आयु ही समाप्त है  जाती है। आरो¨पी भी जमानत पर घूमते-घूमते दंड पाने से पहले ही स्वर्ग सिधार जाते हैं। न मुद्दई बचता है न मुदालय। बच जाते हैं सिर्फ मुकदमें ज¨ तारीख दर तारीख खिंचते चले जाते हैं। क¨यलांचल क¢ बहुर्चिर्चत दास हत्याकांड का फैसला आने आने में कई दशक निकल गए थे। तब तक सारे मुख्य आरोपियों का देहांत हो  चुका था। उनकी जगह परिवादियों  की सूची में शामिल किये उनके  भाई बंधु आजीवन कारावास के  भागी बने। ऐसे सैकडों उदाहरण हैं।
हमारी विलंबित न्याय प्रणाली के कारण ही नक्सल प्रभावित इलाका  में त्वरित फैसला करने वाली नक्सलियों  की जन अदालतें लगाकर  मान्य होती रही हैं। लोग अपनी फरियाद लेकर थाना और कोर्ट -कचहरी का चक्कर लगाने की जगह नक्सलियों  की कमेटियों  में अर्जी देने लगे हैं। उनका कई  वैधानिक अस्तित्व भले नहीं है  लेकिन उनके  इलाके में उनके प्रति एक किस्म की आस्था दिखाई देती है तो  यह हमारी न्याय प्रणाली की कमियों के  कारण ही। नक्सली न भारतीय संविधान के  मानते हैं न दंड संहिता के । उनका अपना अलग जंगल का कानून चलता है।
ग्राम स्तर पर मिल बैठकर मामलों  के  निपटाने की यह क¨ई नई व्यवस्था नहीं है। यह परंपरा प्राचीन काल से ही भारत में प्रचलित रही है। यहां पंच के  परमेश्वर का दर्जा दिया जाता रहा है। महात्मा गांधी भी पंचायती राज व्यवस्था क¨ ग्राम स्वराज का आधार मानते थे। वे सत्ता के  विकेद्रीकरण के हिमायती थे। तमाम राजनैतिक पार्टियां ग्राम पंचायतों को शक्ति संपन्न बनाने की वकालत करती हैं।
राज्यपाल महोदय ने जिस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त की है वह सत्ता के केंद्रीकरण की दिशा में संकेत देता है। यह राजतंत्र अथवा तानाशाही की व्यवस्था में ही संभव है। ल¨कतांत्रिक व्यवस्था में विकेद्रीकरण का महत्व है। तब यह जरूरी है कि सत्ता की छो¨टी से छोटी इकाइयां भी एक नियम के तहत चलें। एक दंड विधान है  जिसका हर स्तर पर पालन है। अपराध और  सज़ा के बीच एक तारतम्य है । तमाम फैसले समाज के मान्य है ।
गलत, पक्षपातपूर्ण, मनमाने और  विधान के विरुद्ध फैसले सुनाने वालों  पर कार्रवाई का प्रावधान भी होना चाहिए। मेहनत मजदूरी करके  गुजारा करने वालों  पर छोटी-छोटी गल्ती के लिए बड़ी-बड़ी राशियों  का आर्थिक दंड लादा जाना अराजकता और मनमानी का प्रतीक है।
निश्चित रूप से विकेद्रीकरण अच्छी चीज है लेकिन इसके  नाम पर अराजकता और  वर्वरता के ¨ प्रश्रय नहीं दिया जा सकता। किसी युवती के  साथ सामुहिक बलात्कार करने का आदेश मध्ययुगीन बर्बर समाज¨ में भी नहीं दिया जाता था। यह पूरी तरह आपराधिक कृत्य है। ऐसा फरमान जारी करने करने वाले के  खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई तो  भविष्य में भी इस तरह के  फरमान जारी किये जा सकते हैं।
लेकिन यदि किसी एक पंचायत ने अपने ही पंचायत की बेटी के साथ इस तरह का अमानुषिक फैसला दिया तो इसके  कारण आदिवासियों  की पूरी परंपरागत स्वशासन की व्यवस्था का  गैरकानूनी करार देकर प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। उस पंचायती इकाई क¨ भले भंग कर दिया जाए लेकिन पूरी व्यवस्था के  ध्वस्त नहीं किया जा सकता।
देवेंद्र गौतम 



खबरगंगा: आदिवासी पंचायतों की वैधानिकता का सवाल

Life is Just a Life: क्षणिका – खून भारत का

Written By नीरज द्विवेदी on शुक्रवार, 31 जनवरी 2014 | 10:16 pm

Life is Just a Life: क्षणिका – खून भारत का: क्षणिका – खून भारत का काश ... अश्रु निकलने और मोमबत्तियां बननी बंद हो जायें ... तब तो भारत का खून जलेगा, उबलेगा, खौलेग...

Life is Just a Life: क्षणिका – घुंघुरू

Written By नीरज द्विवेदी on सोमवार, 27 जनवरी 2014 | 10:57 pm

Life is Just a Life: क्षणिका – घुंघुरू: क्षणिका – घुंघुरू बाँध दिए मेरे पैरों में घुंघुरू शब्दों के और उसने जाते जाते छीन लिए एहसास कहा अब नाचों और मैं नाचने भी ल...

Life is Just a Life: क्षणिका – महँगी धरती

Written By नीरज द्विवेदी on रविवार, 26 जनवरी 2014 | 6:14 pm

Life is Just a Life: क्षणिका – महँगी धरती: क्षणिका – महँगी धरती कल धरती पर जो लुट जाती थी वो जान लूट ली जाती आज ... कल भी धरती महँगी थी आज भी धरती...

Life is Just a Life: क्षणिका – महँगी धरती

Life is Just a Life: क्षणिका – महँगी धरती: क्षणिका – महँगी धरती कल धरती पर जो लुट जाती थी वो जान लूट ली जाती आज ... कल भी धरती महँगी थी आज भी धरती...

अपनी पहचान बड़ी बात है

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on शनिवार, 25 जनवरी 2014 | 3:15 pm

इन्सान अगर मिर्च खाता है तो वह ये सोच कर ही खाता है कि इसमें मिर्च होगी. शक्कर भी यही सोच के खाई जाती है. सोचिये अगर मिर्च खाने के बाद हमे स्वाद आये शक्कर का या नमकीन का या खारा या कोई और, तब क्या होगा? हम फिर शक्कर क्यों खायेंगे. कोई दूसरी चीजें खोजेंगे, स्वाद के हिसाब से.

तो फिर इनमें क्या बुराई थी

अरविन्द केजरीवाल इन दिनों यही कर रहे हैं. १२० साल पुरानी कांग्रेस, २९ साल पुरानी भाजपा को, नित नए उगते क्षेत्रीय राजनैतिक कुकुरमुत्ते दलों को लोगों ने यूं ही खारिज नहीं किया था. अगर उन्हें ऐसे ही हुडदंग, झूठ, बयानों में तोड़ मरोड़ करने वालों को चुनना था तो फिर पुराने जाने हुए नेताओं में क्या बुराई थी. केजरीवाल का मैं भी समर्थक रहा, इसलिए नहीं कि वे उभरते सितारे हैं, बल्कि इसलिए कि वे पारंपरिक, सड रही सियासत को साफ़ करने की कोशिश कर रहे हैं. दिक्कत इस कार्य में आना लाजिमी था, किन्तु करना ज़रूरी था. लोगो ने वोट महज दिल्ली से शीला राज ख़त्म करने उन्हें नहीं दिया था. ये कार्य तो भाजपा को चुन के भी किया जा सकता था. असल में जिस बदलाव के लिए अरविन्द को चुना गया अब ये उसका वक्त था. खांटी सियासी तीर चलाने का ये वक्त नहीं था. नए साल में दो बदलाव लोगों को करना हैं, एक करके देख लिया दूसरा बाकी है. पर क्या इस नतीजे के बाद कोई दूसरे बदलाव को लेकर भी उतना ही आशावान होगा?

अरविन्द ने ५ पाप किये हैं

अरविन्द ने अपने इस छोटे से शुद्ध राजनैतिक जीवन को ख़त्म करके बहुत ख़राब किया. इससे उनके हाथों जाने अनजाने ही ५ पाप हो गये.

१. भरोसा गया

बदलाव को लेकर थ्रिल महसूस कर रहे नौजवान निराश हुए. वे अब जब भी बदलाव की बात की जाएगी, अरविन्द के घटिया मानस में खदकते स्वार्थ की बात करेंगे, अब सच्चे आदमी को भी भारी दिक्कत होने वाली है. सामान पाप अन्ना हजारे ने भी किया था, अनशन ख़त्म करके, अब वे दिखाए लोगों को जोड़ के, तभी हर कुछ लोकपाल पारित हुआ नहीं की शाम तक अन्ना सेब खाने लगे.

२. सियासत बुरी है, हम न कहते थे

उन लोगों को फिर आधार मिल गया, जो समेष कहते थे की सियासत सबसे गन्दी चीज है. नेताओं को गालियां देते हुए अपने गृहस्थी में मशरूफ रहते हैं.

३. वे फिर घुटते रहेंगे

पुराने दलों में कुछ अच्छे लोग आप के अंदाज से खुश हुए, उन्हें भी लगा नहीं यार सियासत चुनके उन्होंने कोइ गलत नहीं किया, उनके बच्चे भी आदर्शवाद की राजनीति करने वाले विफल बाबूजी नहीं कहेंगे. वे फिर डरे हुए सियासत में घुसे रहेंगे.

४. पुराने फिर चीखेंगे

जो पुराने दलों में बूथ केप्चरिंग, दलित, पिछडा, मुसलमान आदि को ही सियासत मानते थे, वे कहेंगे हम सही हैं. देख लो आप को, उन्हें भी तो वही करना पड़ेगा.

५. अफसर जो चाहते हैं कुछ करना

अफसरानों में यूं तो खतरनाक दिमाग से भारी लेस कई अफसर हैं, मगर कुछ अच्छे भी हैं, वे सोचते हैं अब शायद काम करने का मौका मिलगा. वे फिर से अपनी फाइलों में घुस जायेंगे, अपने वरिष्ठ की चापलूसी में मस्त हो जायेंगे. चूँकि वही तो होता है आगे बढ़ने का तरीका.
इन पापों की ज़िम्मेदारी अरविन्द ले न ले, बहरहाल लोकसभा से उनको अब ज्यादा उम्मीद नहीं करना चाहिए. श्रेष्ठ होता की दिल्ली की अपेक्षाओं पर ज़रा खरा उतर लेते पहले.
- सखाजी.

Life is Just a Life: भारत और रेल का जनरल डब्बा Bharat aur Rail ka ganar...

Written By नीरज द्विवेदी on गुरुवार, 16 जनवरी 2014 | 10:29 pm

Life is Just a Life: भारत और रेल का जनरल डब्बा Bharat aur Rail ka ganar...: भरी ठसी बोगी में अक्सर मेरा देश चला करता है, जनरल के डब्बे में जीकर बचपन रोज पला करता है। हो चाहे व्यवसाय दुग्ध का, रोज रोज का ऑफि...

अद्भुत भारत तुझे नमन। घटना एक, नजरिए अनेक।

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on बुधवार, 18 दिसंबर 2013 | 5:53 pm

भारतीय राजनयिक की अमेरिका में तलाशी और उन पर केस दर्ज।
एक असली कमेंट----
बसपा: वह शिड्यूल कास्ट की हैं, इसलिए भारत सरकार कुछ नहीं कर रही। (असली कमेंट)
अब काल्पनिक
आआपा: वह न्यूयॉक में बिजली कनेक्शन काट रही थी।
भाजपा: वह अमेरिका में रामलला का मंदिर बनवा रही थी।
कांग्रेस: वह सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ लड़ रही थी।
वाम दल: अमेरिकी पूंजीवादी हैं होता ही है ऐसा, राजनयिक को चीन जाना चाहिए था।
अन्ना: वह अमेरिका में लोकपाल के लिए अनशन पर जाने वाली थी।
बॉलीवुड: उनका अमेरिकी सीनेटर से चक्कर था।
सपा: वह कंप्यूटर शिक्षा का विरोध कर रही थी।
एनसीपी: वह अमेरिकी शुगर मिलों के साथ काम नहीं कर पा रही थी।
टीआरएस: वह पृथक छोटा टैक्सॉस मांग रही थी।
शिवसेना: वह अमेरिका से ब्रिटिश भैया को भगाने का काम कर रही थी।
आरजेडी: वह अमेरिका में चारागाहों पर कब्जा कर रही थी।
जदयू: वह भाजपा के साथ मिलकर अराजकता फैला रही थी।
डीएमके: उसे अमेरिकी सेतु समुद्रम का ठेका नहीं मिला था।
एआईडीएमके: वह तमिलों का साथ दे रही थी।
जय भारत, जय हिंद।
-सखाजी

कांग्रेस की एक और परीक्षा

AAP interacting with media.
देश की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस की सेहत पर दिल्ली नतीजों से ज्यादा असर नहीं पड़ता। चूंकि वह इतनी बड़ी और इतनी पुरानी पार्टी है कि उसे आप नहीं मिटा सकते। बहरहाल एक परीक्षा हुई, जिसके नतीजों में कांग्रेस पूरी तरह से तहत नहस सी नजर आई। इससे अभी वह उबरी भी नहीं थी, कि दूसरी परीक्षा उसके सामने है। कांग्रेसी पहली परीक्षा में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में सफाए के बाद थोड़ा आत्म चिंतन की मुद्रा में जरूर दिख रही है, लेकिन अभी भी अपनी 127 सालों पुराने तजुर्बे को वह कमतर नहीं मान रही। अभी दूसरी परीक्षा फिर उसकी होने जा रहा है। शकील अहमद इसे परीक्षा भले न मानें, सोनिया तो खैर क्या मानेंगी। मगर है तो कांग्रेस की ही परीक्षा। अब आआपा ने दिल्ली की जनता से पूछने के लिए २५ लाख लोगों तक सीधे पहुंचने की बात की है। उनसे एक बार फिर से यह पूछा जाएगा, कि वे सरकरा कांग्रेस के साथ बनाएं या नहीं। अगर इसमें बिल्कुल उल्टे नतीजे आते हैं, जिनमें जनता मना कर देती है। ऐसा हो भी रहा है, कई मीडिया, टीवी, अखबारों ने ऐसे सर्वे करवाएं हैं, जिनमें सरकार बनाने के लिए मना किया गया है। अगर ऐसे ही नतीजे आआपा के इस सर्वे में आते हैं, तो समझिए कांग्रेस एक और परीक्षा में फैल हो गई। वह कांग्रेस प्री पोल सर्वे में फैल होती है, वह एग्जिट पोल में फैल होती है, संवैधानिक चुनावी प्रक्रिया में फैल होती है, वह लोगों की आशाओं पर फैल होती है, वह कांग्रेस एक बार फिर से अगर इस सर्वे में भी फैल होती है, तो फिर क्या कांग्रेस को गंभीरता से सोचना नहीं चाहिए। आआपा ने भले ही सरकार बनाने के इस मसले को बेहद रोचक, गंभीर और नाटकीय बना दिया हो, लेकिन मसला सिर्फ सरकार बनाने का नहीं है न। इस पूरी प्रक्रिया में जहां भाजपा आआपा को दिल्ली से बाहर निकलने नहीं देना चाहती, ताकि वह देश में दिल्ली का सक्सेस कार्ड दिखाकर मोदी का रथ न रोके, तो वहीं कांग्रेस इन्हें हर शर्त पर एक्पोज करना चाहती है। आआपा से यूं तो कोई बड़ी भूल नहीं हुई, लेकिन एक भूल हो गई, वह यह कि 28 सीटों के साथ विपक्ष में बैठने की। उसे यह कहना था, कि हम सरकार बनाएंगे। लोगों में उत्साह जगता और जिन्होंने इन्हें वोट दिया है वह खुश होते, जिन्होंने नहीं दिया वह भी सोचते अबकी बार देंगे। मगर वह थोड़ा घूम गई, चूंकि उसके सामने थी ही इतनी बड़ी और तजुर्बेदार पार्टियां सामने।
- सखाजी

Life is Just a Life: कविता (मुक्तक) पाठ - दिल्ली में Reciting my poem i...

Written By नीरज द्विवेदी on मंगलवार, 17 दिसंबर 2013 | 8:30 pm

Life is Just a Life: कविता (मुक्तक) पाठ - दिल्ली में Reciting my poem i...: नीरज द्विवेदी, गाँधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा के तत्वाधान में आयोजित सन्निधि संगोष्ठी में दोहा सम्राट नरेश शांडिल्य जी और वरिष्ठ साहित्यकार हरेन्द्र प्रताप जी की उपस्थिति में कविता पाठ करते हुए. — at गाँधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा, राजघाट, नयी दिल्ली. सन्निधि संगोष्ठी (दोहा,मुक्तक). ....

Life is Just a Life: जग रही है या सो रही है जिंदगी Jag rahi hai ya So r...

Written By नीरज द्विवेदी on गुरुवार, 12 दिसंबर 2013 | 9:32 pm

Life is Just a Life: जग रही है या सो रही है जिंदगी Jag rahi hai ya So r...: शब्द का विन्यास धरती का रुदन इतिहास, केवल चल रही है या लड रही है जिन्दगी? स्नेह आंचल का आंख काजल का परिहास, केवल हंस रही है या रो ...

Life is Just a Life: कुछ तेरे हत्यारे हैं Kuch tere hatyarein hain

Written By नीरज द्विवेदी on मंगलवार, 10 दिसंबर 2013 | 7:50 pm

Life is Just a Life: कुछ तेरे हत्यारे हैं Kuch tere hatyarein hain: संसद चौपाटी में बैठे जुगनू बन कर तारे हैं, कुछ तेरे हत्यारे हैं कुछ मेरे हत्यारे हैं। जंगल से निकल कर चोर उचक्के दरबारों में जा बैठे...

फिर वही ढाक के तीन पात

Written By Sadhana Vaid on सोमवार, 9 दिसंबर 2013 | 12:39 am



चार राज्यों में चुनाव के परिणामों ने आज सच में भारत में महोत्सव का माहौल बना दिया है ! वर्षों की मायूसी, मोह भंग एवँ जद्दोजहद की ज़िंदगी जीने के बाद आज भारत की जनता के मुख पर अरसे के बाद एक सच्ची मुस्कान दिखाई दी है ! सत्ता परिवर्तन के साथ देश में राहत का वातावरण भी तैयार हो सकेगा जनता इसके लिये आशान्वित हो उठी है ! अन्याय, अराजकता, भ्रष्टाचार, मँहगाई, असुरक्षा और आतंक की चक्की में पिसते-पिसते आम जनता की मनोदशा इतनी दुर्बल हो गयी थी कि उसके लिये आस्था, विश्वास, निष्ठा, भरोसा जैसे शब्द अपना अर्थ खो चुके थे ! इतने वर्षों तक आकण्ठ भर चुका पाप का घड़ा एक दिन तो फूटना ही था ! आज के चुनाव परिणाम के साथ यह शुभ दिन भी आ गया ! आज सच में उत्सव मनाने का दिन है !
इन चुनावों में कॉंग्रेस पार्टी की हार होगी और भारतीय जनता पार्टी की जीत होगी इसके लिये तो जनता मानसिक रूप से तैयार थी ही लेकिन अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी इतने ज़ोरदार तरीके से अपनी आमद दर्ज करायेगी यह अवश्य ही अप्रत्याशित था ! सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई एवँ शुभकामनायें !
जिस तरह से दिल्ली में सीटों के आँकड़े सामने आये हैं उनके अनुसार दिल्ली में पुन: त्रिशंकु विधान सभा बनने के आसार दिखाई दे रहे हैं ! ३१ सीटें जीत कर पूर्ण बहुमत ना मिलने के कारण सरकार बनाने के लिये ना तो भारतीय जनता पार्टी ही उत्सुक दिखाई दे रही है ना ही २८ सीटें जीतने के बाद आम आदमी पार्टी ! बदलाव होना चाहिये लेकिन इस तरह का जनादेश जनता का कोई भला नहीं कर सकता यह भी विचारणीय है ! जनता ने अपना समर्थन देकर कॉंग्रेस पार्टी को करारी हार दिलाई सिर्फ इसी आशा में कि अब साफ़ सुथरी सरकार सत्ता सम्हालेगी और आम जनता की चिंताओं और फिक्रों को विराम लग जायेगा ! लेकिन जो परिणाम सामने आये उसमें कोई भी पार्टी अकेली सरकार बनाने के लिये समर्थ नहीं ! और आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी दोनों मिल कर सरकार बनाने के लिये तैयार नहीं ! दोनों ही विपक्ष में बैठने की बात कर रहे हैं जिसका सीधा अर्थ है राष्ट्रपति शासन अर्थात परदे के पीछे से फिर कॉंग्रेस का ही शासन ! यानी कि फिर वही ढाक के तीन पात ! यदि ऐसा होता है तो जनता फिर छली जायेगी ! चुनाव खाली हार जीत का ही खेल नहीं है यह जनता द्वारा सरकार बनाये जाने की एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है ! चुनाव में खड़े होना का अर्थ देश के प्रति अपने समर्पण एवं त्याग को स्थापित करना है यह मात्र अहम तुष्टि का साधन नहीं है ! इन परिणामों ने फिर से चिंतित कर दिया है ! तो क्या अब भी दिल्ली के भविष्य पर अनिश्चय के बादल ही मँडराते रहेंगे ?
जनता ने चुनाव में मतदान करके अपना फ़र्ज़ अदा कर दिया ! अब फ़र्ज़ अदायगी का नंबर नेताओं का है कि वे आपसी मतभेद भूल कर अपने अपने प्रदेशों को साफ़ सुथरी, निष्ठावान एवँ कर्तव्यपरायण सरकार दें जो आम आदमी की दिक्कतों को समझे, उन्हें दूर करने के लिये प्रयासरत रहे और भ्रष्टाचार, स्वार्थ और अकर्मण्यता की पुरानी प्रचलित परम्पराओं को तोड़ कर अपनी साफ़ सुथरी छवि जनता के सामने स्थापित करे !

साधना वैद  

राष्ट्र-धर्म का रक्षक संस्कृति रक्षक दल (साम्प्रदायिकता विरोधी मोर्चा रजि. द्वारा संचालित)

Written By Bharat Swabhiman Dal on शुक्रवार, 29 नवंबर 2013 | 4:27 pm

संस्कृति रक्षक दल, साम्प्रदायिकता विरोधी मोर्चा रजि. द्वारा संचालित एक गैर सरकारी सामाजिक स्वयंसेवी संगठन है । इस संगठन का मुख्य उद्देश्य भारतीय संस्कृति की रक्षा व संवर्द्धन करना तथा सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व आध्यात्मिक सभी प्रकार की व्यवस्थाओं का परिवर्तन कर स्वस्थ, समृद्ध एवं शक्तिशाली भारत का पुनर्निर्माण करना है । भारत व भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए संगठन की ग्यारह सूत्री कार्य योजना निम्नलिखित है :-

1. वर्तमान में चल रही समस्त गलत नीतियों व भ्रष्ट व्यवस्थाओं का राष्ट्र हित में पूर्ण परिवर्तन कराना । भ्रष्टाचार, बलात्कार, दहेज हत्या, गौहत्या, आतंकवाद व मिलावट करने वालों के खिलाफ मृत्युदंड का कानून बनवाकर 127 करोड़ भारतीयों को सुरक्षा प्रदान करवाना । इसके लिए देश में फास्ट ट्रेक कोर्ट बनवाकर एक से तीन माह में तुरन्त न्याय की व्यवस्था कराना, जिससे कि अपराधियों को तुरन्त दंड मिल सके और इन भ्रष्टाचार व बलात्कार आदि करने वालों के मृत्युदंड के कानून को राष्ट्रपति के क्षमादान के अधिकार से मुक्त करवाना तथा शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून, अर्थ व कृषि व्यवस्था आदि का पूर्ण भारतीयकरण व स्वदेशीकरण करना ।

2. देश के संविधान से अपमानजनक शब्द इंडिया को हटाकर भारत की पुर्नस्थापना करना, विवादस्पद शब्द 'राष्ट्रपिता' को प्रतिबंधित कराकर भारत माँ के सम्मान की रक्षा करना, भारतीय नागरिकों में साम्प्रदायिक आधार पर भेदभाव उत्पन्न करने वाली नीतियों, कानूनों आदि को भंग करके देश के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता की व्यवस्था कर समानता का अधिकार प्रदान करना, हज सब्सिडी व इमामों को सरकारी कोष से वेतन देना बंद करना तथा शत्रु संपत्ति व बक्फ संपत्ति का राष्ट्रीयकरण करना । आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति को बनाना, जाति - धर्म के आधार पर आरक्षण बन्द करना ।

3. काले धन की अर्थ-व्यवस्था को समाप्त करने, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने, काले धन को वापस मंगाने, भ्रष्टाचारियों की संपत्ति को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने व भ्रष्टाचारियों को कठोर दंड का प्रावधान कराने के लिए कठोर कानून बनवाना ।

4. गौवंश की हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना, गौवंश के हत्यारों को मृत्युदंड का प्रावधान कराना तथा गौवंश पर आधारित अर्थ-तंत्र की व्यवस्था करना, गौवंश आधारित कृषि, ऊर्जा, उद्योग आदि का तंत्र विकसित कराना ।

5. विद्यालयों में चरित्र निर्माण, व्यवसायिक शिक्षा व सैन्य शिक्षा अनिवार्य करना । तथ्यों के आलोक में भारतीय इतिहास का पुर्नलेखन कराकर ताजमहल, कुतुब मिनार आदि प्राचीन भवनों के वास्तविक निर्माताओं को उनका श्रेय देकर भारत का सुप्त स्वाभिमान जगाना । केन्द्रीय परीक्षाओं में अंग्रेजी प्रश्नपत्र की अनिवार्यता समाप्त करना तथा संस्कृत, हिन्दी व क्षेत्रीय भाषाओं को वैकल्पिक आधार प्रदान करना । काल गणना के लिए युगाब्ध को अपनाकर राष्ट्रीय पंचांग के रूप में लागू करना ।

6. संस्कृत भाषा को प्रोत्साहित करना, उसे द्वितीय राजभाषा का दर्जा देना, संस्कृत माध्यम से संस्कृत शिक्षा देना, प्रत्येक राज्य में एक - एक केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना करना, संस्कृत में व्यवसायिक, रोजगार उन्मुख पाठ्यक्रमों का निर्माण करना व संस्कृत में रोजगार के अधिक अवसरों को उपलब्ध कराना, दूरदर्शन संस्कृत की स्थापना करना ।

7. मुस्लिम समाज का अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त कर उन्हें भारत की मुख्यधारा बहुसंख्यक समाज की श्रेणी में शामिल करना । 1947 में हिन्दुस्थान विभाजन के पश्चात भारत में मुस्लिम जनसंख्या 7.88 प्रतिशत बची थी जो जनगणना 2011 में बढ़कर संभावतः 17.80 प्रतिशत हो चुकी है, जो कि बहुसंख्यक समाज है, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार किसी भी देश में 10 प्रतिशत से कम जनसंख्या वाले धार्मिक समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा दिये जाने का प्रावधान हैं, 10 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या होने पर वह समाज बहुसंख्यक की श्रेणी में आता है ।

8. जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना तथा कश्मीर के मूल निवासियों का जम्मू-कश्मीर में सुरक्षित पुर्नवास कराना ।

9. स्वदेशी उत्पादनों को प्रोत्साहित करना, आयुर्वेद को राष्ट्रीय चिकित्सा पद्धति घोषित करना ।

10. मांस निर्यात बन्द करना, जैविक कृषि एवं पशुपालन को प्रोत्साहित करना तथा राष्ट्रीय किसान आयोग का पुनर्गठन करना । बडे बांधों की योजनाओं को निरस्त कर पर्यावरण के अनुकूल छोटे - छोटे बांधों की योजना पर कार्य करना ।

11. बेरोजगारी, गरीबी, भूख, अभाव व अशिक्षा से मुक्त स्वस्थ, समृद्ध, संस्कारवान व शक्तिशाली भारत का पुनर्निर्माण करना और भारत को विश्व की महाशक्ति तथा विश्वगुरू के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना ।

साम्प्रदायिकता के विनाश एवं भारतीय संस्कृति के विकास के लिए संगठन की ग्यारह सूत्री कार्य योजना को पसंद करने वाले मित्रों, भारत माता, गौ माता, गंगा माता के पुजारियों, भगवान राम, कृष्ण के भक्तों, विश्वविजेता सम्राट विक्रमादित्य, अखण्ड भारत के सृजनकर्ता आचार्य चाणक्य, मेवाड़ केसरी महाराणा प्रताप, हिन्दुत्व रक्षक छत्रपति शिवाजी, महर्षि दयानन्द सरस्वती, गुरू गोविन्द सिंह, स्वामी विवेकानन्द, संत रविदास के अनुयायीयों, क्रांतिधर्मी बिरसा मुण्डा, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, वीर सावरकर, भगत सिंह, पं. नाथूराम गोडसे, रानी लक्ष्मीबाई, वीर गोकुल सिंह, चन्द्रशेखर आजाद के आदर्शवादियों, वेद, शास्त्र, रामायण, गीता के श्रद्धालुओं, साम्प्रदायिक एवं भ्रष्ट आसुरी शक्तियों के विनाश एवं राष्ट्र धर्म की रक्षा हेतु अधिक से अधिक संख्या में तन - मन - धन के साथ संगठन से जुड़ें ।
संस्कृति रक्षक दल आपका हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन करता है ।
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E-mail: svmbharat@gmail.com mob.09412458954

विश्वजीत सिंह 'अनंत' 09412458954

विपिन कुमार सुराण 09997967204

बालकिशन 'किशना जी' 09827714551

चन्द्रभान मिन्हास 09625569953

देशपाल सिंह चौधरी 07351828972

हरीश कुमार शर्मा 09868354451

हरीओम सिंह 08126941201

प्रमोद यादव 09917648983, 09826558741

श्रीमती शशी शर्मा 09456680640

राष्ट्र-धर्म रक्षा के जन आन्दोलन संस्कृति रक्षक दल से जुड़ने के लिए कृपया मोबाईल नम्बर 09412458954 पर अपना नाम, उम्र, ई-मेल आईडी & पिन कोड़ SMS करें ।

e.g: kavita chaudhary, 23, kavitachaudhary172@gmail.com, 250001

Life is Just a Life: सियासत Siyasat

Written By नीरज द्विवेदी on गुरुवार, 14 नवंबर 2013 | 9:21 am

Life is Just a Life: सियासत Siyasat: वो हैं कि देशभक्ति का अजीब शौक रखते हैं ये हैं सियासी भेड़िए , कुत्तों की फौज रखते हैं ... दहशतजदा हिमालय कोई कर नह...

उसे पता भी न चला

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on रविवार, 10 नवंबर 2013 | 6:12 pm

उसे पता भी न चला,
उसके लिए,
कितने,
लड़ गये,
मर गए,
कट गए,
कितनों का खून बहा,
कितनों को चोटें लगीं,

उसे पता भी न चला,
उसके लिए,
दोस्त-दोस्त से लड़ा,
छोटा बड़े से भिड़ा,
हर कोई एक-दुसरे से चिड़ा,
दोष दुसरे पर मढ़ा,

उसे पता भी न चला,
उसके लिए,
दीवानगी किस-किस की,
दाव-पर-दाव,
उसके नाम पर लगे,
शहर पर सहर,
उसके नाम से बसे,

उसे पता भी न चला,
उसके लिए,
कितनों ने उसे सपनों में बुलाया,
सपनों में सजाकर,
सपनों कि रानी बनाया,
सपनों ही सपनों में,
ब्याह रचाया,
उसे पता भी न चला,

...

Life is Just a Life: जलते भारत की चीखें Jalte Bharat ki Cheekhein

Written By नीरज द्विवेदी on शनिवार, 9 नवंबर 2013 | 10:34 am

Life is Just a Life: जलते भारत की चीखें Jalte Bharat ki Cheekhein: जलते भारत की चीखें सड़कों पर पड़ी दरारें जब से बन गयी दिलों की खाई है, मंदिर से मस्जिद तक केवल मानवता कुम्हलाई है। बिगड़ गए खड़...

मोदी का गुड मिक्स और हिस्ट्री टच

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on रविवार, 27 अक्टूबर 2013 | 4:22 pm

राहुल गांधी ने लोगों को भावुक करने के लिए जहां दादी, नाना, पापा के मरने के घिसे पिटे अस्त्र का इस्तेमाल किया, तो वहीं मोदी ने पुराने पड़े औजार को नए सिरे से पजा (धार बनाना) लिया। राहुल कह रहे थे, मेरी दादी मरी, पापा को मार डाला एक दिन मुझे भी मार डालेंगे। इसमें यह कहीं नहीं रिफ्लेक्ट हुआ हर मरने वाले को सत्ता मिलनी चाहिए। फिर कोई कसर रही तो आईएसआई के जरिए साधने के चक्कर में खुद भेद दिए गए।
इसके काउंटर के लिए नरेंद्र मोदी ने जो किया वह सबका था। पहले दिन झांसी की रानी का टच निकाला तो अगली पटना की रैली में सिंकदर को निपटाने वाले बिहारियों का सीना फुला दिया। इतना ही नहीं, बातों ही बातों में किंग मेकर चाणक्य का भी जिक्र कर दिया। यानी बिहार मोदी के लिए बेहद जरूरी है। फिर नीवनतम इतिहास जेपी और बीजेपी का जिक्र भी बड़ी ही सावधानी और आम आदमी से जुडऩे वाले लहजे में किया। 
साबित होता है, कि राहुल के लिए प्राग इतिहास मोतीलाल नेहरू हैं, तो आजादी का इतिहास जवाहरलाल नेहरू। देश में प्रगति का इतिहास इंदिरा गांधी हैं, तो तकनीकी विकास का इतिहास राजीव गांधी। देश को, चीत्कार करते हिंदू मुस्लिमों के आपसी टकराव से बचाने वाला इतिहास उनकी पार्टी है। अंत में देश की इतनी दुर्दशा के बावजूद अगर कोई आशा की किरण है, तो वे स्वयं हैं।
यह है राहुल का इतिहासबोध और उसका इस्तेमाल। इसके ठीक उलट, मोदी ने सार्वजनिक सीना फुलाऊ इतिहास को पकड़ा, जकड़ा और इस्तेमाल किया। सिंकदर जो विश्वविजयी था, उसे हराने पर किसका सीना न फूलेगा, चाणक्य जो हिंदुस्तान के स्वर्ण युग के महागुरु हैं, जिनकी सीखें हर कोई अंधा होकर मानता है, उनके बिहारी कनेक्शन से कौन हरजाई होगा, जो रूठेगा। जेपी जैसे आधुनिक समाजवाद के आधुनिक संस्करण पर कौन बिहार का नेता होगा जो न रीझेगा। ये सब वे बातें हैं, जो सबका सीना फुलाती हैं। यह अल्हदा बात है, कि नरेंद्र मोदी का इतिहास टच कोई नया नहीं है, यह 90 के दशक में भाजपाइयों ने खूब यूज किया है। बड़ी लंबी लच्छेदार बातें करके लोगों के सीने फुलाए और उनपर आज तक राज कर रहे हैं। अभी तो मोदी को प्राग इतिहास में जाना बाकी है, जहां से राजा, ऋषि, मुनि, वेद, शा, ग्रंथों से उद्धरण लिए जाते हैं। धार्मिक कथानकों का विज्ञानिक आधार दिया जाता है। जबकि राहुल फिर से कांग्रेसी बलिदान की खोल में घुसते नजर आ सकते हैं, लेकिन यह बहुत पुराना अ और उदाहरण हो चला है, अब कुछ नया करना पड़ेगा। अपने खास होने वाले चोले से बाहर आना एक कलावती के घर में खाने से संभव नहीं हैं, तो वहीं नरेंद्र मोदी ने  फिर से रेल के डिब्बे में चाय बेचने की बात कहकर आम लोगों से कनेक्शन स्थापित किया। तो अपनी इमेज के इतर, गुजरात में कच्छ और भरूंच का उदाहरण देते हुए मुसलमानों को भी साधा। गरीबी के नाम धागे से हिंदू मुस्लिमों को बांधने की देश में पहली और नायाब कोशिश भी की। चूंकि अब कोई यूं तो निबंधों से इकट्ठा होगा नहीं, कि हिंदू मुस्लिम भाई-भाई कह दो और सब एक हो जाएं। इसलिए परखा हुआ, जाना, समझा और 100 टका सही तरीका अपनाया।

यहां से मोदी के जरिए हम देश में आ रही सकारात्मक राजनीतिक बयार को भी महसूस कर सकते हैं। चूंकि एक दम से सबकुछ सतयुग जैसा हो जाए, आपस में विरोधी राजनेता कजलियों की तरह एक दूसरे को आप लीजिए वोट आप लीजिए कहने लगे यह मुमकिन नहीं है। इसलिए मोदी ने इक्का दुक्का बातें और विषय वस्तु आम भी रखी। नीतीश पर भी बहुत सख्त या खराब तरीके से नहीं बरसे, सामान्य विरोधी होने के नाते वैचारिक भिन्नता को दिखाया। ये सब कुछ ऐसी बातें हैं, जिन्हें हम सकारात्मक सियासत का सूत्रपात कह सकते हैं। साथ ही मोदी का गुड मिक्स ऑफ हिस्ट्री टच कह सकते हैं।

-सखाजी

Life is Just a Life: जैसे कोई शीशा टूट गया हो Jaise Koi Sheesha Tut Gay...

Written By नीरज द्विवेदी on रविवार, 20 अक्टूबर 2013 | 12:15 pm

Life is Just a Life: जैसे कोई शीशा टूट गया हो Jaise Koi Sheesha Tut Gay...: एक छन्न की आवाज जैसे कोई शीशा टूट गया हो बिखर गया हो गिरकर आँखों की कोरों से कोई सपना कोई अपना गूंजता रहा एक सत्य कानों में ...

टिकट टिकट बस एक ही जुबां पर शब्द

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013 | 7:14 pm

वह कुनमुना रहा है, कुछ भी नहीं मुंह से निकलता। बस कह रहा टिकट टिकट। भारी ज्वर है, दर्द है, सिर में भी भारी तनाव और दबाव है। शरीर अकड़ा जा रहा है, वक्त निकला जा रहा है। बस एक ही शब्द जुबां पर टिकट टिकट। लोग आसपास जमा हैं, ऐसा मर्ज है जिसका कोई संसार में डॉक्टर नहीं होता, सो कोई डॉक्टर भी नहीं है, आसपास। सब अपने अनुभवों से उसे सलाह दे रहे हैं, कह रहे हैं टिकट लाओ। भाई। मगर कोई समझता नहीं, किसी ने कहा डाक टिकट लाकर दो। दी गई। मगर वह चुप नहीं हुआ। बस डाक टिकट में बनी देश के पहले प्रधानमंत्री की तस्वीर देखकर इशारा करता रहा। कोई नहीं समझा, किस नेता की बात कर रहा है। बुखार बढ़ता जा रहा है, दर्द भी चरम पर है, हाथ पैरों में तो सूजन भी आने लगी। फिर मुंह से निकला टिकट टिकट।
कुछ और भी विद्वान वहां जमा हैं, किसी ने कहा पगला गए हो, वह टिकट मांग रहा है, बस की टिकट लाकर दो। दी गई। वह चुप नहीं हुआ। फिर कोई भीड़ से बोला, भाई ट्रेन की टिकट की बात कर रहा है, फिर वह झल्लाया, चिल्लाया टिकट टिकट। कोई है नहीं जो समझ पाता। इंसान है तो यही सोच रहा है, अधिक बुखार होने से यह बड़ बड़ा रहा है। फिर एक बार लोगों ने कहा प्लेन की टिकट दो। फिर भी चुप नहीं हुआ। सब हार गए, परेशान हो गए, सरप्राइज हो गए। आखिर यह चुप कैसे होगा।
कुछ ने कहा इसे इसके हाल पर छोड़ दो, शायद कुछ दिन बाद ठीक हो जाए। मगर ऐसा कैसे होता, भीड़ थी, तो सलाह देगी ही। फिर एक सलाह दी गई। भीड़ से कोई चिल्लाया, भैया वह विधानसभा की टिकट मांग रहा है। इतना सुनना था, कि मरीज का कुनमुनाना बंद हुआ, थोड़ा आराम लगा। किसी ने कहा कौन देगा, वह फिर दहाड़ मारकर रोने लगा।
आखिर इलाज तो हर चीज का है, न। बस पहचान भर हो जाए, कि मर्ज क्या है। सियासी बीमारियों के डॉक्टर को बुलाया गया। उसने आते ही कहा-
मरीज का नाम?
जी कमल विहारी।
उम्र?
55 साल।
कब से राजनीति में है?
करीब 50 साल से।
ठीक है तो अभी तो वह नौजवान है। पार्टी कौन सी है?
जी ढिमकापा।
बहुत बढिय़ा। (डॉक्टर ने जांच की) फिर बोला, इनके पैरों में जकडऩ है, सिर में दर्द है, पेट भी ठीक नहीं है, बुखार बहुत तेज है, चलो में कुछ दवाएं लिखता हूं ये कैसे भी अरेंज करना होंगी, वरना प्रत्याशी घोषणा के बाद यह बागी हो जाएगा। दवाएं हैं, राज्य पार्टी प्रभारी पेट की खराबी के लिए, जल्द से जल्द इनकी उनसे मुलाकात करवाएं। पैरों के दर्द के लिए समर्थकों को बुलाएं। सिरदर्द के लिए विरोधियों को विभाजित बनाएं रखें, वे एक न हो पाएं। बुखार इनका नहीं उतरेगा, जबतक यह लड़ न लें। देखिए ये दवाएं न मिल पाएं, तो फिर प्रत्याशी घोषणा के बाद मिलिए। निर्दलीय, बागी, दूसरी छोटी मोटी पार्टी आदि में शामिल करवा कर इनका ऑपरेशन करना होगा। ये लड़ेंगे नहीं तब तक टिकट टिकट चिल्लाएंगे। चूंकि यह बीमारी इतनी बढ़ चुकी है, कि ऑपरेशन ही लगता है करना होगा।
सब सरप्राइज अरे ये क्या?
सखाजी

Life is Just a Life: भारत में गौहत्या - एक दंश

Written By नीरज द्विवेदी on सोमवार, 14 अक्टूबर 2013 | 11:36 pm

Life is Just a Life: भारत में गौहत्या - एक दंश: कल फिर अनगिन निरीह आहें निकलेंगी इसी भूमि पर फिर से धरती को सहना होगा अथाह संताप कातर चीत्कारें अस्पष्ट मार्मिक पुकारें बूचड...

Life is Just a Life: रेशे Reshe

Written By नीरज द्विवेदी on सोमवार, 7 अक्टूबर 2013 | 11:30 pm

Life is Just a Life: रेशे Reshe: रेशे कल शाम बिछुड़ गए मुझसे मेरे कई अधूरे शब्द, खो गए कुछ अस्पष्ट भाव बिखरे हुए अजन्में विचार और दूर हो गयीं मुझसे क...

(गीत) जाने कितने बेघर हो गए !

                             
                                                                 

                                                           जाने कितने बेघर हो गए ,कितने ही बेजान ,
                                                            फिर भी  सबक नहीं ले रहा  आज का इंसान !
                                                                     मिट गए सारे जंगल - पर्वत  
                                    ,                                क़त्ल हो गए झरने
                                                                     खेतों में  धुंए की बारिश ,
                                                                     फसल लगी है मरने !
                                                        खून का प्यासा युद्धखोर अब यह मानव बेईमान ,   
                                                        हिंसा-प्रतिहिंसा में जल कर  जग बनता श्मशान !
                                                                    समझे खुद को धरती और
                                                                    समन्दर का स्वामी ,
                                                                     इसीलिए तो धमका जाए
                                                                     बार-बार सुनामी !
                           
                                                      मिट जाएगा देख लेना सबका नाम-ओ-निशान
  ,                                                   कुछ लोगों की करनी से है यह दुनिया परेशान  !
                                                        
                                                                गंगा -जमुना मैली हो गयी
                                                                खुल  कर पापी मुस्काएं  ,     
                                                                पाप नहीं  मिट  पाएगा
                                                                 चाहे बार-बार   धुलवाए !
                                                  झूठ-फरेब की आदत और  एक झूठा अभिमान  ,
                                                  महासागर के रौद्र रूप से  मटियामेट  मकान  !
                                                            नदियों के  मीठे पानी को 
                                                            बना  दिया   ज़हरीला ,
                                                            सहज-सलोना गाँव मिटाया    
                                                            शहर बसा रंगीला !
                                                
                                                  महंगाई का खूनी मंज़र  रोज  निकाले प्राण ,
                                                  फिर भी सबक नहीं ले रहा आज का इंसान  !
                             
                                                                                    --  स्वराज्य  करुण
                                             गीत 
                                                        जाने कितने बेघर हो गए !

                                                                                
                                                           जाने कितने बेघर हो गए ,कितने ही बेजान ,
                                                            फिर भी  सबक नहीं ले रहा  आज का इंसान !
                                                                     मिट गए सारे जंगल - पर्वत  
                                    ,                                क़त्ल हो गए झरने
                                                                     खेतों में  धुंए की बारिश ,
                                                                     फसल लगी है मरने !
                                                        खून का प्यासा युद्धखोर अब यह मानव बेईमान ,   
                                                        हिंसा-प्रतिहिंसा में जल कर  जग बनता श्मशान !
                                                                    समझे खुद को धरती और
                                                                    समन्दर का स्वामी ,
                                                                     इसीलिए तो धमका जाए
                                                                     बार-बार सुनामी !
                           
                                                      मिट जाएगा देख लेना सबका नाम-ओ-निशान
  ,                                                   कुछ लोगों की करनी से है यह दुनिया परेशान  !
                                                        
                                                                गंगा -जमुना मैली हो गयी
                                                                खुल  कर पापी मुस्काएं  ,     
                                                                पाप नहीं  मिट  पाएगा
                                                                 चाहे बार-बार   धुलवाए !
                                                  झूठ-फरेब की आदत औ एक झूठा अभिमान  ,
                                                  महासागर के रौद्र रूप से  मटियामेट  मकान  !
                                                            नदियों के  मीठे पानी को 
                                                            बना  दिया   ज़हरीला ,
                                                            सहज-सलोना गाँव मिटाया    
                                                            शहर बसा रंगीला !
                                                
                                                  महंगाई का खूनी मंज़र  रोज  निकाले प्राण ,
                                                  फिर भी सबक नहीं ले रहा आज का इंसान  !
                             
                                                                                                 --  स्वराज्य  करुण

Founder

Founder
Saleem Khan