यादों की एल्बम ...ड़ा श्याम गुप्त ...
Written By shyam gupta on शनिवार, 23 जुलाई 2011 | 10:58 am
खबरगंगा: प्रिंट मीडिया : अंध प्रतिस्पर्द्धा की भेंट चढ़ते एथिक्स
Written By devendra gautam on शुक्रवार, 22 जुलाई 2011 | 11:20 pm
काहे खून तेरा प्यारे अब खौलता नहीं —??
तोड़ लिया कोई फूल तुम्हारा
खाली हो गयी क्यारी
उजड़ जा रहा चमन ये सारा
गुल गुलशन ये जान से प्यारी
खुश्बू तेरे मन जो बसती
मिटी जा रही सारी
पत्थर क्यों बन जाता मानव
देख देख के दृश्य ये सारे
खींच रहा जब -कोई साड़ी
खौलता नहीं —??
————————–
अंधियारे क्यों भटक रहा
जिस बिल से ये चले आ रहे
दूध अभी भी चढ़ा रहा ?
तू माहिर है बच भी सकता
भोला तो अब भी भोला है
दोस्त बनाये घूम रहा
उनसे अब भी प्यार जो इतना
बिल के बाहर आग लगा
बिल में ही रह जाएँ !
काट न खाएं !
इन भोलों को !!
लाठी क्यों ना उठा रहा ??
काहे खून तेरा प्यारे अब
खौलता नहीं —??
————————
तोड़-तोड़ के पत्थर दिन भर
बहा पसीना लाता
धुएं में आँखें नीर बहाए
आधा पका – बनाता
बच्चों को ही पहले देने
पत्तल जभी सजाता
मंडराते कुछ गिद्ध -बाज है
छीन झपट ले जाते
कल के सपने देख देख के
चुप क्यों तू रह जाता
काहे खून तेरा प्यारे अब
खौलता नहीं —??
—————————
२०.०७.२०११ जल पी बी
८.५५ पूर्वाह्न
लब तक खींचा अरु छोड़ गयी
Written By नीरज द्विवेदी on गुरुवार, 21 जुलाई 2011 | 9:15 pm
मन को बाँध पाना मंत्र जप में नहीं है
मन को बाँध पाना मंत्र जप में नहीं है |
यही मंत्र जप का मंत्र एक दिन परेशान कर देगा |
फिर इस मंत्र से छुटकारा पाना मुश्किल हो जाएगा |
यही फिर टकराएगा और घूमेगा पूरे मन में |
चैन से न रहने देगा मन को और मनवाले को |
मंत्र जप करने वालों की हालत बड़ी बुरी होती है |
हाथ में माला और मुहं में मंत्र जप की बोली होती है |
मंत्र जप फिर निरंतर चलता रहता है |
जप करने वाले को वह ठीक से सोचने और शांत भी नहीं रहने देता है |
बात भी करता है तो मंत्र चलता है अन्दर |
अब उस मंत्र से वह भागना भी चाहता है तो भाग नहीं पाता |
मन को शांत करना है तो फिर करो कोई और उपाय |
या फिर करने दो उसे जो कर रहा है वह |
पर मत जाने दो शरीर को उसके पीछे |
शरीर के मालिक तुम हो यह जान कर चलो |
मन कितना भागेगा, आखिर भाग-भाग कर थक जाएगा |
बस ख्याल यह रखो की इसके पीछे शरीर को मत जाने दो |
फिर जब यह थक जाएगा और शरण तुम्हारी आएगा तो फिर काबू कर लो इसे |
और मालिक बन जाओ इसके, अब यह तुम्हारे कहे अनुसार चलेगा |
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मेरी बिटिया सदफ स्कूल क्लास प्रतिनिधि का चुनाव जीती
Written By आपका अख्तर खान अकेला on मंगलवार, 19 जुलाई 2011 | 10:23 pm
मेरी बिटिया सदफ स्कूल क्लास प्रतिनिधि का चुनाव जीती
Pt. DAYANANDA SHASTRI has such a cool profile!
अन्नपूर्णा.....ड़ा श्याम गुप्त ...
भोजन ब्रह्म है,और जीव -
हज़ार मुखों से ग्रहण करने वाला ,
वैश्वानर है,
जगत है;
और हज़ार हाथों से बांटने वाली ,
अन्नपूर्णा -माया है उसी ब्रह्म की |
हाँ, ऐसा ही लगता है ,तब--
जब तुम - तवा, चूल्हा , चकला-
रोटी, कलछा और कुकर पर,
एक ही समय में ध्यान दे लेती हो |
और , मुन्ना मुन्नी पापा व अन्य को ,
परोस भी देती हो,
एक साथ-
गर्मा-गर्म, सुस्वादु भोजन |
जैसे, अन्नपूर्णा -
हज़ार हाथों से,
सारे विश्व को तृप्त कर रही हो |
या कोई ज्ञान रूपा,
हज़ार भावों से-
वैश्वानर को,
चराचर को,
ब्रह्म का-
आस्वादन करा रही हो ||
खिलाफ़त कर के भी देखो ''
तांका ----- दिलबाग विर्क
Written By डॉ. दिलबागसिंह विर्क on सोमवार, 18 जुलाई 2011 | 8:39 pm
धर्म अर्थ काम मोक्ष
दिल का जख्म
दिल का
दिल का जख्म, तो, यूँ सीने से उभर आया है |किसी ने दिल थोडा, दिल से लहू बह आया है |
दिखा न रहे थे, जमाने को, पर अब तो सब ने देखा है |
तेरी बेवफाई का, खौफनाक नतीजा ज़माने ने देखा है |
دل کا جخم، تو، یوں سینے سے ابھر آیا ہے
کسی نے دل تودہ، دل سے لہو بہ آیا ہے
دکھا ن رہے تھے، جمانے کو، پر اب تو سب نے دیکھا ہے
تیری بیوافی کا، کوفناک نتیجہ نمانے نے دیکھا ہے
Dil Ka Jakhm, To, Yun Seene Se Ubhar Aaya hai
Kisi Ne Dil Toda, Dil Se Lahoo Bah Aaya Hai
Dikha Na Rahe The, Jamane Ko, Par Ab To Sab Ne Dekha Hai
Teri Bewafai Ka, Kaufnaak Nateeja Jamane Ne Dekha Hai
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आंसू यूँ बह गए किसी कि बेवफाई से |
दरिया जैसे बह गया हो बड़ी रुखाई से |
آنسو یوں بہ گئے کسی کی بیوافی سے
دریا جیسے بہ گیا ہو بدی رکھی سے
Aansu Yun Bah Gaye Kisi Ki Bewafai Se
Dariya Jaise Bah Gaya Ho Badi Rukhai Se
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आखें न छुपाओ हांथों से, कुछ तो देख लेने दो |
रो रही हैं, कि खो रही हैं, इतना तो देख लेने दो |
اکھیں نہ چھپاؤ ہانتھوں سے، کچھ تو دیکھ لینے دو
رو رہی ہیں، کی کھو رہی ہیں، اتنا تو دیکھ لینے دو
Akhen Na Chhupao Hanthon Se, Kuch To Dekh Lene Do.
Ro Rahi Hain, Ki Kho Rahi Hain, Itna To Dekh Lene Do.
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हया नज़रों में होती है, ये आज मैंने देखा है |
झुकी जब नज़रें उसकी, हया को मैंने देखा है |
ہی نظروں میں ہوتی ہے، یہ از مہینے دیکھا ہے
جھکی جب نظریں اسکی، ہی کو مہینے دیکھا ہے
Haya Nazron Mein Hoti Hai, Ye Aaz Maine Dekha Hai
Jhuki Jab Nazren Uski, Haya Ko Maine Dekha Hai
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Yuva - MSN India | भोले भंडारी का प्रिय श्रावण मास
Written By पंडित दयानन्द शास्त्री on रविवार, 17 जुलाई 2011 | 4:27 pm
ग़ज़लगंगा.dg: इन्हीं सड़कों से रगबत थी......
इन्हीं सड़कों से रगबत थी, इन्हीं गलियों में डेरा था.
यही वो शह्र है जिसमें कभी अपना बसेरा था.
सफ़र में हम जहां ठहरे तो पिछला वक़्त याद आया
यहां तारीकिये-शब है वहां रौशन शबेरा था.
वहां जलती मशालें भी कहां तक काम आ पातीं
जहां हरसू खमोशी थी, जहां हरसू अंधेरा था.
खजाने लुट गए यारो! तो अब आंखें खुलीं अपनी
जिसे हम पासबां समझे हकीकत में लुटेरा था.
कोई तो रंग हो ऐसा कि जेहनो-दिल पे छा जाये
इसी मकसद से मैंने सात रंगों को बिखेरा था.
अंधेरों के सफ़र का जिक्र भी मुझसे नहीं करना
जहां आंखें खुलीं अपनी वहीं समझो शबेरा था.
वो एक आंधी थी जिसने हमको दोराहे पे ला पटका
खता तेरी न मेरी थी ये सब किस्मत का फेरा था.
मैं अपने वक़्त से आगे निकल आता मगर गौतम
मेरे चारो तरफ गुजरे हुए लम्हों का घेरा था.
भय और भक्ति
ज़माने से नफरत करो
हमसे मोहब्बत करो, ज़माने से क्यूँ डरते हो || 1 ||
جمانے سے نفرت کرو، ہمسے کیوں کرتے ہو،
ہمسے موحبّت کرو، جمانے سے کیوں ڈرتے ہو،
Jamane Se Nafart Karo, Hamse Kyun Karte Ho.
Hamse Mohabbat karo, Jamane Se Kyun Darte Ho.
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न कुछ कहो, नैनों को कहने दो |
न कुछ सुनो, सांसों को बहने दो || 2 ||
نہ کچھ کہو، نینو کو کہنے دو.
نہ کچھ سنو، سانسوں کو بہنے دو.
Na Kuch Kaho, Naino Ko Kahne Do.
Na Kuch Suno, Sanson Ko Bahne Do.
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ऐसे तो उदास न बनो, दिल के तलबगार न बनो |
गर हो गयी खता हमसे, उसे अब माफ़ करो || 3 ||
ایسے تو اداس ن بنو، دل کے طلبگار ن بنو
گر ہو گیے کھاتا ہمسے، اسے اب معاف کرو
Aise To Udaas Na Bano, Dil Ke Talabgaar Na Bano.
Gar Ho Gayee Khata Hamse, Use Ab Maaf Karo.
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क्यूँ ये परवाना इस तरह जान देता है,
जलती शमाँ में अपने को डुबो देता ये |
गर इश्क में इसका भी बस चलता तो,
जान देने पर शमाँ को मजबूर करता ये || 4 ||
کیوں یہ پروانہ اس طرح جان دیتا ہے،
جلتی سما میں اپنے کو دبا دیتا یہ،
گر اشک میں اسکا بھی بس چلتا تو،
جان دینے پر شمع کو مزبور کرتا یہ.
Kyun Ye Parwana Is Tarah Jaan Deta Hai,
Jalti Shama Mein Apne Ko Dubo Deta Ye.
Gar Ishk Mein Iska Bhi Bas Chalta To,
Jaan Dene Par Shama Ko Mazboor Karta Ye.
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आप बोलिए और बताइये इस भटकाव का अंत होगा कैसे ?
समलैंगिकता और बलात्कार की घटनाएं क्यों अंजाम देते हैं जवान ? Rape
वो खड़ी है
Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on शनिवार, 16 जुलाई 2011 | 6:56 am
किसी के इंतज़ार में,
कोई तो आने वाला है,
आखें गडी हैं, राह पर,
तक रही हैं, हर राही को,
दिल बेचैन हो रहा है,
अमन चैन खो रहा है,
बार-बार घडी वो देख रही है,
पर वो खड़ी है,
किसी के इंतज़ार में,
वक्त कुछ गुज़र रहा है,
दिल उसका बैठ रहा है,
सोच कुछ न रही है,
मन अटकलों में जा रहा है,
वो होश खो रही है,
जोश वो खो रही है,
पर जज्बा न खो रही है,
वो अभी न रो रही है,
वो अभी तक खड़ी है,
किसी के इंतज़ार में,
गुरूपूर्णिमा पर विशेष - अपना उद्धार स्वयं करें
Written By Bharat Swabhiman Dal on शुक्रवार, 15 जुलाई 2011 | 5:34 pm
इस बात में कोई संदेह नहीं कि दिव्यभूमि भारतवर्ष में ऐसे असाधारण गुरू आज भी मौजूद है जो लोगों की बेचैनी , व्याकुलता और कुंठा का समाधान साधारण तरीके से करने की क्षमता रखते है । साथ ही ये आध्यात्मिक गुरू लोगों के जीवन को कठिन बनाने वाली चुनौतियों का समाधान भी कर रहे है ।
शिष्य को गुरू की जितनी आवश्यकता रहती है , उससे अधिक आवश्यकता गुरू को शिष्य की रहती है । जिसके भीतर अपने उद्धार की लगन होती है जो अपना कल्याण करना चाहते है तो उसमें बाधा कौन दे सकता है ? और अगर आप अपना उद्धार नहीं करना चाहते तो आपका उद्धार कौन कर सकता है । कितने ही अच्छे गुरू हों , सन्त हों पर आपकी इच्छा के बिना कोई आपका उद्धार नहीं कर सकता ।
गुरू , सन्त और भगवान भी तभी उद्धार करते हैं , जब मनुष्य स्वयं उन पर श्रद्धा - विश्वास करता है , उनको स्वीकार करता है , उनके सम्मुख होता है , उनकी देशनाओं का पालन करता है । अगर मनुष्य उनको स्वीकार न करें तो वे कैसे उद्धार करेंगे ? नहीं कर सकते । स्वयं शिष्य न बने तो गुरू क्या करेगा ? जैसे दूसरा कोई व्यक्ति भोजन तो दे देगा , पर भूख स्वयं को चाहिए । स्वयं को भूख न हो तो दूसरे के द्वारा दिया गया बढिया भोजन भी किस काम का ? ऐसी ही स्वयं में लगन न हो तो गुरू का , सन्त - महात्माओं का उपदेश किस काम का ?
भारत भूमि में गुरू , सन्त और भगवान का कभी अभाव नहीं होता । अनेक सुविख्यात सन्त हो गये , आचार्य हो गये , गुरू हो गये पर अभी तक हमारा उद्धार नहीं हुआ है । इससे सिद्ध होता है कि हमने उनको स्वीकार नहीं किया । अतः अपने उद्धार और अपने पतन में हम ही कारण है । जो अपने उद्धार और पतन में दूसरे को कारण मानता है , उसका उद्धार कभी हो ही नहीं सकता । वास्तव में मनुष्य स्वयं ही अपना गुरू है । इसलिए उपदेश स्वयं को ही दें । दूसरे में कमी न देखकर अपने में ही कमी देखें और उसे दूर करने की चेष्टा करें । तात्पर्य यह है कि वास्तव में कल्याण न गुरू से होता है और न ईश्वर से ही होता है , प्रत्युत हमारी सच्ची लगन से होता है । स्वयं की लगन के बिना तो भगवान भी कल्याण नहीं कर सकते ।
गुरू बनाने से अधिक महत्वपूर्ण है गुरू की देशनाओं पर चलना । यदि गुरू बनाने मात्र से कल्याण हो जाता तो दत्तात्रेय 17 गुरू न बनाते । स्वामी रामतीर्थ ने तो यहां तक कह डाला कि न तो राम तुम्हारा कल्याण कर सकते है न ही कृष्ण । तुम्हें अपना रास्ता स्वयं चुनना होगा और उस पर चलना होगा ।
गुरू की महिमा कौन नहीं जानता ? इसमें कोई संदेह नहीं कि गुरू का समय - समय पर दिशा - निर्देश पाते रहना चाहिए । गुरू तो हमें अध्यात्म का मार्ग दिखाता है , अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है । हमें सत्य के मार्ग पर चलने तथा मानसिक विकारों से मुक्ति की युक्ति बताता है । वह हमारा मददगार है । हम उसका सम्मान करें । हम उसको नमन करें । उनके प्रति कृतज्ञ रहें । जहां तक परमात्मा का स्थान है उसे कोई नहीं ले सकता ।
स्वामी सत्यमित्रानंद जी कहते है कि मैं तो तुम्हारी तरह साधक हूँ । आपका विश्वास ही आपकी प्राप्ति है । ऐसे सच्चे महापुरूषों का , सद्गुरूओं का सान्निध्य मिल जाये तो साधक भाग्यशाली है । याद रखों आपका उद्धार गुरू के अधीन है , न सन्त - महात्माओं के अधीन है और न भगवान के अधीन है । अपना उद्धार तो स्वयं के ही अधीन है ।
आज गुरूपूर्णिमा का महापर्व है , गुरू की देशनाओं को जीवन में उतारने का संकल्प लेने का दिन है । सभी को गुरूपूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ ।
- विश्वजीतसिंह
अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए
एक और मुद्दा राजनीतिक केंद्र बनने को तैयार है
एक बार फिर मुंबई पर हुआ आतंकियों का वार है
फिर ना कहीं आतंकी दोषियों पर सियासत गरमाए
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए
वैसे भी, आजकल देश में महंगाई का दौर बढ़ा है
इन दिनों मुर्गों और बकरों का भाव भी चढ़ा है
फिर ना कोई जेलों में ताजा चिकन-बिरयानी खाए
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए
आवाम देश की गरीबी, भूखमरी से जूझ रही है
और सिंहासन को दोषियों को पकड़ने की सूझ रही है
फिर ना किसी की सुरक्षा पर करोड़ों-अरबों रूपये बहायें
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए
आतंकी हमले के दोषी को पकड़ने से भी क्या होगा
चलेंगे सालो साल मुक़दमे, इससे ज्यादा क्या होगा
फिर ना जेल में कोई आतंकी बेख़ौफ़ आराम फरमाए
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए
अफजल को फांसी मुक़र्रर, मिली नहीं अब तक भी
आतंक से थर्राया देश, पर सत्ता हिली नहीं अब तक भी
फिर अफजल, कसाब जैसे कानून को ठेंगा दिखलायें
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए.
-विभोर गुप्ता (9319308534)
शौच
शौच और सोच दोनों एक ही तरह से हैं |
शौच करने जब कोई जाता है तभी वह सोचता भी है |
शौच करने के समय उसको बहुत से सोच आते हैं |
और जब गाँव में शौच करने जाते हैं तो कोई
कहीं बैठा होता है और कोई कहीं बैठा होता है |
तो उस समय जो चर्चा होती है उसी चर्चा को
गुफ्तगु कहते है यानी गु (शौच ) करते समय की गयी चर्चा |
और यह गुफ्तगु बहुत ही महत्तवपूर्ण होती है |
तो शौच और सोच तथा गुफ्तगु यह जीवन में बहुत मायने रखते हैं |
कई लोग तो शौच करते हुए ही अपने सारे दिन का प्लान सोच लेते हैं |
और वह प्लान भी अच्छा होता है |
और अक्सर अच्छे-अच्छे प्लान शौच में ही आते हैं |
इसलिए अक्सर लोग शौच में घुसे रहते हैं |
देखिए ‘तकनीकी एग्रीगेटर‘ लिंक पर
जिन विद्वानों ने तकनीकी लेखन किया है, उनसे अनुरोध है कि अपनी बेहतरीन पोस्ट्स (जितनी भी चाहें) का और अपने ब्लॉग या वेबसाइट का लिंक इस पोस्ट्स के कमेंट में या फिर ईमेल के द्वारा उपलब्ध करा दें ताकि उन्हें ‘टेक एग्रीगेटर‘ में सजाया जा सके।
हिंदी ब्लॉगिंग को बढ़ावा देने के लिए सभी को अपने पूर्वाग्रहों से उबरना होगा।
इसी संदेश के साथ आप देखिए ‘तकनीकी एग्रीगेटर‘ निम्न लिंक पर !
ये बुज़दिल हरामी आतंकवादी क्या पाना चाहते हैं ? Solution
Written By DR. ANWER JAMAL on गुरुवार, 14 जुलाई 2011 | 8:47 pm
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| Photo : http://piyush.jainji.com/tag/13th-july-2011-serial-blasts-photos/ |
उसी का ख़ून पानी है वही बहेगा !!
शाम ढलने लगी है, अँधेरे को थोडा भगा दूँ
कुछ जतन करो ऐसा कि कोई गम तुम्हें न होने पाए |
बशर्ते जिन्दगी का फलसफा तुम कुछ समझ पाए |
उससे पहले यह न जिन्दगी खत्म होने पाए |
गर तुझे खुदा मिल जाए तो कहना न किसी से |
नूर खुद अपनी कहानी कह देगा इस जहां से |
वक्त न जाया कर कुछ खुदा को भी याद कर |
मुद्दतें बीत जाती हैं खुद को खुद से भरमा कर |
मौत के दरवाजे पर मुत्त्सर नहीं होता लम्हा एक |
याद कर खुदा को बन जा बन्दा अब नेक |
नवाजिस है जुस्तुजू है रूह की इन्तहा है |
मत पूछ की तू कहाँ है तू कहाँ है तू कहाँ है |
यह जिन्दगी का नहीं, मौत का सफ़र है |
जिन्दगी बस मौत को भुलाने का कफर है |
शाम ढलने लगी है, अँधेरे को थोडा भगा दूँ |
शमा की रौशनी से चिरागों तो थोडा जला दूँ |
मौत से मत पूछ जिन्दगी किसे कहते हैं |
रुखसत हुआ इस जहाँ से लोग यूँ कहते हैं |
मौत का यह सफ़र है जिन्दगी का नहीं |
इसकी मंजिल तो मौत है जिन्दगी नहीं |
किस्सा ये साफगोई का यूँ ही ख़तम नहीं होता |
मंज़र पर मंज़र चले जाते हैं पर माजरा ख़तम नहीं होता |
रौशनी की रोशनाई में इबारतें लिख दी जाती हैं |
रौशनी ख़त्म हो जाती हैं पर किस्सा ख़तम नहीं होता |
वह ऐतबार ही क्या जो उठ जाए हकीकत से |
पेश कर हकीकतें उन मसीहाओं की ||
जानकर हकीकत उस खुदा की |
तेरा भी ऐतबार उस खुदा पर हो जाएगा ||
खुदा से न पूँछ अपने से सवाल कर |
सुर्रे को छककर पी फिर बवाल कर ||
रहयिक का स्वाद चख फिर मलाल कर |
है खुदा तेरे साथ इतना तो ख्याल कर ||
सुर्रा - नाभि
रहयिक - अमृत
विखरी हुई सासों को सम्हालने का वक्त आ गया |
सांसों के दरमियाँ रहने का वक्त आ गया |
------- बेतखल्लुस
.
मनोदशा अर्थात मन की दशा, मन की दशा क्या होती है, यह कहना थोड़ा मुश्किल है। क्यूंकि मन तो चंचल होता है, पल-पल में बदलता रहता है, मन पर काबू पाना बहुत ही मुश्किल बात है। किन्तु नामुमकिन नहीं, परंतु मन की कुछ बातों पर तो आप काबू पा सकते हैं। मगर हर बार, हर बात में मन पर काबू पा सकना या पा लेना यह एक आम इंसान के लिए मुमकिन नहीं और यहाँ मुझे एक गीत की एक लाइन याद आ रही है। जैसा कि आप सभी जानते हैं मेरे हर लेख में कोई न कोई फ़िल्मी गीत जरूर जुड़ जाता है। J पता नहीं क्यूँ जब भी मैं कुछ लिखने जाती हूँ उस पर आधारित कोई न कोई फ़िल्मी गीत मेरे ज़हन में आ ही जाता है।
“जीत लो मन को पढ़ कर गीता मन ही हारा तो क्या जीता, तो क्या जीता हरे कृष्ण हरे राम”
कहने का मतलब यह है कि गीता में भी कहा गया है कि अगर जीवन में सफलता पानी है और मोह माया से छुटकारा पाना है, तो सब से पहले अपने मन को जीत लो फिर सब कुछ तुम्हारे हाथ होगा। अर्थात “मन के हारे, हार है और मन के जीते जीत”
खैर यह तो थी गीता की बात हम तो बात कर रहे थे, साधारण परिस्थिति में मनोदशा की बात आपने देखा होगा कि जब कभी हम कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेने जाते है। तो हमारा मन अकसर दो भागों में बंट जाता है और हमको निर्णय लेनें में बहुत असुविधा महसूस होती है, कि क्या सही है क्या गलत, दिल कुछ और कहता है, दिमाग कुछ और, कहने वाले कहते हैं ऐसे हालात में हमको हमेशा अपने मन की सुनना चाहिए, मगर कुछ लोग यह भी कहते हैं कई बार दिल से लिए फ़ैसले भी गलत हो सकते है क्यूंकि दिल भावनाओं से बंधा होता है और भगवान ने खुद इंसान को दिमाग का दर्जा दिल से ऊपर का दिया है। मगर क्या करें
“दिल है कि मानता नहीं”
ऐसे ही आपने कई बार यह भी देखा होगा कि जब हम कोई निर्णय लेने वाले होते हैं या लेने के विषय मे गहनता से सोच रहे होते है, तो उस विषय के हर बिन्दु पर गौर किया करते हैं कि उस के क्या परिणाम हो सकते है और बहुत सोचने समझने के बाद जब हम किसी नतीजे पर पहुँचते हैं, तो मन मे एक बार आता है, अब जो होगा सो देखा जाएगा और हम फैसला ले डालते है। मगर फिर कुछ दिनों बाद हमको ऐसा क्यूँ लगता है कि काश ऐसा हो पता तो कितना अच्छा होता। मतलब हमको हमारे द्वारा लिए गये निर्णय पर ही मलाल होने लगता है और यह जानते हुये भी कि अब वो निर्णय बदला नहीं जा सकता, पर फिर भी हमारा मन है कि हमको अंदर से एहसास कराता रहता है कि बदल सकता तुम्हारा निर्णय तो शायद ज्यादा अच्छा होता। क्यूँकि कभी-कभी हमारा मन स्वार्थी भी हो जाया करता है।
कुछ दिनों पहले की ही बात है। जब हम ने इंडिया आने के लिए टिकिट बुक की थी, तब सारी स्थिति को देख परख कर कि इतने दिनों में कब कहना रहना संभव हो सकेगा यह सब सोच कर हमने सभी (प्लेन) हवाई जहाज और ट्रेन के टिकिट बुक किये थे। मगर उस के बावजूद भी कुछ दिनों बाद मुझे लगने लगा था, कि काश मैं अपने मायके में थोड़े और ज्यादा दिन रुक पाती तो अच्छा होता, जबकि मुझे खुद पता था कि ऐसा होना संभव नहीं है। तभी तो जो सोच कर निर्णय लिया था वो इसलिए लिया था कि बाद में ऐसा कोई पछतावा न हो, मगर मन का क्या है वो तो कभी पूर्णरूप से संतुष्ट होता ही नहीं, ना कभी हुआ है, और ना ही कभी होगा। इसे ही तो कहते है न मन का स्वार्थी होना J
अब मैं आप को एक और मनोदशा से अवगत करती हूँ। वो है (करेंसी) अर्थात मुद्रा को लेकर उत्पन्न होने वाली मनोदशा आप को शायद पता हो, जब कोई भी इंसान नया-नया इंडिया से यहाँ आता है मतलब केवल यहीं नहीं बल्कि इंडिया से बाहर कभी भी, कहीं भी जाता है, तो उस देश में पैसे को लेकर उसकी मनोदशा क्या होती है। जब भी वो कुछ खरीदने की द्रष्टी से बाजार जाता है, तो पूरे समय उसका दिमाग इस ही उधेड़ बुन में लगा रहता है कि यदि यह चीज यहाँ (1) एक पाउंड की है, तो इंडियन रुपयों के हिसाब से कितने की हुई। फिर चाहे वो चीज उसके लिए कितनी भी साधारण या कितनी भी महत्वपूर्ण क्यूँ न हो, हर छोटी बड़ी चीज में उसका मन इस ही बात को लेकर उलझा रहता है। यहाँ तक की जब कोई और अपनी खरीदी हुई किसी चीज के बारे में बात करें या बताएं, तब भी सामने वाले का दिमाग तुरंत उस चीज के मूल्य को भारतीय रुपयों में बदल कर देखना शुरू कर देता है।
खैर जो लोग यहाँ नए-नए आयें है, उनका ऐसा करना तो समझ में आता है। हम भी किया करते थे, जब हम यहाँ नए-नए आये थे। मगर अब इतने साल गुजर जाने के बाद अब हमको ऐसा कुछ नहीं लगता जो सामान जितने का है, उसे हम यहां की (करेंसी) अर्थात मुद्रा के हिसाब से ही देखते है और लेते है। मगर आश्चर्य तो तब होता है, जब हम उन लोगों को देखते है, जो हम से भी पहले से यहाँ रह रहें हैं, वो लोग आज भी इस उधेड़बुन से नहीं निकल पाये हैं। बल्कि अगर मैं अपनी बात करूँ और सच कहूँ तो मेरे साथ तो अब उल्टा ही हो गया है। अब जब मैं इंडिया आकर कुछ ख़रीदती हूँ तो अब उस चीज के मूल्य को मैं पाउंड की नज़र से देखने लगी हूँ J यह भी तो एक प्रकार की मनोदशा ही है। है ना J
अंतत बस इतना ही कि आज शायद मैं अपने इन अनुभवों से आप सभी को मनोदशा अर्थात मन की दशा का अर्थ समझा पाई हूँ या शायद नहीं भी, मगर मेरे हिसाब से और मेरे विचार से मन की दशा पर आज तक न कोई काबू कर पाया है और न ही कभी कर पाएगा जिस दिन जिस किसी ने भी मन की इस परिस्थिति पर काबू पा लिया उस दिन वो इंसान, इंसान न रह कर भगवान बन जाएगा। क्यूंकि इंसान तो भावनाओं से मिलकर बना है और यह भावनाएं ही हैं जो इंसान को जानवर से अलग करती हैं। तो जहां भावनायेँ होगी वहाँ स्वार्थ भी होगा और जहां स्वार्थ होगा वहाँ कभी मन पर काबू किया ही नहीं जा सकेगा। ऐसा मेरा मत है। जय हिन्द....






