Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: शत प्रतिशत Shat Pratishat: शत प्रतिशत तुम होती हो तो ये सच है कि सब कुछ मेरे मन का नहीं होता मेरी तरह से नहीं होता मेरे द्वारा नहीं होता मेरे लिए न...
4:11 pm
Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: शत प्रतिशत Shat Pratishat
Written By नीरज द्विवेदी on सोमवार, 20 अक्टूबर 2014 | 4:11 pm
5:01 pm
Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: तुम्हारे बिना भी Tumhare Bina Bhi
Written By नीरज द्विवेदी on शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014 | 5:01 pm
Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: तुम्हारे बिना भी Tumhare Bina Bhi: मैं खुश रहता हूँ, आज कल भी तुम्हारे बिना भी पर तुम्हे पता है कि मुझे कितनी हिम्मत जुटानी पड़ती है कितनी जद्दोजेहद करनी पड़ती है ...
6:45 pm
Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: एक वृक्ष की शाख हैं हम Ek Vriksh Ki Shakh Hai Ham
Written By नीरज द्विवेदी on बुधवार, 15 अक्टूबर 2014 | 6:45 pm
Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: एक वृक्ष की शाख हैं हम Ek Vriksh Ki Shakh Hai Ham:
विंध्य हिमाचल से निकली जो,
उस धारा की गति प्रवाह हम,
मार्ग दिखाने इक दूजे को,
बुजुर्ग अनुभव की सलाह हम,
फटकार हैं हम, डांट हैं हम, एक वृक्ष की शाख हैं हम।
.....
......
विंध्य हिमाचल से निकली जो,
उस धारा की गति प्रवाह हम,
मार्ग दिखाने इक दूजे को,
बुजुर्ग अनुभव की सलाह हम,
फटकार हैं हम, डांट हैं हम, एक वृक्ष की शाख हैं हम।
.....
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10:06 pm
Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: क्षणिका - जल्दी बीतो न Jaldi Beeton Na
Written By नीरज द्विवेदी on मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014 | 10:06 pm
Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: क्षणिका - जल्दी बीतो न Jaldi Beeton Na:
जल्दी बीतो न,
दिन,
रात
और दूसरे समय के टुकड़ों ...
दिन,
रात
और दूसरे समय के टुकड़ों ...
तेज चलो न
घडी की सुईयों
धक्का दूँ क्या ....
घडी की सुईयों
धक्का दूँ क्या ....
ये टिक टिक
जल्दी जल्दी टिक टिकाओ न …
जल्दी जल्दी टिक टिकाओ न …
तुम्हारा क्या जाता है
पर मेरा जाता है।
पर मेरा जाता है।
-- नीरज द्विवेदी
5:31 pm
Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: जब समझ जाओ, तब तुम मुझको समझाना Jab Samajh Jao, Ta...
Written By नीरज द्विवेदी on रविवार, 7 सितंबर 2014 | 5:31 pm
Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: जब समझ जाओ, तब तुम मुझको समझाना Jab Samajh Jao, Ta...:
जो बीत रहा वो करे व्यक्त
शब्दों में चाह अधूरी हो
मन सिसक सिसक कर रोता है
जब चुप रहना मज़बूरी हो ....
जो बीत रहा वो करे व्यक्त
शब्दों में चाह अधूरी हो
मन सिसक सिसक कर रोता है
जब चुप रहना मज़बूरी हो ....
8:47 am
Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: तन्हाईयाँ Tanhayiyan
Written By नीरज द्विवेदी on शुक्रवार, 29 अगस्त 2014 | 8:47 am
Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: तन्हाईयाँ Tanhayiyan:
मेरी तन्हाईयाँ
आज पूछती है मुझसे
कि वो भूले बिसरे हुए गमजदा आँसू
जो निकले तो थे
तुम्हारी आँखों की पोरों से
पर जिन्हें कब्र तक नसीब नहीं हुयी
जमीं तक नसीब नहीं हुयी
जो सूख गए ....
12:42 pm
Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: गीत - तरस रहीं दो आँखें Taras Rahin Do Ankhein
Written By नीरज द्विवेदी on शनिवार, 23 अगस्त 2014 | 12:42 pm
Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: गीत - तरस रहीं दो आँखें Taras Rahin Do Ankhein:
तरस रहीं दो आँखें बस इक अपने को
मोह नहीं छूटा जीवन का,
छूट गए सब दर्द पराए,
सुख दुख की इस राहगुजर में,
स्वजनों ने ही स्वप्न जलाए,
अब तो बस कुछ नाम संग हैं, जपने को।
कब से तरस रहीं दो आँखें, अपने को।
जर्जरता जी मनुज देह की, ....
12:42 pm
Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: गीत - तरस रहीं दो आँखें Taras Rahin Do Ankhein
Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: गीत - तरस रहीं दो आँखें Taras Rahin Do Ankhein:
तरस रहीं दो आँखें बस इक अपने को
मोह नहीं छूटा जीवन का,
छूट गए सब दर्द पराए,
सुख दुख की इस राहगुजर में,
स्वजनों ने ही स्वप्न जलाए,
अब तो बस कुछ नाम संग हैं, जपने को।
कब से तरस रहीं दो आँखें, अपने को।
जर्जरता जी मनुज देह की, ....
10:29 am
Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: चलो मिलाकर हाथ चलें Chalo Milakar Hath Chalein
Written By नीरज द्विवेदी on मंगलवार, 19 अगस्त 2014 | 10:29 am
Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: चलो मिलाकर हाथ चलें Chalo Milakar Hath Chalein:
चलो मिलाकर हाथ चलें, संघ मार्ग पर साथ चलें,
आसमान में फर फर देखो,
फहर रहा भगवा ध्वज अपना,
कर्म रहा पाथेय हमारा,
रचा बसा है बस इक सपना,
एक हो हिन्दुस्तान हमारा, मात्र यही प्रण साध चलें,
चलो मिलाकर हाथ चलें, संघ मार्ग पर साथ चलें .....
....
9:09 pm
Written By kavisudhirchakra.blogspot.com on मंगलवार, 5 अगस्त 2014 | 9:09 pm
7:54 am
Life is Just a Life: मुँहबंदी का रोजा Munhbandi Ka Roja
Life is Just a Life: मुँहबंदी का रोजा Munhbandi Ka Roja: मेरठ पर न बोल सके तो जरा सहारनपुर पर बोलो, जबरन धर्म बदलने की इस कोशिश पर ही मुँह खोलो, क्या चुप ही रहोगे जब तक पीड़ित रिश्तेदार न हो...
11:09 am
Life is Just a Life: उस एक दिन Us Ek Din
Written By नीरज द्विवेदी on शनिवार, 5 जुलाई 2014 | 11:09 am
Life is Just a Life: उस एक दिन Us Ek Din: एक दिन मैं चल पड़ूँगा, दूरियाँ कुछ तय करूँगा। समय की झुर्री में संचित, उधार का जीवन समेटे, इस धूल निर्मित देह में ही, चाह की चादर ...
5:57 pm
हिंदी को लेकर भारत में हमेशा ही कलह की स्थिति रही है। इसकी खास वजह लोगों के सेंटीमेंट नहीं हैं, बल्कि सियासी सेंटीमेंट्स हैं। हिंदी को जब राज्य भाषा बनाए जाने की अपने जमाने के खुद उप अँगरेज़ जवाहरलाल नेहरू ने की थी, तो दक्षिण के कुछ नेताओं ने इसकी पुरजोर खिलाफत कर डाली। तुष्टिकरण की पराकाष्ठा दिखाते हुए नेहरू के कार्यकाल में इसे राज्यभाषा नहीं बनाया जा सका। आज फिर एक बार हिंदी पर सियासत गरम हो रही है। यूं लग रहा है, कि तमिल की भावनाएं ही भावनाएं हैं बाकियों का कुछ नहीं। ऐसा सिर्फ इसलिए, क्योंकि तमिल के नेता शोर्टकट वोट के लिए लोगों की भावनायें भड़काते हैं. होने को हिंदी में भी बहुत भड़काऊ नेता पड़े हैं, लेकिन इनके पास मुद्दे और भी हैं. ओडिशा की विधानसभा तो सबको मात देते हुए सदन में हिंदी बोलने की मनाही तक पर उतारू हो गई. ये हालत किसी भी विकासशील देश के लिए ठीक नहीं हो सकते. इस बात को तमिल, केरल, कन्नड़, तेलुगु, ओडिया, सबको समझना होगा. इस समय हिंदी वरसस अन्य भाषा का वक्त नहीं, बल्कि दुनिया से मुकाबले के लिए खुद को खड़ा करने का वक्त है. एक तरफ हम अंग्रेजी को अपनाने में वक्त नहीं लगाते, तो दूसरी तरफ हिंदी पे इतना हिचकिचाते हैं, आखिर ये स्वम के अंतस में छाई हीन भावना जैसी ही बात तो है.
मौजूदा भाषाई समझ, इस्तेमाल, परस्पर व्यवहार और लिखने, पढऩे, बोलने की क्षमता के मुताबिक भारत में 90 करोड़ लोग सीधे या परोक्ष रूप से हिंदी का इस्तेमाल करते हैं। महज 35 करोड़ लोग ही ऐसे हैं, जो अन्य भाषाओं का इस्तेमाल करते हैं। यानी देश की आबादी का महज 28 फीसदी हिस्सा ही ऐसा है, जो हिंदी का इस्तेमाल नहीं करता। लेकिन इसमें भी ऐसा एक बड़ा हिस्सा है, तकरीबन 30 फीसदी तक, जो हिंदी के बारे में जागरूक है, वह हिंदी को आंशिक रूप से समझता भी है। यह आंकड़े अमेरिका की एक एजेंसी ने जुटाए थे।
अमेरिक मूल की एक एमएनसी जब गुडग़ांव में अपना मुख्यालय खोलने पहुंची, तो उसके सामने भाषा की बड़ा संकट पैदा हुआ। तब इसके लिए कंपनी ने एक व्यापक सर्वे करवाया। इसमें पाया गया कि देश के करीब 72 फीसदी लोग हिंदी में जीते हैं। जबकि इसमें 80 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो हिंदी के अलावा दूसरी भाषाओं में असहज हैं। कंपनी ने इस सर्वे में बोलियों तक को हिंदी की निकटस्थ पाया था। इसमें 14वें नंबर पर हिंदी की छत्तीसगढ़ी बोली शामिल थी, जबकि पहले नंबर पर मजबूत, अल्हड़ता और सहजता के साथ बोली जाने वाली हिंदी की हरियाणवी बोली थी। ऐसे में हम यह कैसे कह दें कि हिंदी राज्य भाषा नहीं बन सकती।
- सखाजी
90 करोड़ लोगों के क्या कोई जज्बात नहीं हैं
Written By Barun Sakhajee Shrivastav on शुक्रवार, 20 जून 2014 | 5:57 pm
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हिंदी की चूहों से तुलना
दक्षिणी नेताओं ने हिंदी की मुखालफत में एक अजीबो गरीब तर्क दिया, उन्होंने कहा कि हिंदी को राज्यभाषा बनाने के पीछे क्या कारण हैं। तो नेहरू ने जवाब दिया, यह देश की भाषा है, ज्यादा से ज्यादा लोग इसे बोलते हैं। इस जवाब के बाद दक्षिण के नेताओं ने कहा यूं तो देश में चूहे सर्वाधिक पाए जाते हैं, तो फिर क्यों ने उसे राजकीय जीव घोषित कर दिया जाए। इस तर्क के बाद मुंह फाडक़र सारे के सारे दक्षिणी नेता, खासकर तमिल के नेताओं ने संसद में ठहाका लगाया था। इस घटना के बाद हिंदी पर कभी कोई बहस सीधी-सीधी नहीं की गई।हिंदी क्यों जरूरी है, जरा समझिए
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| गूगल के सौजन्य से. |
अमेरिक मूल की एक एमएनसी जब गुडग़ांव में अपना मुख्यालय खोलने पहुंची, तो उसके सामने भाषा की बड़ा संकट पैदा हुआ। तब इसके लिए कंपनी ने एक व्यापक सर्वे करवाया। इसमें पाया गया कि देश के करीब 72 फीसदी लोग हिंदी में जीते हैं। जबकि इसमें 80 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो हिंदी के अलावा दूसरी भाषाओं में असहज हैं। कंपनी ने इस सर्वे में बोलियों तक को हिंदी की निकटस्थ पाया था। इसमें 14वें नंबर पर हिंदी की छत्तीसगढ़ी बोली शामिल थी, जबकि पहले नंबर पर मजबूत, अल्हड़ता और सहजता के साथ बोली जाने वाली हिंदी की हरियाणवी बोली थी। ऐसे में हम यह कैसे कह दें कि हिंदी राज्य भाषा नहीं बन सकती।
90 करोड़ हिंदी वालों की कोई भावनाएं नहीं
तमिल के महज 7 करोड़ लोगों की भावनाएं इतनी मजबूत हैं, कि 90 करोड़ हिंदी बोलने वालों की कोई औकात नहीं। नेहरू ने इस हिंदी के सांप को पिटारे में बंद करके रखा तो, फिर किसी शीर्ष नेता ने दोबारा छुआ नहीं। चूंकि यह उन्हें ही डसने लगा था। अब कहीं जाकर एक वास्तविक मुद्दे के साथ हिंदी को उठाया गया है। जबकि तथ्य कहते हैं, आजादी के समय भारत की आबादी 40 करोड़ थी। अब यह 125 करोड़ है, जिसमें से संवाद, संचार और हिंदी फिल्मों ने हिंदी को और व्यापक बनाया है। 1950 के संदर्भ में हिंदी बोलने वाले और अन्य भाषियों के बीच 60 और 40 का अनुपात था। जबकि अब यह अनुपात घटकर 72 और 28 तक आ गया है। यानी हिंदी बोलने वाले देश में 72 हंैं, तो अन्य भाषी महज 28। इन 28 में भी करीब 12 लोग ऐसे हैं, जो हिंदी को आंशिक रूप से समझते हैं। ऐसे में हिंदी इतने विरोध के बाद देश में बढ़ी है, तो आने वाले वक्त में तो यह दुनिया की भाषा बन सकती है। इसमें किसी को ऐतराज क्यों होना चाहिए। मान लिया जाए कि तमिल को दुनिया की भाषा बनाया जा रहा है, तो क्या हिंदी भाषी इसका विरोध करेंगे। अगर तमिल की स्वीकार्यता है और दुनिया उसे इंज्लिश के स्थान पर स्थापित करना चाहती है, तो इसमें क्या बुरा है। ये सियासत नहीं तो क्या है, जहां 90 करोड़ लोगों की भावनाएं कुचलकर महज 7 करोड़ लोग उनमें भी आधों को तो पता ही नहीं होगा, कि हिंदी और तमिल में कोई लड़ाई है, को खुश किया जाता है।अब वक्त है जरा नेशनलिज्म का
यह कोई मोदी का करिश्मा नहीं है और न ही भाजपा की भारी चुनावी जीत। एक जन मानस है, जहां हिंदी को व्यापक स्तर पर स्वीकारा जा रहा है। भारतीयता को अपनाया जा रहा है। 80 का दशक पीछे छूट गया है, जब इंज्लिश का आना और हिंदी का न आना उच्च मध्यमवर्गीय होने की निशानी थी। हिंदी का टूटा फूटा बोलना और मजदूरों से हिंदी में बात करने की कोशिश करना व्यावसायिक घराने से ताल्लुक को दर्शाती थी। अब वक्त उल्टा है, जहां संसद में ठेठ कन्नड़ भाषी मल्लिकार्जुन खडग़े बड़ी नफासत के साथ शुद्ध उच्चारण और सही मुहावरों के साथ हिंदी बोलते हैं। अरुणांचल के किरण रिजिजू ऐसी फर्राटेदार हिंदी बोलते हैं, कि लगता ही नहीं कि यह आदमी अहिंदी राज्य का है। हिंदी फिल्मों में संवाद अदायगी में हिंदी के अच्छे शब्दों को आधुनिक शब्दों के साथ घोल कर एक नई शब्द रेसिपी बनाई जा रही है। उर्दू को हिंदी में ऐसे घोल दिया गया जैसे उर्दू कोई हिंदी की ही एक बहन है। इतने खूबसूरत वक्त में जहां तकनीकी में हिंदी के कई सॉफ्टवेयर आ रहे हैं, वहां हिंदी का विरोध बिल्कुल बेवजह है। लोगों को हिंदी के नाम पर भडक़ाना बंद करें, अन्य हिंदी भाषी नेतागण। अब वक्त नेशनलिज्म का है।- सखाजी
10:13 pm
Life is Just a Life: साँझ और समंदर Sanjh Aur Samandar
Written By नीरज द्विवेदी on शनिवार, 14 जून 2014 | 10:13 pm
Life is Just a Life: साँझ और समंदर Sanjh Aur Samandar: धूप से एक रेशा खींचकर लपेटना शुरू किया तो साँझ की शक्ल में रात आ गयी उनके साथ बीते पलों को समेटना शुरू किया तो समंदर के ...
3:00 pm
असलियत इन दिनों बड़ा शोर मचा रही थी। हर तरफ असलियत के समर्थक भी बढ़ रहे थे। कई ब्लॉग लिखे जा रहे थे। फेसबुक पर तो जैसे असलियत के मुरीदों की बाढ़ जैसी आ गई थी। ट्विटर पर भी लोग असलियत के समर्थन में ट्वीट कर रहे थे। मोबाइल पर असलियत के समर्थन में खूब एसएमएस आते। यह मान लीजिए कि असलियत ही असलियत इन दिनों चर्चा में थी। हर तरफ कागज को खूब आलोचना झेलनी पड़ रही थी। हर कोई कागज पर गुस्सा दिखा रहा था। कागज और असलियत के बीच अघोषित सी जंग छिड़ी हुई थी। कागज इस बात को लेकर बेहद आश्चर्य में था कि कोई उसे चुनौति दे रहा है। आजादी के इतने सालों बाद कागज अपने रहने के स्थान फाइलों को जरूर बदलता रहा, लेकिन कभी ऐसे दिन नहीं देखे थे।
अब तो कागज की कोई सुन भी नहीं रहा था। हर कोई असलियत का हिमायती था। कई बार कागज कई सारे गरीबी, भुखमरी, लाचारी बेबसी खत्म करने के आंकड़े दिखाता, मगर कोई इनपर भरोसा करने की बजाए असलियत की बातें सुनने लगता। कागज को अभी भी यह गुमान था, कि 1947 से चली आ रही उसकी सत्ता को कोई इस कदर झुठला तो नहीं ही सकता, भले ही तात्कालिक तौर पर भरोसे का इम्तेहान ले ले। वह अपनी मस्ती छोडऩे तैयार ही नहीं था। हरी कालीन वाले मल्टीपोल गोलाकार भवन में जब तब सरकारें इस कागज को रखतीं और बताती कि उन्होंने बेरोजगारी को इतने फीसदी खत्म कर दिया, तो कभी गरीबी के लिए इतने करोड़ खर्च दिए, तो कभी नाली, पानी, बिजली, सडक़, खेत, खलिहानों की दुरुस्तगी इस कागज की पीठ पर लादकर रख दी जाती। अभी तक हरी कालीन वाली इस इमारत में कागज की ही आवाज गूंजती थी।
पिछले कुछ महीनों से असलियत की आवाज भी यहां सुनाई देने लगी है। इस कदर कि कागज अपने घमंड के बोझ तले ही दबने लग गया था। एक दिन थक हार कर आखिरकार कागज को अपनी ताकत दिखानी ही पड़ी। उसने अपने मातहतों, फीसदी, अंक, बढ़त, घटत, फायदा, नुकसान, धन, आवक, जावक आदि को इकट्ठा करके असलियत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। असलियत भी कहां चुप रहने वाली थी। उसने भी जवाबी हमले शुरू कर दिए। अब कागज और असलियत के बीच खुली जंग छिड़ गई। कागज सालों से सत्ता पर कसकर बैठे हुए अफसरानों के पास जा पहुंचा। अफसरान उसे अपने ज्यादा करीब लगे, चूंकि इन्होंने ही कागजों की चम्मच बनाकर देश को खूब पीया था। कागज इनके सारे कारनामों से वाकिफ था। जाने को तो वह सियासतदानों केपास भी जा सकता था। मगर जानता था, इनके पास जाने और मनुहार या धमकी देने से कोई फायदा नहीं। मनुहार ये सुनते नहीं हैं और धमकी इन्हें लगेगी नहीं, चूंकि ये फिर जीतकर विराजमान हो जाएंगे। यूं तो मनुहार अफसर तो और बिल्कुल भी नहीं सुनते, मगर धमकी से भारी डरते हैं। कागज ने अफसरों को खूब डराया, सारे काले कारनामे सामने लाने की धमकी दी। असर तो हुआ, मगर जरा उल्टा। अफसर गांवों, खेत, खलिहानों और मध्यमवर्गीय युवाओं की बातें सुनने पहुंचने लगे। महंगाई को एक कागज पर छपे फीसदी और ऊपर उठते या नीेचे गिरते गणित के निशान से नापने की बजाय टमाटर के ठेले पर हफ्ता दर हफ्ता दाम पूछकर समझने लगे। कागज तो अपनी सलामती के लिए गया था। अपनी लंबी आयु मांगने गया था। मगर यहां तो सारे अफसरों ने पाला ही बदल लिया। असलियत के पाले में जा पहुंचे। कागज सिर धुनकर सरकार की खुले बाजार में दो हजार रुपये की कीमत वाली 15 हजार में खरीदी गईं लोहे की आलमारियों में चुप जा छिपा।
- सखाजी
कागज और असलियत का झगड़ा
Written By Barun Sakhajee Shrivastav on मंगलवार, 10 जून 2014 | 3:00 pm
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अब तो कागज की कोई सुन भी नहीं रहा था। हर कोई असलियत का हिमायती था। कई बार कागज कई सारे गरीबी, भुखमरी, लाचारी बेबसी खत्म करने के आंकड़े दिखाता, मगर कोई इनपर भरोसा करने की बजाए असलियत की बातें सुनने लगता। कागज को अभी भी यह गुमान था, कि 1947 से चली आ रही उसकी सत्ता को कोई इस कदर झुठला तो नहीं ही सकता, भले ही तात्कालिक तौर पर भरोसे का इम्तेहान ले ले। वह अपनी मस्ती छोडऩे तैयार ही नहीं था। हरी कालीन वाले मल्टीपोल गोलाकार भवन में जब तब सरकारें इस कागज को रखतीं और बताती कि उन्होंने बेरोजगारी को इतने फीसदी खत्म कर दिया, तो कभी गरीबी के लिए इतने करोड़ खर्च दिए, तो कभी नाली, पानी, बिजली, सडक़, खेत, खलिहानों की दुरुस्तगी इस कागज की पीठ पर लादकर रख दी जाती। अभी तक हरी कालीन वाली इस इमारत में कागज की ही आवाज गूंजती थी।
पिछले कुछ महीनों से असलियत की आवाज भी यहां सुनाई देने लगी है। इस कदर कि कागज अपने घमंड के बोझ तले ही दबने लग गया था। एक दिन थक हार कर आखिरकार कागज को अपनी ताकत दिखानी ही पड़ी। उसने अपने मातहतों, फीसदी, अंक, बढ़त, घटत, फायदा, नुकसान, धन, आवक, जावक आदि को इकट्ठा करके असलियत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। असलियत भी कहां चुप रहने वाली थी। उसने भी जवाबी हमले शुरू कर दिए। अब कागज और असलियत के बीच खुली जंग छिड़ गई। कागज सालों से सत्ता पर कसकर बैठे हुए अफसरानों के पास जा पहुंचा। अफसरान उसे अपने ज्यादा करीब लगे, चूंकि इन्होंने ही कागजों की चम्मच बनाकर देश को खूब पीया था। कागज इनके सारे कारनामों से वाकिफ था। जाने को तो वह सियासतदानों केपास भी जा सकता था। मगर जानता था, इनके पास जाने और मनुहार या धमकी देने से कोई फायदा नहीं। मनुहार ये सुनते नहीं हैं और धमकी इन्हें लगेगी नहीं, चूंकि ये फिर जीतकर विराजमान हो जाएंगे। यूं तो मनुहार अफसर तो और बिल्कुल भी नहीं सुनते, मगर धमकी से भारी डरते हैं। कागज ने अफसरों को खूब डराया, सारे काले कारनामे सामने लाने की धमकी दी। असर तो हुआ, मगर जरा उल्टा। अफसर गांवों, खेत, खलिहानों और मध्यमवर्गीय युवाओं की बातें सुनने पहुंचने लगे। महंगाई को एक कागज पर छपे फीसदी और ऊपर उठते या नीेचे गिरते गणित के निशान से नापने की बजाय टमाटर के ठेले पर हफ्ता दर हफ्ता दाम पूछकर समझने लगे। कागज तो अपनी सलामती के लिए गया था। अपनी लंबी आयु मांगने गया था। मगर यहां तो सारे अफसरों ने पाला ही बदल लिया। असलियत के पाले में जा पहुंचे। कागज सिर धुनकर सरकार की खुले बाजार में दो हजार रुपये की कीमत वाली 15 हजार में खरीदी गईं लोहे की आलमारियों में चुप जा छिपा।
- सखाजी
8:08 pm
Life is Just a Life: एक लत Ek Lat
Written By नीरज द्विवेदी on बुधवार, 28 मई 2014 | 8:08 pm
Life is Just a Life: एक लत Ek Lat: मेट्रो भी अजीब है जितनी ज्यादा बेतरतीब आवाजें सुनाई देतीं हैं ज्ञान गंगाएँ उतना ही शांत हो जाता हूँ मैं, जितनी ज्यादा भीड़ मि...
10:03 am
Life is Just a Life: खिलखिलाहट Khilkhilahat
Written By नीरज द्विवेदी on रविवार, 25 मई 2014 | 10:03 am
Life is Just a Life: खिलखिलाहट Khilkhilahat: बहुत कुछ लिखा है तुमने मेरी हथेली पर रंगीन कूचियों से छितराए हैं रंग मुस्कुराते हुए खिलखिलाते हुए गुनगुनाते हुए चढ़ रह...
8:25 am
Life is Just a Life: क्षणिका - इन्तजार
Written By नीरज द्विवेदी on शुक्रवार, 23 मई 2014 | 8:25 am
Life is Just a Life: क्षणिका - इन्तजार:
क्षणिका - इन्तजार
पाना
केवल पलभर का ...
और इन्तजार की हद क्या है ?
क्यों
एक पल से
काम चलाऊं ...
सदियों के
इन्तजार से
बेहतर क्या है?
-- नीरज द्विवेदी
2:43 pm
बेवफाओं से इतना पड़ा पाला कि अब
इल्तिफ़ात से भी किनारा लेना सीख़ लिया।
झूठे कसमें वादों से अब मैं कभी ना टूटूंगा
ग़ार को पहचानने का हुनर जो सीख लिया।
वो कत्लेआम के शौक़ीन हैं तो क्या हुआ
मैंने भी तो अब मर के जीने का तरीका सीख़ लिया।
सुनसान रास्तों पर चलने से अब डर नहीं लगता
मैंने अब इन पर आना-जाना सीख लिया।
मर कर जीना सीख लिया
Written By Mithilesh dubey on गुरुवार, 15 मई 2014 | 2:43 pm
अब दुःख दर्द में भी मैने मुस्कुराना सीख लिया
जब से अज़ाब को छिपाने के सलीका सीख लिया। बेवफाओं से इतना पड़ा पाला कि अब
झूठे कसमें वादों से अब मैं कभी ना टूटूंगा
वो कत्लेआम के शौक़ीन हैं तो क्या हुआ
सुनसान रास्तों पर चलने से अब डर नहीं लगता
शब्दार्थ :::
इल्तिफ़ात- मित्रता
ग़ार- विश्वासघात
इल्तिफ़ात- मित्रता
ग़ार- विश्वासघात
अज़ाब - पीड़ा
2:01 am
प्रेस की आजादी की जब भी बात होती है, तो दो बातें सामने आती हैं। पहली तो यह कि आजादी छीन कौन रहा है और दूसरी यह कि आजादी छीनी कोई क्यों रही है। पहली बात तो सीधी और सपाट है, कि यह आजादी वही छीनना चाहेगा, जिसकी अपनी नकारात्मक आजादी खतरे में होगी। इसे आजादियों का आपसी झगड़ा भी कह सकते हैं। यानी नकारात्मक आजादी सकारात्मक आजादी को छीन लेना चाहती है। इस पर तो हमारा जोर नहीं है। अगर कोई आजादी छीन रहा है, तो हम लड़ेंगे और लड़ते रहेंगे। बेशक यह होना भी चाहिए। मगर क्या इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि आजादी आपकी बची रहेगी। यह निरंतर चलते रहने वाली प्रक्रिया है। कभी आप अपनी आजादी को बचा पाएंगे, तो कभी नहीं। मगर दूसरी बात जरूर आपके हाथ में है और नतीजे लेकर आने वाली मजबूत बात है।
यह बात है कि आजादी छीनी क्यों जा रही है। अगर हम इसके मंथन में जाएंगे, तो 5 प्रमुख बातें पाएंगे।
पहली, तो यह कि आजादी छीनने के लिए हम खुद ही दोषी हैं। जब हम कमिश्नर के बंगले पर बिल्ली और मिका सिंह के किस वाले केस लगातार दिखाते हैं, तभी हम अपनी आजादी को गिरबी रख देते हैं।
दूसरी, जब हम किसी खास मामले में यहां उदाहरण नहीं दूंगा, बाइस्ड होकर बात करने लगते हैं, तो अपनी आजादी को बेच देते हैं.
तीसरी, टीआरपी और आईआरएस के सर्वे हमें परेशान करते हैं। उदाहरण दूंगा, कि आईआरएस के सर्वे में कोई अखबार बहुत आगे है, इसके दो कारण हैं एक तो वह बेहद कस्टमाइज खबरें छापता है, दूसरा वह भाषाई स्तर पर अंग्रेजी का बेइंमतहां इस्तेमाल करता है। ठीक ऐसे ही अंग्रेजी को अखबार भी हैं, जो बेहद सरल इज आर एम वाली अंग्रेजी का इस्तेमाल करते हुए फख्र से कहते हैं, वी आर नॉट इन जर्नलिज्म, रादर इन एटवर्टाजिंग इंडस्ट्री। बस यहीं खत्म हो जाते हैं।
चौथी, ऑगसटस हिक्की से लेकर आज के कोई मुहल्ला अखबार तक, कहीं भी कोई ऐसा सिस्टम नहीं है, कि कोई विचारशील व्यक्तित्व सीधा किसी स्थान पर बैठ सके। अकेडमीज क्या पढ़ाती हैं और क्या जमीन पर होता है, इस फर्क को बताने की जरूरत नहीं है।
पांचवी, मालिकान के अपने व्यावसायिक हित। यह बात निबंध की तरह लगेगी, किंतु इसका समाधान है।
समाधान है, हमारे पास। इस दिशा में हम काम भी कर रहे हैं। हम लोग ऐसे केस खोज रहे हैं, कि जिससे यह साबित कर सकें, कि फलां सार्वजनिक हित का ऐसा केस था, जिसे मीडिया ने ऐसा बना दिया, इसके पीछे मीडिया की यह मंशा थी। अगर हम इसे कर पाए, तो जरूर दुनिया में यह मील का पत्थर साबित होगा। इसमें हम ऐसे कमसकम 200 केस लेंगे, जिनके बीहाफ पर कोर्ट में एक पीआईएल के रूप में लिटिगेशन दायर की जा सके। इसमें हमारी मांग होगी कि देश में अखबार को व्यवसाय से दूर कर दिया जाए।
जो व्यक्ति भी अखबार निकालेगा वह किसी दूसरे व्यवसाय में नहीं जा सकता। यह चौंकाने वाली बेहूदा सी बात है। बेशक ऐसा ही है। चूंकि सवाल उठेंगे, कि पत्रकारों का आर्थिक हालत खराब हो जाएगी, मालिकान के संपादक होने से संपादक नाम की संस्था खत्म हो जाएगी, कई बड़े संस्थान हैं, जो नो लॉस नो प्रॉफिट में काम कर रहे हैं वे ऐसा नहीं कर पाएंगे, मालिक जब दूसरा धंधा नहीं करेगा, तो वह इसमें ही काला पीला करेगा। तमाम सारे ऐसे सवाल हैं, जो मौजूं हैं। बहुत सही हैं।
किंतु दोस्तों हम करना भी यही चाहते हैं। पहली आशंका कि पत्रकारों की आर्थिक हालत खराब हो जाएगी, तो बिल्कुल सही है। हो जाएगी, मगर अभी कौन सी अच्छी है। नौकरीनुमा पत्रकारिता में एक रिपोर्टर न्यूज एक्जेक्यूटिव बन कर रह गया है। उसे अपने स्रोत को पटाए रखते हुए संस्थान की चाही गईं खबरों में से खबरें देना है। तब वह पत्रकार कहां रहा? जब वह अपने दिल के विद्रोह को जाहिर ही नहीं कर पा रहा तो कैसा पत्रकार। जबकि स्वतंत्र पूर्ण समय पत्र से जुड़ेगा, तो वह खुद की अपनी एक इमेज स्थापित करेगा। टैग जर्नलिस्ट नहीं रहेगा, कि फलां के ढिमकां जी। जब यह एक मिशन बन जाएगा, तो खुदबखुद इसमें पत्रकार अपनी हिस्सेदारी करेगा, न कि नौकरी। सुबह उंगली से पंच करो, शाम को रिपोर्ट बनाओ कि कितनी खबरें पढ़ीं आपने।
अब आशंका नंबर 2 पर आते हैं, कि संपादक नाम की संस्था खत्म हो जाएगी, तो भैया अभी कौन सी जिंदा है। कितने संपादकों के केबिन में बुक शेल्फ है, कितने संपादकों के पास अपना कोई दुनिया को बदल देने का जज्बा है। संपादक शब्द से यही उम्मीद की जाती है। यह भैया नौकरी है, बस। पाठक को केंद्र में रखकर उसके लिए कुछ ऐसी सूचनाएं देना, जो उसके काम की हों। यानी रायपुर की चमक को बस्तर की तपती जिंदगी नहीं देनी।
तीसरी बात यानी आशंका मालिक जब दूसरा धंधा नहीं करेगा, तो इसीसे कालापीला करेगा। भैया इसमें कौन सी बुराई है, अभी ऐसे लोग कालापीला कर रहे हैं, जो नीचे वालों को चूस रहे हैं। अगर तब हमारा अपना आदमी कोई कालापीला कर लेगा तो क्या हो जाएगा। यह तो मजाक रहा, किंतु सत्य यह है कि इस उद्योग से सबसे पहले तो कचरा हटेगा, पैसा कमाने वालों का। दूसरा विचारवानों के पास बहुत कुछ रहेगा, अपना करने का.
हम कोई ऐसी स्वर्ण व्यवस्था की बात भी नहीं करने जा रहे, जिससे कि सतयुग आ जाएगा, हम तो बस इसे रिप्लेस करके इससे बेहतर लाना चाहते हैं। ऐसे ही रिप्लेसमेंट से एक दिन वास्तव में सतयुग ला पाएंगे।
अगर आपके पास ऐेसे केस दस्तावेजों के साथ हैं, जिनसे यह साबित हो कि फलां मामला इतनी बड़ी जनसंख्या से जुड़ा था, इतने व्यापक असर वाला था, लेकिन मीडिया ने अपने इस आर्थिक कारण से उसे दबा डाला, तो हमें बताएं। हम इस पर काम कर रहे हैं।
धन्यवाद।
-सखाजी
जो सेठ प्रेस में हो वह किसी और पेशे में न हो....
Written By Barun Sakhajee Shrivastav on सोमवार, 28 अप्रैल 2014 | 2:01 am
प्रेस की आजादी की जब भी बात होती है, तो दो बातें सामने आती हैं। पहली तो यह कि आजादी छीन कौन रहा है और दूसरी यह कि आजादी छीनी कोई क्यों रही है। पहली बात तो सीधी और सपाट है, कि यह आजादी वही छीनना चाहेगा, जिसकी अपनी नकारात्मक आजादी खतरे में होगी। इसे आजादियों का आपसी झगड़ा भी कह सकते हैं। यानी नकारात्मक आजादी सकारात्मक आजादी को छीन लेना चाहती है। इस पर तो हमारा जोर नहीं है। अगर कोई आजादी छीन रहा है, तो हम लड़ेंगे और लड़ते रहेंगे। बेशक यह होना भी चाहिए। मगर क्या इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि आजादी आपकी बची रहेगी। यह निरंतर चलते रहने वाली प्रक्रिया है। कभी आप अपनी आजादी को बचा पाएंगे, तो कभी नहीं। मगर दूसरी बात जरूर आपके हाथ में है और नतीजे लेकर आने वाली मजबूत बात है।
यह बात है कि आजादी छीनी क्यों जा रही है। अगर हम इसके मंथन में जाएंगे, तो 5 प्रमुख बातें पाएंगे।
पहली, तो यह कि आजादी छीनने के लिए हम खुद ही दोषी हैं। जब हम कमिश्नर के बंगले पर बिल्ली और मिका सिंह के किस वाले केस लगातार दिखाते हैं, तभी हम अपनी आजादी को गिरबी रख देते हैं।
दूसरी, जब हम किसी खास मामले में यहां उदाहरण नहीं दूंगा, बाइस्ड होकर बात करने लगते हैं, तो अपनी आजादी को बेच देते हैं.
तीसरी, टीआरपी और आईआरएस के सर्वे हमें परेशान करते हैं। उदाहरण दूंगा, कि आईआरएस के सर्वे में कोई अखबार बहुत आगे है, इसके दो कारण हैं एक तो वह बेहद कस्टमाइज खबरें छापता है, दूसरा वह भाषाई स्तर पर अंग्रेजी का बेइंमतहां इस्तेमाल करता है। ठीक ऐसे ही अंग्रेजी को अखबार भी हैं, जो बेहद सरल इज आर एम वाली अंग्रेजी का इस्तेमाल करते हुए फख्र से कहते हैं, वी आर नॉट इन जर्नलिज्म, रादर इन एटवर्टाजिंग इंडस्ट्री। बस यहीं खत्म हो जाते हैं।
चौथी, ऑगसटस हिक्की से लेकर आज के कोई मुहल्ला अखबार तक, कहीं भी कोई ऐसा सिस्टम नहीं है, कि कोई विचारशील व्यक्तित्व सीधा किसी स्थान पर बैठ सके। अकेडमीज क्या पढ़ाती हैं और क्या जमीन पर होता है, इस फर्क को बताने की जरूरत नहीं है।
पांचवी, मालिकान के अपने व्यावसायिक हित। यह बात निबंध की तरह लगेगी, किंतु इसका समाधान है।
समाधान है, हमारे पास। इस दिशा में हम काम भी कर रहे हैं। हम लोग ऐसे केस खोज रहे हैं, कि जिससे यह साबित कर सकें, कि फलां सार्वजनिक हित का ऐसा केस था, जिसे मीडिया ने ऐसा बना दिया, इसके पीछे मीडिया की यह मंशा थी। अगर हम इसे कर पाए, तो जरूर दुनिया में यह मील का पत्थर साबित होगा। इसमें हम ऐसे कमसकम 200 केस लेंगे, जिनके बीहाफ पर कोर्ट में एक पीआईएल के रूप में लिटिगेशन दायर की जा सके। इसमें हमारी मांग होगी कि देश में अखबार को व्यवसाय से दूर कर दिया जाए।
जो व्यक्ति भी अखबार निकालेगा वह किसी दूसरे व्यवसाय में नहीं जा सकता। यह चौंकाने वाली बेहूदा सी बात है। बेशक ऐसा ही है। चूंकि सवाल उठेंगे, कि पत्रकारों का आर्थिक हालत खराब हो जाएगी, मालिकान के संपादक होने से संपादक नाम की संस्था खत्म हो जाएगी, कई बड़े संस्थान हैं, जो नो लॉस नो प्रॉफिट में काम कर रहे हैं वे ऐसा नहीं कर पाएंगे, मालिक जब दूसरा धंधा नहीं करेगा, तो वह इसमें ही काला पीला करेगा। तमाम सारे ऐसे सवाल हैं, जो मौजूं हैं। बहुत सही हैं।
किंतु दोस्तों हम करना भी यही चाहते हैं। पहली आशंका कि पत्रकारों की आर्थिक हालत खराब हो जाएगी, तो बिल्कुल सही है। हो जाएगी, मगर अभी कौन सी अच्छी है। नौकरीनुमा पत्रकारिता में एक रिपोर्टर न्यूज एक्जेक्यूटिव बन कर रह गया है। उसे अपने स्रोत को पटाए रखते हुए संस्थान की चाही गईं खबरों में से खबरें देना है। तब वह पत्रकार कहां रहा? जब वह अपने दिल के विद्रोह को जाहिर ही नहीं कर पा रहा तो कैसा पत्रकार। जबकि स्वतंत्र पूर्ण समय पत्र से जुड़ेगा, तो वह खुद की अपनी एक इमेज स्थापित करेगा। टैग जर्नलिस्ट नहीं रहेगा, कि फलां के ढिमकां जी। जब यह एक मिशन बन जाएगा, तो खुदबखुद इसमें पत्रकार अपनी हिस्सेदारी करेगा, न कि नौकरी। सुबह उंगली से पंच करो, शाम को रिपोर्ट बनाओ कि कितनी खबरें पढ़ीं आपने।
अब आशंका नंबर 2 पर आते हैं, कि संपादक नाम की संस्था खत्म हो जाएगी, तो भैया अभी कौन सी जिंदा है। कितने संपादकों के केबिन में बुक शेल्फ है, कितने संपादकों के पास अपना कोई दुनिया को बदल देने का जज्बा है। संपादक शब्द से यही उम्मीद की जाती है। यह भैया नौकरी है, बस। पाठक को केंद्र में रखकर उसके लिए कुछ ऐसी सूचनाएं देना, जो उसके काम की हों। यानी रायपुर की चमक को बस्तर की तपती जिंदगी नहीं देनी।
तीसरी बात यानी आशंका मालिक जब दूसरा धंधा नहीं करेगा, तो इसीसे कालापीला करेगा। भैया इसमें कौन सी बुराई है, अभी ऐसे लोग कालापीला कर रहे हैं, जो नीचे वालों को चूस रहे हैं। अगर तब हमारा अपना आदमी कोई कालापीला कर लेगा तो क्या हो जाएगा। यह तो मजाक रहा, किंतु सत्य यह है कि इस उद्योग से सबसे पहले तो कचरा हटेगा, पैसा कमाने वालों का। दूसरा विचारवानों के पास बहुत कुछ रहेगा, अपना करने का.
हम कोई ऐसी स्वर्ण व्यवस्था की बात भी नहीं करने जा रहे, जिससे कि सतयुग आ जाएगा, हम तो बस इसे रिप्लेस करके इससे बेहतर लाना चाहते हैं। ऐसे ही रिप्लेसमेंट से एक दिन वास्तव में सतयुग ला पाएंगे।
अगर आपके पास ऐेसे केस दस्तावेजों के साथ हैं, जिनसे यह साबित हो कि फलां मामला इतनी बड़ी जनसंख्या से जुड़ा था, इतने व्यापक असर वाला था, लेकिन मीडिया ने अपने इस आर्थिक कारण से उसे दबा डाला, तो हमें बताएं। हम इस पर काम कर रहे हैं।
धन्यवाद।
-सखाजी
4:27 pm
भूतों से डरने की ज़रूरत नहीं, तेज स्वर में बोलो भूत नहीं होता...मोदी की लहर नहीं एक स्वर में बोलो कोई लहर नहीं...कोई कहे विकास, रोड, पानी, नौकरी, स्थाई अर्थ व्यवस्था, ग्रोथ...तो मोहन के पास मैडम के सिखाये मंत्र हैं न...
धर्म निर्पेक्षताये नमः,
मुस्लिमों पे खतराए नमः,
गुजरात दंगाये नमः
इन्दिराए नमः,
१२५ साल पुरानी पार्टिये नमः
बम में मरे बलिदानाए नमः
१० साल तक इतना काम किया कि, देख ही नहीं पाए चारों तरफ अँधेरा छा गया. घुप अन्धकार, सियारों की आवाजें, सांपों का सड़कों पर खुल्ला घूमना और भी न जाने क्या-क्या है रास्ते में. न जाने क्यों घडी नहीं देख पाए, तभी तो खराब घडी आ गई है. मगर करते भी क्या, पीएमओ में काम ही इतना रहता है. कोई कितना भी चाहे मगर वक्त पर नहीं निकल सकता. फिर आखिर में दिन भर की रिपोर्ट भी तो मैडम लेती हैं. इन्हें बताना पड़ता है, दिन भर में मीडिया ने कितना लताड़ा, उसके बदले में आपने कितना उन्हें कोसा, कल की तुलना में कुछ कम लताड़ा तो उपलब्धि वरना खतरा, किसी मंत्री ने कोई अकेले ही तो करप्शन नहीं कर डाला, मैडम और मुझे पता ही न चला हो, पता चला तो कोई बात नहीं मगर बिना बताये ऐसा करने पर अनुशासन भंग की कार्रवाई क्यों नहीं की, ऊपर से शाम होते ही पत्नी एसएमएस करने लगती है, कब तक आओगे, भिन्डी खाते नहीं हो चिकेन डॉक्टर ने मन किया है, बताओ क्या खाओगे, ज्यादा लेट किया तो फोन आ जाता है, मोबाइल नहीं उठाया तो आफिस के नंबर पे लगा देती है. वो पारख स्साला शाम होते ही फोन पे किसी न किसी बहाने से डट जाता है, फोन उठाके बोलता था मैडम का फोन है...घर वाली मैडम का....सरकार वाली नहीं. घर वाली मैडम फोन पे दहाड़ती और कहती तुम्हे किसने कहा था पीएम की नौकरी करो.
सब मिल बोलो मोदी लहर नहीं है...
Written By Barun Sakhajee Shrivastav on शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014 | 4:27 pm
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| जिनका है उन्हें क्रेडिट. |
धर्म निर्पेक्षताये नमः,
मुस्लिमों पे खतराए नमः,
गुजरात दंगाये नमः
इन्दिराए नमः,
१२५ साल पुरानी पार्टिये नमः
बम में मरे बलिदानाए नमः
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| जिनका है उन्हें क्रेडिट. |
आरबीआई में कितने मजे थे. मुझे तुम पर उसी वक्त से गुस्सा आता है, जब तुमने मेरी एक न सुनी. तुम अमेरिका के कुछ बनियों के चक्कर में देश में उदारवाद की बातें कर रहे थे. वो तो मेरी मति मारी गई थी, जो उसी वक्त पंजाब न चली गई. तुम्हे तभी रोकना था, जब वित्त मंत्री बने थे. लेकिन मैंने सोचा चलो भाई जिसके लिए अर्जुन, मोतीलाल, विध्याचरन, नरसिम्हा ओंधे मुह गिरते थे, वो तुम्हे तुम्हारी अमेरिकी दोस्तों से दोस्ती की क़ाबलियत पर मिल गया. मगर तुम ऐसी नौकरी में फसोंगे सोचा न था. थोडी ही देर में फिर फोन घनघनाया,...इस बार बारू ने उठाया..मोहन की तरफ मुस्कुराते हुए लो भाई किसी बच्चे की आवाज़ है...वहाँ बाहुल बाबा की आवाज़ थी....अंकल मेरे लिए आते समय कनाट प्लेस से गाँव, गरीब, किसान के टेटू लेते आना. वो चुनाव हैं न तो माँ ने कहा है गाँव, गरीब, किसान को पहचान. मोहन के पास पहले से क्या कम काम थे.
आज तो बड़ी घबराहट हो रही है, डर लगने लगा है. यूँ तो मोहन रोज पीएमओ में काम ख़तम करते-करते लेट होता था. रोज़ सियारों की आवाजे और सांपो को सड़कों पे देखता था, मगर किसी तरह से स्कूटर इधर-उधर करके चला जाता था..इस बार वह थोडा ज्यादा डरा हुआ है. दरअसल जयराम रामेश ने दोपहर में आके कहा था रस्ते में मोदी की लहर है, तब से ही मोहन परेशान था. बारू और पारख ने बहुत समझाया मोदी एक नेता है...उसकी लहर है चुनाव को लेकर...लेकिन इससे डरना क्या...दरअसल मोहन मोदी लहर यानी कोई भूत समझ रहे थे. मोहन से पंकज पचोरी ने भी कहा, डोंट वरी सर....जिस चीज से डर लगे इसके खिलाफ बोलते जाओ डर...और मन से कहो मोहन तुम्हे किसी चीज से डर नहीं लगता बस...जाओ फिर.
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| जिनका है उन्हें क्रेडिट. |
मोहन को राहत मिली. उसने रट लगाईं, मोदी की कोई लहर नहीं है....मोदी की कोई लहर नहीं है...वह आगे जाता गया, बहुत आगे कपिल की साईकिल मिल गई...मोहन बोला कपिल मोदी की कोई लहर नहीं है...कपिल बोला हाँ मोहन कोई लहर नहीं है, डरो मत मैं भी यही कहते हुए जा रहा हूँ...मोहन का स्कूटर तीसरे गियर में था...जय राम रामेश पैदल मिले, मोहन ने कहा जय राम मोदी की कोई लहर नहीं है...रमेश ने कहा हाँ मोहन डरो मत इतनी ज्यादा लहर भी नहीं है...मोहन का डर और बढ़ गया...आगे नटखट दिग्गी मिला, मोहन ने हाथ हिलाया बोला मोदी की कोई लहर नहीं है...दिग्गी ने भी कहा कोई लहर नहीं है...उसे तो दिल्ली के बुखारी बाबा ने भगा दिया है....मोहन को ताकत मिली...ऐसे ही मनीष, अभिषेक, अहमद, जनार्दन, अंटोनी, मोइली, नबी आदि मिलते मोहन सबसे कहता मोदी की कोई लहर नहीं है... वे सब भी मोहन का बताते मोदी की कोई लहर नहीं....
मोदी लहर का भूत थोडा कमजोर पड़ा. लेकिन मोहन को अब सबसे बड़ी परीक्षा देना थी....बड़ी खाई पड़ती है. इसमें विख्यात है कि कई तरह के भूत रहते हैं. मोहन की घिग्घी फिर से बांध गई, ठीक वैसे ही जैसे १० सालों से बंधी थी....
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| जिनका है उन्हें सप्रेम क्रेडिट. |
खाई में दाखिल होते ही आवाज़ आई विकास...मोहन बोला नहीं मैं मोहन...फिर आवाज आई विकास...मोहन बोला नहीं मैं मोहन हूँ... फिर से आवाज़ आई गुजरात की सड़के..मोहन बोला नहीं अभी तो भूतों वाली खाई है. फिर आवाज़ आई नदियों को जोड़ेंगे, मोहन बोला भाई जो करना है कर लो बस मुझे घर जाने दो...मोदी लहर नहीं है...मोहन ने कहा. फिर आवाज़ आई...विकास...मोहन समझ गया अब वह पूरी तरह से भूतों के घेरे में है लाख कहे मोदी लहर नहीं है या भूत नहीं है तो भी भूत उसे छोड़ेंगे नहीं आज तो मर गया...इधर पत्नी का फोन फिर बजा...आवाज़ आई मोहन तुम अभी पीएमओ में हो या १० जनपथ पे...मोहन का गला सूख रहा था...आवाज़ नहीं निकल रही थे...बस इतना बोला घर आ पाया तो ज़रूर बताऊंगा..और फोन काट दिया.
मोहन ने मैडम के सिखाये मन्त्र पढ़े, जब भी कोई विकास, सड़क, बिजली, पानी, रास्ते, राजमार्ग, रोजगार जैसे भूतों से तुम्हारा सामना हो तुम इन मंत्रो का जाप करना...मोहन चिल्लाया...
धर्म निर्पेक्षताये नमः
मुस्लिमों पे खतराये नमः
गुजरात दंगाये नमः
बस इन मन्त्रों के पढ़ ही रहा था की पीछे से कई आवाज़े इन्ही मंत्रों का रिपीट जाप कर रही थी...
धर्म निर्पेक्षताये नमः
मुस्लिमों पे खतराये नमः
गुजरात दंगाये नमः
मोहन ने पीछे मुडके देखे...तो कपिल, अभिषेक, दिग्गी, बाहुल बाबा, रियंका दीदी, कॉर्पोरेट वाड्रा, सोना चांधी, मनीष, नबी आदि थर थर कम्पते हुए इस मन्त्र का जाप कर थे.
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| जिनका है उन्हें सप्रेम क्रेडिट. |
पास ही में अदानी, अम्बानी, अदानी, अम्बानी का जाप करते हुए एक "जाम आदमी" गले में मफलर लगाये खड़ा था....एक "हाथी" पे बैठी जोगन जाप कर रही थी मुस्लिमों पे अत्याचार नहीं होने देंगे....तो साईकिल की घंटी बजाते हुए गिर के सिंहों का पीछा करते हुए "उत्त पदेश" का नेता भाग रहा था...बिहार में सरकारी राम मंदिर बनाने वाला एक दडियल बार बार सांसे लेके छोर रहा था...जैसे डर के मारे पगला गया हो.
विकास, सबके लिए खाना, सबके लिए नौकरी, स्थाई अर्थ व्यवस्था, हाई सेंसेक्स, दो अंकों में ग्रोथ, बड़ी सड़के, पानी भरपूर, सर्वश्रेष्ठ मॉस ट्रांसपोर्टेशन आदि आदि कुछ अजनबी से आवाज़े आ रही थे,,,,इनका सामना कर रहे लोग थर थर काँप रहे थे...मोहन ने आवाज़ लगाई भागो भाई....मोदी की लहर आई...
- सखाजी.
7:32 am
Life is Just a Life: मुक्तक - भगत सिंह के नारे
Life is Just a Life: मुक्तक - भगत सिंह के नारे:
जब जब आँखें होतीं बदरा, भाव मेरे बूँदें बन आते,
जब भी बरसा मीठा अम्बर, श्वर मेरे कविता बन जाते,
जीवन की रागनियाँ बजती, और नील गगन में तारे,
सपनों के सरगम पर नाचें, भगत सिंह के नारे।
8:09 am
Life is Just a Life: मुक्तक - तेरे बिन
Written By नीरज द्विवेदी on गुरुवार, 24 अप्रैल 2014 | 8:09 am
Life is Just a Life: मुक्तक - तेरे बिन:
मुक्तक -
तेरे बिन
तेरे बिन
तुझको जीतूँ
लक्ष्य है मेरा, तुझसे जीत नहीं चहिए,
लक्ष्य है मेरा, तुझसे जीत नहीं चहिए,
तेरी जीत
में जीत हमारी, तेरी हार नहीं चहिए,
में जीत हमारी, तेरी हार नहीं चहिए,
तू मेरा प्रतिमान
किरन है, जो मैं सूरज हो जाऊँ,
किरन है, जो मैं सूरज हो जाऊँ,
तू मेरा सम्मान
किरन है, जो मैं सूरज हो जाऊँ,
किरन है, जो मैं सूरज हो जाऊँ,
तेरे बिन
उगने ढलने का भी, अधिकार नहीं चहिए,
उगने ढलने का भी, अधिकार नहीं चहिए,
तेरे बिन
जीने मरने का भी, अधिकार नहीं चहिए।
जीने मरने का भी, अधिकार नहीं चहिए।
8:43 am
Life is Just a Life: मैं, तुम और हम Main Tum aur Hum
Written By नीरज द्विवेदी on बुधवार, 9 अप्रैल 2014 | 8:43 am
Life is Just a Life: मैं, तुम और हम Main Tum aur Hum: मैं, तुम और हम होने का एहसास उस वक्त जब हम, हम नहीं थे मैं और तुम थे, उस वक्त जब आसमां के टुकड़े टुकड़े हो चुके थे और हर टुक...
12:17 pm
श्री रामचन्द्र जी के साथ यह अन्याय क्यों?
Written By DR. ANWER JAMAL on सोमवार, 7 अप्रैल 2014 | 12:17 pm
चाय के ठेले पर विकास पुरूष
के बाद अब एक अहम सवाल
श्री रामचन्द्र जी के साथ यह अन्याय क्यों?
सांप्रदायिक तत्व धर्म के झंडे लेकर चलते हैं लेकिन मक़सद अपने पूरे करते हैं जो कि धर्म के खि़लाफ़ होते हैं। इसीलिए ये धार्मिक सत्पुरूषों को पीछे धकेलते रहते हैं।
राम मंदिर का मुददा गर्माने और भुनाने वाालों ने प्रधानमंत्री पद के लिए रामचन्द्र जी के वंश में से किसी का नाम आगे क्यों नहीं बढ़ाया?
क्या इन सांप्रदायिक तत्वों को श्री रामचन्द्र जी की सन्तान में कोई योग्य व्यक्ति ही नज़र नहीं आया या फिर उन्हें गुमनामी के अंधेरे में धकेलने वाले यही तत्व हैं?
रामकथा के अनुसार सारी धरती मनु को दी गई थाी और इसी उत्तराधिकार क्रम में यह श्री रामचन्द्र जी को मिली थी लेकिन आज उनके उत्तराधिकारी वंशजों के नाम दुनिया वाले तो क्या स्वयं भारत में उनके श्रद्धालु भी नहीं पहचानते।
श्री रामचन्द्र जी के साथ यह अन्याय क्यों?
यही बात मुसलमानों को भी समझ लेनी चाहिए कि उनके लीडर किसी दीनदार आलिम को अपना रहबर क्यों नहीं मान लेते?
इसके पीछे भी यही कारण है कि ये लीडर दीन के मक़सद को नहीं जो कि अमन और भाईचारा है बल्कि अपने लालच को पूरा करने में जुटे हुए हैं।
चुनाव का मौक़ा इन मौक़ापरस्तों को पहचानने का महापर्व होता है। जनता इन्हें अच्छी तरह पहचान रही है।
सांप्रदायिक तत्व धर्म के झंडे लेकर चलते हैं लेकिन मक़सद अपने पूरे करते हैं जो कि धर्म के खि़लाफ़ होते हैं। इसीलिए ये धार्मिक सत्पुरूषों को पीछे धकेलते रहते हैं।
राम मंदिर का मुददा गर्माने और भुनाने वाालों ने प्रधानमंत्री पद के लिए रामचन्द्र जी के वंश में से किसी का नाम आगे क्यों नहीं बढ़ाया?
क्या इन सांप्रदायिक तत्वों को श्री रामचन्द्र जी की सन्तान में कोई योग्य व्यक्ति ही नज़र नहीं आया या फिर उन्हें गुमनामी के अंधेरे में धकेलने वाले यही तत्व हैं?
रामकथा के अनुसार सारी धरती मनु को दी गई थाी और इसी उत्तराधिकार क्रम में यह श्री रामचन्द्र जी को मिली थी लेकिन आज उनके उत्तराधिकारी वंशजों के नाम दुनिया वाले तो क्या स्वयं भारत में उनके श्रद्धालु भी नहीं पहचानते।
श्री रामचन्द्र जी के साथ यह अन्याय क्यों?
यही बात मुसलमानों को भी समझ लेनी चाहिए कि उनके लीडर किसी दीनदार आलिम को अपना रहबर क्यों नहीं मान लेते?
इसके पीछे भी यही कारण है कि ये लीडर दीन के मक़सद को नहीं जो कि अमन और भाईचारा है बल्कि अपने लालच को पूरा करने में जुटे हुए हैं।
चुनाव का मौक़ा इन मौक़ापरस्तों को पहचानने का महापर्व होता है। जनता इन्हें अच्छी तरह पहचान रही है।
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