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नाजायज भी जायज है

Written By नीरज द्विवेदी on मंगलवार, 20 सितंबर 2011 | 12:20 pm




तू अगर खड़ी हो सम्मुख तो,
दिल की दुर्घटना जायज है,
आँखों की बात करूँ कैसे?
इनका ना हटना जायज है॥

स्वप्नों में उड़ना जायज है,
चाँद पकड़ना जायज है,
गर तुम हो साथ मेरे तो,
दुनिया से लड़ना जायज है॥

किसी और से आँख लड़े कैसे?
ये सब तो अब नाजायज है
तू हो मेरे आलिंगन में तो,
धरती का फटना जायज है॥

चाहें लाख बरसतें हो बादल,
उनका चिल्लाना जायज है,
गर तेरा सर हो मेरे सीने पर,
बिजली का गिरना जायज है॥

अचूक हलाहल हो सम्मुख,
मेरा पी जाना जायज है,
इक आह हो तेरे होंठों पर,
तो मेरा डर जाना जायज है॥

स्रष्टि का क्रंदन जायज है,
हिमाद्रि बिखंडन जायज है,
मेरे होंठो पर हों होंठ तेरे,
तो धरा का कम्पन जायज है॥

तू हो तीर खड़ी नदिया के,
उसका रुक जाना जायज है,
बस तेरे लिए हे प्राणप्रिये,

जीवन के छंद



नौका को सागर की लहरों पर
पति और पत्नी के झगड़ों पर,
एहसास प्यार का होता है,
गऊयों को अपने बछड़ों पर॥

हिन्दू मुस्लिम के दंगों पर,
भाई भाई के झगड़ों पर,
एहसास दर्द का होता है,
धरती को अपने टुकड़ों पर॥

पेड़ों पर चढ़ती बेलों पर,
उन पर इठलातीं कलियों पर,
एहसास प्यार का होता है,
मिटटी को जौं की फलियों पर॥

नदिया के दोनों छोरों पर,
आँखों के दोनों कोरों पर,
एहसास दर्द का होता है,
अब तेरे बिना बिछौनों पर॥

उस रब के सारे बन्दों पर,
इस दुनिया के सब धंधो पर,
आश्चर्य बहुत ही होता है,
अब जीवन के इन छंदों पर॥

डा. दिव्या श्रीवास्तव जी अपने ब्लॉग ‘ज़ील‘ पर शायद अब और न लिखेंगी,

Written By DR. ANWER JAMAL on सोमवार, 19 सितंबर 2011 | 6:48 pm

डा. दिव्या श्रीवास्तव जी अपने ब्लॉग ‘ज़ील‘ पर शायद अब और न लिखेंगी,
कारण उन्होंने यह बताया है कि किन्हीं अनुराग शर्मा जी ने एक पोस्ट लिखकर उनका अपमान कर दिया है और मर्धन्य से ब्लॉगर्स ने उनकी हां में हां मिलाई है।
यहां तक कि पाबला जी ने भी लिख डाला
‘छील कर रख दिया‘
बस यही बातें उन्हें खा गईं और वे हौसला हार बैठीं।
औरत ख़ुद को कितना ही ‘आयरन लेडी‘ लिख ले , लेकिन वास्तव में उसका दिल होता है मोम जैसा ही, जो एक आंच से ही पिघल जाता है और औरत का ही क्या ख़ुद मर्द का दिल भी ऐसा ही होता है चाहे वह कितना कह ले कि मर्द को दर्द नहीं होता।
दर्द भी होता है और टीस भी उठती है।
जो आदमी अपने रब की रज़ा की ख़ातिर उसका पैग़ाम आम करता है, सिर्फ़ वही इस दुख दर्द को ख़ातिर में नहीं लाता, वर्ना तो हरेक आदमी इसके सामने आखि़रकार घुटने टेक ही देता है।
समाज सुधारक बनना कोई हंसी खेल नहीं है।
जो इस राह पर चले वह चलने से पहले ही सोच ले कि
‘इक आग का दरिया है और डूब कर जाना है‘

मोदी हिट...मोलाना फिट ...मजा आ गया पहली बार उपवास पर भी राजनीति हुई .............


देश के सभी धर्मों की रीड उपवास का राजनीतिकरण कर उपहास उढ़ाया जाने लगा है .....एक गाँधी का उपवास ...एक अन्ना का उपवास और फिर कभी मोदी तो कभी बाघेला का उपवास और उपवास का इतना बढ़ा राजनीतिकरण इतना बढ़ा तमाशा ...........देश जानता है कभी पत्थर..कभी मिटटी .कभी पानी ...कभी गणेश जी का दूध ...कभी गोउ माता तो कभी क्या क्या सभी पर देश में सत्ता हथियाने की राजनीति होती रही है लेकिन पहली बार देश में उपवास का उपहास उढ़ाकर सरकारी खर्च पर राजनीति और फिर उसका विरोध करने के नाम पर कोंग्रेसियों का जवाबी उपवास तमाशा बन गया है ..........खेर जो भी हो नरेंद्र मोदी और उनके समर्थकों ने इस उपवास राजनीती में खुद को हिट कर लिया है पहले योजनाबद्ध तरीके से बुर्के वाली ओरतों तो टोपी वाले आदमियों को उपवास स्थल पर मंच पर बुलाया गया कोंग्रेस की तरह ही इन लोगों को शो पीस बनाया गया और जब देश के लोगों का सर चकराने लगा खुद शिव सेना खुद संघ के लोग इस पर एतराज़ जताने लगे तो एक कथित मोलाना से टोपी मंगवाकर उसे पहनने से इंकार कर वापस से अपनी छवि को बनाने का प्रयास किया है ..दोस्तों किसी भी राजनीति से धर्म का कोई रिश्ता नहीं है चाहे हिन्दू धर्मगुरु हो चाहे मुस्लिम या किसी भी धर्म का गुरु हो वोह ऐसे किसी भी राजनितिक स्टंट का हिस्सा बनता है तो वोह खुद धर्म के साथ विश्वासघात करता है और ऐसे सभी धर्मों से जुड़े कई धर्म गुरु करते रहे हैं धर्म के लोगन को उकसाया फिर सियासत में आये र्फिर राज्यसभा या महत्वपूर्ण पदों पर बेठ गए हैं ऐसे धोकेबाज़ धर्मगुरुओं की लम्बी लिस्ट है जिसे देख कर आपको मुझे सभी को शर्म आ जायेगी ....जी हाँ दोस्तों कोई भी आदमी जो मुस्लिम धर्म से जुड़ा होगा जो धर्म गुरु होगा वोह सियासत का खेल खेलने मंच पर जाकर नरेंद्र मोदी को टोपी भेंट नहीं करेगा और अगर किसी मोलाना मोलवी द्वारा ऐसा क्या जाता है तो खुद समझ लेना चाहिए के वोह प्रायोजित है या फिर मक्कार है जो खुद आगे रहकर किसी सियासी मंच पर किसी निजी लाभ कमाने के उद्देश्य से जा रहा है ...मोदी ने इस मक्कार मोलाना की टोपी लेकर खुद को हिट कर लिया लेकिन आए सवाल छोड़ दिया के धर्म के साथ खिलवाड़ कर सियासत करने वाले मोलाना या किसी भी धर्म गुरु के साथ केसा सुलूक किया जाये .यह मोलाना जो सियासत के मंच पर गया निश्चित तोर पर मजहब से दूर और मक्कारी से भरा होगा अगर यह टोपी कांड मोदी का प्रायोजित मीडिया की खबर बनाने के लियें नहीं किया गया है तो इस मोलाना के खिलाफ एक मोदी जो दुसरे धर्म का है उसे टोपी उढ़ाकर साम्प्रदायिक वातावरण पैदा कर मोदी की भावनाएं आहत करने के मामले में जेल भेजना चाहिए और आज नहीं तो कल ऐसे सियासत में घुसपेठ रखने वाले मोलाना और धर्मगुरुओं के साथ बर्ताव करना होगा ताकि देश गंदी राजनीति और धर्म की गंदी राजनीति से पाकसाफ रह सके .......अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

ONLY NEWS: The two-day National Conference on Agriculture for...

ONLY NEWS: The two-day National Conference on Agriculture for...: The two-day National Conference on Agriculture for Rabi Campaign 2011 concluded with a resolve to accord high priority to enhancing producti...

ONLY NEWS: The two-day National Conference on Agriculture for...

Written By mark rai on रविवार, 18 सितंबर 2011 | 11:59 am

ONLY NEWS: The two-day National Conference on Agriculture for...: The two-day National Conference on Agriculture for Rabi Campaign 2011 concluded with a resolve to accord high priority to enhancing producti...

ONLY NEWS: दक्षिण चीन सागर में भारत को न जाने की चीन की चेताव...

Written By mark rai on शनिवार, 17 सितंबर 2011 | 8:37 pm

ONLY NEWS: दक्षिण चीन सागर में भारत को न जाने की चीन की चेताव...: दक्षिण चीन सागर में भारत को न जाने की चीन की चेतावनी को नजरअंदाज करते हुए भारत ने वियतनाम की सेनाओं की ताकत बढ़ाने के लिए कई तरह के सहयोग का...

5 अगस्त 2011

Written By D.P. Mishra on शुक्रवार, 16 सितंबर 2011 | 1:58 pm

क्रिकेट का अर्थ - क्रीड काट - काटने का खेल - गला काट प्रतियोगिता

क्रिकेट का अर्थ - क्रीड काट - काटने का खेल - गला काट प्रतियोगिता

क्रिकेट के खेल का प्रारंभ सैनिकों की आरामगाह से हुआ : -
1. बालीबाल : - जब युद्ध समाप्त होता था तो एक पक्ष के सैनिक दूसरे पक्ष के सैनिकों की कटी हुई लाशों के सिरों के बाल पकड़कर एक-दुसरे के पास फेंकते थे उसी को यह लोग बालीबाल कहते थे | 

2. फुटबाल :- उस सर को जब यह लोग अपने पैर के जूते से फोड़ते थे तो उसके फूटने पर उसे फुटबाल कहते थे | तभी तो आज भी लोग क्रोध में आने पर किसी को कहते हैं की तेरे सर को फूटबाल बनाकर खेलूँगा | 

3. क्रिकेट :- उसी सिर को जब यह सैनिक अपने बदूक के बट से मारते थे तो उस बट का नाम आगे चल कर बैट पड़ गया | और जिस सिर के बाल पकड़ कर सैनिक लोग खेलते थे वह बाल नाम से प्रसिद्ध हो गयी | और जो पैर है वह पैड का परिचायक है पैड यानी पैर | पैर को संस्कृत में पद कहते हैं और पद को अंग्रेजी में पैड पड़ा जाता है | जब कोई बाल को नहीं मार पाता था तो वह विकट स्तिथि में आ जाता था उसको विकिट बोलते हैं | रन यानी रण का परिचायक है, क्यूंकि यह रण यानी युद्ध में मैदान में खेला जाता है |

4. गोटियाँ-कंचे :- जो उनकी ऑंखें होती थी वह भी निकाल कर उनसे गोटियाँ या हम जो कंचे खेलते हैं खेले जाते थे |

5. सरहद :- फिर उनके सिरों से ही तो हद बनाई जाती थी | यानी उनके सिरों को ही तो वह उसके राज्य को जीतकर सीमा में लटका देते थे | सिर हद यानी | 

6. फिर उस कटे हुए सिर को बालों के पकड़ कर उछालते हैं और उस पर तीर या बन्दुक से निशाना लगाते हैं | 

7. गुब्बारे :- फिर उसे दूर लटका देते हैं और फिर उस पर निशाना लगाते हैं | देखा नहीं है मेलों में रंग भरे हुए गुब्बारे पर न��शाना लगाते हैं | अब गुब्बारे प्रयोग में लाते हैं पहले तो कटे हुए सिर ही लटकाए जाते थे | और निशाना लगने पर जैसे गुब्बारे से रंग निकलता है तो उन सिरों में से खून निकलता था | 

इस तरह से यह सैनिकों का खेल क्रिकेट, बालीबाल, फ़ुटबाल है | इसमें अमेरिका का खेल बेसबाल भी शामिल है | यह खेल बहुत ही क्रूर और हिंसात्मक होता है |

क्रीडा यह संस्कृत शब्द है | क्रीडा शब्द का ही अपभ्रंश क्रिकेट है | यानी जब क्रीडा की जाती है, किसी को काटने के लिए तो उसे क्रीड केट कहते हैं | और एक मुहावरा भी है की गला काट प्रितियोगिता है | तो जब गले को काटने की प्रतियो�����िता होती है, तो वही प्रतियोगिता तो क्रीड काट बनती है | और किसी भी मरे हुए सैनिक का गला ही तो काटा जाता है | क्यूंकि राजा कहता है की गला काट कर लाओ और इनाम पाओ |

मेरे ख्याल से तो सारे खेल ही इसी तरह इजाद हुए हैं | क्यूंकि हर खेल में बाल का तो इस्तेमाल होता ही है | बास्केटबाल, रग्बी, होकी, फूटबाल, बोलिबाल, टेनिस, यानी जहाँ पर भी बाल का उपयोग होता है खेल में वह सारे खेल कटे हुए सिर से ही खेले जाते थे | और अगर खेल में हिंसा न हो तो मज़ा नहीं आता है | जब खिलाडी खेलते हैं तो वह किस तरह हिंसात्मक होते हैं और एक-दुसरे के प्रति अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं | वह हम आपको पता नहीं है | वह तो कोई खिलाडी ही बता सकता है | और हर खेल में हमेशा हिंसा ही होती है | गली मोहल्ले और कस्बों और जिलों के स्तर के खेल में तो हिंसा बहुत होती हैं | और यूरोप के फ़ुटबाल खेल की हिंसा तो जग प्रसिद्ध है | क्रिकेट में भी पहले बॉडी लाइन बोल्लिंग का �����लन था जो की हिंसात्मक था | और उसमे ही मज़ा आता था | बिना हिंसा के मज़ा किसको आता है | खेल से प्यार फैलता है की नफरत यह बात समझनी तो पड़ेगी | खेल हमेशा से नफरत फैलाता | खेल में हारने वाला हमेशा अगली बार में कैसे जीतुं इस बारे में ही योजना बनाता रहता है |



अमेरिका में चिकेन इस कदर लोकप्रिय है कि वहां सितंबर महीना नेशनल चिकेन मंथ के रूप में मनाया जाता है

खाने की प्लेट चिकेन के बिना अधूरी होती है


खाने की प्लेट चिकेन के बिना अधूरी होती है। यह बात सुनकर कोई शाकाहारी व्यक्ति भले ही मुंह बिचकाए, पर चिकेन के शौकीन  इसका पुरजोर समर्थन करेंगे।बदलते समय में जब खान-पान की आदतें बदल रही हैं और बाजार में तमाम तरह के व्यंजन उपलब्ध हैं, ऐसे समय में चिकेन से बने व्यंजन लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं। शेफ सुहैल हसन कहते हैं आज चिकेन से बने कई तरह के व्यंजन उपलब्ध हैं। चिकेन पारंपरिक इंडियन करी से लेकर चाइनीज, इटालियन हर तरह के खाने में मिल जाएगा।भारतीय खाने में चिकेन बिरियानी, चिकेन करी, तंदूरी चिकेन जैसे व्यंजन मिल जाएंगे। अफगानी खाने में शोरमा, अफगानी तंदूर और कबाब जैसे लजीज पकवान मिल जाएंगे। इटालियन खाने में चिकेन पिज्जा और चिकेन पास्ता मिल जाएगा, वहीं चाइनीज खाने में चिकेन चाउमीन, चिकेन सूप, चिकेन चॉप्सी, चिली चिकेन, चिकेन मोमो और चिकेन मंचूरियन जैसे स्वादिष्ट और लोकप्रिय व्यंजन मिल जाएंगे। उनके अनुसार, फास्ट फूड के शौकीनों को भी चिकेन बर्गर, चिकेन पैटीस और चिकेन रोल जैसे ढेरों व्यंजन मिल जाते हैं। एक चिकेन से आज हजारों तरह के व्यंजन बनने लगे हैं।चिकेन के एक दीवाने परमानंद मिश्र का कहना है कि खाने में रोज ही चिकेन व्यंजन हो तो क्या बात है। लेकिन जरूरत इस बात की है कि वह अलग-अलग वेराइटी में हो। उनकी पत्नी सौम्या मिश्र ने बताया कि घर हो या बाजार, ननवेजेटेरियन्स की पहली पसंद चिकेन व्यंजन ही होते हैं। साथ ही उन्होंने जोड़ा कि घर आने वाले मेहमान अगर शाकाहारी हों तो बड़ी कोफ्त होती है। समझ में नहीं आता है कि क्या बनाएं और क्या खिलाएं। चिकेन के अन्य आशिक प्रसेनजित राज्यवर्द्धन ने कहा कि रोज के खान-पान का हिस्सा बन चुके चिकेन संस्कृति को बढ़ावा देने में रेस्त्राओं का भी खासा योगदान रहा है। उनकी पत्नी दिव्या ने बताया कि घर से बाहर उनकी पहली पसंद चिकेन से बने व्यंजन ही होते हैं।रेसिपी विशेषज्ञ ममता सिंह कहती हैं चिकेन कलचर आज इस कदर फैला हुआ है कि कुछ लोगों को इसके बिना भोजन अधूरा लगता है। कभी केवल घरों में पकने वाला चिकेन आज रेस्त्रां, कैफे के अलावा गली-मुहल्ले में स्थित रोल, मोमो और चाउमीन के फास्ट फूड के ठेले पर भी मिलने लगा है। वैसे पुरानी दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके के मशहूर करीम रेस्त्रां, न्यू फ्रेंडस कॉलोनी के अल बेक रेस्त्रां में दिन भर खाने के लिए लोगों की भीड़ जमा रहती है।

मैक्डोनाल्ड्स का मशहूर चिकेन बर्गर यहां आने वाले खाने के शौकीनों के सबसे पसंदीदा खाने में से एक है। वहीं केएफसी [केंटचुकी फ्राइड चिकेन] रेस्त्रां तो चिकेन प्रेमियों के लिए खास ही है। यहां चिकेन विंग्स, चिकेन बर्गर और चिकेन लेग्स जैसे चिकेन के ढेरों आइटम मिलते हैं। कनॉट प्लेस स्थित केएफसी आउटलेट मे काम करने वाले अतुल सिंह ने कहा कि इसका स्वाद एक बार चढ़ जाए तो छूटना मुश्किल होता है।चिकेन न केवल अपने देश में, बल्कि बाहर के देशों मे भी काफी लोकप्रिय है। अमेरिका में चिकेन इस कदर लोकप्रिय है कि वहां सितंबर महीना नेशनल चिकेन मंथ के रूप में मनाया जाता है। 15 सितंबर को वहां नेशनल चिकेन लवर्स डे के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन अमेरिका के कई रेस्त्राओं में मुफ्त चिकेन परोसा जाता है। इन्हीं में से एक पोलो ट्रॉपिकल रेस्त्रां चेन में आज के दिन हर साल दोपहर दो बजे से शाम के सात बजे तक पीले कपड़ों में आने वाले लोगों को मुफ्त में चिकेन परोसा जाता है। यानि जी भर के चिकेन खाइए वो भी बिल्कुल मुफ्त और मनाइए चिकेन लवर्स डे।

मोदी के उपवास का खर्च उठाएगी गुजरात सरकार...अब देश में आओ उपवास उपवास खोलें

Written By आपका अख्तर खान अकेला on गुरुवार, 15 सितंबर 2011 | 9:55 pm


हमारे देश में अगर नेता कुछ भी करे तो मिडिया उसका राजनीतिकरण कर उसकी गंभीरता को खत्म कर देता है .आप सभी जानते हैं के देश में सभी राजनितिक दलों ने रोज़े और रोज़े अफ्तार का राजनीतिकरण कर दिया है ..जबकि अब उपवास का पहली बार देश में राजनीतिकरण हुआ है और वोह भी भाजपा के आर एस एस के सिपाही और पूर्व सिपाही ने ऐसा किया है ......दोस्तों आप सभी जानते हैं के मोदी आर एस एस के हैं और गुजरात में कोंग्रेस के जो अध्यक्ष बाघेला हैं है वोह कभी मोदी के साथी भाजपा के सिपाही और आर एस एस के रंग रुट रहे हैं ....अभी हाल ही में एक खबर के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने उपवास की घोषणा की उपवास सार्वजनिक नहीं होता यह तो निजी होता है और उपवास का सम्बन्ध बंदे और खुदा से होता है इसे सार्वजनिक करने की कतई आवश्यकता नहीं होती खेर हमारे मोदी जी है ..अद्च्छे प्रशासक है ..बोलते अच्छा है भाजपा के सिरमोर और प्रधानमन्त्री के दावेदार हैं बस उन्होंने इसे जनता के समक्ष एक पत्र लिख कर सार्वजनिक कर डाला ..अगर मोदी उपवास करना चाहते हैं या उपवास कर भी रहे हैं तो इससे भला किसी को क्यूँ और क्या एतराज़ होना चाहिए लेकिन कोंग्रेस जो ठहरी उसने मोदी के उपवास को भी राजनितिक रंग दे दिया पहले दिल्ली से उपवास की आलोचना हुई और फिर गुजरात में कोंग्रेस के पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बाघेला ने भी उपवास का जवाब उपवास से देने के लियें उपवास रखने की घोषणा कर दी दोस्तों देश में सभी बिन्दुओं पर राजनितिक साजिशें रची गयी हैं और अब जब इस मामले में राजनीति छिचाले दरी होने लगी है तो तोबा करने को जी चाहता है इसलियें कहते है के यह मेरा देश हैं यहाँ आओ उपवास उपवास खेलें ......अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

अहमदाबाद. गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी पर दोहरा वार हुआ है। एक तरफ उनके खिलाफ गुजरात दंगों में भूमिका को लेकर सनसनीखेज आरोप लगाने वाले आईपीएस अफसर संजीव भट्ट ने एक बार फिर उन्‍हें निशाने पर लिया है, तो दूसरी ओर कांग्रेस ने भी मोदी के उपवास का जवाब उन्‍हीं के अंदाज में देने का ऐलान किया है।

गुजरात कांग्रेस अध्यक्ष अर्जुन मोडवाडिया ने आज कहा कि मोदी का उपवास नकली सद्भभावना है। उन्‍होंने कहा, '१० सालों में कहां थी मोदी की यह सद्भावना? उन्‍हें गरीबों और बेरोजगारों से सद्भावना क्यों नहीं है? मोदी खुद से गुजरात को न जोड़ें।' कांग्रेस ने अपने उपवास को उपवास यज्ञ का नाम दिया है और कहा है कि यह कांग्रेस का नहीं बल्कि आम जनता का उपवास होगा।
मोदी पर सद्भावना का नाटक करने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस नेता ने कहा कि मोदी और सद्भावना अलग-अलग चीजें हैं। उन्‍होंने सवालिया लहजे में कहा, 'पांड्या के मर्डर के बाद मोदी, आडवाणी उनके घर क्‍यों नहीं गए थे।'
भट्ट ने मोदी को खुला पत्र लिखते हुए कहा है कि सीएम और उनकी पार्टी बीजेपी ने हाल में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मामले में ‘पूरी तरह अर्थ का अनर्थ किया है।’ भट्ट ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला किसी भी सूरत में नरेन्द्र मोदी को क्लीन चिट नहीं देता और किसी मायने में यह नहीं कहता कि उनके खिलाफ जाकिया जाफरी की शिकायत 'गैर-तथ्यात्मक' है। संजीव भट्ट ने लिखा है, 'बीजेपी या उसके नेता नरेंद्र मोदी के प्रचार के विपरीत यह फैसला गुजरात दंगों के पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में एक बेहद महत्वपूर्ण कदम है।'

बीते अप्रैल में संजीव भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर कहा था कि 27 फरवरी 2002 को वह एक बैठक में शामिल थे जिसमें सीएम मोदी ने वहां मौजूद पुलिस अफसरों से कहा था कि वो दंगाइयों को नजरअंदाज करें और दंगों का शिकार हो रहे लोगों की शिकायतों को भी नजरअंदाज करे।

उधर, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शनिवार से तीन दिनों का उपवास करने की घोषणा के बाद कांग्रेस नेता शंकरसिंह वाघेला ने भी साबरमती आश्रम में उसी दिन से तीन दिनों का उपवास रखने का ऐलान कर दिया है। वाघेला ने कहा कि मोदी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का गलत मतलब निकाल रहे हैं और खुद को बेदाग साबित करने की कोशिश में हैं। उन्‍होंने कहा, 'मोदी इतने बेदाग हैं तो वे राज्‍य में लोकायुक्‍त का विरोध क्‍यों कर रहे हैं।'

सरकार उठाएगी उपवास का खर्च

मोदी ने घोषणा की थी कि वह अपने 61वें जन्मदिवस (17 सितंबर) पर 'शांति, एकता एवं सामाजिक सद्भाव' के लिए तीन दिनों का उपवास करेंगे। इसके लिए तैयारियां जोरों पर हैं गुजरात सरकार मोदी के उपवास का भुगतान करेगी। सभी खर्च चेक भुगतान के जरिये किए जाएंगे।

मोदी के उपवास के जवाब में संजीव भट्ट ने लिखा है, 'छह करोड़ गुजरातियों में से मैं भी एक हूं और मैं तब खुद को बेहद ठगा हुआ महसूस करता हूं जब आप जैसे लोग अपने निहित स्वार्थों के लिए गुजरात के लोगों को बहकाने का काम करते हैं।'

मोदी पर पलट वार करते हुए संजीव भट्ट ने कहा है कि सद्भावना, सच्चाई और न्याय के बिना अधूरी है और इसे कोई मांग या खरीद नहीं सकता। उन्‍होंने कहा कि इस बाबत लोगों का विश्वास जीतना अब मोदी के लिए मुश्किलों से भरा है। भट्ट ने कहा कि जिस फैसले पर मोदी और उनके साथ जुड़े लोग बेहद खुश हैं वह फैसला असल में असल में बेहद चालाकी के साथ दंगों के लिए जिम्‍मेदार लोगों को उनके अंजाम तक पहुंचाने में अहम भूमिका अदा करेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2002 के गुजरात दंगे मामले में जाकिया जाफरी की ओर से दायर याचिका पर मोदी को राहत दी है। न्यायालय के इस फैसले के एक दिन बाद मुख्यमंत्री ने यह घोषणा की है। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले में निर्णय निचली अदालत करेगी।

अनिवार्य हिन्दी कापी और कवि कौ जनमु दिन.......कविता ..डा श्याम गुप्त ....

Written By shyam gupta on बुधवार, 14 सितंबर 2011 | 10:28 pm


अनिवार्य हिन्दी कापी और कवि कौ जनमु दिन.....    
        ( ब्रज भाषा )
कवि गोरखाधंधा जी के 
जनमु दिना पे आयोजित गोष्ठी में ,
कविवर  पांडे जी नै -
बडी सकुचाहट ते याद दिलायौ ;
  अबहि छै महीना पहलै ही तौ ,
आपने आपुनि जनम दिना हतो  मनायौ |
कवि जी सकपकाय गए , हडबड़ाये , फिरि-
मुसुकावत भये बोले-
पर भैया !, कवि तौ -
अखिल भारतीय कहिलाबै है ;
वाकौ तौ केन्द्र सरकार की नीतिन ते ही,
नातौ होबै है , और -
केन्द्रीय भाषा नीति तौ ,
द्विभाषी है ;
वा जनमु दिना तौ -
असल अंगरेजी आलेख हतो ,
ये तौ वाकी -
अनिवार्य हिन्दी कापी है ||
 

कहते है हिन्दूस्तानी है हम....

कहते है हिन्दूस्तानी है हम,
पर जुबान पे अंग्रेजों की भाषा बसती है,
देख के अपनी विलायती तेवर,
हिन्दी हम पर यूँ हँसती है।
क्या बचपन में पहला अक्षर,
माँ कहने में शर्माया था,
रोता था जब जब तू प्यारे,
लोरी ने चैन दिलाया था।

अब बढ़ी बुद्धि,अब बढ़ा ज्ञान,
हिन्दी को क्यों बदनाम किया,
जिसके साये में पल पल कर,
हम सब ने जग में नाम किया।

मीठी भाषा,प्यारी भाषा,
हिन्दी को बस आत्मसात करो,
अंग्रेजी भाषा है अपनी गुलामी,
उस भाषा में मत बात करो........।

"साहित्य प्रेमी संघ" की ओर से आप सभी हिन्दी प्रेमीयों को हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.....
www.sahityapremisangh.com

अंजलि ने आत्महत्या कर ली , क्यों ?


लिव इन रिलेशनशिप  को लेकर यूरोप में कैसी भी दीवानगी देखने में आ रही हो, लेकिन भारतीय संस्कृति में यह अभी तक पूरी तरह से घूल-मिल नहीं पाई है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि भारतीय समाज पारिवारिक बंधनों में बहुत भरोसा करता है। ऐसे में दो युवाओं द्वारा अगर लिव इन रिलेशनशिप  जैसा कदम उठाया भी जाता है, तो भी पारिवारिक बंधनों के चलते ऐसे रिश्ते  कामयाब नहीं हो पाते हैं। ऐसा ही एक वाकिया हाल ही में टीवी और समाचार चैनलों पर सुर्खियों में बना हुआ है। यह मामला है एयरफोर्स की बर्खास्त पूर्व फ्लाइंग ऑफिसर अंजलि गुप्ता का, जिनके सूइसाइड के मामले में उनके प्रेमी ग्रुप कैप्टन अमित गुप्ता पर पुलिस का शिकंजा कसता जा रहा है। पुलिस का कहना है कि लिव-इन रिलेशनशिप में धोखा मिलने की वजह से अंजलि ने सूइसाइड किया है। अंजलि के परिवार वालों के मुताबिक, अंजलि और अमित पिछले सात सालों लिव-इन रिलेशनशिप में थे। उनका कहना है कि अमित ने अपनी पहली पत्नी से तलाक के बाद अंजलि से विवाह करने का वादा किया था, लेकिन अब वह इससे मुकर रहा था। अंजलि भी पिछले एक साल से भोपाल में ही रह रही थी। अंजलि की मां ने आरोप लगाया है कि अमित ने ही अंजलि को अपने सीनियरों के खिलाफ शारीरिक उत्पीड़न करने का आरोप लगाने के लिए उकसाया था। और, अंजलि ने 3 सीनियर अधिकारियों के खिलाफ एयरफोर्स के अधिकारियों से शिकायत की थी। इसके बाद उसका कोर्ट मार्शल कर दिया गया था। उसके बाद से अंजिली और अमित साथ रह रहे थे। अमित का पत्नी से तलाक होने वाला था। 
जाहिर है, लिव इन रिलेशनशिप  के चक्कर में अपनी जिंदगी को बर्बाद कर लेने वाली अंजलि गुप्ता इस रिष्ते की जटिलताओं का ही शिकार हुई है। अंजलि गुप्ता का कॅरिअर अच्छा चल रहा था, लेकिन अपने प्रेमी अमित के चक्कर में उन्होंने अपने सीनियर अधिकारियों के उपर झूठे इल्जाम लगाए। इसका नतीजा ये निकला कि उनका कॅरिअर पूरी तरह चैपट हो गया, उनके खिलाफ कोर्ट मार्शल भी हुआ। हालांकि इसके बाद भी अंजलि संभल गई थी और वो एक खुशहाल जिंदगी जी सकती थी, अगर अमित लिव इन रिलेशनशिप  के रिष्ते को पूरी ईमानदारी के साथ निभाता और उसका साथ देता। लेकिन अमित ने सिर्फ अंजलि का इस्तेमाल किया और जैसा कि अंजलि की मां के बयानों से लगता है कि उसने बरसों तक अंजलि का यौन शोषण करने के बाद भी अपनी पहली पत्नी को छोड़कर उससे शादी करने का इरादा नहीं जताया। इसी के चलते अब अंजलि आत्महत्या पर मजबूर हुई है।
Source :
http://khabarindiya.com/index.php/articles/show/3279_desh_dunia?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+khabarindiya+%28KhabarIndiya.Com%२९
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सीनियर अधिकारियों ने अंजलि के साथ क्या किया ?
इसे केवल अंजलि और उसके अधिकारी ही जानते हैं।
नौकरी और रूपये को औरत की मज़बूती के लिए आज ज़रूरी माना जाता है लेकिन यह सब होने के बावजूद भी अंजलि ने आत्महत्या कर ली , क्यों ?
केवल एक सही सोच और एक सही तरीक़े के अभाव में।

लिव इन रिलेशनशिप भी इसी अभाव की कोख से जन्मा है और समय के साथ साथ और बहुत से मसले सामने आते चले जाएंगे।
अंजलि उनमें से एक बानगी भर है।
क्या नौकरी करने के बावजूद भी औरत को सुरक्षा और सम्मान नहीं मिल पाता ?

चंद्रमुखी चौटाला का भी है एक फ़साना


तेरे लट्ठ पन ने तुझे एक मुकाम दिला दिया |
तुझे सारे ज़माने में इस कदर चमका दिया |
तेरी अक्ल की दाद देता है यह जमाना | 
चंद्रमुखी चौटाला का भी है एक फ़साना || १ ||
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इतनी सफाई से केश को सोल्व करती हो |
की किसी को भी भनक नहीं लगने देती हो |
रुसवा नहीं होता कोई, ऐसा इन्साफ दिलाती हो |
अंदाज़ तुम्हारा निराला है, सबसे बड़े सलीके से पेश आती हो ||२ ||
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इस तरह तू मुझे न देख, मुझे तुझसे लगता है डर |
बात सिर्फ इतनी सी नहीं है, दिल का तो तू है समंदर |
पर तेरी आवाज़ और तेरे अंदाज़ से मुझे लगता है डर |
इज़हार तो करना चाहता हूँ, अपने दिल का मन्ज़र || ३ ||
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गुरुरे हुस्न, मैं तुझे ताकीद न कर पाया |

देखता रहा तुझे, तस्लीम न कर पाया |
खता माफ़ हो, या सजा दे दो |
पर नज़र न हटे तुझसे, ऐसी जगह दे दो || ४ ||
.

वाह वाह ! ताबे हयात लग रही हो |

इस लिबास में भी, नूर-ए-हयात लग रही हो || ५ ||

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जी हाँ ..में हिंदी यानी भारत माता की राष्ट्र भाषा हूँ ..


जी हाँ ..में हिंदी यानी भारत माता की राष्ट्र भाषा हूँ .....में संविधान की अनुसूची में शामिल हूँ .मुझे बोलना ..मुझे लिखना .मेरे साहित्य का प्रकाशन करना ..मेरे शब्दों में देश के सभी कानून कायदे प्रकाशित करना देश की सरकार की संवेधानिक ज़िम्मेदारी है .....आज़ादी से आज तक मुझे देश भर में लागू करवाने के लियें अरबों नहीं अरबों नहीं खरबों रूपये खर्च किये जा चुके हैं ...............लेकिन अफ़सोस में सिर्फ और सिर्फ सितम्बर महीने की १४ तारीख की एक यादगार बन गयी हूँ .मेरी भाषा में चलने वाले स्कूलों को सभी शिक्षाबोर्ड खासकर केन्द्रीय शिक्षा बोर्ड में उपेक्षित रखा गया है . विदेशी भाषा में गिटपिट करने वाले लोगों के बीच में अगर में फंस जाऊं तो मेरा ही नाम लेकर मेरी खिल्ली उडाई जाती है लोगों का उपहास और मजाक उढ़ाने पर मेरा नाम लेकर कहावत बनाई गयी है ..दोस्तों आपको तो सब पता है आप से क्या छुपाऊं जब किसी का मजाक उढ़ाया जाता है तो साफ तोर पर कहा जाता है के इसकी हिंदी हो गयी है .मेरे दुःख दर्द को न तो मेरे प्रधानमन्त्री ने समझा ना मेरे देश के राष्ट्रपति ने और नहीं सांसद विधायक मेरी तकलीफ समझ पाए हैं जनता का क्या कहें महाराष्ट्र में मुझे उपेक्षित किया है दक्षिण में अगर मुझे बोला जाये तो कोई बात नहीं करता बेल्लारी में अगर मुझे लागू करने की बात की जाए तो दंगे फसादात किये जाकर कत्ले आम हो जाते हैं .संविधान के रक्षकों की सांसदों वकीलों और जजों की बात करें तो वहां तो मेरा कोई वुजूद ही नहीं है ....मेरे देश मेरे भारत महान में सवा करोड़ लोग हैं और यकीन मानिये तीस करोड़ भी मुझे ठीक से बोलने और लिखने का दावा नहीं कर सकते हैं मेरा इस्तेमाल अगर केवल तीस करोड़ लोग करते हैं तो फिर में केसी राष्ट्रिय भाषा मेने देखा अल्पसंख्यक कल्याण के नाम पर देश में कथित योजनायें बनाकर अल्पसंख्यकों का जेसे शोषण हो रहा है धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का देश में जेसे ढिंढोरा पीट कर मनमानी की जा रही है गरीबी उन्मूलन का नारा देकर गरीबों पर जो अत्याचार क्या जा रहा है बस उसी तरह से देश में मेरे नाम पर राजनीति की जा रही है .अफ़सोस तो मुझे इस बात पर है के संसद में ५४४ सांसद और २७२ राज्यसभा सदस्यों में से गिनती के लोग हैं जो मुझे समझते हैं .सांसद में भाषण होता है तो अंग्रेजी में मशीने कन्वर्टर लगी हैं आम आदमी से हिंदी इस्तेमाल की बात की जाती है विधान में सातवीं अनुसूची की भाषा बना कर मेरा उपयोग आवश्यक किया जाता है लेकिन सांसद में न तो मेरी भाषा में शपथ ली जाती है और ना ही लिखा पढ़ी बात चीत की जाती है ..जितने भी लोग मेरे प्रचारक हैं सभी के बच्चे पैदा होते ही विदेशी भाषा अंग्रेजी के स्कूलों में पढने जाते हैं मेरी भाषा में चल रहे स्कुल बंद हों इसके लियें देश के सभी कोर्स की किताबें मेरी भाषा में छपवाना बंद कर दी गयीं है चाहे डॉक्टरी हो चाहे इंजीनियरिंग चाहे वैज्ञानिक हो चाहे कानून की पढाई..चाहे प्रबंधन की पढाई हो सभी तो विदेशी भाषा अंग्रेजी और अंग्रेजी में है फिर मुझे कोन और क्यूँ पसंद करेगा जब मुझे सांसद में बोलने के लियें पाबन्द नहीं किया जाता ..जब मुझे अदालतों में बोलने और लिखने के लियें पाबन्द नहीं किया जाता जब मुझे आधे से भी कम राज्यों और जिलों में बोला जाता है जब मेरे वित्तमंत्री ..कानून मंत्री ..मेरे देश को चलाने वाली सोनिया गाँधी मुझे नहीं समझती मुझे नहीं जानतीं मेरे देश के कोंग्रेस भाजपा या दुसरे कोई भी दल हो उनकी कार्यालय भाषा विदेशी अंग्रेजी है तो भाइयो क्यूँ मुझे हर साल यह दिवस बनाकर अपमानित करते हो या यूँ कहिये के कियूं मेरी हिंदी की और हिंदी करते हो ......अगर तुम्हे मुझसे प्यार हिया ....मुझे तुम इमानदारी से देश में लागू करना चाहते हो तो सबसे पहले देश में एक कानून हो जिसमें किसी भी चुनाव लड़ने वाले के लियें हिंदी जानना आवश्यक रखा जाए सभी प्रकार के चुनाव चाहे वोह लोकसभा हों .चाहे राज्यसभा ..चाहे विधानसभा चाहे पंच सरपंच चाहे पालिका चाहे कोलेज स्कूलों के चुनाव हों सभी के आवेदन पत्र हिंदी में हों और प्रत्याक्षी के द्वारा स्वयंम भरकर देना आवश्यक किया जाए सांसद और राज्यसभा .विधानसभाओं की भाषा केवल हिंदी हो और सुप्रीम कोर्ट से लेकर निचली अदालतों की भाषा हिंदी की हो ....देश में केंद्र और राज्य सरकार से सम्बंधित विभागों में हिंदी का ही चलन हो और सभी कर्मचारियों अधिकारीयों के लियें पाबंदी हो के वोह हिंदी के जानकर होंगे सभी प्रतियोगी परीक्षाएं हिंदी भाषा में ही ली जाएँ तब कहीं में थोड़ी बहुत जी सकूंगी वरना मुझे सिसका सिसका कर राजनीती का शिकार न बनाओ यारों ॥ मेरे देश के नोजवानों .मेरे देश के नेताओं ..मेरे देश के अन्ना ..मेरे देश के अन्ना समर्थकों ...मेरे देश के कथित राष्ट्रवादी लोगों .पार्टियों क्या तुम ऐसा कर सकोगे नहीं ना इसिलियिएन में कहती हूँ के मुझे बख्शो मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो मेरे नाम पर हर साल करोड़ों रूपये बर्बाद कर गरीबों का गला मत काटो .......या तो मुझे इमादारी से लागू करो वरना दोहरा चरित्र निभाने वालों तुम चुल्लू भर पानी में ड़ूब मरो ....जय हिंदी .......जय भारत .......हम हिंदी है हिंदुस्तान हमारा क्योंकि सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा और सारे जहां से चोर बेईमान दगाबाज़ नेता हमारा .....अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

ये मदिरालय

Written By नीरज द्विवेदी on मंगलवार, 13 सितंबर 2011 | 6:30 pm


थोड़े गम जो सह नही पाते हैं,
बस मय में ही डूबे जाते हैं।
पीकर खुद को बादशाह समझ,
मदिरालय में झुकने जाते हैं।

मदिरामय होकर, स्वप्नों में,
सच्चे दुःख दर्द, भुलाये जाते हैं।
मृतप्राय पड़े इस जीवन के,
सत्यासत्य बखाने जाते हैं। 

दो चार ग़मों के ही खातिर,
ये मदिरालय जाया करते हैं।
स्वाभिमान गिरवी रख कर,
मय की ठोकर खाया करते हैं।

ये तो अपने कर्मों का ही,
बोझ नहीं ढ़ो पाते हैं।
ये तुच्छ और असहाय जीव,
दार्शनिक बनाये जाते हैं। 

हम प्रश्न नहीं उठाते दुःख पर,
जीवन के पहलू होते हैं।
पर इनसे लड़ने की ताकत,
मदिरा से कायर ही लेते हैं।

हम निपट अकेले हैं फिर भी,
साथ न इसका लेते हैं।
हम अपने जख्मों का दर्द,
हँस, स्वयं गर्व से पीते हैं।


लोकपाल ही भारत के बादशाह बनेंगे ?????

Written By Brahmachari Prahladanand on सोमवार, 12 सितंबर 2011 | 9:20 am

चाँद से चांदनी गिरी,
पनाह कहीं न मिली,
समाँ गयी धरती में,
फिर खोद-खोद मिली,

भारत जिसे स्वतन्त्रता नहीं,

परतंत्रता ही अच्छी लगती है,
तब किस-किस के दास बने,
अब लोकपाल से आस लगे,

फरियाद यह करना जानती है,

खुद से कुछ न करना चाहती है,
किसी बादशाह की गुलाम थी,
फरियाद उसी से होती थी,

अब आगे के वक्त में, शिकायत लोकपाल से करेगी,

लोकपाल ही बादशाह बनेंगे, ये फिर गुलामी करेगी,

न रहना आता इसे आज़ादी से,

बस रहना आता फरियादी से,
रहकर गुलाम कई सदियों से,
सांस लेना न आता खुली हवा से,

अब क्या आगे की बात कहूँ,

दिखता है नज़ारा, बात साफ़ कहूँ,
सोने की अब आदत सी हो गयी है,
जबसे रियाया भी शाह हो गयी है,

काम कौन करे, जब सब राजा हो गए,

गुलाम कौन बने, जब सब बादशाह हो गए,
गर पेट की मजबूरी न होती,
सारी रियाया फिर मज़े से सोती,

हैं सब राजा यहाँ लोकतंत्र में,

करते राजनीति लोकतंत्र में,
फिर से गुलाम होना चाहते हैं,
लोकपाल किसी को बनाना चाहते हैं,


                                          ------- बेतखल्लुस


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अंदाज ए मेरा: अध्‍ययन यात्रा बनाम दारू पार्टी.... !!!!!

Written By Atul Shrivastava on रविवार, 11 सितंबर 2011 | 6:53 pm

अंदाज ए मेरा: अध्‍ययन यात्रा बनाम दारू पार्टी.... !!!!!: दारू जो कराए कम है ! और दारू की लत.... पूछो मत ! ! लोग अपना मान सम्‍मान और बाकी सब भूलकर दारू के लिए सब कुछ करने तैयार हो जाते हैं ! ! ...

God Created Man

ये मायावी आँकड़े

Written By बेनामी on शनिवार, 10 सितंबर 2011 | 1:21 pm

बहुत दिनों से थोक में आँकड़े आ रहे हैं। फलाना इतने अरब खा गया, ढिकाना इतने करोड़ दबा गया, अमके ने इतने लाख की रिश्वत ले ली, ढिमके के डबल बैड में इतने करोड़ नगद और उतने करोड़ के जे़वर निकले। हाल ही में प्रधानमंत्री समेत तमाम केन्द्रीय मंत्रियों ने गाजे-बाजे के साथ अपनी सम्पत्ति की घोषणा की, छोटे-बड़े कई आँकड़े अखबारों में मुख्य पृष्ठ पर प्रकट हुए। पढ़े-लिखे लोग पढ़-पढ़कर चमत्कृत हो रहे हैं और अपनी तुच्छ सम्पत्ति से उन मायावी आँकड़ों की तुलना कर, सिर पटक-पटक कर अफसोस कर रहे हैं- हाय, हम क्यों न समय रहते राजनीति में घुस पड़े! कुछेक लाख हम भी छाप लेते, कुछ गाड़ियाँ-बंगले हमें भी नसीब हो जाते।

जिन्होंने ठीक से स्कूल-कॉलेज का मुँह देखा है, उन्होंने तो आँकड़ों को सही-सही पढ़ लिया और उनके आयतन को आत्मसात भी कर लिया, मगर एक सौ इक्कीस करोड़ में से, देश की अधिकांश पढ़ने-लिखने से पूरी तौर पर बरी आम जनता इन आँकड़ों की माया से एकदम अप्रभावित है। उसका सौभाग्य है कि ये लम्बे-लम्बे, चौड़े-चौड़े आँकड़े पढ़कर उन्हें अपनी छाती नहीं कूटना पड़ रही है। कारण उन्‍हें अखबार पढ़ना ही नहीं आता। कहीं से अगर इन आँकड़ों की खबर लग भी गई तो उनके लिये समझना नामुमकिन है कि इतना धन वास्तव में कितना धन होता है। वे अपनी बीस रुपये औसत रोज़न्दारी से खुश है, उनके दिमाग को कोई फालतू टेन्शन नहीं है।

देश के कर्णधारों ने अधिकांश जनता को इसी दिन के लिये तो अनपढ़-गँवार बनाए रखा है, ताकि जब नेताओं की पोलों के समाचार अखबारों में छपें, टीवी पर सनसनी फैलाएँ तो बेचारी को उन्हें पढ़ने-समझने की ज़हमत न उठाना पडे़ और न ही गुस्से और आक्रोश की अगांधीवादी भावना से दो-चार होना पड़े। लोग यदि अपनी रोटी-रोज़ी की जुगाड़ की चिन्ता छोड़कर इस आँकड़ेबाज़ी की चिन्ता करने लगें तो देश का विकास कितना प्रभावित होगा!

इसमें विरोधी ताकतों की मुश्किलें बढ़ाने की सियासी चाल भी है। जाओ बेटा घर-घर और समझाओ गँवार जनता को कि हमने कितना माल दबाया है। जनता तुम्हारे दुष्प्रचार को समझे इस लायक उसे छोड़ा ही नहीं गया है, कर लो बेटा क्या करते हो।


साभार - http://vyangya।blog।co।in/ लेखक - प्रमोद ताम्बट

अगजल--- दिलबाग विर्क


http://sahityasurbhi.blogspot.com/2011/08/24.html

                                        * * * * *

तुम दोनों ....



कितना मुश्किल है
ये हर  वक्त का बहना 
रुकना चाहूँ भी 
तो कैसे रुकूँ ......
तुम दोनों भी तो 
चल रहे  हो 
साथ मेरे 
लेकिन -
अलग अलग छोरों पर .....
जो कभी  मिलोगे 
तुम दोनों 
तभी तो रुक पाऊँगी
अन्यथा यूँही
अनवरत बहना होगा ......
कभी देखती हूँ
उस क्षितिज पर
जहाँ तुम दोनों
दिखते हो मिलते हुए
लेकिन तब
मै नहीं आती
नजर -
ख़त्म हो जाता है
मेरा अस्तित्व ....
पतली सी खिची रेखा
जो तुम दोनों में
ही समा जाती है ........
शायद -
अभी वक्त नहीं है
मेरे लीन होने का
वजूद के समर्पण का .....
तभी तुम दोनों
साथ साथ होकर भी
बहुत दूर हो .....................




प्रियंका राठौर

न यूँ इतिहास का हास करो

Written By Brahmachari Prahladanand on शुक्रवार, 9 सितंबर 2011 | 5:17 pm



न यूँ इतिहास का हास करो, न यूँ किसी का पर्दाफास करो,
इत के इह में ही तो आस है, तभी तो जिन्दगी खास है,

खास-ओ-खास जिन्दगी का, इतिहास लिखा जाता है,
आम-ओ-आम तो उसमें यूँ, जगह भी न बना पाता है,
उनकी खास जिन्दगी की, कुछ हमें भी आस होती है,
देखते सपने, कास ऐसी जिन्दगी हमारे पास होती है,

तभी तो इतिहास की कक्षा में, नींद है खास होती,
उनके जिन्दगी के सफ़र का सफरनामा है होती,
खोजो अपनी जिन्दगी में, क्या हमारा इतिहास होगा,
कोई हमारी जिन्दगी का पर्दाफास करनेवाला होगा,

जब हम खास होंगे, नज़र में सबके लिए आस होंगे,
कोई इतिहास लिखेगा, किसी के लिए बकवास होंगे,
कोई हमारे इतिहास पे हास करेगा, कई यूँ रोते होंगे,
कई हमसे प्रेरणा लेंगे, कई वक्त-वे-वक्त भूल गए होंगे,

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तारीखें बन गयी कुछ तारीखें, वक्त के बीतते-बीतते,
याद कोई जब इनको करेगा,वक्त के बीतते-बीतते,
सोचेगा, कौन थे वो, जो इस तरह जिए जिन्दगी को,
जिनकी तारीख सबक बन गई, सबकी जिन्दगी को,


                                                         ------- बेतखल्लुस


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विवादों से घिरते जा रहे हैं स्वामी अग्निवेश


हाल ही अन्ना हजारे की टीम से अलग हुए स्वामी अग्निवेश एक बार फिर विवादों से घिरने लगे हैं। वस्तुस्थिति तो ये है कि उनकी विश्वसनीयता ही संदिग्ध हो गई है। अन्ना की टीम में रहने के दौरान भी कुछ लोग उनके बारे में अलग ही राय रखते थे। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर उनके बारे में अंटशंट टिप्पणियां आती रहती थीं, लेकिन जैसे ही वे अन्ना से अलग हुए हैं, उनके बारे में उनके बारे में सारी मर्यादाएं ताक पर रख कर टीका-टिप्पणियां होने लगी हैं। हालत ये है कि आजीवन सामाजिक क्षेत्र में काम करने का संकल्प लेने वाले अग्निवेश को अब कांगे्रस का एजेंट बन कर सियासी दावपेंच चलाने में मशगूल बताया जा रहा है।
असल में स्वामी अग्निवेश मूलत: अन्ना हजारे की टीम में शामिल नहीं थे। वैसे भी उनका अपना अलग व्यक्तित्व रहा है, इस कारण अन्ना हजारे के आभामंडल को पूरी तरह से स्वीकार किए जाने की कोई संभावना नहीं थी। कम से कम अरविंद केजरीवाल व किरण बेदी की तरह अन्ना हजारे का हर आदेश मानने को तत्पर रहने की तो उनसे उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी। सामाजिक क्षेत्र में पहले से सक्रिय स्वामी अन्ना से जुड़े ही एक मध्यस्थ के रूप में थे। वे उनकी टीम का हिस्सा थे भी नहीं, मगर ऐसा मान लिया गया था कि वे उनकी टीम में शामिल हो गए हैं। और यही वजह रही कि उनसे भी वैसी ही उम्मीद की जा रही थी, जैसी कि केजरीवाल व किरण से की जा सकती है।
जहां तक मध्यस्थता का सवाल है, उसमें कोई बुराई नहीं है। मध्यस्थ का अर्थ ही ये है कि जो दो पक्षों में बीच-बचाव करे और वह दोनों ही पक्षों में विश्वनीय हो। तभी तो दोनों पक्ष उसके माध्यम से बात करने को राजी होते हैं। मगर समस्या तब उत्पन्न हुई, जब इस बात की जानकारी हुई कि वे पूरी तरह से कांग्रेस का साथ देते हुए मध्यस्थता कर रहे हैं तो अन्ना व उनकी टीम को ऐतराज होना स्वाभाविक था। जैसा कि आरोप है, वे तो अन्ना की टीम को ही निपटाने में जुट गए थे। जाहिर तौर पर उनकी यह हरकत अन्ना टीम सहित उनके सभी समर्थकों को नागवार गुजरी। बुद्धिजीवियों में मतभेद होना स्वाभाविक है, मगर यदि मनभेद की स्थिति आ जाए तो संबंध विच्छेद की नौबत ही आती है। कदाचित कुछ मुद्दों पर स्वामी अन्ना से सहमत न हों, मगर उन्हीं मुद्दों को लेकर अन्ना के खिलाफ काम करना कत्तई जायज नहीं ठहराया जा सकता। संतोष हेगड़े को ही लीजिए। उनके भी कुछ मतभेद थे, मगर उन्होंने पहले ही स्पष्ट कर दिया था। उनको लेकर कोई राजनीति नहीं कर रहे थे।
जैसी कि जानकारी है, अन्ना टीम को पता तो पहले ही लग गया था कि स्वामी क्या कारस्तानी कर रहे हैं, मगर आंदोलन के सिरे तक पहुंचने से पहले वह चुप रहने में ही भलाई समझ रही थी। जानती थी कि अगर मतभेद और विवाद पहले ही उभर आए तो परेशानी ज्यादा बढ़ जाएगी। और यही वजह रही कि जब अन्ना का आंदोलन एक मुकाम पर पहुंच गया और उसकी सफलता का जश्न मनाया जा रहा था तो दूसरी ओर इस बात की समीक्षा की जा रही थी कि कौन लंका ढ़हाने के लिए विभीषण की भूमिका अदा कर रहा है। उसमें सबसे पहले नाम आया स्वामी अग्निवेश का। इसी सिलसिले में उनका का एक कथित वीडियो यूट्यूब पर डाल दिया गया। जिससे यह साबित हो रहा था कि वे थे तो टीम अन्ना में, मगर कांग्रेस का एजेंट बन कर काम कर रहे थे। वीडियो में उन्हें कथित रूप से हजारे पक्ष को पागल हाथी की संज्ञा देते हुए दिखाया गया है। वीडियो में वह कपिल जी से यह भी कह रहे हैं कि सरकार को सख्ती दिखानी चाहिए ताकि कोई संसद पर दबाव नहीं बना सके।
जहां तक वीडियो की विषय वस्तु का प्रश्न है, स्वयं अग्निवेश भी स्वीकार कर रहे हैं कि वह गलत नहीं है, मगर उनकी सफाई है कि इस वीडियो में वे जिस कपिल से बात कर रहे हैं, वे केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल नहीं हैं, बल्कि हरिद्वार के प्रसिद्ध कपिल मुनि महाराज हैं। बस यहीं उनका झूठ सामने आ गया। मौजूदा इंस्टंट जर्नलिज्म के दौर में मीडिया कर्मी कपिल मुनि महाराज तक पहुंच गए। उन्होंने साफ कह दिया कि उन्होंने पिछले एक वर्ष से अग्निवेश से बात ही नहीं की। साथ ये भी बताया कि हरिद्वार में उनके अतिरिक्त कोई कपिल मुनि महाराज नहीं है। यानि कि यह स्पष्ट है कि स्वामी सरासर झूठ बोल रहे हैं। जाहिर तौर पर इस प्रकार की हरकत को धोखाधड़ी ही कहा जाएगा।
जहां तक अग्निवेश का अन्ना टीम छोडऩे का सवाल है, ऐसा वीडियो आने के बाद ऐसा होना ही था, मगर स्वयं अग्निवेश का कहना है कि वे केजरीवाल की शैली से नाइत्तफाकी रखते थे, इस कारण बाहर आना ही बेहतर समझा। इस बात में तनिक सच्चाई भी लगती है, क्यों कि अन्ना की टीम में दूसरे नंबर के लैफ्टिनेंट वे ही हैं। कुछ लोग तो यहां तक भी कहते हैं कि अन्ना की चाबी भी केजरवाल ही हैं। बहरहाल, दूसरी ओर केजरीवाल का कहना है कि स्वामी इस कारण नाराज हो कर चले गए क्योंकि आखिरी दौर की बातचीत में अन्ना की ओर से उन्हें प्रतिनिधिमंडल में शामिल नहीं किया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि अन्ना को उनके बारे में पुख्ता जानकारी मिल चुकी थी, इसी कारण उनसे थोड़ी दूरी बनाने का प्रयास किया गया होगा।
यहां यह उल्लेखनीय है कि हजारे पहली बार अनशन पर बैठे तो स्वामी ही मध्यस्थ के रूप में आगे आए थे, मगर उनकी भूमिका पर संदेह होने के कारण ही उन्हें लोकपाल विधेयक का ड्राफ्ट बना कर सरकार से बात करने वाली टीम में शामिल नहीं किया गया, जब कि स्वामी ने बहुत कोशिश की कि उन्हें जरूर शामिल किया जाए। बस तभी से स्वामी समझ गए कि अब उनकी दाल नहीं गलने वाली है। इसी कारण जब हजारे ने 16 अगस्त से अनशन पर बैठने का फैसला किया तो अग्निवेश ने आलोचना की थी। अनशन शुरू होने से लेकर तिहाड़ जेल से बाहर आने तक स्वामी गायब रहे, मगर फिर नजदीक आने की कोशिश की तो अन्ना की टीम ने उनसे किनारा शुरू कर दिया।
खैर, यह पहला मौका नहीं कि उनकी ऐसी जलालत झेलनी पड़ी हो। इससे पूर्व आर्य समाज, जो कि उनके व्यक्तित्व का आधार रहा है, उस तक ने उनसे दूरी बना ली थी। ताजा मामले में भी आर्य समाज के प्रतिनिधियों ने उन्हें धोखेबाज बताते हुए सावधान रहने की सलाह दी है। माओवादियों से बातचीत के मामले में भी उनकी कड़ी आलोचना हो चुकी है। अब देखना यह है कि आगे वे क्या करते हैं? सरकार की किसी पेशकश को स्वीकार करते हैं या फिर से सामाजिक क्षेत्र में जमीन तलाशते हैं?
tejwanig@gmail.com

Founder

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Saleem Khan