नाजायज भी जायज है
Written By नीरज द्विवेदी on मंगलवार, 20 सितंबर 2011 | 12:20 pm
जीवन के छंद
डा. दिव्या श्रीवास्तव जी अपने ब्लॉग ‘ज़ील‘ पर शायद अब और न लिखेंगी,
Written By DR. ANWER JAMAL on सोमवार, 19 सितंबर 2011 | 6:48 pm
यहां तक कि पाबला जी ने भी लिख डाला
‘छील कर रख दिया‘
बस यही बातें उन्हें खा गईं और वे हौसला हार बैठीं।
औरत ख़ुद को कितना ही ‘आयरन लेडी‘ लिख ले , लेकिन वास्तव में उसका दिल होता है मोम जैसा ही, जो एक आंच से ही पिघल जाता है और औरत का ही क्या ख़ुद मर्द का दिल भी ऐसा ही होता है चाहे वह कितना कह ले कि मर्द को दर्द नहीं होता।
दर्द भी होता है और टीस भी उठती है।
जो आदमी अपने रब की रज़ा की ख़ातिर उसका पैग़ाम आम करता है, सिर्फ़ वही इस दुख दर्द को ख़ातिर में नहीं लाता, वर्ना तो हरेक आदमी इसके सामने आखि़रकार घुटने टेक ही देता है।
समाज सुधारक बनना कोई हंसी खेल नहीं है।
जो इस राह पर चले वह चलने से पहले ही सोच ले कि
‘इक आग का दरिया है और डूब कर जाना है‘
मोदी हिट...मोलाना फिट ...मजा आ गया पहली बार उपवास पर भी राजनीति हुई .............
ONLY NEWS: The two-day National Conference on Agriculture for...
ONLY NEWS: The two-day National Conference on Agriculture for...
Written By mark rai on रविवार, 18 सितंबर 2011 | 11:59 am
ONLY NEWS: दक्षिण चीन सागर में भारत को न जाने की चीन की चेताव...
Written By mark rai on शनिवार, 17 सितंबर 2011 | 8:37 pm
5 अगस्त 2011
Written By D.P. Mishra on शुक्रवार, 16 सितंबर 2011 | 1:58 pm
क्रिकेट का अर्थ - क्रीड काट - काटने का खेल - गला काट प्रतियोगिता
क्रिकेट का अर्थ - क्रीड काट - काटने का खेल - गला काट प्रतियोगिता
अमेरिका में चिकेन इस कदर लोकप्रिय है कि वहां सितंबर महीना नेशनल चिकेन मंथ के रूप में मनाया जाता है
खाने की प्लेट चिकेन के बिना अधूरी होती है
मैक्डोनाल्ड्स का मशहूर चिकेन बर्गर यहां आने वाले खाने के शौकीनों के सबसे पसंदीदा खाने में से एक है। वहीं केएफसी [केंटचुकी फ्राइड चिकेन] रेस्त्रां तो चिकेन प्रेमियों के लिए खास ही है। यहां चिकेन विंग्स, चिकेन बर्गर और चिकेन लेग्स जैसे चिकेन के ढेरों आइटम मिलते हैं। कनॉट प्लेस स्थित केएफसी आउटलेट मे काम करने वाले अतुल सिंह ने कहा कि इसका स्वाद एक बार चढ़ जाए तो छूटना मुश्किल होता है।चिकेन न केवल अपने देश में, बल्कि बाहर के देशों मे भी काफी लोकप्रिय है। अमेरिका में चिकेन इस कदर लोकप्रिय है कि वहां सितंबर महीना नेशनल चिकेन मंथ के रूप में मनाया जाता है। 15 सितंबर को वहां नेशनल चिकेन लवर्स डे के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन अमेरिका के कई रेस्त्राओं में मुफ्त चिकेन परोसा जाता है। इन्हीं में से एक पोलो ट्रॉपिकल रेस्त्रां चेन में आज के दिन हर साल दोपहर दो बजे से शाम के सात बजे तक पीले कपड़ों में आने वाले लोगों को मुफ्त में चिकेन परोसा जाता है। यानि जी भर के चिकेन खाइए वो भी बिल्कुल मुफ्त और मनाइए चिकेन लवर्स डे।
मोदी के उपवास का खर्च उठाएगी गुजरात सरकार...अब देश में आओ उपवास उपवास खोलें
Written By आपका अख्तर खान अकेला on गुरुवार, 15 सितंबर 2011 | 9:55 pm
अहमदाबाद. गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर दोहरा वार हुआ है। एक तरफ उनके खिलाफ गुजरात दंगों में भूमिका को लेकर सनसनीखेज आरोप लगाने वाले आईपीएस अफसर संजीव भट्ट ने एक बार फिर उन्हें निशाने पर लिया है, तो दूसरी ओर कांग्रेस ने भी मोदी के उपवास का जवाब उन्हीं के अंदाज में देने का ऐलान किया है।
गुजरात कांग्रेस अध्यक्ष अर्जुन मोडवाडिया ने आज कहा कि मोदी का उपवास नकली सद्भभावना है। उन्होंने कहा, '१० सालों में कहां थी मोदी की यह सद्भावना? उन्हें गरीबों और बेरोजगारों से सद्भावना क्यों नहीं है? मोदी खुद से गुजरात को न जोड़ें।' कांग्रेस ने अपने उपवास को उपवास यज्ञ का नाम दिया है और कहा है कि यह कांग्रेस का नहीं बल्कि आम जनता का उपवास होगा।
मोदी पर सद्भावना का नाटक करने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस नेता ने कहा कि मोदी और सद्भावना अलग-अलग चीजें हैं। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा, 'पांड्या के मर्डर के बाद मोदी, आडवाणी उनके घर क्यों नहीं गए थे।'
भट्ट ने मोदी को खुला पत्र लिखते हुए कहा है कि सीएम और उनकी पार्टी बीजेपी ने हाल में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मामले में ‘पूरी तरह अर्थ का अनर्थ किया है।’ भट्ट ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला किसी भी सूरत में नरेन्द्र मोदी को क्लीन चिट नहीं देता और किसी मायने में यह नहीं कहता कि उनके खिलाफ जाकिया जाफरी की शिकायत 'गैर-तथ्यात्मक' है। संजीव भट्ट ने लिखा है, 'बीजेपी या उसके नेता नरेंद्र मोदी के प्रचार के विपरीत यह फैसला गुजरात दंगों के पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में एक बेहद महत्वपूर्ण कदम है।'
बीते अप्रैल में संजीव भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर कहा था कि 27 फरवरी 2002 को वह एक बैठक में शामिल थे जिसमें सीएम मोदी ने वहां मौजूद पुलिस अफसरों से कहा था कि वो दंगाइयों को नजरअंदाज करें और दंगों का शिकार हो रहे लोगों की शिकायतों को भी नजरअंदाज करे।
उधर, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शनिवार से तीन दिनों का उपवास करने की घोषणा के बाद कांग्रेस नेता शंकरसिंह वाघेला ने भी साबरमती आश्रम में उसी दिन से तीन दिनों का उपवास रखने का ऐलान कर दिया है। वाघेला ने कहा कि मोदी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का गलत मतलब निकाल रहे हैं और खुद को बेदाग साबित करने की कोशिश में हैं। उन्होंने कहा, 'मोदी इतने बेदाग हैं तो वे राज्य में लोकायुक्त का विरोध क्यों कर रहे हैं।'
सरकार उठाएगी उपवास का खर्च
मोदी ने घोषणा की थी कि वह अपने 61वें जन्मदिवस (17 सितंबर) पर 'शांति, एकता एवं सामाजिक सद्भाव' के लिए तीन दिनों का उपवास करेंगे। इसके लिए तैयारियां जोरों पर हैं गुजरात सरकार मोदी के उपवास का भुगतान करेगी। सभी खर्च चेक भुगतान के जरिये किए जाएंगे।
मोदी के उपवास के जवाब में संजीव भट्ट ने लिखा है, 'छह करोड़ गुजरातियों में से मैं भी एक हूं और मैं तब खुद को बेहद ठगा हुआ महसूस करता हूं जब आप जैसे लोग अपने निहित स्वार्थों के लिए गुजरात के लोगों को बहकाने का काम करते हैं।'
मोदी पर पलट वार करते हुए संजीव भट्ट ने कहा है कि सद्भावना, सच्चाई और न्याय के बिना अधूरी है और इसे कोई मांग या खरीद नहीं सकता। उन्होंने कहा कि इस बाबत लोगों का विश्वास जीतना अब मोदी के लिए मुश्किलों से भरा है। भट्ट ने कहा कि जिस फैसले पर मोदी और उनके साथ जुड़े लोग बेहद खुश हैं वह फैसला असल में असल में बेहद चालाकी के साथ दंगों के लिए जिम्मेदार लोगों को उनके अंजाम तक पहुंचाने में अहम भूमिका अदा करेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2002 के गुजरात दंगे मामले में जाकिया जाफरी की ओर से दायर याचिका पर मोदी को राहत दी है। न्यायालय के इस फैसले के एक दिन बाद मुख्यमंत्री ने यह घोषणा की है। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले में निर्णय निचली अदालत करेगी।
अनिवार्य हिन्दी कापी और कवि कौ जनमु दिन.......कविता ..डा श्याम गुप्त ....
Written By shyam gupta on बुधवार, 14 सितंबर 2011 | 10:28 pm
कवि गोरखाधंधा जी के
जनमु दिना पे आयोजित गोष्ठी में ,
कविवर पांडे जी नै -
बडी सकुचाहट ते याद दिलायौ ;
अबहि छै महीना पहलै ही तौ ,
आपने आपुनि जनम दिना हतो मनायौ |
कवि जी सकपकाय गए , हडबड़ाये , फिरि-
मुसुकावत भये बोले-
पर भैया !, कवि तौ -
अखिल भारतीय कहिलाबै है ;
वाकौ तौ केन्द्र सरकार की नीतिन ते ही,
नातौ होबै है , और -
केन्द्रीय भाषा नीति तौ ,
द्विभाषी है ;
वा जनमु दिना तौ -
असल अंगरेजी आलेख हतो ,
ये तौ वाकी -
अनिवार्य हिन्दी कापी है ||
कहते है हिन्दूस्तानी है हम....
www.sahityapremisangh.com
अंजलि ने आत्महत्या कर ली , क्यों ?
लिव इन रिलेशनशिप को लेकर यूरोप में कैसी भी दीवानगी देखने में आ रही हो, लेकिन भारतीय संस्कृति में यह अभी तक पूरी तरह से घूल-मिल नहीं पाई है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि भारतीय समाज पारिवारिक बंधनों में बहुत भरोसा करता है। ऐसे में दो युवाओं द्वारा अगर लिव इन रिलेशनशिप जैसा कदम उठाया भी जाता है, तो भी पारिवारिक बंधनों के चलते ऐसे रिश्ते कामयाब नहीं हो पाते हैं। ऐसा ही एक वाकिया हाल ही में टीवी और समाचार चैनलों पर सुर्खियों में बना हुआ है। यह मामला है एयरफोर्स की बर्खास्त पूर्व फ्लाइंग ऑफिसर अंजलि गुप्ता का, जिनके सूइसाइड के मामले में उनके प्रेमी ग्रुप कैप्टन अमित गुप्ता पर पुलिस का शिकंजा कसता जा रहा है। पुलिस का कहना है कि लिव-इन रिलेशनशिप में धोखा मिलने की वजह से अंजलि ने सूइसाइड किया है। अंजलि के परिवार वालों के मुताबिक, अंजलि और अमित पिछले सात सालों लिव-इन रिलेशनशिप में थे। उनका कहना है कि अमित ने अपनी पहली पत्नी से तलाक के बाद अंजलि से विवाह करने का वादा किया था, लेकिन अब वह इससे मुकर रहा था। अंजलि भी पिछले एक साल से भोपाल में ही रह रही थी। अंजलि की मां ने आरोप लगाया है कि अमित ने ही अंजलि को अपने सीनियरों के खिलाफ शारीरिक उत्पीड़न करने का आरोप लगाने के लिए उकसाया था। और, अंजलि ने 3 सीनियर अधिकारियों के खिलाफ एयरफोर्स के अधिकारियों से शिकायत की थी। इसके बाद उसका कोर्ट मार्शल कर दिया गया था। उसके बाद से अंजिली और अमित साथ रह रहे थे। अमित का पत्नी से तलाक होने वाला था।
जाहिर है, लिव इन रिलेशनशिप के चक्कर में अपनी जिंदगी को बर्बाद कर लेने वाली अंजलि गुप्ता इस रिष्ते की जटिलताओं का ही शिकार हुई है। अंजलि गुप्ता का कॅरिअर अच्छा चल रहा था, लेकिन अपने प्रेमी अमित के चक्कर में उन्होंने अपने सीनियर अधिकारियों के उपर झूठे इल्जाम लगाए। इसका नतीजा ये निकला कि उनका कॅरिअर पूरी तरह चैपट हो गया, उनके खिलाफ कोर्ट मार्शल भी हुआ। हालांकि इसके बाद भी अंजलि संभल गई थी और वो एक खुशहाल जिंदगी जी सकती थी, अगर अमित लिव इन रिलेशनशिप के रिष्ते को पूरी ईमानदारी के साथ निभाता और उसका साथ देता। लेकिन अमित ने सिर्फ अंजलि का इस्तेमाल किया और जैसा कि अंजलि की मां के बयानों से लगता है कि उसने बरसों तक अंजलि का यौन शोषण करने के बाद भी अपनी पहली पत्नी को छोड़कर उससे शादी करने का इरादा नहीं जताया। इसी के चलते अब अंजलि आत्महत्या पर मजबूर हुई है।
Source :
http://khabarindiya.com/index.php/articles/show/3279_desh_dunia?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+khabarindiya+%28KhabarIndiya.Com%२९
-------------------------
सीनियर अधिकारियों ने अंजलि के साथ क्या किया ?
इसे केवल अंजलि और उसके अधिकारी ही जानते हैं।
नौकरी और रूपये को औरत की मज़बूती के लिए आज ज़रूरी माना जाता है लेकिन यह सब होने के बावजूद भी अंजलि ने आत्महत्या कर ली , क्यों ?
केवल एक सही सोच और एक सही तरीक़े के अभाव में।
लिव इन रिलेशनशिप भी इसी अभाव की कोख से जन्मा है और समय के साथ साथ और बहुत से मसले सामने आते चले जाएंगे।
अंजलि उनमें से एक बानगी भर है।
चंद्रमुखी चौटाला का भी है एक फ़साना
इतनी सफाई से केश को सोल्व करती हो |
की किसी को भी भनक नहीं लगने देती हो |
रुसवा नहीं होता कोई, ऐसा इन्साफ दिलाती हो |
अंदाज़ तुम्हारा निराला है, सबसे बड़े सलीके से पेश आती हो ||२ ||
.बात सिर्फ इतनी सी नहीं है, दिल का तो तू है समंदर |
पर तेरी आवाज़ और तेरे अंदाज़ से मुझे लगता है डर |
इज़हार तो करना चाहता हूँ, अपने दिल का मन्ज़र || ३ ||
.
गुरुरे हुस्न, मैं तुझे ताकीद न कर पाया |
देखता रहा तुझे, तस्लीम न कर पाया |
खता माफ़ हो, या सजा दे दो |
पर नज़र न हटे तुझसे, ऐसी जगह दे दो || ४ ||
.
वाह वाह ! ताबे हयात लग रही हो |
इस लिबास में भी, नूर-ए-हयात लग रही हो || ५ ||
जी हाँ ..में हिंदी यानी भारत माता की राष्ट्र भाषा हूँ ..
ये मदिरालय
Written By नीरज द्विवेदी on मंगलवार, 13 सितंबर 2011 | 6:30 pm
हम प्रश्न नहीं उठाते दुःख पर,
लोकपाल ही भारत के बादशाह बनेंगे ?????
Written By Brahmachari Prahladanand on सोमवार, 12 सितंबर 2011 | 9:20 am
पनाह कहीं न मिली,
समाँ गयी धरती में,
फिर खोद-खोद मिली,
भारत जिसे स्वतन्त्रता नहीं,
परतंत्रता ही अच्छी लगती है,
तब किस-किस के दास बने,
अब लोकपाल से आस लगे,
फरियाद यह करना जानती है,
खुद से कुछ न करना चाहती है,
किसी बादशाह की गुलाम थी,
फरियाद उसी से होती थी,
अब आगे के वक्त में, शिकायत लोकपाल से करेगी,
लोकपाल ही बादशाह बनेंगे, ये फिर गुलामी करेगी,
न रहना आता इसे आज़ादी से,
बस रहना आता फरियादी से,
रहकर गुलाम कई सदियों से,
सांस लेना न आता खुली हवा से,
अब क्या आगे की बात कहूँ,
दिखता है नज़ारा, बात साफ़ कहूँ,
सोने की अब आदत सी हो गयी है,
जबसे रियाया भी शाह हो गयी है,
काम कौन करे, जब सब राजा हो गए,
गुलाम कौन बने, जब सब बादशाह हो गए,
गर पेट की मजबूरी न होती,
सारी रियाया फिर मज़े से सोती,
हैं सब राजा यहाँ लोकतंत्र में,
करते राजनीति लोकतंत्र में,
फिर से गुलाम होना चाहते हैं,
लोकपाल किसी को बनाना चाहते हैं,
------- बेतखल्लुस
.
अंदाज ए मेरा: अध्ययन यात्रा बनाम दारू पार्टी.... !!!!!
Written By Atul Shrivastava on रविवार, 11 सितंबर 2011 | 6:53 pm
God Created Man
ये मायावी आँकड़े
Written By बेनामी on शनिवार, 10 सितंबर 2011 | 1:21 pm
जिन्होंने ठीक से स्कूल-कॉलेज का मुँह देखा है, उन्होंने तो आँकड़ों को सही-सही पढ़ लिया और उनके आयतन को आत्मसात भी कर लिया, मगर एक सौ इक्कीस करोड़ में से, देश की अधिकांश पढ़ने-लिखने से पूरी तौर पर बरी आम जनता इन आँकड़ों की माया से एकदम अप्रभावित है। उसका सौभाग्य है कि ये लम्बे-लम्बे, चौड़े-चौड़े आँकड़े पढ़कर उन्हें अपनी छाती नहीं कूटना पड़ रही है। कारण उन्हें अखबार पढ़ना ही नहीं आता। कहीं से अगर इन आँकड़ों की खबर लग भी गई तो उनके लिये समझना नामुमकिन है कि इतना धन वास्तव में कितना धन होता है। वे अपनी बीस रुपये औसत रोज़न्दारी से खुश है, उनके दिमाग को कोई फालतू टेन्शन नहीं है।
देश के कर्णधारों ने अधिकांश जनता को इसी दिन के लिये तो अनपढ़-गँवार बनाए रखा है, ताकि जब नेताओं की पोलों के समाचार अखबारों में छपें, टीवी पर सनसनी फैलाएँ तो बेचारी को उन्हें पढ़ने-समझने की ज़हमत न उठाना पडे़ और न ही गुस्से और आक्रोश की अगांधीवादी भावना से दो-चार होना पड़े। लोग यदि अपनी रोटी-रोज़ी की जुगाड़ की चिन्ता छोड़कर इस आँकड़ेबाज़ी की चिन्ता करने लगें तो देश का विकास कितना प्रभावित होगा!
इसमें विरोधी ताकतों की मुश्किलें बढ़ाने की सियासी चाल भी है। जाओ बेटा घर-घर और समझाओ गँवार जनता को कि हमने कितना माल दबाया है। जनता तुम्हारे दुष्प्रचार को समझे इस लायक उसे छोड़ा ही नहीं गया है, कर लो बेटा क्या करते हो।
अगजल--- दिलबाग विर्क
तुम दोनों ....
न यूँ इतिहास का हास करो
Written By Brahmachari Prahladanand on शुक्रवार, 9 सितंबर 2011 | 5:17 pm
न यूँ इतिहास का हास करो, न यूँ किसी का पर्दाफास करो,
इत के इह में ही तो आस है, तभी तो जिन्दगी खास है,
खास-ओ-खास जिन्दगी का, इतिहास लिखा जाता है,
आम-ओ-आम तो उसमें यूँ, जगह भी न बना पाता है,
उनकी खास जिन्दगी की, कुछ हमें भी आस होती है,
देखते सपने, कास ऐसी जिन्दगी हमारे पास होती है,
तभी तो इतिहास की कक्षा में, नींद है खास होती,
उनके जिन्दगी के सफ़र का सफरनामा है होती,
खोजो अपनी जिन्दगी में, क्या हमारा इतिहास होगा,
कोई हमारी जिन्दगी का पर्दाफास करनेवाला होगा,
जब हम खास होंगे, नज़र में सबके लिए आस होंगे,
कोई इतिहास लिखेगा, किसी के लिए बकवास होंगे,
कोई हमारे इतिहास पे हास करेगा, कई यूँ रोते होंगे,
कई हमसे प्रेरणा लेंगे, कई वक्त-वे-वक्त भूल गए होंगे,
.
तारीखें बन गयी कुछ तारीखें, वक्त के बीतते-बीतते,
याद कोई जब इनको करेगा,वक्त के बीतते-बीतते,
सोचेगा, कौन थे वो, जो इस तरह जिए जिन्दगी को,
जिनकी तारीख सबक बन गई, सबकी जिन्दगी को,
------- बेतखल्लुस
.
विवादों से घिरते जा रहे हैं स्वामी अग्निवेश
हाल ही अन्ना हजारे की टीम से अलग हुए स्वामी अग्निवेश एक बार फिर विवादों से घिरने लगे हैं। वस्तुस्थिति तो ये है कि उनकी विश्वसनीयता ही संदिग्ध हो गई है। अन्ना की टीम में रहने के दौरान भी कुछ लोग उनके बारे में अलग ही राय रखते थे। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर उनके बारे में अंटशंट टिप्पणियां आती रहती थीं, लेकिन जैसे ही वे अन्ना से अलग हुए हैं, उनके बारे में उनके बारे में सारी मर्यादाएं ताक पर रख कर टीका-टिप्पणियां होने लगी हैं। हालत ये है कि आजीवन सामाजिक क्षेत्र में काम करने का संकल्प लेने वाले अग्निवेश को अब कांगे्रस का एजेंट बन कर सियासी दावपेंच चलाने में मशगूल बताया जा रहा है।
असल में स्वामी अग्निवेश मूलत: अन्ना हजारे की टीम में शामिल नहीं थे। वैसे भी उनका अपना अलग व्यक्तित्व रहा है, इस कारण अन्ना हजारे के आभामंडल को पूरी तरह से स्वीकार किए जाने की कोई संभावना नहीं थी। कम से कम अरविंद केजरीवाल व किरण बेदी की तरह अन्ना हजारे का हर आदेश मानने को तत्पर रहने की तो उनसे उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी। सामाजिक क्षेत्र में पहले से सक्रिय स्वामी अन्ना से जुड़े ही एक मध्यस्थ के रूप में थे। वे उनकी टीम का हिस्सा थे भी नहीं, मगर ऐसा मान लिया गया था कि वे उनकी टीम में शामिल हो गए हैं। और यही वजह रही कि उनसे भी वैसी ही उम्मीद की जा रही थी, जैसी कि केजरीवाल व किरण से की जा सकती है।
जहां तक मध्यस्थता का सवाल है, उसमें कोई बुराई नहीं है। मध्यस्थ का अर्थ ही ये है कि जो दो पक्षों में बीच-बचाव करे और वह दोनों ही पक्षों में विश्वनीय हो। तभी तो दोनों पक्ष उसके माध्यम से बात करने को राजी होते हैं। मगर समस्या तब उत्पन्न हुई, जब इस बात की जानकारी हुई कि वे पूरी तरह से कांग्रेस का साथ देते हुए मध्यस्थता कर रहे हैं तो अन्ना व उनकी टीम को ऐतराज होना स्वाभाविक था। जैसा कि आरोप है, वे तो अन्ना की टीम को ही निपटाने में जुट गए थे। जाहिर तौर पर उनकी यह हरकत अन्ना टीम सहित उनके सभी समर्थकों को नागवार गुजरी। बुद्धिजीवियों में मतभेद होना स्वाभाविक है, मगर यदि मनभेद की स्थिति आ जाए तो संबंध विच्छेद की नौबत ही आती है। कदाचित कुछ मुद्दों पर स्वामी अन्ना से सहमत न हों, मगर उन्हीं मुद्दों को लेकर अन्ना के खिलाफ काम करना कत्तई जायज नहीं ठहराया जा सकता। संतोष हेगड़े को ही लीजिए। उनके भी कुछ मतभेद थे, मगर उन्होंने पहले ही स्पष्ट कर दिया था। उनको लेकर कोई राजनीति नहीं कर रहे थे।
जैसी कि जानकारी है, अन्ना टीम को पता तो पहले ही लग गया था कि स्वामी क्या कारस्तानी कर रहे हैं, मगर आंदोलन के सिरे तक पहुंचने से पहले वह चुप रहने में ही भलाई समझ रही थी। जानती थी कि अगर मतभेद और विवाद पहले ही उभर आए तो परेशानी ज्यादा बढ़ जाएगी। और यही वजह रही कि जब अन्ना का आंदोलन एक मुकाम पर पहुंच गया और उसकी सफलता का जश्न मनाया जा रहा था तो दूसरी ओर इस बात की समीक्षा की जा रही थी कि कौन लंका ढ़हाने के लिए विभीषण की भूमिका अदा कर रहा है। उसमें सबसे पहले नाम आया स्वामी अग्निवेश का। इसी सिलसिले में उनका का एक कथित वीडियो यूट्यूब पर डाल दिया गया। जिससे यह साबित हो रहा था कि वे थे तो टीम अन्ना में, मगर कांग्रेस का एजेंट बन कर काम कर रहे थे। वीडियो में उन्हें कथित रूप से हजारे पक्ष को पागल हाथी की संज्ञा देते हुए दिखाया गया है। वीडियो में वह कपिल जी से यह भी कह रहे हैं कि सरकार को सख्ती दिखानी चाहिए ताकि कोई संसद पर दबाव नहीं बना सके।
जहां तक वीडियो की विषय वस्तु का प्रश्न है, स्वयं अग्निवेश भी स्वीकार कर रहे हैं कि वह गलत नहीं है, मगर उनकी सफाई है कि इस वीडियो में वे जिस कपिल से बात कर रहे हैं, वे केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल नहीं हैं, बल्कि हरिद्वार के प्रसिद्ध कपिल मुनि महाराज हैं। बस यहीं उनका झूठ सामने आ गया। मौजूदा इंस्टंट जर्नलिज्म के दौर में मीडिया कर्मी कपिल मुनि महाराज तक पहुंच गए। उन्होंने साफ कह दिया कि उन्होंने पिछले एक वर्ष से अग्निवेश से बात ही नहीं की। साथ ये भी बताया कि हरिद्वार में उनके अतिरिक्त कोई कपिल मुनि महाराज नहीं है। यानि कि यह स्पष्ट है कि स्वामी सरासर झूठ बोल रहे हैं। जाहिर तौर पर इस प्रकार की हरकत को धोखाधड़ी ही कहा जाएगा।
जहां तक अग्निवेश का अन्ना टीम छोडऩे का सवाल है, ऐसा वीडियो आने के बाद ऐसा होना ही था, मगर स्वयं अग्निवेश का कहना है कि वे केजरीवाल की शैली से नाइत्तफाकी रखते थे, इस कारण बाहर आना ही बेहतर समझा। इस बात में तनिक सच्चाई भी लगती है, क्यों कि अन्ना की टीम में दूसरे नंबर के लैफ्टिनेंट वे ही हैं। कुछ लोग तो यहां तक भी कहते हैं कि अन्ना की चाबी भी केजरवाल ही हैं। बहरहाल, दूसरी ओर केजरीवाल का कहना है कि स्वामी इस कारण नाराज हो कर चले गए क्योंकि आखिरी दौर की बातचीत में अन्ना की ओर से उन्हें प्रतिनिधिमंडल में शामिल नहीं किया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि अन्ना को उनके बारे में पुख्ता जानकारी मिल चुकी थी, इसी कारण उनसे थोड़ी दूरी बनाने का प्रयास किया गया होगा।
यहां यह उल्लेखनीय है कि हजारे पहली बार अनशन पर बैठे तो स्वामी ही मध्यस्थ के रूप में आगे आए थे, मगर उनकी भूमिका पर संदेह होने के कारण ही उन्हें लोकपाल विधेयक का ड्राफ्ट बना कर सरकार से बात करने वाली टीम में शामिल नहीं किया गया, जब कि स्वामी ने बहुत कोशिश की कि उन्हें जरूर शामिल किया जाए। बस तभी से स्वामी समझ गए कि अब उनकी दाल नहीं गलने वाली है। इसी कारण जब हजारे ने 16 अगस्त से अनशन पर बैठने का फैसला किया तो अग्निवेश ने आलोचना की थी। अनशन शुरू होने से लेकर तिहाड़ जेल से बाहर आने तक स्वामी गायब रहे, मगर फिर नजदीक आने की कोशिश की तो अन्ना की टीम ने उनसे किनारा शुरू कर दिया।
खैर, यह पहला मौका नहीं कि उनकी ऐसी जलालत झेलनी पड़ी हो। इससे पूर्व आर्य समाज, जो कि उनके व्यक्तित्व का आधार रहा है, उस तक ने उनसे दूरी बना ली थी। ताजा मामले में भी आर्य समाज के प्रतिनिधियों ने उन्हें धोखेबाज बताते हुए सावधान रहने की सलाह दी है। माओवादियों से बातचीत के मामले में भी उनकी कड़ी आलोचना हो चुकी है। अब देखना यह है कि आगे वे क्या करते हैं? सरकार की किसी पेशकश को स्वीकार करते हैं या फिर से सामाजिक क्षेत्र में जमीन तलाशते हैं?
tejwanig@gmail.com





