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ना जाने क्यों वो “बुत” बनकर

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on रविवार, 25 सितंबर 2011 | 8:26 pm

ना जाने क्यों वो “बुत” बनकर

मंदिर दौड़ी मस्जिद दौड़ी
कभी गयी गुरुद्वारा
अर्ज चर्च में गली गली की 
खाक छान फिर पाया 
लाल एक मन-मोहन भाया
मेरे जैसे कितनी माँ की
इच्छा दमित पड़ी है अब भी 
कुछ के “लाल” दबे माटी में
कुछ के जबरन गए दबाये 
बड़ा अहम था मुझको खुद पर 
राजा मेरा लाल कहाए 
ईमां धर्म कर्म था मैंने  
कूट -कूट कर भरा था जिसमे
ना जाने क्यों वो “बुत” बनकर
दुनिया मेरा नाम गंवाए
उसको क्या अभिशाप लगा या
जादू मंतर मारा किसने
ये गूंगा सा बना कबूतर
चढ़ा अटरिया गला   फुलाए
कभी गुटरगूं कर देता बस
आँख पलक झपकाता जाए
हया लाज सब क्या पी डाला
दूध  ko  मेरे चला भुलाये
कल अंकुर फूटेगा उनमे
माटी में जो “लाल” दबे हैं
एक “लाल” से सौ सहस्त्र फिर
डंका बज जाए चहुँ ओर
छाती चौड़ी बाबा माँ की
निकला सूरज दुनिया भोर 
हे "बुत" तू बतला रे मुझको
क्या रोवूँ  मै ??  मेरा चोर ??
चोर नहीं ....तो है कमजोर ??
अगर खून -"पानी"  है अब भी
वाहे गुरु लगा दे जोर  
शुक्ल भ्रमर ५
यच पी २५.९.२०११
८.१५ पी यम

LOVE is LIFE: दुधवा के गैंडो की नस्ल सुधारने को आसाम से आएगा नर गैंडा

इसलिए प्यार अधुरा रह जाता है

यार से ही प्यार हो जाता है,
प्यासे को पानी ही पियाला जाता है,
पीते-पीते निगाह एक हो जाती है,
पर अब घड़े से कौन चुल्लू में पिलाता है,

कुँए अब ख़त्म हुए,
पनघट पर कौन अब जाता है,
प्यासा तो बेचारा अब भी है,
पर बोतल से पी लेता है,

निगाह न एक हो पाती है,
कोई पनिहारिन न मिल पाती है,
बिचारा आधे प्यार पर रह जाता है,
आधा प्यार न उसे मिल पाता है,
इसलिए प्यार अधुरा रह जाता है,


.

साहित्य सुरभि: अग़ज़ल - 25

साहित्य सुरभि: अग़ज़ल - 25: मेरी जिन्दगी किस मोड़ पर ला दी तूने ग़म को रू-ब-रू करके , ख़ुशी छुपा दी तूने. मैंने पूछा था तुझसे अपनी वफा़ का हश्...

Ajeeb















ना जीने की कोई वजह है  ना है कोई साथ
इस अकेलेपन में कौन थामेगा मेरा हाथ
इन अनजानों के समंदर में हर तरफ लगी है घात
हर मोड़ पर है शिकारी शिकार करने को तैनात

नारद इस जहाँ में हर एक शिकारी है
दिल न लगाना तो जिन्दगी से गद्दारी है
ये गद्दारी जो तुम कर लो तो जिन्दगी तुम्हें देती है सजा
जीते रहो इस जहां में तनहा बस यही है सजा

और जो ना की गद्दारी और इश्क कर दिया
अपनी जिंदगी को किसीके नाम कर दिया
तो फिर इसका एक इनाम मिल गया
इनाम में बेवफा का खिताब मिल गया

नारद इस जहाँ के रंग बड़े निराले हैं
जो दीखते  गोरे है बिम्ब में वो ही काले हैं

असमाप्य ...........

"नारद"
अंदाज ए मेरा: जब जानवर कोई इंसान को मारे.... वहशी उसे कहते हैं स...: 1706। ये अधिकृत आंकडा था आज दोपहर करीब सवा दो बजे से पहले। जी हा ! भारत में बाघ यानि राष्‍ट्रीय पशु की मौजूदगी का आंकडा। सवा दो बजे के बा...

दिल की फरियाद के ख़त

Written By तरूण जोशी " नारद" on शनिवार, 24 सितंबर 2011 | 8:51 am













खून से लिखे थे ख़त वो दिल की फरियाद के
तड़पता था दिल वो मेरा तेरी ही याद में

वस्ल में रही तमन्ना तेरे ही दीदार की
जब हुआ दीदार तो वो घडी थी बहार की

वो बहार भी है रुक गई , वो बयार भी है मिट गयी
इन आँधियों से की है नारद उम्मीद क्यूँ तुने प्यार की

कांटो से उलझ कर घाव ही मिल पता है
बेवजह ही शिराओं से लहू छलक जाता है

इश्क करने की "नारद" यही एक कहानी है

लोग कहते है की इश्क जिंदगानी है
पर माना है मैंने बस यही* एक बेगानी है

*बस जिंदगी ही बेगानी है

"नारद"

अश्क नैन ले -मोती रही बचाती

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on शुक्रवार, 23 सितंबर 2011 | 9:36 pm

आइये थोडा हट के कुछ देखें २६ और ३२ रुपये में दिन भर खाना खा लें बच्चों को पढ़ा लें संसार चला लें प्यार कर लें हनीमून भी मना लें ………कैसा है ये प्यार ……………….
क्या आयोग मंत्री तंत्री नेता के दिल और दिमाग नहीं होता ………….
ऊपर से कुदरत की कहर गिरा हुआ घर बना लें रोज जगह बदलते हुए भागते फिरें जो बच जाएँ ….
अश्क नैन ले -मोती रही बचाती
इठलाती -बलखाती
हरषाती-सरसाती
प्रेम लुटाती
कंटक -फूलों पे चलती
पथरीले राहों पे चल के
दौड़ी आती
तेरी ओर
“सागर” मेरे-तेरी खातिर
क्या -क्या ना मै कर जाती
नींद गंवाती -चैन लुटाती
घर आंगन से रिश्ता तोड़े
“अश्क” नैन ले
“मोती” तेरी रही बचाती
दिल क्या तेरे “ज्वार” नहीं है
प्रियतम की पहचान नहीं है
चाँद को कैसे भुला सके तू
है उफान तेरे अन्तर भी
शांत ह्रदय-क्यों पड़े वहीं हो ?
तोड़ रीति सब
बढ़ आओ
कुछ पग -तुम भी तो
बाँहे फैलाये
भर आगोश
एक हो जाओ
समय हाथ से
निकला जाए !!
———————-
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल “भ्रमर”५
८.३० पूर्वाह्न यच पी २२.०९.२०११

जीवन के रंग .....: हंसों ना !

ONLY NEWS: टाइगर पटौदी

ONLY NEWS: टाइगर पटौदी: 1941 में भोपाल में जन्मे पटौदी काफी दिनों से बीमार चल रहे थे। हालत नाजुक होने पर उन्हें आईसीयू में भर्ती कराया गया था। उन्हें ऑक्सीजन सपोर्ट...

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ

मोहब्बत का अंजाम


















जो मैंने चाहा नही वोअंजामहो गया
मेरी तमन्नाओं का ये क्या मुकां हो गया,
मेरी जान औ रूह सिमटी थी एक आहट में
और वो आहट बसी थी केवल तेरी ही चाहत में,

चाहके भी तुमको हम पा ना सके
दाग लग गया दामन बचा ना सके,
छींटे जो लग उडे रंग-ए-मोहब्बत के
चाह के भी खुद को हम छिपा ना सके,

जब भीग ही गये तो मजा डूब के लिया
वो मजा भी पूरा हम पा ना सके,

डूबते को तिनके ने सहारा दे दिया
इसी के साथ मुझे उसी ने बेसहारा किया,
ले गया मुझको दूर वो किनारे से
ना डूब में सका ना सुखने दिया,

तुम जो सोचो कि नारद तिनके का कद्रदान हैं
ये ना सोचो कि तिनके में मुझे ख्वाबगाह मिला,
सच है कि तिनका मेरा कब्रगाह है बना

ये कहानी बयां कर रहा हुँ आज मैं बेटू
ये समझना ना कि बेवफ़ा था स्वीटू

मैं तुमसे दूर होके अकेला हूं अधूरा हूँ,
तुमसे ही मैं पूरा हूँ
बस जिन्दगी में तेरी ही ख्वाईश रखी
तेरे सिवा अब ना कोई ख्वाईश रही,

तेरी नफरत के आगे मेरी आस टूट गई,
तेरी नफरत के आगे मेरी आस टूट गई,
यादों में जी रहा हूँ , मेरी सांस छूट गई!


"नारद"

कोन कहता है हमारे देश में ३२ रूपये में दो वक्त पेट भर कहा नहीं सकते अरे इन गरीबों को संसद में तो जाकर देखो

Written By आपका अख्तर खान अकेला on गुरुवार, 22 सितंबर 2011 | 4:57 pm


कितनी अजीब बात है ..केसे हमारे देश के लोग हैं .बेचारी हमारी सरकार इतनी महनत और लगन के बाद सरकारी आंकड़े तय्यार करती है गरीबी का आंकलन करती है और हम .हमारा मिडिया सरकारी महनत का मजाक उढ़ाते हैं अभी हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत में सरकार ने गरीबी को परिभाषित करते हुए एक शपथ पत्र दिया जिसमे शहर में ३२ रूपये और गाँव में २८ रूपये में पेट भरनेवाली बात कही और इससे कम आमदनी वालेको गरीब माना गया है हमारे देश में ४५ करोड़ लोगों की यह संख्या बताई गयी है सवा सो करोड़ में से ४५ करोड़ आज भी देश में बदतर हालात में है यह तो सरकार ने स्वीकार कर लिया है दोस्तों ..आओ सोचते हैं सरकार ने यह आंकड़े कहां से प्राप्त किये ...................भाई सरकार का कोई भी कारिन्दा जो एयर कंडीशन से कम बात नहीं करता है वोह किसी गाँव या कच्ची बस्ती गरीबों की बस्ती में तो नहीं गया ...लेकिन हाँ संसद की केन्टीन से यह आंकड़े उन्होंने प्राप्त किये हैं जहां एक सांसद इस गरीबी की परिभाषा में आता है दोस्तों आप जानते हैं संसद की केन्टीन में एक रूपये की चाय दो रूपये का दूध ..डेढ़ रूपये की दाल ..दो रूपये के चांवल ..एक रूपये की चपाती चार iरूपये का डोसा ..आठ रूपये की बिरयानी ...तेरह रूपये की मछली और २४ रूपये का मुर्गा मिलता है और यह बेचारे इतने गरीब है के इतना महंगा सामान खरीद कर खाने के इन्हें कम रूपये मिलते इन्हें केवल अस्सी हजार रूपये प्रति माह का वेतन मिलता है और करीब एक लाख रूपये के दुसरे भत्ते मिलते हैं ..अब देश के इन गरीबों का बेचारों का क्या करें बेचारे संसद में जाकर सोते हैं संसद में जाकर लड़ते हैं जब कानून बनाने या विधेयक पारित करने की बात होती है तो वाक् आउट कर कानून पारित करवा देते हैं जब विश्वास मत की बात आती है तो बेचारे रिश्वत लेकर वोट डाल देते हैं ..लोकसभा में सवाल पूंछना हो तो इसके भी रूपये ले लेते हैं और संसद के बाहर कोई अगर इस सच को उजागर करे तो उन्हें विशेषाधिकार का नोटिस देकर डरा देते हैं .हैं ना हमारा देश गरीब और हमारे देश की गरीबी के आंकड़े बिलकुल सही और ठीक हैं .............अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

पुरुषस्य भाग्यम


पुरुषस्य भाग्यम





सवाई पदमनाभ सिंह, जयपुर के नए महाराजाधिराज, आयु १२ वर्ष



सवाई पदमनाभ सिंह
जयपुर के नए महाराजाधिराज
आयु १२ वर्ष


यह बालक कितना राजनीति में खरा उतरेगा, १२ वर्ष की आयु में अकबर महान भी भारत का का बादशाह बना था, पर तब परिस्थिति कुछ और थी, आज परिस्थिति कुछ और है, और जयपुर का राजघराना कितना इसका साथ देता है, पर जिसको भाग्य ने राजा बनाया है, तो कोई-न-कोई राज़ इसमें जरूर होगा, भारत में राजसी प्रथा का पुनः आगाज़ होगा, क्या पता आगे चल कर यही भारत का सम्राट होगा |
 

होम्योपैथी के खिलाफ इन दिनों दुनिया भर में मुहिम चलाई जा रही है

भारत ही नहीं, होम्योपैथी के खिलाफ इन दिनों दुनिया भर में मुहिम चलाई जा रही है। अभी पिछले दिनों ब्रिटेन में एक अनुसंधान का हवाला देते हुए एलोपैथी लाबी ने होमियोपैथी के सिध्दांतों को अवैज्ञानिक घोषित कर दिया। इस दुष्प्रचार के बावजूद आम आदमी आज भी होमियोपैथी के प्रति विश्वास रखता है।
सवाल है कि देश में जहां 70 फीसदी से ज्यादा लोग लगभग 20 रुपये रोज पर गुजारा करते हों वहां होम्योपैथी जैसी सस्ती चिकित्सा पध्दति एक बढ़िया विकल्प हो सकती है? 
हमारे योजनाकारों को इस मुद्दे पर गम्भीरता से विचार करना होगा।

सेलेबेसी वाले ही तो सेलेब्रेटी बनते हैं

Written By Brahmachari Prahladanand on बुधवार, 21 सितंबर 2011 | 10:03 pm

यम के अंतर्गत ब्रह्मचर्य अपने आपमें सब कुछ समाये हुए है | सबसे पहले इसको समझने की बात है | इसके सम्बन्ध में विश्व भर में कई प्रकार की भ्रांतियां फैली हुई हैं | सारे योग का आधार इसी एक चीज पर टिका है| इसलिए इसको बहुत सूक्ष्मता एवं गहनता से समझना होगा | क्यूंकि यह आत्म को ब्रह्म बना देता है | यानी सामान्य से सामान्य व्यक्ति को भी भगवन बना देता है | पुरुष को भी पुरुषोत्तम बना देता है | यह शारीर के स्वास्थ्य से लेकर के और आत्म के चैतन्य तक इसी का बोलवाला है | यह शारीर एवं चेतना को एक रखता है | इसके आभाव में शारीर अलग और चेतना अलग से प्रतीत होने लगते हैं और चेतना को शारीर बोझ लगने लगता है | इसलिए योग के साधक की चर्या ब्रह्म के जैसे होनी चाहिए |

अपनी शक्ति को संभाल कर रखने के लिए जो भी विधि कार्य करे उसे ब्रह्मचर्य कहते हैं | अब वह चाहे ब्रह्मचर्य हो, सलेबेसी हो या और भी कोई नाम हो | बात है की शरीर की जो शक्ति है वह किसी तरह संभल जाये | उसी शारीर की शक्ति को सँभालने के लिए यह सब ढेर सारी विधियाँ हैं | और सभी विधियों का एक ही धेय्य है की जो शक्ति शारीर में हमने अर्जित की है उसको किस प्रकार से बचा कर रखें | क्यूंकि इस शक्ती के बिना हम अध्यात्म तो क्या किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त नहीं कर सकते हैं | कोई भी क्षेत्र हो जीवन का हर क्षेत्र में मेहनत करनी होती है और मेहनत करने के लिए शक्ती चाहिए | पहले के समय में शक्ति अधिक थी तो लोग उस अनुसार मेहनत करते थे | अब शक्ती कम है तो मशीनों से मेहनत करवाते हैं | मशीन भी तो शक्ती से चलती है | इस शक्ति के बल पर वह निखर कर आता है | जैसे अगर प्रिंटर में इंक बराबर है तो प्रिंट ठीक आएगा नहीं तो धुंधला आएगा | उसी प्रकार यदि व्यक्ती में शक्ति है तो उसके हर काम नंबर १ के होंगे | अगर वह अध्यातम की साधना के लिए योग, ध्यान आदि करता है तो उसमे करने में उसे और आनंद मिलेगा | और अगर शक्ती कम है तो आलसी बन कर मेहनत से जी चुराएगा | मेहनत तो सब में करनी पड़ती हैं चाहे वह सांसारिक कार्यों के लिए या फिर आध्यत्मिक कार्यों के लिए |

क्या वाल्मीकि ने बिना ब्रह्मचर्य के ऋषि बने थे ? क्या भीष्म पितामह बिना ब्रह्मचर्य के इच्छा मृत्यु का वरदान पा गए ? हिटलर ने भी तो शादी नहीं की और एक अदना सा आदमी दुनिया को हिला गया | दारा सिंह क्या बिना ब्रह्मचर्य के इतने बड़े पहलवान बने ? स्वामी रामदेव जी एक छोटे से किसान के बेटे ब्रह्मचर्य के बल पर ही तो इतना आगे बड़े हैं | महऋषि महेश योगी भी तो ब्रह्मचर्य के बल पर ही आगे बड़े | जिसको भी सफलता चाहिए आध्यात्म में उसे ब्रह्मचर्य का पालन तो अति आवश्यक रूप से करना पड़ेगा | क्यूंकि योग सूत्र के यम में ब्रह्मचर्य पहले ही आ जाता है | यही तो आधार हैं आध्यात्मिकता मी उन्नती का | ओशो रजनीश, स्वामी राम तीर्थ, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, तुलसीदास यह सब साधारण लोग थे किन्तु ब्रह्मचर्ये के बल पर आध्यात्मिकता में कितने ऊपर गए यह सारा जगत जानता है | ब्रह्मचर्य के पालन की बात नहीं होती तो कितने ही इस आध्यात्म में सफल हो जाते | किन्तु केवल मात्र ब्रह्मचर्य के आभाव में वह सफलता से वंचित रह गए | आध्यात्मिकता में केवल एक बात चलती है वह है ब्रह्मचर्य | यहाँ पर अच्छे विचार-बुरे विचार इनका कोई महत्व नहीं है | महत्व केवल ब्रह्मचर्य का है | बिना ब्रह्मचर्य के कोई भी विचार या कोई भी काम चाहे वह कितना ही अच्छा हो उन्नति प्राप्त नहीं करता है | ब्रह्मचर्य वह है की इसका आनंद वही ले सकता है जो इसका पालन करता है | इसका आनंद दूसरा नहीं ले सकता है | इसलिए कोई भी आध्यात्मिक साधना हो उसमे ब्रह्मचर्य को प्रधानता है | साधू, योगी, संन्यासी, वैरागी, उदासी, पादरी, सूफी, दरवेश, लामा, भिक्षु, जैन मुनि, इसाई संन्यासी, तिब्बती लामा, शओलिन मोंक, और भी कोई भी आध्यामिकता वाले हैं वह सबसे पहले ब्रह्मचर्य के पालन पर बल देते हैं | और जहाँ पर ब्रह्मचर्य ख़त्म हो जाता है तो उसका बुरा पतन होता है चाहे वह कितन ही ऊँचा गया हो वह बुरी तरह नीचे गिरता है | जैसे विश्वामित्र, इनका पतन हुआ |  बिना ब्रह्मचर्य के आध्यामिकता में सफलता पाना तो कभी नहीं हो सकता है |



मेरे अनुसार जिसको भी आध्यात्मिकता में जाना है, उसे ब्रह्मचर्य को अपनाना नहीं पड़ता है, वह ब्रह्मचर्य तो अपने आप आता है, जैसे आप गाडी में बैठो तो गाडी अपने आप आपको ले जाती है, जैसे आग पर कोई वस्तु रखो तो पक जाती है, जैसे दवाई अपना काम कर जाती है, आपको कुछ नहीं करना पड़ता है, तो ऐसी ही आध्यात्मिकता में जब कोई जाता है तो ब्रह्मचर्य अपने आप आ जाता है, क्यूंकि उसको आध्यात्मिकता के रास्ते में रौशनी करने के लिए ब्रह्मचर्य की जरूरत होती है, यह रौशनी कैसे आती है ? सवाल यह है ? यह ओज जो आध्यात्मिकता में आता है यह सवाल है ? तो इसका उत्तर आपको दूंगा | जो भी लोग एक बार आध्यात्मिकता में ब्रह्मचर्य का महत्त्व समझ जाते हैं, तो फिर वह यही करता है की इसको कैसे बचाया जाए | अब वह क्या है जो वह समझ जाता है ? तो वह यह है की, जिस प्राकृतिक प्रक्रिया में वह अपना खज़ाना लुटाता है, उस प्राकृतिक प्रक्रिया से वह दूर भागता है, यह है ब्रह्मचर्य, यानी ब्रह्म की चर्या |



अब यह खज़ाना क्या है ? तो इस छोटी-सी प्रक्रिया में जो अरबों आत्माएं हम बहा देते हैं, उन आत्माओं को अगर हम अपने में रखें तो हम कितना प्रकाशवान हो जायेंगे, यह ऐसे है की आत्मा ही प्रकशवान होती है, किन्तु उसका प्रकाश हमको पता नहीं चलता है, किन्तु जब वही आत्मा एक शरीर धारण करती है और अपने अन्दर की आत्माओं को बचाकर रखती है तो उससे उसे प्रकाश मिलता है, जैसे कैंसर का कीटाणु दीखता नहीं हैं, लेकिन उसमे भी तो आत्मा है, वह कितना बलवान है, की आपकी आत्मा को शरीर से हटाकर खुद उस शरीर पर कब्ज़ा कर लेता है, इसी तरह से जो आत्माएं हम शरीर से बाहर निकाल देते हैं, अगर उसको हम अपने शरीर में इकठ्ठा रखें तो वह जो प्रकाश करेंगे, जो ओज उनसे निकलेगा वही ओज तो आध्यात्मिकता है, जैसे एक जुगुनू के प्रकाश से कुछ नहीं होता है, किन्तु जब बहुत से जुगनुओं को एक जगह रख दो तो तो प्रकाश निकलता है, वह एक अलग का अहसास देता है, एक अलग सा अपना पन देता है, बस यही आध्यात्मिकता में ब्रह्मचर्य का उपयोग होता है, जैसे गाडी में पेट्रोल का उपयोग होता है, बिना पेट्रोल के गाडी नहीं चल सकती है, उसी तरह बिना ब्रह्मचर्य के आध्यात्मिकता सफल नहीं हो सकती है, आध्यात्मिकता में उस को पृथ्वी से जल से अग्नि से वायु से आकाश बनाया जाता है, जैसे मिटटी से आनाज से रोटी से भोजन से खून से रोशनी से प्राण से आत्मा से परमात्मा बनाया जाता है,



अब इसको आजकल के हिसाब से समझाता हूँ, आजकल की भाषा में इसे सेलेबेसी कहते हैं, जब शरीर में सेल बेसी यानी ज्यादा हो जाते हैं उसे सेले बेसी कहते हैं, Cell , जब हमारे शरीर में सेलों की मात्र ज्यादा हो जाती है तो उसे सेलेबेसी कहते हैं, अब सेल की मात्र कैसे होगी ज्यादा शरीर में और किसके होगी ? जो भी सेलेबेसी को अपनाएगा उसके शरीर में सेल की मात्र ज्यादा होगी, और जो सेल हैं उसके शरीर में वही तो उसकी फिर दूसरों से अलग करेंगे, उसको उन्नति दिलाएंगे, तो जो सेलेबेसी का पालन करने वाले ही तो फिर सेलेब्रेटी बनते हैं, और सेलेब्रेटी जो होते हैं, उन्होंने सेल को बढाने ब्रत लिया है, यानी जो अपने सेलों को बढाने के लिए ब्रत लेते हैं वही सेलेब्रेटी होते हैं, और दूसरा से समझाता हूँ जो सेल का उपयोग हम रेडिओ, घडी आदि चलाने में करते हैं तो उसे भी तो सेल ही कहते हैं, यानी उसमे भी उर्जा भरी है, अगर आप वह सेल तो तोड़कर उसकी उर्जा को समाप्त कर देंगे तो फिर कैसे टोर्च जलेगी, तो ऐसे ही इस शरीर की टोर्च को जलाने के लिए सेल की जरूरत होती है, और सेल को बेटरी भी कहा जाता है, जो की ब्रती का ही अपभ्रंश है, यानी जो सेल को सुरक्षित रखने और बढाने का ब्रत लेता है | तभी तो कोई भी व्रत को करने का संकल्प लेता है तो उसे सेलेब्रती कहते हैं, तो यह है ब्रह्मचर्य, सेलेबेसी |



यहाँ पर बात हो रही है आध्यात्मिकता में किस तरह से ब्रह्मचर्य मदद करता है, उसका सारा उल्लेख किया है मैंने, यानी जब किसी को आध्यात्मिकता में जाना है तो उसको और अधिक उर्जा की आवश्यकता होगी, तो उसको वह उर्जा ब्रह्मचर्य से ही प्राप्त होगी, जैसे एक नदी के पानी को रोककर डैम बनाया, फिर उस डैम का पानी नहर से खेतों में पहुँचाया, या फिर उस डैम के पानी से बिजली उत्पन्न की, तो उस बिजली को उत्पन्न करने के लिए, बहुत अधिक पानी की जरूरत होगी, और अगर पानी कम होगा तो फिर बिजली नहीं उत्पन्न हो सकती है, तो इसी तरह से जब कोई आध्यात्मिकता में जाता है, तो पतंजलि सूत्र के आष्टांग योग में पहला सोपान है यम उस यम में ब्रह्मचर्य भी है, मैं यहाँ पर प्रजजन के प्राकृतिक नियम के विरुद्ध नहीं बोल रहा हूँ, मैं यहाँ पर आध्यात्मिकता के पक्ष में बोल रहा हूँ, तो ऐसी ही एक डैम हमारे शरीर में है जिसे कुंडलिनी कहा जाता है, कुंडलिनी से तात्पर्य है कुण्ड लीनी यानी कुण्ड से लेना, अब जो कुण्ड हमारे अन्दर है, उस कुण्ड में कुछ होगा ही नहीं और हम उस कुण्ड को खली रखेंगे तो कैसे हम आध्यात्मिकता में सफल हो पायेगे, तो उस कुण्ड को भरने का काम तो करना पड़ेगा, और वह भराव कैसे होगा, उस भराव को करने के लिए, और उस भराव को रोकने के लिए ही आध्यात्मिकता में यह सारे रास्ते बने हैं, जैसे हम अपनी गृहस्थी को चलाने के लिए कुछ धन कमाते है, किन्तु हम बचत भी तो करते हैं, जो बचत हमारे आड़े वक्त काम आती है, उस बचत को सेव ( Save ) भी कहते हैं, तो इसी प्रकार से जो उर्जा हमने अपने शरीर में इक्कठी की है, कुण्ड में, उस उर्जा को बचाना भी तो है, नहीं तो वह किसी भी रास्ते से बह जायेगी, तो उस उर्जा को कैसे बचाया जाए उसको कैसे अपनी बचत यानी सेविंग बनाया जाए तो वह आध्यात्मिकता में होता है, और फिर उसी उर्जा के बल पर वह आध्यात्मिकता में प्रगति पाता है, जैसे की रोकेट को आसमान में उड़ने और धरती के गुरुत्व आकर्षण को तोड़ने के लिए बहुत उर्जा चाहिए, इसी प्रकार आध्यातिमिकता में भी साधना करने के लिए बहुत उर्जा चाहिए, वह उर्जा जब अग्नि के साथ मिलती है, तो जैसे अग्नि को सूखी लकड़ी या घास मिलने से रौशनी मिलती है, उसी तरह से इस उर्जा के साथ अग्नि लगने से यह और भी तेज़ी से जलती है, और उस जलती हुयी अग्नि का प्रकाश ही फिर उस साधक के चेहरे और आखों, वाणी और व्यवहार से झलकता है, इसलिए कहा है की संत के केवल दर्शन कर लो, सब जीवन सफल हो जाएगा, क्यूँ की उस संत से उस उर्जा को संभाला और उस उर्जा का उपयोग साधना करने में किया है, तो आध्यात्मिकता में यह बहुत जरूरी है, जहाँ ऋषि मुनि की बात है तो में उनकी बारे में टिप्पड़ी नहीं करूंगा, क्यूंकि वह ऋषि की उपाधि किसी को तभी मिलती थी जब वह हजारों वर्षों तक एक आशन में एक समाधी में बैठा रहता था, फिर जब वह ऋषि बन जाता था, उसके बाद विवाह करता था, उसके पहले विवाह नहीं करता था, किसी भी ऋषि का जीवन देख लो, तो मैं वही तो कह रहा हूँ की साधना करके ही तो कोई लायक बनता है, जब वह सिद्ध हो जाता है, तो फिर वह दूसरा काम करता है, भगवान् की दी हुई जिन्दगी है यह तो सब जानते है, किन्तु उसको हम कैसे उपयोग में लाते हैं, यह हमारे हाथ में है, की हम परिस्थिति से समझौता कर लेते हैं, की हम परिस्थिति को बदल देते हैं, परिस्थिति वह होती है की जब कोई साधक साधना में बैठता है और अपनी इस अमूल्य उर्जा को बचाने की फ़िक्र करता है, और जब वह उर्जावान होने लगता है, तो परियों की नज़र उस पर रहती है, तो वह परी ( अप्सरा) आसमान से आती है और उस साधक के सामने स्थित हो जाती है, और उसकी तपस्या भंग करती है, और उसकी कमाई को लूट कर ले जाती है, तो जो स्थिति परी के द्वारा निर्मित की जाए वह परिस्थिति होती है, कई उससे समझौता कर लेते हैं, कई उसे पार कर लेते हैं, जीवन में जिसके भी रूहानियत आती है उसमें सफानियत अपने आप आ जाती है, यानी जिसमें आध्यात्मिकता आती है, उसकी नियत अपने आप साफ हो जाती है, लोग थोडा उल्टा समझते हैं, वह यह समझते हैं की ब्रह्मचर्य जो है वह साधना होता है, आध्यात्मिकता में, बस इसी चक्कर में वो असफल हो जाते हैं, और जिन्दगी के चक्करों से हटकर सात चक्करों के चक्कर में पड़ जाते हैं, जबकि मामला थोडा उल्टा है, जो भी आध्यात्मिकता में उतरता है उसमे ब्रह्मचर्य अपने आप आ जाता है, उसे लाना नहीं पड़ता है, उसका तो जाना उस ओर होता ही नहीं है, यह तो अपने आप आता है, तो कुण्ड में पानी जमा करो, फिर उस पानी से बिजली बनाओ, फिर उस बिजली का उपयोग साधना में देखने के लिए करो, ओर आगे बदने के लिए करो, फिर देखो क्या आनंद आता है, बस बात यही अटक जाती है की वह जो कुण्ड है उससे यह पानी बाहर न जाए, ओर सीधा टरबाईंन पर जाए, यह उपाय कोई नहीं बताता है की यह जो हमने पानी रुपी शक्ति शरीर में इक्कठी की है या कैसे बिजली बनेगी, ओर वह इक्कठी तो हो जाती है पर जब उसको यह ज्ञान नहीं होता है तो फिर पानी का काम है की वह हमेशा नीचे रास्ते पर ही ओर बने बनाये रास्ते पर ही चलता है, तो फिर वह उसी रास्ते पर चला जाता है, किन्तु गर उस पानी को ऊपर चढ़ाना है तो फिर कोई-न-कोई तो विधि होगी, बस वह विधि कौन जानता है, यह ढूढना पड़ेगा, ओर जितने भी शास्त्र, नियम, जो भी साहित्य है वह उसके हित के लिए ही बना है, पर इतने विधियों में इतने शास्त्रों में असली विधि कहाँ खो गयी पता नहीं, जैसे कई नकली नोटों के साथ कुछ असली नोट डाल दो ओर फिर उसको कुछ दिन के बाद ढूँढो तो फिर असली ओर नकली में फर्क नहीं कर पाओगे, इसी को कहते हैं गडमड यानी जो ज्ञान है उसको मड यानी मिटटी में मिला देना, फिर एक बार गडमड होने से फिर मामला बिगड़ जाता है, ओर सही क्या है ओर गलत क्या है ? यह जानना मुस्किल हो जाता है, तो यह मेरा आध्यात्मिकता में जो आना चाहते हैं, उनके लिए है, ओर जो अभी संसार का आनंद लेना चाहते है, वह ख़ुशी-ख़ुशी संसार का आनंद लें |



सेलेबेसी वाले ही तो सेलेब्रेट करते हैं,
सेलेबेसी वाले ही तो सेलेब्रेटी बनते हैं,
सेलेबेसी वाले ही तो सेलेब्रेशन करते हैं,
सेलेबेसी वाले ही तो सेल को बढाने का व्रत करते हैं, 


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एक पुस्तक जो साफ़ तौर पर यह कहती है कि ये “ब्राह्‌मणवादियों” का “ब्राह्‌मणवादी आतंकवाद” है, इस्लामवादियों का “इस्लामी आतंकवाद” नहीं...

Hindi translation of bestseller "Who Killed Karkare?"
Book:
 करकरे के हत्यारे कौन ?

भारत में आतंकवाद का असली चेहरा

एस. एम. मुशरिफ़
by S.M. Mushrif
[Former, IG Police, Maharashtra]
368 pages p/b
Price: Rs 250 / US $15  $20
ISBN-10: 81-7221-038-8
ISBN-13: 978-81-7221-038-0
Year: 2010
Publishers: Pharos Media Publishing Pvt Ltd

368 पन्‍नों की यह पुस्तक भारत में “इस्लामी आतंकवाद” की फ़र्ज़ी धारणा को तोड़ती है।

यह उन शक्‍तियों के बारे में पता लगाती है जिनका महाराष्ट्र ए टी एस के प्रमुख हेमंत करकरे ने पर्दाफ़ाश करने की हिम्मत की और आख़िरकार अपने साहस, और सत्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की क़ीमत अपनी जान देकर चुकाई।

एक पुस्तक जो साफ़ तौर पर यह कहती है कि ये “ब्राह्‌मणवादियों” का “ब्राह्‌मणवादी आतंकवाद” है, इस्लामवादियों का “इस्लामी आतंकवाद” नहीं...


From the back Cover:

राज्य और राज्यविहीन तत्त्वों द्वारा राजनीतिक हिंसा या आतंकवाद का एक लम्‍बा इतिहास भारत में रहा है। इस आरोप ने कि भारतीय मुसलमान आतंकवाद में लिप्त हैं, 1990 के दशक के मध्य में हिंदुत्ववादी शक्‍तियों के उभार के साथ ज़ोर पकड़ा और केंद्र में भाजपा की सत्ता के ज़माने में राज्य की विचारधारा बन गया। यहाँ तक कि “सेक्यूलर” मीडिया ने सुरक्षा एजेंसियों के स्टेनोग्राफ़र की भूमिका अपना ली और मुसलमानों के आतंकवादी होने का विचार एक स्वीकृत तथ्य बन गया | हद यह कि बहुत-से मुसलमान भी इस झूठे प्रोपेगण्डे पर विश्‍वास करने लगे।

पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी एस.एम. मुशरिफ़ ने, जिन्होंने तेलगी घोटाले का भंडाफोड़ किया था, इस प्रचार-परदे के पीछे नज़र डाली है, और इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र व अपने लम्बे पुलिस अनुभव से प्राप्त ज़्यादातर जानकारियों (शोध-सामग्री) का उपयोग किया है। उन्होंने कुछ चौंकाने वाले तथ्यों को उजागर किया है, और अपनी तरह का पहला उनका यह विश्‍लेषण तथाकथित “इस्लामी आतंकवाद” के पीछे वास्तविक तत्त्वों को बेनक़ाब करता है। ये वही शक्‍तियां हैं जिन्होंने महाराष्ट्र ए टी एस के प्रमुख हेमंत करकरे की हत्या की, जिसने उन्हें बेनक़ाब करने का साहस किया और अपनी हिम्मत व सत्य के लिए प्रतिबद्धता की क़ीमत अपनी जान देकर चुकाई।
यह पुस्तक भारत में “इस्लामी आतंकवाद” से जोड़ी गयीं कुछ बड़ी घटनाओं पर एक कड़ी नज़र डालती है और उन्हें आधारहीन पाती है।

About the author

एस.एम. मुशरिफ़ महाराष्ट्र के एक पूर्व आई जी पुलिस थे जो सबसे ज़्यादा अब्दुल करीम तेलगी फ़र्ज़ी स्टांप पेपर घोटाले को उजागर करने के लिए याद किये जाते हैं। वह 1975 में महाराष्ट्र के लोक सेवा आयोग द्वारा सीधे पुलिस उपाध्यक्ष नियुक्‍त किये गये थे; और 1981 में भारतीय पुलिस सेवा में ले लिए गए थे।
श्री मुशरिफ़ को वर्ष 1994 में सराहनीय सेवा के लिए “राष्ट्रपति पुलिस पदक” से सम्मानित किया गया था । शानदार सेवा के लिए उन्हें पुलिस महानिदेशक का प्रतीक चिह्‌न भी दिया गया और बेहतरीन कार्यप्रदर्शन के लिए सीनियर अधिकारियों की तरफ़ से उन्हें बहुत सराहा गया। अक्‍तूबर 2005 में उन्होंने रिटॉयरमेंट लिया। अब वह सूचना अधिकार अधिनियम, 2005 को लागू कराने, भ्रष्टाचार के ख़ात्मे, साम्प्रदायिक सौहार्द्र और किसानों व दलितों के कल्याण के लिए काम कर रहे हैं।
विषय-सूची / Table of Contents:
तीसरे अंग्रेज़ी संस्करण का प्राक्‍कथन
प्राक्‍कथन
1. हिन्दू-मुस्लिम दंगे
आम हिन्दुओं (बहुजन) को दबोचे रखने के लिए ब्राह्‌मणवादियों की रणनीति
2. नई चाल, नया जाल
साम्प्रदायिकता के बजाय “मुस्लिम-दहशतगर्दी” का हव्वा
3. बम विस्फोटों की जाँच
ब्राह्‌मणवादियों को बचाने और मुसलमानों के फंसाने के लिए आई बी की ग़ैर ज़रूरी और सोची-समझी दख़ल अन्दाज़ी
i) 2006 का मुंबई ट्रेन बम विस्फोट मामला (11 जुलाई 2006)
ii) मालेगांव बम विस्फोट मामला (8 सितम्बर 2006)
iii) अहमदाबाद बम विस्फोट और सूरत के बिना फटे बम (26 जुलाई 2008)
iv) दिल्‍ली बम विस्फोट 2008 (13 सितम्बर 2008)
v) समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट केस (19 फ़रवरी 2007)
vi) हैदराबाद मक्‍का मस्जिद विस्फोट (18 मई 2007)
vii) अजमेर शरीफ़ दरगाह विस्फोट (11 अक्‍तूबर 2007)
viii) उत्तर प्रदेश की अदालतों में श्रृंखलाबद्‌ध विस्फोटक (23 नवम्बर 2007)
ix) जयपुर धमाके (13 मई 2008)
4. नानदेड़ बम धमाका (5 अप्रैल 2006)
जिसका राज़ संयोग से फ़ाश हो गया
5. मालेगांव बम धमाका केस : 2008
(मुंबई पर हमले से पहले की जाँच)
मामले की ईमानदारी के साथ पहली यथार्थ जाँच, हेमंत करकरे ने राह दिखाई
6. करकरे के हत्यारे कौन ?
मुंबई पर आतंकी हमला एक वास्‍तविकता है लेकिन सी एस टी-कामा-
रंगभवन लेन प्रकरण पर रहस्‍य का पर्दा पड़ा हुआ है
भाग-1 आई बी और नौसेना ख़ुफ़िया निदेशालय के ब्राह्‌मणवादी तत्त्वों
ने अमेरिका और रॉ द्वारा दी गयी धमाकेदार ख़ुफ़िया जानकारी को जान-बूझकर रोक दिया
भाग-2 सी एस टी पर लगे 16 सीसीटीवी कैमरों के साथ छेड़छाड़ हुई थी
भाग-3 सी एस टी के “आतंकवादियों” ने उन सिम कार्डों का प्रयोग किया था जिनके तार सतारा से जुड़े हुए थे।
भाग-4 उन 284 फ़ोनों में से कसाब और ईस्माइल ख़ान के पास एक भी फ़ोन नहीं आया जिनपर वाइस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल टेक्नोलॉजी (वी ओ आई पी) का प्रयोग करके आतंकवादियों ने पाकिस्तान के
अपने आक़ाओं की कॉल रिसीव की थीं।
भाग-5 आतंकवादी धारा-प्रवाह मराठी बोल रहे थे
भाग-6 सी एस टी पर मारे गये 46 लोगों में से 22 मुसलमान थे
भाग-7 करकरे को फंदे में फंसाया गया
भाग-8 अजमल कसाब को भारतीय एजेंसियों द्वारा 2006 के पहले काठमांडू (नेपाल) में गिरफ़्तार किया गया था
भाग-9 अजमल कसाब की बहु-प्रचारित तस्‍वीर
भाग-10 एक महिला गवाह को पूछताछ और उसके बयान को दर्ज
करवाने के लिए जबरन अमेरिका ले जाया गया लेकिन वह अडिग रही
भाग-11 मुंबई अपराध शाखा की कहानी में झोल साफ़ नज़र आता है
ए) सी एस टी-कामा पर गोलीबारी का समय
बी) सी एस टी-कामा क्षेत्र पर आतंकवादियों की संख्‍या
सी) सी एस टी से आतंकवादियों का निकलना
डी) “स्कॉडा” थ्योरी
ई) गिरगांव चौपाटी मुठभेड़ में मारे गये आतंकवादियों की संख्‍या
मुंबई आतंकी हमले का एक वैकल्पिक दृष्टिकोण
1) विले पार्ले और वाडी बंदर पर टैक्सी धमाकों का राज़
2) ऑफ़िशियल सीक्रेट एक्ट के तहत एक मामला
3) प्रधान पैनल की रिपोर्ट को छिपाने के प्रति सरकार (पढ़ें आई बी) की चिंता रिपोर्ट के चुनिंदा हिस्सों का लीक होना गुमराह करने के लिए है
बाद की घटनाएं दृष्टिकोण की पुष्टि करती हैं
फिर से जाँच के लिए उपयुक्‍त मामला
7. मुंबई हमला केस की जाँच
आई बी और एफ बी आई असल जाँचकर्ता, मुंबई क्राइम ब्रांच महज़ एक कठपुतली
8. मालेगांव विस्फोट कांड 2008 (मुंबई हमले के बाद जाँच)
हेमंत करकरे की जाँच पर पानी फेरना
असल षडयंत्रकारी का चेला ही जाँच टीम का प्रमुख बना
अनेक भयंकर कोताहियां और कारगुज़ारियां
9. महाराष्‍ट्र के ब्राह्‌मणों की संदिग्‍ध भूमिका
10. आई बी के ख़िलाफ़ चार्ज शीट
11. देश व समाज को बचाने के लिए तुरन्त उपाय ज़रूरी

संलग्‍नक अ
संलग्‍नक ब
नक़्शा : उस स्थान का चित्र जहां पर प्रमुख आतंकवादी हमला हुआ और हेमंत करकरे की हत्या हुई
 

Pharos Media is pleased to inform about our new book “Who Killed Karkare? — The real face of terrorism in India” written by a former senior police officer. For the first time, it probes deep into the "Islamic terrorism" in India. Of particular interest is the book's detailed study of the 26/11 attack on Mumbai during which Maharashtra ATS chief Hemant Karkare was killed.

Source :

ONLY NEWS: वियतनाम के साथ मिलकर भारत के तेल और गैस निकालने की...

Written By mark rai on मंगलवार, 20 सितंबर 2011 | 10:04 pm

ONLY NEWS: वियतनाम के साथ मिलकर भारत के तेल और गैस निकालने की...: दक्षिणी चीन सागर में वियतनाम के साथ मिलकर भारत के तेल और गैस निकालने की योजना पर चीन ने फिर से निशाना साधा है। चीन ने इस योजना पर कड़ा विरोध...

शिकायत जिस से हो उसी से बात की जाये

ब्लॉगिंग और सोशल नेटवर्किंग के ज़रिये फ़ासले ख़त्म हो जाते हैं और एक इंसान दूसरे इंसान से जुड़ जाता है। यह जुड़ना इंसान को कुछ पा लेने का अहसास दिलाता है, उसमें आशा के दीप जलाता है और उसे ताक़तवर भी बनाता है। इंसान और इंसान के बीच बनने वाला यह रिश्ता कुछ ख़ुशियों के साथ कुछ ज़िम्मेदारियां भी लेकर आता है। जब उन ज़िम्मेदारियों को भुला दिया जाता है तो फिर वह ख़ुशी भी काफ़ूर हो जाती है, जो कि उस रिश्ते के बनते समय मिली थी। ब्लॉगिंग के दौरान ब्लॉगर्स भी कुछ भूलें और कुछ ग़लतियां कर जाते हैं और तब दुख देने वाले हालात पैदा हो जाते हैं, जिनसे सिर्फ़ दो इंसान ही दुखी नहीं होते बल्कि उन दोनों ब्लॉगर्स से जुड़े हुए लोग भी दुखी हो जाते हैं। भूल और ग़लती हो जाने पर उसे सुधार लेना ही एकमात्र व्यवहारिक हल है इस समस्या का।
'शिकायत जिस से हो उसी से बात की जाये . इधर उधर शिकायतें करने वालों का मकसद शिकायत करना नहीं बल्कि बेइज्ज़त करना हुआ करता है.'
यदि हमारी बातों या व्यवहार से किसी को चोट पहुंची हो तो अहसास होते ही तुरंत क्षमा मांग लेनी चाहिए। यह तनाव को दूर रखने का एकमात्र तरीका है। यदि समय रहते क्षमा याचना न की जाए तो यह तनावपूर्ण हो सकता है। हमें अपनी गलतियों से सबक लेकर उनसे ऊपर उठना चाहिए। अपने जीवन व कार्यों के प्रति उत्तरदायी होने का यही एक तरीका है, परंतु इस राह में अहं हमारी सबसे बड़ी समस्या है, जो अक्सर हमारे व भूल को स्वीकारने के बीच आ जाता है। यदि आप सोचते हैं कि जीवन में कोई व्यक्ति भूलें किए बिना रह सकता है तो यह आपका भ्रम है। यदि हम भूलों से सबक नहीं लेते तो इसका अर्थ होगा कि हम एक और अवसर गंवा रहे हैं। गलतियों व संभावित गलत कदमों का निरंतर मूल्यांकन  ही उनसे कुछ सीखने व भविष्य में उन्हें अनदेखा करने का तरीका है।

ब्लॉगर्स अपनी भूल कैसे सुधारें ? Hindi Blogging Guide (17)

उस रास्ते से तो

उस रास्ते से तो, अब तक बहुत निकल गए होंगे,
अब तक तो सबके निशाँ आपस में मिल गए होंगे,
सड़क भी अब तक वहाँ बन गयी होगी,
अब तो सब गाडी में सोकर जाते होंगे,

तुझे भी गर सोकर जाना है,
जिन्दगी में खोकर ही जाना है,
बने बनाये रास्ते अपना ले तब,
नए रास्तों की खोज में जिन्दगी न लगा अब,

तू भी मजे से सोकर निकल जा,
न होश रख, बस तू निकल जा,
सवार हो जा किसी गाडी में,
और अपनी मंजिल पे निकल जा,

अब ये वो दौर नहीं है की तू अपना रास्ता बना,
अब ये वो दौर नहीं है की तू होश में रहे सदा,
यहाँ तो बेसुध ही रहना है, सोते से रहना है,
जाग गर गए तो सब फिर सुला देंगे, इसलिए सोते ही रहना है,

यह होश वालों का नहीं, जोश वालों का दौर है,
यहाँ सब सोने वालों का दौर,
जागने वाला बेचारा सब को ले जाता है,
फिर भी उसकी फटी हालत पर तरस किसी को न आता है,

एक वही तो है जो जागा हुआ है,
पसीने से तरबतर अपना काम कर रहा है,
पेट भर फिर भी न उसको मिल रहा है,
जमाना अपना पेट मज़े से भर रहा है,

कितनों को उसने मंजिल पर है पहुँचाया,
अपना काम छोड़ दूसरों का काम करवाया,
आज उसकी ही हालत बुरी है,
ये दुनिया ऐसी ही धुरी है,

इसलिए तो भगवान् भी छुप गया है,
यह इंसान उसे भी नहीं छोड़ता है,
सवार होकर भगवान् पर अपनी बात मनवाना चाहता है,
भगवान् को फिर बुरा-भला भी कहना चाहता है,

                                                      
------- बेतखल्लुस

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Founder

Founder
Saleem Khan