नियम व निति निर्देशिका::: AIBA के सदस्यगण से यह आशा की जाती है कि वह निम्नलिखित नियमों का अक्षरशः पालन करेंगे और यह अनुपालित न करने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से AIBA की सदस्यता से निलम्बित किया जा सकता है: *कोई भी सदस्य अपनी पोस्ट/लेख को केवल ड्राफ्ट में ही सेव करेगा/करेगी. *पोस्ट/लेख को किसी भी दशा में पब्लिश नहीं करेगा/करेगी. इन दो नियमों का पालन करना सभी सदस्यों के लिए अनिवार्य है. द्वारा:- ADMIN, AIBA

प्रथम -पूजनीय -श्री गणेश [अष्ट विनायक -वक्रतुंड ]

Written By Shikha Kaushik on सोमवार, 5 सितंबर 2011 | 8:42 pm



किसी भी कार्य को आरम्भ करने से पूर्व ''श्री गणेशाय नम: '' मन्त्र का उच्चारण समस्त विघ्नों को हरकर कार्य की सफलता को सुनिश्चित करता है .पौराणिक आख्यान के अनुसार -एक बार देवताओं की सभा बुलाई गयी और यह घोषणा की गयी कि-''जो सर्वप्रथम तीनों लोकों का चक्कर लगाकर लौट आएगा वही देवताओं का अधिपति कहलायेगा .समस्त देव तुरंत अपने वाहनों पर निकल पड़े किन्तु गणेश जी का वाहन तो मूषक है जिस पर सवार होकर वे अन्य देवों की तुलना में शीघ्र लौट कर नहीं आ सकते थे .तब तीक्ष्ण मेधा सम्पन्न श्री गणेश ने   माता-पिता [शिव जी व्  माता पार्वती ] की परिक्रमा की क्योंकि तीनों लोक माता-पिता के चरणों  में बताएं गएँ हैं .श्री गणेश की मेधा शक्ति का लोहा मानकर उन्हें 'प्रथम पूज्य -पद ' से पुरुस्कृत किया गया .

 ''अष्ट -विनायक ''
भगवान   श्री गणेश के अनेक   रूपों   की पूजा   की जाती  है .इनमे इनके आठ स्वरुप अत्यधिक प्रसिद्ध  हैं .गणेश जी के इन   आठ स्वरूपों   का नामकरण   उनके   द्वारा   संहार किये गए असुरों के आधार पर किया गया है .सर्वप्रथम अष्ट-विनायक रूप में ''वक्रतुंड'' ब्रह्मरूप का परिचय इस प्रकार है -
vakratunda.gif_120_120_256_9223372036854775000_0_1_0.gif

''वक्रतुंड '' अवतार ये ,सब देह धारण करता है ,
ब्रह्मरूप ,मत्सरासुर-हन्ता ,सिंह वाहन पर चलता है .''

श्री गणेश के हुए ;अब तक कई अवतार
जिनमे आठ प्रमुख हुए ;मुद्गल पुराणानुसार ,
सर्वप्रथम हैं 'वक्रतुंड' ;उन्हें मेरा प्रणाम !
कथा कहूँ मैं प्रभु की ,सुनिए देकर कान .

देवराज   -प्रमाद   से हुई मत्सरासुर उत्पत्ति ;
दैत्य गुरुसे दीक्षा पञ्चाक्षरी  मन्त्र की प्राप्त की ,
'ॐ नम: शिवाय 'से किया कठोर तप उसने ;
हो प्रसन्न फिर 'अभय' का वरदान दिया था शिव ने . 

पाकर वरदान प्रभु से मत्सर अपने घर  आया ;
शुक्राचार्य ने तब उसे दैत्यों  का नृप बनाया ,
फिर उसके मंत्री सदा उसे देते 'विश्व-विजय 'सलाह ,
शक्ति-पद का मद उसके भी सिर चढ़कर  था बोल रहा .

बलशाली उस असुर ने सेना को साथ लिया ;
पृथ्वी के राजाओं पर हमला फिर बोल दिया ,
उस असुर के समक्ष कोई नृप न टिक सका ;
कुछ पराजित हो गए ,कोई कन्दरा में जा छिपा .

पृथ्वी-विजय के बाद पाताल-स्वर्ग को बढ़ा;
''शेष'' भी आधीन हो ;कराधान को  राजी हुआ ,
वरुण,कुबेर,यम भी न उसका विरोध कर सके ,
इंद्र के घुटने भी मत्सर के आगे थे टिके .


पृथ्वी-स्वर्ग-पाताल का मत्सर था राजा हो गया ;
तीनों लोक में असुर आतंक -तम था बढ़ गया ,
त्रस्त हो सब देवता कैलाश पहुंचे जोड़ हाथ ;
ब्रह्मा जी व् श्री हरि- देवताओं के थे साथ .

देवताओं ने सुनाएँ दैत्य -अत्याचार थे ;
'दुष्कर्म है ये महा' शिव के ये उद्गार थे ,
यह समाचार जब मत्सर के कान में पड़ा;
कैलाश पर भी आक्रमण करने को वो आगे बढ़ा .


घोर युद्ध शिव के संग मत्सर का होने था लगा ;
किन्तु अपने बल से उसने शिव को भी दे दी दगा ,
बांध शिव को पाश में कैलाश -स्वामी बन गया ,
कैलाश पर रहते हुए आतंक फैलता रहा .

मत्सर-विनाश कैसे हो ?देवों की थी चिंता यही ;
भगवान् दत्तात्रेय तभी उनके निकट आये वही  ,
वक्रतुंड मन्त्र ''गं'' का उपदेश देवों को दिया ;
देवताओं ने ह्रदय से मन्त्र का था जप किया .


संतुष्ट हो आराधना से 'वक्रतुंड' प्रकट हुए ,
'आप सब निश्चिन्त हो 'देवों से ये वचन कहे ,
मत्सरासुर का घमंड चूर अब मैं कर दूंगा ;
आपकी समस्त पीडाओं को शांत कर दूंगा .

असंख्य गण के संग मत्सर-नगर को घेरा था ;
काली रात्रि के बाद ये नया सवेरा था ,
पांच दिन घनघोर युद्ध पूरे प्रवाह से था चला ;
वक्रतुंड के दो गणों ने मत्सर सुतों का वध किया .


पुत्र वध से व्याकुल मत्सर उपस्थित था हुआ;
उन्मत्तता  में प्रभु को गालियाँ देने लगा ,
तब प्रभावी प्रभु ने उससे ये वचन कहे -
'शस्त्र  धर' शरण में आ ; प्राण हैं गर तुझको प्रिय .

अन्यथा निश्चित ही तू अब तो मारा जायेगा ;
अन्याय  का ये घोर तम उस क्षण ही मिटने पायेगा ,
देखकर विकराल  रूप  प्रभु का, हो गया असुर विह्वल ;
क्षीण-शक्तिवान मत्सर करने लगा उनका नमन .

मत्सर की प्राथना से वक्रतुंड संतुष्ट हुए ;
'अभय'-'अपनी भक्ति' वर दे ,उससे ये वचन कहे -
पाताल लोक  में रहो ,जीवन बिताओ शांति से ,
अन्याय-अत्याचार पथ पर चलना न तुम भ्रान्ति से .

देवताओं को भी उसकी कैद से छुड़ा लिया  ,
अपनी भक्ति का उन्हें  वरदान  प्रभु ने दिया ,
'वक्रतुंड' भगवान् की महिमा का ये गुणगान है ,
उनके ह्रदय में सर्वदा  भक्त का स्थान है .

         ''जय श्री वक्रतुंड भगवान् की ''
                     
                                शिखा कौशिक










प्रेम की पराकाष्ठा -राधा ---व्युत्पत्ति व उदभव ....डा श्याम गुप्त ....


                      राधा-चरित्र का वर्णन श्रीमद भागवत पुराण में स्पष्ट नहीं मिलता; वेद-उपनिषद में भी राधा का उल्लेख नहीं है। राधा व राधा-कृष्ण का सांगोपांग वर्णन ’गीत-गोविन्द’ से मिलता है। वस्तुतः राधा का क्या अर्थ है, राधा शब्द की व्युत्पत्ति कहां से, कैसे हुई ?
             सर्व प्रथम ऋग्वेद 
के भाग १/मंडल१-२ में-राधस शब्द का प्रयोग हुआ है,जिसको ’बैभवके अर्थ में प्रयोग कियागया है। रिग्वेद-२/३-४-५- में-’ सुराधा’ शब्द श्रेष्ठ धनों से युक्त के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है। सभी देवों से उनकीसंरक्षक शक्ति का उपयोग कर धनों की प्रार्थना , प्राक्रतिक साधनों का उचित उपयोग की प्रार्थना की गई है। रिग्वेद-५/५२/४०९४ में ’ राधो’ व ’आराधना’ शब्द शोधकार्यों के लिये भी प्रयोग किये गये हैं,यथा-- "यमुनामयादि श्रुतमुद्राधो गव्यं म्रजे निराधो अश्व्यं म्रजे॥" अर्थात यमुना के किनारे गाय,घोडों आदि धनों का वर्धन वृद्धि  व उत्पादन) आराधना सहित करें।
वस्तुतः रिग्वेदिक व यजुर्वेद व अथर्व वेदिक साहित्य में ’
राधा’ शब्द की व्युत्पत्ति, रा =रयि(संसार, ऐश्वर्य,श्री,वैभव) +धा=( धारक,धारण करने वाली शक्ति) से हुई है; अतः जब उपनिषद व संहिताओं के ग्यान मार्गीकाल में स्रष्टि के कर्ता का ब्रह्म व पुरुष,परमात्मा, रूप वर्णन हुआ तो समस्त संसार की धारक चित-शक्ति,ह्लादिनी शक्ति,परमेश्वरी(राधा) का आविर्भाव हुआ ; भविष्य पुराण में--जब वेद को स्वयं साक्षात नारायण कहा तो उनकीमूल कृतित्व- काल, कर्म, धर्म व काम के अधिष्ठाता हुए--काल रूप कृष्ण  व उनकी सहोदरी (भगिनी-साथ-साथ उदभूत) राधा परमेश्वरी; कर्म रूप ब्रह्मा व नियति (सहोदरी); धर्म रूप-महादेव व श्रद्धा(सहोदरी) एवम कामरूप-अनिरुद्ध व उषा ।----इस प्रकार राधा परमात्व तत्व कृष्ण  की चिर सहचरी , चिच्छित-शक्ति (ब्रह्म संहिता) है। वही परवर्ती साहित्य में श्री कृष्ण  का लीला-रमण व लौकिक रूप के आविर्भाव के साथ उनकी साथी, प्रेमिका, पत्नी हुई व ब्रजबासिनी रूप में जन-नेत्री।

               भागवत पुराण में-एक अराधिता नाम की गोपी का उल्लेख है, किसी एक प्रिय गोपी को भगवान श्रीकृष्ण महारास के मध्य में लोप होते समय साथ ले गये थे, जिसे ’मान ’ होने पर छोडकर अन्तर्ध्यान हुए थे; संभवतः यह वही गोपी रही होगी जिसे गीत-गोविन्द के रचयिता  विद्यापति व सूरदास आदि परवर्ती कवियों-भक्तों ने श्रंगारभूति श्रीकृष्ण (पुरुष) की रसेश्वरी (प्रकृति) रूप में कल्पित व प्रतिष्ठित किया।
               वस्तुतः गीत गोविन्द व भक्ति काल के समय
स्त्रियों के सामाज़िक(१ से १० वीं शताब्दी) अधिकारों में कटौती होचुकी थी, उनकी स्वतंत्रता, स्वेच्छा, कामेच्छा अदि पर अंकुश था। अत: राधा का चरित्र महिला उत्थान व उन्मुक्ति के लिये रचित हुआ। पुरुष-प्रधान समाज में कृष्ण उनके अपने हैं, जो उनकी उंगली पर नाचते है, स्त्रियों के प्रति जवाब देह हैं, नारी उन्मुक्ति-उत्थान के देवता हैं। इस प्रकार वृन्दावन-अधीक्षिका, रसेश्वरी श्री राधाजी का ब्रज में, जन-जन में, घर-घर में ,मन-मन में, विश्व में, जगत में प्राधान्य हुआ। वे मातु-शक्ति हैं, भगवान श्रीकृष्ण  के साथ सदा-सर्वदा संलग्न, उपस्थित, अभिन्न--परमात्म-अद्यात्म-शक्ति;  अतः वे लौकिक-पत्नी नहीं होसकतीं, उन्हें बिछुडना ही होता है,गोलोक के नियमन के लिये ।

सच्चाई को नहीं चाहिए सुरक्षा घेरा !


हाजी अब्दुल रहीम निःस्वार्थ सेवा की मिसाल


हाजी अब्दुल रहीम अंसारी साहब
कागज़ी समाजसेवी सबक़ ले.. 
समाचार पत्रों में आप अक्सर समाजसेवियों के बारे में पढ़ते रहते है. किन्तु जो समाजसेवी समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बनते है उसके पीछे कितनी सतनी सच्चाई होती है. शायद हर पत्रकार जानता है. ऐसे समाजसेवियों को आईना दिखने के लिए हैं.  हाजी अब्दुल रहीम अंसारी, एक ऐसा नाम जो उन लोंगो के लिए के लिए प्रेरणा श्रोत है जो खुद को समाजसेवी कहलाने के लिए परेशान रहते है किन्तु समाजसेवा का कोई कार्य नहीं करते. 
मूलतः संत रविदासनगर भदोही जनपद के काजीपुर मुहल्ले के रहने वाले अब्दुल रहीम अंसारी नगर के अयोध्यापुरी प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक के पद पर कई वर्षो तक  कार्यरत रहे. २००७ में वे इसी विद्यालय से अवकाश प्राप्त किये, दो दिन घर पर रहने के बाद उन्हें एहसास हुआ की वे घर पर खाली नहीं रह सकते. लिहाजा फिर पहुँच गए उसी स्कूल जहाँ बच्चो को पढ़ाते थे, उन्हें देखते ही बच्चे चहक उठे. उन्होंने विद्यालय के प्रधानाचार्य से पढ़ाने की इच्छा जाहिर की और नियमित रूप से विद्यालय आकर पढ़ाने लगे. यही नहीं विद्यालय का लेखा जोखा पहले उन्ही के पास रहता था, दुबारा यह जिम्मेदारी उन्हें फिर सौंप दी गयी.  २००९ में उन्होंने हज भी किया. पांच वक़्त के नमाज़ी अब्दुल रहीम अभी तक नियमित रूप से विद्यालय  आकर बच्चो को शिक्षा देते रहते है. उन्हीं के दिशा निर्देश पर पूरा विद्यालय परिवार चलता है. एक बार विद्यालय के प्रधानाद्यापक और सहायक अध्यापक राजीव श्रीवास्तव ने उन्हें अपने वेतन से कुछ पारिश्रमिक देने की बात कही तो वे  भड़क उठे.  कहा आज भी सरकार उन्हें आधी तनख्वाह देती है. हराम का लेना उन्हें पसंद नहीं जब तक शरीर साथ देगा वे बच्चों को नियमित शिक्षा देंगे. यही नहीं वे होमियोपैथिक के अच्छे जानकर भी है. विद्यालय के बच्चे जब बीमार होते हैं तो वही दवा देते हैं.. यही नहीं जो भी उनके पास इलाज के लिए पहुँचता है. उसे भी दवा देते है. और इस दवा का वे कभी एक पैसा तक नहीं लेते. आज वे अपने मुहल्ले में वे सम्मान की दृष्टि से देखे जाते है.  आज जहा लोग पैसे के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते है. ऐसे में वे सम्मान जनक पात्र ही नहीं वरन पूरे समाज के लिए प्रेरणास्रोत  है.
सच इंसानियत, समाजसेवा का जज्बा हर इन्सान में होना चाहिए चाहे वह किसी भी धर्म का हो. ऐसे महान व्यक्तित्व को मैं सलाम करता हूँ. यदि ऐसे लोंगो का अनुसरण लोग करें तो जरा सोचिये समाज का क्या स्वरूप होगा. 
हाजी अब्दुल रहीम साहब के बारे में हमें यह सारी जानकारी हमारे मित्र हरीश सिंह जी ने दी है जो कि ख़ुद भदोही में ही रहते हैं। यह जानकर अच्छा लगता है कि हमारे दरम्यान अभी ऐसे लोग मौजूद हैं जो कि अपने फ़र्ज़ पहचानते हैं और उसे अदा करते हैं और यह तो सोने पर सुहागे जैसा सुखद है कि यह सब करने वाला एक मुसलमान है।
आदर्श शिक्षक के रूप में एक मुसलमान को पाना उन तमाम धारणाओं को निर्मूल कर देता है जो कि नफ़रत का बीज रोपने वाले अक्सर ही जन गण के मन में साज़िश के तौर पर डालते रहते हैं।
हमारी दुआ है कि मुसलमानों को विशेष रूप से हाजी जी के अमल से प्रेरणा मिले और यूं तो वह हरेक के लिए एक प्रेरणा स्रोत हैं ही।
ब्लॉगर्स मीट वीकली में आज सबसे पहले हाजी अब्दुल रहीम साहब का ही ज़िक्र किया गया है। जिसे आप इस लिंक पर देख सकते हैं- 

तुझको मिले अब तो चाहत तेरी

Written By नीरज द्विवेदी on रविवार, 4 सितंबर 2011 | 10:35 pm



मेरी दुआ है रब से, कि पूरी हो आरजू तेरी,
मेरी अल्तजा है उस खुदा से, मोहब्बत मेरी,
मुझे तू मिले, ना मिले, अब ये किस्मत मेरी,
फिर भी तुझको मिले अब तो चाहत तेरी॥

इन दिनों हमें शौक है, याद करना तुम्हें,
और तुम्हारी आदत है, भूल जाना हमें,
तुझे हिचकी का आना है हरकत मेरी
फिर भी तुझको मिले अब तो चाहत तेरी॥

ये आज कल अश्क बहाना है हरकत मेरी,
फिर भी तुझको मिले अब तो चाहत तेरी॥

भाई दिनेश राय जी दिविवेदी को आज उनके जन्म दिन पर हार्दिक बधाई


भाई दिनेश राय जी दिविवेदी को आज उनके जन्म दिन पर हार्दिक बधाई ..ब्लोगिग्न की दुनिया के सिरमोर कहे जाने वाले भाई दिनेश जी का जन्म आज ही के दिन बारां में एक सिद्धांतवादी अध्यापक परिवार के यहाँ हुआ था ...मजेदार बात यह है के कल टीचर्स दे है और आज भाई दिनेश जी का जन्म
दिन है .....पेशे से वकालत कर रहे भाई दिनेश जी पत्रकार लेखक और कवि भी रहे हैं और अभी विभिन्न साह्तियिक संस्थाओं से जुड़ कर साहित्य के सेवा और हिंदी भाषा का प्रचार प्रसार कर रहे हैं ...........हिंदी ब्लोगिंग में कई वर्षों से जुड़ कर हिंदी ब्लोगिग्न को सजाने संवारने और कई बेहिसाब सेद्धान्तिक और रचनात्मक पोस्टें लिख कर अपना विशिष्ठ स्थान बनाने वाले द्विवेदी जी अनवरत ब्लॉग के लेखक है और कई ब्लॉग के रचयिता.मार्ग दर्शक भी रहे हैं वर्तमान में विधि मामलात के उलझे सवालातों पर देश भर में पीड़ित लोगों को विधिक रूप से साक्षर कर भाई द्विवेदी जी ने विविध आयाम स्थापित किये हैं .....वकालत में बुलंदी और सियासत में कोमरेड गिरी ने भाई दिनेश को हर दिल अज़ीज़ बना दिया है पढना और पढ़ाना इनका कम है और इन दिनों हमारी वाणी ब्लॉग एग्रीगेटर के सम्पादक के रूप में आप महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं अनछुए पहलुओं को बहतरीन अंदाज़ में लिखना और प्रस्तुत करना दिनेश जी की प्रतिभा में चार चाँद लगा देता है और यही वजह के ब्लोगर्स इनके ब्लॉग पर टिप्पणियाँ करना अपना मान सम्मान समझते हैं ऐसे महान ब्लोगर भाई दिनेश द्विवेदी को उनके जन्म दिन पर मेरा सलाम .........................अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

आज़ादी की दूसरी लड़ाई में काले अँगरेज़ बाधक बन रहे हैं

Written By आपका अख्तर खान अकेला on शनिवार, 3 सितंबर 2011 | 9:44 pm


जी हाँ दोस्तों एक आज़ादी की लड़ाई सभी ने मिलकर अंग्रेजों को भगाने के लियें लड़ी थी धरने दिए ..प्रदर्शन किये .गोलियां खायीं ..जेल में गए और फिर कहीं जाकर यह आज़ादी हमे मिली है लेकिन आज जब भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबे नेताओं खासकर सत्तापक्ष के लोगों से जनता मुक्ति मांग रही है देश से भ्रष्टाचार और कालाबाजारी के खिलाफ आवाज़ उठा कर काले धन को बाहर निकालने की बात कर रही है तब सत्ता पक्ष के लोग वही सब कुछ कर रहे है जो अंग्रेजों ने आज़ादी का आन्दोलन दबाने के लियें क्या ,,,,सत्ता पक्ष ने पहले काले धन के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले बाबा रामदेव को आना से लडाया फिर डिवाइड एंड रुल की निति पर सत्तापक्ष ने बाबा रामदेव से समझोता कर गले लगाया उन्हें रामलीला मैदान बेठने की जगह दी जब बात बिगड़ गयी तो फिर उनकी जलियावाला बाग़ जेसी गत बनाई गयी .उनके खिलाफ अचानक सत्तापक्ष ने सारी जांचें शुरू कर दी .इस जीत से सत्तापक्ष का सीना फुल गया और उसने समझा भ्रष्टाचार के खिलाफ जो भी बात करे उसे भ्रस्थ बताओ जेल में डालो ..अन्ना के साथ भी ऐसा ही बर्ताव किया गया पहले अन्ना को डराया धमकाया फिर गिरफ्तार कर प्रताड़ित किया लेकिन जब जनता की आवाज़ उठी तो सरकार दो कदम पीछे हटी और अन्ना और उनके समर्थकों के आगे अंग्रेजों की तरह नतमस्तक हो गयी सारे देश ने देखा के समझोते हुए दलालों को भेजा गया आन्दोलन के जो समर्थक थे उनकी हिट लिस्ट बनाई गयी और उन्हें सबक सिखाने उन्हें जेल का दरवाज़ा दिखाने के प्रयास तेज़ हो गये ..आन्दोलन के जो गद्दार बने सरकार का जिसने समर्थन किया उन्हें पुरस्कर्त करने की तय्यारी की गयी .............आज बाबा रामदेव के खिलाफ नोटिस उनके खिलाफ जांच अचानक उनके द्वारा काले धन के खिलाफ आवाज़ उठाने का नतीजा है वरना इसी सत्ता के लियें यह बाबा रामदेव भगवान थे ..अन्ना और उनके समर्थकों को सत्तापक्ष ने माथे पर बिठाया और फिर अचानक दूध में से मक्खी की तरह निकाल दिया .ताज्जुब तो यह है के सत्तापक्ष ने वोह अंग्रेजों की निति अपनाई जिसमे वोह डिवाइड एंड रुल की निति से देश को गुलाम बनाये रहे लेकिन अभी इन काले अंग्रेजों की सभी नीतिया फेल हो गयीं साम्प्रदायिकता ..अआर एस एस ..विपक्षी आन्दोलन कहकर आन्दोलन को दबाया बदनाम किया लेकिन वाह देश जिंदाबाद रहा और जनता जीत गयी घोषणा हो गयी लेकिन सत्तापक्ष तो काली अँगरेज़ है उसने केजरीवाल को सताया ..बाबा को उठाया ..अन्ना को भ्रष्ट कहा और किरण बेदी ..ओम,पूरी सहित प्रशांत भारद्वाज को जेल भेजने की धमकिया देकर कार्यवाहियां शुरू की इतना बखेड़ा होने के बाद भी सत्ता पक्ष को पछतावा नहीं है वोह अपनी गलतियाँ सुधारना नहीं चाहती है और एक रावण की तरह हरकतें कर रही है लेकिन उन्हें पता नहीं के दस सर वाले रावण का अंत करने के लियें अब राम का जन्म हो गया है और देश की सुक्ख शांति इमानदारी का जो हरण इस सरकार ने किया है उसे छुडाने के लियें अन्ना रामबाण और हनुमानों की वानर सेना को लेकर आ गये है फिर कुम्भ कारन हो चाहे शूर्पनखा हो चाहे रावण हो सभी को धाराशायी होना ही होगा इसलियें कहते हैं के वन्दे मातरम ..इन्कलाब जिंदाबाद .मेरा देश महान है मेरे देश की भोली भली जनता जब सडको पर आती है तो फिर यह मेरे देश की तरह ही महान हैं .....अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

मै बीमार नहीं-ईमानदार हूँ

मै बीमार नहीं-ईमानदार हूँ
कुरुक्षेत्र के मैदान सा
खौफनाक -धंसा चेहरा
टूटी खटिया और मडई में पड़ा
घेरे -अधनंगे
चमकता चेहरा चरित्रवान बच्चे
साधारण जीर्ण वस्त्र में लिपटी
ये मेरी प्यारी गुडिया
अर्थी उठाने नहीं जुटे
मै बीमार नहीं ईमानदार हूँ
ये पढ़ते हैं पास बैठ
मेरे मन को
मेरे दुःख को
मेरे दर्द को
जो मैंने झेला है
घुट-घुट के जिया हूँ
गरल पिया हूँ
मेरे हाथों से छीन
सुधा के प्याले
जब -जब "उन्होंने "-पिया है
चोर-चोर मौसेरे भाई
सच ही कहा है
मेले में अकेले
कोने में पड़ा -पड़ा
तिल-तिल जिया हूँ
साठ साल

गांधी की आत्मा ले
थाना-कचहरी
स्कूल-अस्पताल
पग-पग पे दलाल-
से - कितना भिड़ा हूँ
मै बीमार नहीं
ईमानदार हूँ ----
ये देख रहे हैं
मेरी जमा पूँजी
मेरी धरोहर
मेरी नजरें
पत्थर से दिल पे
खिले कुछ फूल
मेरी मुस्कान
जो अब भी
सैकड़ों में -
फूंक देती है जान
टटोल रहे हैं
मेरा सोने का दिल
और टटोलें भी क्या ??
वहां टंगा है
एक मैला -कुचैला
खादी का कुर्ता
सौ छेद हुयी जेब ------
मै बीमार नहीं
ईमानदार हूँ ----
----------------------
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल "भ्रमर"५
02.09.2011 HP
00.५४ पूर्वाह्न

गुरुवासरीय गोष्ठी संपन्न.......ड़ा श्याम गुप्त...

Written By shyam gupta on शुक्रवार, 2 सितंबर 2011 | 10:41 am

गोष्ठी का एक दृश्य
श्री दिवाकर पांडे रचना पढते हुए


                              आलम बाग कानपुररोड क्षेत्र की   प्रत्येक गुरूवार को आयोजत  होने वाली साप्ताहिक गुरुवासरीय साहित्यिक गोष्ठी दि १.९ .११ गुरूवार को श्री बसंत राम दीक्षित के विजय नगर स्थित आवास पर आयोजित हुई |  जिसमें डॉ श्याम गुप्त, श्री राम देव लाल विभोर, ड़ा सुरेश प्रकाश शुक्ल, डॉ श्रीकृष्ण सिंह अखिलेश, श्री बसंत राम दीक्षित, श्रीमती पुष्पा दीक्षित, श्री मधुकर अस्थाना, श्री जियोलाल जैन, श्री शीलेन्द्र चौहान व एवं मुख्य अतिथि के रूप में   हैदरावाद से पधारे सुप्रसिद्ध कवि, साहित्यकार व पत्रकार श्री दिवाकर पांडे ने अपनी अपनी रचनाओं का पाठ किया |

श्री गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनायें !

Written By Shikha Kaushik on गुरुवार, 1 सितंबर 2011 | 3:19 pm


Lord Ganesha Wallpapers


सर्वप्रथम आप जानिए ''संकष्टनाशनस्तोत्रं '' के बारे में -

Ganesha Chaturthi Wallpapers''नारद'' जी कहते हैं -



''पहले मस्तक झुकाकर गौरिसुत को करें प्रणाम ;
आयु,धन, मनोरथ-सिद्धि ;स्मरण से मिले वरदान ;
'वक्रतुंड' प्रथम नाम है ;''एकदंत'' है  दूजा ;
तृतीय 'कृष्णपिंगाक्ष' है ;'गजवक्त्र' है चौथा ;
'लम्बोदर'है पांचवा,छठा 'विकट' है नाम,
'विघ्नराजेन्द्र' है सातवाँ ;अष्टम 'धूम्रवर्ण' भगवान,
नवम 'भालचंद्र' हैं ,दशम 'विनायक' नाम ,
एकादश 'गणपति' हैं ,द्वादश 'गजानन' मुक्तिधाम ,
प्रातः-दोपहर-सायं जो नित करता नाम-ध्यान ;
सब विघ्नों का भय हटे, पूरण होते काम  ,
बारह-नाम का स्मरण,सब सिद्धि करे प्रदान ;
ऐसी  महिमा प्रभु की उनको है सतत प्रणाम ,  
इसका जप नित्य करो ;पाओ इच्छित वरदान ;
विद्या मिलती छात्र को ,निर्धन होता धनवान ,
जिसको पुत्र की कामना उसको मिलती संतान ;
मोक्षार्थी को मोक्ष का मिल जाता है ज्ञान ,
छह मास में इच्छित फल देता स्तोत्र महान ,
एक वर्ष जप करने से होता सिद्धि- संधान ,
ये सब अटल सत्य है ,भ्रम का नहीं स्थान ;
मैं 'नारद 'यह बता रहा ;रखना तुम ये ध्यान ,
जो लिखकर स्तोत्र ये अष्ट-ब्राहमण को करे दान ;
सब विद्याएँ जानकर बन जाता है विद्वान .''

   [श्री गणेश जी की प्रेरणा से यह 'संकष्टनाशनस्तोत्रं' सरल भाषा में प्रस्तुत किया है .आने वाले दिनों में भगवान श्री गणेश के आठ प्रसिद्द रूपों का एक -एक कर परिचय प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगी .]
                                               शिखा कौशिक
                   http://shikhakaushik666.blogspot.com/





खेल के नाम पर जनता के विशवास के साथ खेल


जी हाँ दोस्तों देश में खेल के नाम पर जनता के साथ विश्वासघात का खेल किया जा रहा है .सारा देश जानता है के कोमन वेल्थ के नाम पर भाजपा के समर्थन से बने सुरेश कलमाड़ी ने देश में क्या खेल किया हिया इसके बाद शरद पंवार केसे क्रिकेट में बने और फिर अभी राजस्थान में सी पी जोशी पर जब कोंग्रेस के ही सांसद महेश जोशी ने हाथ साफ़ किया तो कोंग्रेस के सी पी जोशी कुछ वोटों के लियें ललित मोदी और वसुंधरा के सामने इंग्लेंड होने पर भी केसे गिडगिडाए............क्रिकेट सट्टा हो चाहे मेच फिक्सिंग हो चाहे ललित मोदी का क्रिकेट घोटाला हो सभी मामलों में देश की जनता के सामने एक सवाल है के देश की खेल संस्थाएं कहां से कितना रुपया लेती है और कहां इस रूपये को खर्च करती हैं क्या वोह रुपया जनहित में खर्च है या फिर मनामाना खर्च हो रहा है .इस बार जनता की आवाज़ पर यह पहल खुद केंद्र सरकार के खेल मंत्री अजय माकन ने किया बस अजय माकन ने संसद से चाहा के खेल संस्थाओं की स्वायत्त बरकरार रखते हुए उन्हें सिर्फ इतनी सी पाबंदी लगा दें के उनकी आमदनी और खर्च का सच वोह जनता को बता दें और यह संस्थाएं देश से कुछ भी ना छुपायें इसलियें इन्हें आर टी आई के दायरे में ले लें बस फिर क्या था भाजपा ..कोंग्रेस .ऍन सी पी एक हो गए और चोर चोर मोसेरे भाई बन कर खेल में हो रहे भ्रष्टाचार के सच को उजागर करने से केसे रोका जाए सी मामले में अपनी सारी ताकत झोंकने लगे अब सरकार और केंद्र के खेल मंत्री देश के खेलों के नाम पर खेल संस्थाओं के इस भ्रस्ताचार और भ्रष्टाचार एकता के आगे बे बस हैं ...............अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

एक अकेला पत्ता



एक पेड़ से टूटा हुआ, निरुपाय, हताश, निपट अकेला पत्ता  क्या सन्देश देना चाहता है. पढिये यहाँ:  एक पत्ता



२६ अगस्त के आन्दोलन का एक और अनदेखा बलिदान

Written By नीरज द्विवेदी on बुधवार, 31 अगस्त 2011 | 10:30 pm



मौत से पहले दिनेश ने पूछा था, ”टीम अन्ना का कोई क्यों नहीं आया?”
अब आप जानना चाहेंगे की कौन दिनेश?
हम बात कर रहे हैं अन्ना हजारे जी के सशक्त लोकपाल के समर्थन में आत्मदाह करने वाला दिनेश.

दिनेश यादव का शव जब बिहार में उसके पैतृक गांव पहुंचा तो हजारों की भीड़ ने उसका स्वागत किया और उसकी मौत को ‘बेकार नहीं जाने देने’ का प्रण किया। लेकिन टीम अन्ना की बेरुखी कइयों के मन में सवालिया निशान छोड़ गई। सवाल था कि क्या उसकी जान यूं ही चली गई या उसके ‘बलिदान’ को किसी ने कोई महत्व भी दिया?

गौरतलब है कि सशक्त लोकपाल पर अन्ना हजारे के समर्थन में पिछले सप्ताह आत्मदाह करने वाले दिनेश यादव की सोमवार को मौत हो गई थी। पुलिस के मुताबिक यादव ने सुबह ... २६ अगस्त के... (Complete)

एक लघुदीप की लौ





इक खामोश अँधेरी रात की, इक रोशनी कहती है,
ये जो चमक है, उस लघुदीप की कहानी कहती है,
जिसकी लौ में जिजीविषा की, छोटी झलक दिखती है,
और इस अथाह अँधेरे से, लड़ने की कोशिश दिखती है॥

ये रात से जंग जीत लेने की, ख्वाइश दिखती है,
मजलूम की ईश्वर से की गयी, फरमाइश लगती है,
इस कालिमा में भले ही, बस ... एक लघुदीप की लौ (Complete)

हिंदू मुस्लिम की मुहब्बत का ताजमहल है देवबंद

देवबंद। देवबंद में ईद की नमाज़ सकुशल संपन्न हुई।

देवबंद की ईदगाह में क़ारी उस्मान साहब की इमामत में ईद की नमाज़ 9 बजकर 30 मिनट पर अदा हुई।
जामा मस्जिद में मौलाना सालिम क़ासमी साहब की इमामत में 9 बजे सुबह अदा हुई जबकि मस्जिद ए रशीद में सुबह 7 बजकर 15 मिनट पर ही ईदुल फित्र की नमाज़ अदा की जा चुकी थी।
इस मौक़े पर शान्ति व्यवस्था के लिए पुलिस प्रशासन की ओर से उचित प्रबंध किए गए।
देवबंद की सरज़मीन प्यार मुहब्बत की सरज़मीन है। ईदगाह के बाहर ही बहुत से पंडाल लगाकर हिन्दू भाई बैठ जाते हैं और जैसे मुसलमान भाई नमाज़ अदा करके निकलते हैं तो वे उनसे गले मिलकर ईद की मुबारकबाद देते हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं के अलावा राजनीतिक पार्टियों के लीडर भी ईद मिलन के आते हैं और दिन भर अलग अलग जगहों पर ईद मिलन के औपचारिक और अनौपचारिक कार्यक्रम चलते ही रहते हैं बल्कि कई बड़े आयोजन तो कई दिन बाद तक होते रहते हैं।
इस साल भी प्यार मुहब्बत की यही ख़ुशनुमा फ़िज़ा देखने में आ रही है। कोई हिन्दू भाई अपने मुसलमान दोस्तों के घर ईद मिलने जा रहा है और कहीं कोई मुसलमान अपने हिन्दू दोस्तों के घर शीर लेकर जा रहा है और उसका मक़सद उनकी मां से दुआ प्यार पाना भी होता है।
दुनिया भर में देवबंद की जो छवि है,  वह यहां आकर एकदम ही उलट जाती है।
बड़ा अद्भुत समां है।
आम तौर पर कुछ लोग कहते हैं कि धर्म नफ़रत फैलाता है और अपने अनुयायियों को संकीर्ण बनाता है लेकिन ईद के अवसर पर हर जगह यह धारण ध्वस्त होते देखी जा सकती है और देवबंद का आपसी सद्भाव देख लिया जाए तो बहुत लोग यह जान जाएंगे कि इंसान को इंसान से जोड़ने वाली ताक़त सिर्फ़ धर्म के अंदर ही है।
जो लोग धर्म के बारे में लिखने पढ़ने के शौक़ीन हों या फिर वे सामाजिक संघर्ष के विराम पर चिंतन कर रहे हों, उन्हें चाहिए कि वे एक नज़र देवबंद के हिन्दू मुस्लिम रिलेशनशिप का अध्ययन ज़रूर कर लें।
आगरा में अगर पत्थर का ताजमहल है तो यहां सचमुच मुहब्बत का ताजमहल है।
हिंदू मुस्लिम की मुहब्बत का ताजमहल है देवबंद।

ईद की नमाज़ से पहले ग़रीबों को फ़ित्रा दे दीजिए



ईद की नमाज़ से पहले फ़ित्रा देने के बारे में

ईद अरबी शब्द है, जिसका मतलब होता है ख़ुशी। सो ईद से ख़ुशी जुड़ी हुई है। ईदुल्फित्र से रोज़े और फ़ित्रे की ख़ुशी। फ़ित्रा वह रक़म है जो ईदुल्फित्र की नमाज़ से पहले अदा की जाती है। यह रक़म ग़रीबों को दी जाती है, जिससे वह भी ईद मना सकें।
जब तक रोज़ेदार फ़ित्रा अदा नहीं करेगा, अल्लाह उसके रोज़े भी क़ुबूल नहीं करेगा। सो मुसलमान पर लाज़िम है कि ईद की नमाज़ से पहले पहले फ़ित्रा अदा कर दे वर्ना तो लौटकर ज़रूर ही अदा कर दे। यह एक निश्चित रक़म होती है जो अलग अलग साल में गेहूं की क़ीमत के मददे नज़र अलग अलग होती है। इस्लामी विद्वान हर साल हिसाब निकाल इसकी घोषणा करते हैं। यह रक़म मुस्लिम और ग़ैर मुस्लिम हरेक को दी जा सकती है, बस आदमी ग़रीब होना चाहिए। इसी के साथ यह भी एक ख़ास बात है कि पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. ने कहा है कि मेरी औलाद को ज़कात और फ़ित्रा वग़ैरह मत देना, यह मेरी औलाद पर हराम है अर्थात वर्जित है। अक्सर मुसलमान इसी माह में अपनी ज़कात भी निकालते हैं। मुसलमानों को सदक़ा देने की ताकीद भी क़ुरआन और हदीस में बहुत की गई है और कमज़ोर आय वर्ग के लोगों को ‘क़र्ज़ ए हसना‘ देने के लिए भी बहुत प्रेरणा दी गई है।
‘क़र्ज़ ए हसना‘ की शक्ल यह होती है कि क़र्ज़ देने वाला आदमी अल्लाह की रज़ा की ख़ातिर जब किसी ज़रूरतमंद को क़र्ज़ देता है तो न तो वह उस पर सूद लेता है और न ही कोई अवधि निश्चित करता है बल्कि यह सब वह क़र्ज़ लेने वाले पर छोड़ देता है कि वह जैसे चाहे और जब चाहे क़र्ज़ लौटाए और न चाहे तो न लौटाए। इन सबके बदले में अल्लाह का वादा है कि वह ईमान वालों को दुनिया में इज़्ज़त की ज़िंदगी देगा और मरने के बाद जन्नत की ज़िंदगी। हक़ीक़त यह है कि अगर दुनिया के मालदार इस तरीक़े से ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की मदद करने लगें तो दुनिया से भूख और ग़रीबी का ख़ात्मा हो जाएगा और जो जुर्म इनकी वजह से होते हैं वे भी दुनिया से ख़त्म हो जाएंगे। अमीर और ग़रीब की आपसी नफ़रत और आपसी संघर्ष भी मिट जाएगा। तब यह दुनिया भी जन्नत का ही एक बाग़ बन जाएगी। दुनिया के सामने इसका नमूना मुसलमानों को पेश करना है।
धर्म की उन शिक्षाओं को सामने लाने की ज़रूरत आज पहले से कहीं ज़्यादा है जिनका संबंध जन कल्याण से है। जो लोग यह कहते हैं कि धर्म शोषण करना सिखाता है और दुनिया को बेहतर बनाने के लिए धर्म को छोड़ना ज़रूरी है।‘ उन लोगों से हमारा यही कहना है कि भाईयो , आपने धर्म के नाम पर अधर्म के दर्शन कर लिए होंगे। एक बार इस्लाम के दर्शन तो कीजिए, बराबरी और इंसाफ़ की, आपस में भले बर्ताव के बारे में इस्लामी शिक्षाओं को जान लीजिए और फिर उससे बेहतर या उस जैसी ही शिक्षा स्वयं बनाने की कोशिश कर लीजिए और हमारा दावा है कि आप दोनों ही काम नहीं कर पाएंगे। इस्लाम की बिना सूदी अर्थ व्यवस्था अर्थ शास्त्रियों की समझ में अब आ रही है।
इसी व्यवस्था में से एक है ‘फ़ित्रा‘।
क़ुरआन कहता है कि ‘...और मोमिन के माल में याचक और वंचित का भी हक़ है।‘ यानि ऐसा करके दौलतमंद मोमिन किसी याचक और किसी वंचित पर कोई अहसान नहीं कर रहा है बल्कि वह उन्हें वही धन दे रहा है, जिस पर उनका हक़ है। यह हक़ ईश्वर अल्लाह ने निश्चित किए हैं। जो ईश्वर अल्लाह को और उसके धर्म को नहीं मानते, वे उसके निश्चित किए हुए हक़ को भी नहीं मानते और दुनिया में भूख और ग़रीबी मौजूद है तो इसका कारण यही है कि दुनिया अल्लाह के ठहराए हुए हक़ को मानने के लिए तैयार ही नहीं है और सारी समस्या की जड़ यही न मानना है और इनका हल केवल मान लेना है। जो मान लेता है , वह ईमान वाला कहलाता है। ईमान वालों को चाहिए कि जो हक़ अल्लाह ने मुक़र्रर कर दिए हैं, उन्हें पूरा करने की कोशिश करे ताकि लोग जान लें कि धर्म इंसानियत को क्या कुछ देता है ?

सबको ईद मुबारक

ऐसे हुई कोटा में ईद की घोषणा .................

Written By आपका अख्तर खान अकेला on मंगलवार, 30 अगस्त 2011 | 11:17 pm


दोस्तों कल ईद है पहले बिहार में चाँद दिखा फिर लखनऊ से चाँद दिखने की खबर आई लेकिन कोटा में बरसात होने के कारण चाँद दूर दूर तक दिख नहीं सका था और ईद की घोषणा तो चाँद देखने के बाद ही की जाने की शरियत है बस कोटा के लोगों के दिल थमे हुए थे और उन्हें शहर काजी अनवार अहमद के फेसले का इन्तिज़ार था .....में खुद भी शहर काजी अनवर अहमद का नजदीकी हूँ कोटा वक्फ कमेटी का नायब सदर और कानूनी सलाहकार के अलावा पत्रकारिता से जुडा हूँ इसीलिए मेरे फोन पर धन धनाधन घंटियाँ बजने लगी .हम खुद काजी साहब से चाँद दिखने की शहादत केसे लें और ईद केसे घोषित करें इसकी चर्चा में थे ...........इसी बीच मेरे पास बारां के वकील जनाब आफाक भाई का फोन आया उनका कहना था कोटा में तो चाँद नहीं दिखा लेकिन बूंदी में उनके रिश्तेदार ने चाँद देख लिया है इसकी खबर शहर काजी साहब कोटा को दी गयी ...शहर काजी कोटा ने बूंदी शहर काजी से राबता किया वहां चाँद दिखने की पुष्ठी हुई लेकिन चाँद दिखने की शरीयती साक्ष्य तो लेना थी ..शहर काजी साहब ने एक कार मंगवाई उसमे दो ज़िम्मेदार लोगों को चाँद देखने वालों से जिरह करने और उनकी गवाही लेने के लियें बूंदी भेजा गया बूंदी कोटा से चालीस किलोमीटर दूर दुसरा जिला है ....खेर ज़िम्मेदार लोग बूंदी पहुंचे इस दोरान कोटा के सभी लोगों के दिल थमे हुए थे क्योंकि कोटा में अनेकों बार चाँद की शहादत नहीं हाने पर ईद दुसरे दिन हुई है चाहे पुरे देश में कभी भी ईद मना ली जाए कुछ लोग एतेकाफ में बेठे थे जो मस्जिदों से उठना चाहते थे लेकिन ईद की घोषणा चाँद की शहादत पर होना थी .................बूंदी गए दोनों मोअज्जिज़ लोग शहादत लेकर वापस कोटा आये काज़ियात कार्यालय में इसे पेश किया गया शहर काजी ने फिर एक बार तस्दीक की और तस्दीक करने के बाद एक फरमान एक आदेश जारी कर कोटा में भी कल ईद की घोषणा करते हुए ईद की नमाज़ साढ़े नो बजे पढने की घोषणा की ..............ईद की घोषणा हो चुकी थी पटाखे फूट गए थे एलान होने लगा था इसी बीच मुबारक बाद के सिलसिले शुरू हो गये ..थोड़ी देर बाद कोटा के अनवरत ब्लोगर भाई दिनेश राय जी द्विवेदी का फोन आया उन्होंने ईद के बारे में पूंछा तो मेने सारी जानकारी दी उन्होंने सुझाव दिया के भाई ईद की इस घोषणा को कमसे कम ब्लॉग पर लिख कर लोगों तक पहुंचाएं मेने भाई दिनेश द्विवेदी जी को कल ईद पर आने की दावत दी ..दिनेश जी ने तपाक से जवाब दिया के मेरे तो बेटे और बेटी दोनों आधी रात को आ रहे है हमारी तो ईद उनसे ही होगी उनका कहना था के बच्चे राखी पर नहीं आये थे अब चार दिन कोटा में उनके साथ रहेंगे इसलियें हमारी तो चार दिन ही ईद रहेगी ..भाई दिनेश जी द्विवेदी जी की यह बात सुन कर में दुखी हो गया और में मेरी ईद के बारे में सोचने लगा क्योंकि मेरा इकलोता प्यारा बेटा शाहरुख कहां नोयडा अमिटी में बी टेक कम्प्यूटर साइंस में कर रहा है और छुट्टी नहीं होने के कारण उसे पहली बार हमसे अलग दूर ईद मनाना पढ़ रही है मेरी बस आँखे छलछला आयीं और भावुकता में बहकर एक बार फिर मेने अपने बच्चे शाहरुख को फोन कर ईद की मुबारक बाद दी जो दिल्ली में मेरी बहन केघर रोहिणी में ईद मनाने के लियें रास्ते में जा रहा था .........तो दोस्तों चाँद की शहादत से ईद की घोषणा और फिर ख़ुशी से उदासी के इस सफ़र की दास्ताँ आपके सामने पेश है सभी भाइयों को ईद की बहुत बहुत मुबारकबाद ...अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

यादें एक छोटी सी प्रेम कहानी


कहते है जो बीत गया सो बीत गया हम लोगों को उस से छोड़ कर आगे बढ़ना चाहिए शायद इसलिए ऊपर वाले ने भी हमको हमारी दोनों आँखें हमारे सर के पीछे न दे कर आगे चेहरे पर दी हैं ताकि हम चाह कर भी हमेशा के लिए या ज्यादा लम्बे समय के लिए अपने अतीत को ना देख सकें हालाँकि यह बात अलग है की यह ज़रूरी नहीं है की हर किसी का अतीत बुरा ही हो। लेकिन सवाल यह उठता है की अतीत चाहे अच्छा हो या बुरा हो हम चाह कर भी उस में लौट नहीं सकते अगर बुरा हो तो भी उस में वापस लौट कर सुधार नहीं किया जा सकता और यदि अच्छा हो सुखद हो तो भी उस में लौट कर उस को दुबारा जिया नहीं जा सकता। लोग कहते हैं यादें जिसकी जैसी भी हों होंठों पर मुसकान ले ही आती हैं मगर मेरा मानना है की यादें, यदि मुसकान लाती हैं तो उस के साथ-साथ उस पल के बीत जाने का ग़म भी साथ लाती हैं जिस पल ने उन्हें यादें बना दिया।
यादें एक ऐसा शब्द जिसमें न जाने कितनी गहराई छुपी हुई है। यादें जो खट्टी भी होती हैं और मीठी भी जीवन से जुड़ा सब से अटूट और महत्वपूर्ण रिश्ता होती हैं यह यादें जिसे कभी नहीं झूठलाया जा सकता। कोई साथ निभाये या ना निभाये, मगर हमेशा साथ निभाती हैं, यह यादें। कई बार यूँ भी होता है कि आप अपने जीवन में कुछ यादों से भागना चाहते हो, मगर तब भी आपका साथ नहीं छोड़ती यह यादें सच्चे जीवन साथी की तरह हमेशा साथ निभाती हैं यह यादें। न जाने कितने जज़्बातों का समंदर होती हैं यह यादें, जिसमे यह दिल की कश्ती डूबती, संभालती बस जीवन चक्र की भाति चलती ही चली जाती है। यादों के समंदर में जज़्बातों का सैलाब भी किस क़दर समाया हुआ होता है। जैसे किसी के लंबे इंतज़ार का जज़्बा, मानो यादों मे भी कभी खत्म नहीं हुआ होता। वो किसी खास का इंतज़ार, वो महकता हुआ तो, कभी सुलगता हुआ इंतज़ार,वो बचपन के दिन यहाँ मुझे याद आती हैं (जगजीत सिंग जी) की गाई हुई एक मशहूर गजल “यह दौलत भी लेलो, यह शोहरत भी लेलो, मगर मुझ को लौटा दो बचपन की यादें वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी” तो कभी पहले प्यार का, पहले मिलन का कुतूहल भरा इंतज़ार जिसमे ऐसा लगता है मानो मिलन कि घड़ी में सदियाँ बीत रही हों। एक पल जैसे एक-एक वर्ष के समान प्रतीत होने लगता है
इसी मिलन से जुड़ा एक वाक़या जो मेरी यादों में बसा है। आज आपको सुनती हूँ।
दो प्रेमी हुआ करते थे एक प्यारा सा लड़का और एक खूबसूरत सी शोख़ लड़की दोनों के नाम आप अपनी पसंद के अनुरूप रख सकते हैं J दोनों में प्यार हुआ प्यार का इज़हार भी हुआ। मिलने का दिन तय हुआ और जब घड़ी मिलन की आई तब जैसे दोनों का वक्त काटे नहीं कट रहा था। लड़का, लड़की के शहर से बहार रहा करता था। जिस दिन दोनों ने मिलने का तय किया उस दिन दोनों के ही मन मे तरह-तरह के सवाल उठ रहे थे। मन ही मन दोनों यह सोच रहे थे कि जब सामना होगा महबूब से तो क्या कहेंगे एक दूसरे से शुरुवात कहाँ से होगी कैसे होगी। इस ही कुतूहल के चलते लड़की का मोबाइल बाजा और लड़के का SMS आया में स्टेशन पहुँच गया हूँ थोड़ी देर में आता हूँ। यह देख लड़की का मन था उछाल गया मारे ख़ुशी के वो बोल पड़ी थोड़ी देर में क्यूँ? जब आही गये हो तो आ भी जाओ ना जैसे भी हो अभी चले आओ लड़का ने कहा नहीं तुम्हारे घर आना है मुझे ऐसे ही नहीं आ सकता थोड़ा समय लगेगा खुद को ठीक-ठाक तो कर लू, लड़की ने जैसे तैसे खुद का दिल थाम लिया और घर के बाहर जाकर उसका इंतज़ार करने लगी तभी थोड़ी देर में पास आता एक आटो देख कर लड़की का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। और जब उस में से उसका राजकुमार उतरा तो दोनों का चहरा देखने लायक था। मारे ख़ुशी के लड़की का मन किया कि गले लगा ले अपने राजकुमार को ताकि उसे यक़ीन आ जाये की यह सपना नहीं हक़ीक़त है।
मगर मुहौले वालों के डर ने उसे ऐसा करने न दिया और लड़के का मन किया की वो बस एक बार लड़की को छु भर ले ताकि उसे भी यह यक़ीन आ सके की यह भ्रम नहीं हक़ीक़त है लड़का लड़की को बस पूरे समय अपनी आँखों के सामने देखना चाहता था उसे छु कर महसूस करना चाहता था। दोनों घर के अंदर गए मुहब्बत् के इक़रार के बाद भी दोनों की हालत ऐसी थी मानो अभी तक इज़हार ही न हुआ हो लड़की ने लड़के दिल की बात समझते हुए लड़के से एक बे मतलब की शर्त लगाई ताकि लड़का लड़की का हाथ थाम सके उसे छु सके, महसूस कर सके और जैसे ही लड़की का हाथ लड़के हाथों मे आया तो लड़की ने कहा इतनी घबराहट क्यूँ हो रही है तुमको की तुम्हारी धड़कने चल नहीं दौड़ रही है। लड़के ने अचंभित होकर पूछा तुम को कैसे पता की मेरी धड़कन बहुत तेज़ है। लड़की ने कहा मैंने प्यार किया है तुम से तुम्हारे हाथों से भी मैं तुम्हारी दिल की धड़कन को महसूस कर सकती हूँ और तभी लड़के ने लड़की से कहा की मैं भी एक बार अपने प्यार को महसूस करना चाहता हूँ और दूजे ही पल दोनों एक दूसरे के आग़ोश में ऐसे खो गये जैसे पानी में रंग, हवा में ख़ुशबू, लहरों में समंदर।
आज भी जब यह किसा यादों में याद आता है। होठों पर एक शरारत भरी मुसकान उभर कर आती है यादों में भी यादों की कश्ती दूर तलक ले जाति है।.....                     

ब्लॉग पहेली-३ आने वाली है कुछ ही घंटों में - सबसे पहले आप सभी को ''ईद मुबारक ''

सबसे  पहले आप सभी को ''ईद मुबारक ''


                   Eid Mubarak Wallpaper
ब्लॉग पहेली-३ आने वाली है कुछ ही घंटों में .आप रहें   तैयार और जिस भी ब्लॉग पर जाएँ देख लें उस ब्लोगर का चेहरा ध्यान से .टिप्पणीकारों के चेहरों पर ध्यान दें क्योंकि चेहरा पहचान कर  ही बन पायेंगें आप ''विजेता ''
अब ये मत  कहियेगा की मुझे  ये ब्लॉग अच्छा नहीं लगता या वो ब्लॉग अच्छा नहीं लगता.भाई सब  ब्लॉग अच्छे  है.शुभकामनाओं के साथ 
                                                        शिखा कौशिक 
                             http://blogpaheli.blogspot.com

Founder

Founder
Saleem Khan