नियम व निति निर्देशिका::: AIBA के सदस्यगण से यह आशा की जाती है कि वह निम्नलिखित नियमों का अक्षरशः पालन करेंगे और यह अनुपालित न करने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से AIBA की सदस्यता से निलम्बित किया जा सकता है: *कोई भी सदस्य अपनी पोस्ट/लेख को केवल ड्राफ्ट में ही सेव करेगा/करेगी. *पोस्ट/लेख को किसी भी दशा में पब्लिश नहीं करेगा/करेगी. इन दो नियमों का पालन करना सभी सदस्यों के लिए अनिवार्य है. द्वारा:- ADMIN, AIBA

यादों की एल्बम ...ड़ा श्याम गुप्त ...

Written By shyam gupta on शनिवार, 23 जुलाई 2011 | 10:58 am

सांझ ढाले जब दीप जले ,
और बदली में चाँद चले ,
यादों के तले हो रात ;
तन स्वप्नों के आँगन में ,
मैं तुमको ढूँढता हूँ ,
प्रिय तुमको ढूँढता हूँ |

जब ख़्वाबों की अंगडाई,
इस मन में इठलाती है ;
जब याद तेरी प्रियतम,
इस दिल में गहराती है ;
तब धुंध भरी सुबहों में,
मैं तुमको ढूँढता हूँ |

तुम पास नहीं होते हो,
जब जब हे प्रियतम मेरे ;
चाहत के वी सी पी पर,
ख्यालों की इन रीलों में,
यादों के परदे पर ही,
मैं तुमको ढूँढता हूँ |

यादों की एल्बम से,
जब मन भर जाता है;
यादों की यादों से भी,
जब ये दिल घबराता है ;
अपने ही पदचापों में,
मैं तुमको ढूँढता हूँ ||


खबरगंगा: प्रिंट मीडिया : अंध प्रतिस्पर्द्धा की भेंट चढ़ते एथिक्स

Written By devendra gautam on शुक्रवार, 22 जुलाई 2011 | 11:20 pm

अभी मीडिया जगत की दो ख़बरें जबरदस्त चर्चा का विषय बनी हैं. पहली खबर है अंतर्राष्ट्रीय मीडिया किंग रुपर्ट मर्डोक के साम्राज्य पर मंडराता संकट और दूसरी हिंदुस्तान टाइम्स इंदौर संस्करण में लिंग परिवर्तन से संबंधित एक अपुष्ट तथ्यों पर आधारित रिपोर्ट को लेकर चिकित्सा जगत में उठा बवाल. इन सबके पीछे दैनिक अख़बारों के बीच बढती प्रतिस्पर्द्धा के कारण आचार संहिता की अनदेखी की प्रवृति है. इस क्रम में एक और गंभीर बात सामने आई की मीडिया हाउसों का नेतृत्व नैतिक दृष्टिकोण से लगातार कमजोर होता जा रहा है. विपरीत परिस्थितियों का मुकाबला करने की जगह वह हार मान लेने या अपनी जिम्मेवारी अपने मातहतों के सर मढने की और अग्रसर होता जा रहा है. रुपर्ट मर्डोक जैसी शख्सियत ने फोन हैकिंग का आरोप लगने के बाद सार्वजानिक क्षमा याचना के बाद अपने बहुप्रसारित अखबार न्यूज ऑफ़ दी वर्ल्ड को बंद कर दिया लेकिन हॉउस ऑफ कॉमंस की मीडिया कमिटी के समक्ष हैकिंग के लिए अखबार की संपादकीय टीम को दोषी बताते हुए स्वयं को इससे पूरी तरह अनभिग्य बताया. अखबारी दुनिया की हल्की जानकारी रखने वाले के गले से भी उनकी बात नीचे नहीं उतर पायेगी. यह सच है कि अख़बार में छपने वाली ख़बरों के संकलन के तौर-तरीके और उनके चयन के लिए पूरी तरह जिम्मेवार उसका संपादक होता है. लेकिन कोई भी रणनीति तय करने और अंजाम देने के पहले वह अखबार के मालिक को विश्वास में जरूर लेता है. मीडिया किंग का यह कहना कि उन्हें कोई जानकारी ही नहीं थी या तो उनकी कायरता का परिचायक है या फिर प्रबंधकीय अक्षमता का. कायरता पूर्ण बयान देकर वे एक झटके में हीरो से जीरो बन गए हैं. यदि उन्होंने यह कहा होता कि अखबार का मालिक होने के नाते जो भी हुआ मैं उसकी नैतिक जिम्मेवारी स्वीकार करता हूं तो कानून के वे भले ही अपराधी होते लेकिन पूरी दुनिया के मीडिया की नज़र में उनका कद बहुत ऊंचा हो जाता. उनका मीडिया साम्राज्य और भी तेज़ी से पुष्पित-पल्लवित होता लेकिन तो उनकी बादशाहत को ताश के पत्तों की तरह भरभराकर ढह जाने से कोई भी नहीं रोक सकता. वे मीडिया कर्मियों और पाठकों की नज़र से गिर चुके हैं. जाहिर है कि यदि निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ तथ्यों को उजागर करने तक अखबार की भूमिका सीमित रक्खी जाती तो फोन हैकिंग जैसे गैर कानूनी तिकड़मों को अपनाने की जरूरत नहीं पड़ती. इस तरह के तरीकों का इस्तेमाल प्रतियोगी को पछाड़ कर आगे निकलने और बाज़ार पर अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए किया जाता है. यह सच को हिंग फिटकिरी डालकर तड़का बनाने भर का नहीं बल्कि सनसनी फैलाकर पाठकों को चौंकाते रहने के दुराग्रह का मामला है.
इधर हिंदुस्तान टाइम्स के इंदौर संस्करण में लिंग परिवर्तन से संबंधित एक रिपोर्ट को इतना सनसनीखेज़ बनाकर छापा गया कि चिकत्सा जगत में थुककम-फजीहत की नौबत आ गयी. जेनिटोप्लास्ती के जरिये शल्य चिकित्सा कर एक उभयलिंगी शिशु को लड़की से लड़का बनाया गया था. यह कोई नयी बात नहीं थी. हाल के वर्षों में कई शहरों के आधुनिक अस्पतालों में ऐसे ऑपरेशन सफलता पूर्वक किये जा चुके हैं. यह बॉक्स में दी जाने वाली खबर होती है. लेकिन समस्या यह थी कि उसी दिन प्रतियोगी अखबार डीएनए का इंदौर संस्करण लॉंच होने वाला था और हिंदुस्तान टाइम्स को कोई धमाकेदार खबर देकर उसे चौंका देना था. इसलिए इस खबर को इस रूप में बनाया गया जैसे इंदौर में लिंग परिवर्तन का एक नया अध्याय शुरू हुआ है और यहां के चिकित्सक किसी भी लड़की को लड़का बना देने की तकनीक विकसित कर चुके हैं. चिकित्सा विज्ञानं की दृष्टि में यह असंभव बात थी. पुरुष हारमोन और कम से कम अविकसित लिंग के अभाव में यह संभव ही नहीं है. लिहाज़ा प्रथम पृष्ठ के लीड के रूप में छपी इस खबर को चुनौती दी जाने लगी. जिस चिकित्सक के साक्षात्कार के आधार पर रिपोर्ट तैयार की गयी थी उसने साक्षात्कार लेने वाले पत्रकार से कहा था कि खोजी पत्रकारिता में दिलचस्पी हो तभी पूरी छानबीन के बाद किसी निष्कर्ष पर पहुंचना और उसके बाद ही इसे प्रकाशित करना उचित होगा लेकिन इतनी सब्र कहां थी. डीएनए को चुनौती जो देनी थी. आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर बन गयी एक सनसनीखेज़ बिग स्टोरी.जब आलोचना होने लगी तो प्रधान संपादक तक पल्ला झाड़ गए. एक दूसरे के सर पर जिम्मेवारी का ठीकरा फोड़ा जाने लगा. नैतिक साहस का अभाव यहां भी दिखा.
सवाल उठता है कि मीडिया घरानों के बीच अंध प्रतिस्पर्द्धा का यह दौर प्रिंट मीडिया को कहां ले जाएगी. छपे शब्दों की विश्वसनीयता को कितना आघात पहुंचेगी और मूल्यों के प्रति जिम्मेवार पत्रकारिता का युग क्या अब समाप्त मान लेना चाहिए..? कोई आचार संहिता अब शेष नहीं रह जाएगी. कभी पेड़ न्यूज कभी नीरा राडिया जैसे लोगों के साथ घोटाले के तार बुनना ही मीडिया और मीडिया कर्मियों का एकमात्र लक्ष्य रह जायेगा ..?

----देवेंद्र गौतम

काहे खून तेरा प्यारे अब खौलता नहीं —??



तोड़ लिया कोई फूल तुम्हारा
खाली हो गयी क्यारी
उजड़ जा रहा चमन ये सारा
गुल गुलशन ये जान से प्यारी
खुश्बू तेरे मन जो बसती
मिटी जा रही सारी
पत्थर क्यों बन जाता मानव
देख देख के दृश्य ये सारे
खींच रहा जब -कोई साड़ी
cheer-haran_6412
काहे खून तेरा प्यारे अब
खौलता नहीं —??
(फोटो साभार गूगल देवता /नेट से लिया गया )
————————–
साँप हमारे घर में घुसते
अंधियारे क्यों भटक रहा
जिस बिल से ये चले आ रहे
दूध अभी भी चढ़ा रहा ?
तू माहिर है बच भी सकता
भोला तो अब भी भोला है
दोस्त बनाये घूम रहा
उनसे अब भी प्यार जो इतना
बिल के बाहर आग लगा
बिल में ही रह जाएँ !
काट न खाएं !
इन भोलों को !!
लाठी क्यों ना उठा रहा ??
काहे खून तेरा प्यारे अब
खौलता नहीं —??
————————
तोड़-तोड़ के पत्थर दिन भर
बहा पसीना लाता
धुएं में आँखें नीर बहाए
आधा पका – बनाता
बच्चों को ही पहले देने
पत्तल जभी सजाता
मंडराते कुछ गिद्ध -बाज है
छीन झपट ले जाते
कल के सपने देख देख के
चुप क्यों तू रह जाता
काहे खून तेरा प्यारे अब
खौलता नहीं —??
—————————
शुक्ल भ्रमर ५
२०.०७.२०११ जल पी बी
८.५५ पूर्वाह्न

लब तक खींचा अरु छोड़ गयी

Written By नीरज द्विवेदी on गुरुवार, 21 जुलाई 2011 | 9:15 pm


मैं जोकर था क्या सर्कस का,
देखामुस्काया अरु भूल गयी।
या तीर था तेरे तरकश का,
लब तक खींचा अरु छोड़ गयी॥

मैं तो अंकुर हूँ जीवन का,
संसार तेरा भर देता मैं।

मन को बाँध पाना मंत्र जप में नहीं है

.

मन को बाँध पाना मंत्र जप में नहीं है |
यही मंत्र जप का मंत्र एक दिन परेशान कर देगा |
फिर इस मंत्र से छुटकारा पाना मुश्किल हो जाएगा |
यही फिर टकराएगा और घूमेगा पूरे मन में |
चैन से न रहने देगा मन को और मनवाले को |
मंत्र जप करने वालों की हालत बड़ी बुरी होती है |
हाथ में माला और मुहं में मंत्र जप की बोली होती है |
मंत्र जप फिर निरंतर चलता रहता है |
जप करने वाले को वह ठीक से सोचने और शांत भी नहीं रहने देता है |
बात भी करता है तो मंत्र चलता है अन्दर |
अब उस मंत्र से वह भागना भी चाहता है तो भाग नहीं पाता |
मन को शांत करना है तो फिर करो कोई और उपाय |
या फिर करने दो उसे जो कर रहा है वह |
पर मत जाने दो शरीर को उसके पीछे |
शरीर के मालिक तुम हो यह जान कर चलो |
मन कितना भागेगा, आखिर भाग-भाग कर थक जाएगा |
बस ख्याल यह रखो की इसके पीछे शरीर को मत जाने दो |
फिर जब यह थक जाएगा और शरण तुम्हारी आएगा तो फिर काबू कर लो इसे |
और मालिक बन जाओ इसके, अब यह तुम्हारे कहे अनुसार चलेगा |

.

मेरी बिटिया सदफ स्कूल क्लास प्रतिनिधि का चुनाव जीती

Written By आपका अख्तर खान अकेला on मंगलवार, 19 जुलाई 2011 | 10:23 pm

मेरी बिटिया सदफ स्कूल क्लास प्रतिनिधि का चुनाव जीती

मेरी बिटिया सदफ जो ६ वर्ष की है और सेंट जोसेफ स्कूल बेराज रोड कोटा में सेकंड क्लास में पढ़ती है  कल उसकी क्लास में हुए क्लास प्रतिनिधि का चुनाव जीत कर उसने जो ख़ुशी ज़ाहिर की वोह देखने लायाक थी उसकी ख़ुशी से हम खुद भी अपनी ख़ुशी नहीं रोक सके ...............दोस्तों मेरी सबसे छोटी बिटिया सदफ शुरू से ही पढने कमाल करती आई है लेकिन अतिरिक्त एक्टिविटी में भी वोह स्कूल के सभी कार्यक्रमों में हिस्सेदार रही है वोह नर्सरी से एच के जी तक मोनिटर रही फिर उनके स्कूल में निर्वाचन के आधार पर क्लास प्रतिनिधि चुनने का प्रावधान है क्लास फर्स्ट में वोह क्लास प्रतिनिधि निर्वाचित हुई लेकिन हमें कोई खास ख़ुशी नहीं थी ..इस बार पिछले सप्ताह स्कूल से जब बिटिया सदफ आई तो उसने मुझ से बढे भाई शाहरुख से , बहन जवेरिया से , मेरी शरीके हयात रिजवाना से और मेरे मम्मी पापा से एक ही बात कही के वोह स्कूल के क्लास प्रतिनिधि यानि सेकंड क्लास के प्रतिनिधि के चुनाव में खड़ी हुई है उसके अलावा एक लडकी और एक लडका और इस चुनाव में खड़ा है इसलिए सभी मिलकर उसके दुआ करे के वोह चुनाव में हर कीमत पर जीत कर आये ...उसका कहना था के पापा जो लड़का उसके मुकाबिल खड़ा है वोह तो बच्चों को चोकलेट देकर वोट मांग रहा है ..हमने बिटिया को समझाया के बेटा तुम तुम्हारे कर्म और तुम्हारे अखलाक से अगर तुम्हारे साथ के बच्चों की पसंद बन कर जीतो तो ठीक रहेगा वरना जो होगा देखा जायेगा .....खेर वक्त निकल गया और कल हमारी बिटिया सदफ क्लास प्रतिनिधि का चुनाव जीत कर जब बेच लायी तो उसकी ख़ुशी का पारावार नहीं था उसने बताया केसे एसेम्बली में सबके सामने उसे बुलाकर तालियों की गडगडाहट के बीच उसकी जीत की घोषणा की गयी और फिर खुशियों की बहार उसके मुख पर देखने लायक थी .................दोस्तों बात तो छोटी सी है लेकिन में स्कूलों में छोटी छोटी क्लासों में नेतृत्व क्षमता को बढ़ावा देने और सेवा कार्यों का बच्चों में भाव पैदा करने की इस दोस्ताना चुनाव की खूबियों को देखने लगा और सोचता रहा के बच्चों से लेकर बड़ों तक , स्कूल से लेकर कोलेज और फिर लोकसभा तक चनाव जो होते हैं उसमे कितना फर्क हो जाता है ..एक बच्चे का चुनाव जो बिना किसी खर्च के खामोशी से हो गया एक छात्रनेता यानी कोलेज का चुनाव जो काफी खर्चीला और उदंडता का हो गया है और फिर विधायक और लोकसभा के चुनाव में करोड़ों के खरीद फरोख्त के जो खेल होते हैं वोह तो आप सब जानते ही है ऐसे में सियासत बुरी है या उसे करने वाले बुरे हैं कुछ समझ नहीं आ पाता काश सभी चुनाव स्कूल के क्लास प्रतिनिधि की तरह शांत तरीके से हो तो शायद देश में कुछ सुधार आ जाए ...............अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

Pt. DAYANANDA SHASTRI has such a cool profile!

अन्नपूर्णा.....ड़ा श्याम गुप्त ...

भोजन ब्रह्म है,
और जीव -
हज़ार मुखों से ग्रहण करने वाला ,
वैश्वानर है,
जगत है;
और हज़ार हाथों से बांटने वाली ,
अन्नपूर्णा -
माया है उसी ब्रह्म की |

हाँ, ऐसा ही लगता है ,तब--
जब  तुम - तवा, चूल्हा , चकला-
रोटी, कलछा और कुकर पर,
एक ही समय में ध्यान दे लेती हो |
और , मुन्ना मुन्नी पापा व अन्य को ,
परोस भी देती हो,
एक साथ-
गर्मा-गर्म, सुस्वादु भोजन |
जैसे, अन्नपूर्णा -
हज़ार हाथों से,
सारे विश्व को तृप्त कर रही हो |
या कोई ज्ञान रूपा,
हज़ार भावों से-
वैश्वानर को,
चराचर को,
ब्रह्म का-
आस्वादन करा रही हो ||

खिलाफ़त कर के भी देखो ''

''खिलाफ़त कर के भी देखो ''

१३ जुलाई २०११ की शाम को हुए तीन धमाकों ने मुंबई सहित पूरे देश को फिर से दहला डाला .मुम्बईकरो ने साहस के साथ इसका मुकाबला किया और घायलों को अस्पताल पहुँचाया .मुम्बईकरो ने हर आतंकी हमले व् बम-विस्फोट का इसी हौसले के साथ डटकर मुकाबला किया है पर ''१४ जुलाई २०११ के ''अमर उजाला ''दैनिक समाचार पत्र में पृष्ठ  -१४ ''पर प्रकाशित ''दिल में टीस;पर नहीं टूटा  मुंबई का हौसला ''खबर में उल्लिखित एक बात ने  मुझे सोचने पर विवश कर दिया .खबर में लिखा था कि-''मुंबई के लोगों की जिन्दगी फिर से पटरी पर लौट रही है .सुबह लोग अपने दफ्तर जाते दिखे.कबूतरखाना के सामने एक स्कूल में बच्चों के चेहरे पर दहशत का नामोनिशां तक नहीं था .बच्चों का कहना था कि उन्हें धमाकों के बारे में मालूम है लेकिन वे डरते नहीं हैं .''
                           यही बात सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर इतनी शीघ्र मुंबई सामान्य कैसे हो गयी ?क्या बम-विस्फोंटों को उसने अपनी नियति समझ लिया है ?२० से ज्यादा हमारे जैसे  इंसानों के जिस्म के टुकड़े-टुकड़े हो गए .ठीक है हम दहशतगर्दों को ये जवाब देना चाहते हैं कि हम तुम्हारे हमलों से डरते नहीं हैं पर हम अगर एक सामान्य इन्सान है तो ऐसे मौके पर हमारे भीतर डर और आक्रोश दोनों ही प्रकट होने चाहियें .
                          मुंबई हमलों  के अगले दिन अपने दैनिक कार्यों पर न जाकर बम-विस्फोटों का अपने स्तर से शांतिपूर्ण विरोध करना चाहिए था .उन्हें प्रशासन व् सरकार को यह दिखाना चाहिए था कि हमारी जान इतनी भी सस्ती नहीं कि हम बम विस्फोटों की भेंट चढ़ने हेतु फिर निकल पड़ें .उन्हें हर सार्वजानिक कार्य का बहिष्कार कर यह सन्देश देना चाहिए था कि सत्तासीन लोगों सावधान हो जाओ -हम अब अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं .आप सत्ता भोग करने हेतु मंत्री पदों पर नहीं बैठाये गए हैं .हमें अपनी सुरक्षा की गारंटी चाहिए तभी हम  सामान्य रूप से सार्वजानिक कार्यों में लग पाएंगे .हम आप से सवाल करते हैं अपनी सुरक्षा को लेकर -अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर .आप क्या कर रहे हैं ?
                     प्रशासनिक लापरवाही का  विरोध तो मुम्बईवासियों को करना ही चाहिए था -जिसका एकमात्र स्वरुप हर सार्वजानिक कार्य का बहिष्कार था .हौसला टूटना नहीं चाहिए पर आक्रोश भी ऐसे समय पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए जिससे सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने वालों की कुम्भकर्णी नींद टूटे वरना सुन्न हुए अंग की भांति हमारी भावनाएं भी सुन्न पड़ जाएँगी .

                           ''मौत के आगे घुटने मत टेको ;
जिन्दगी को मौत बनने से भी रोको ;
हर हालत को सह जाना होशयारी नहीं 
एक बार तो खिलाफ़त करके भी देखो .
                    शिखा कौशिक 

तांका ----- दिलबाग विर्क

Written By डॉ. दिलबागसिंह विर्क on सोमवार, 18 जुलाई 2011 | 8:39 pm

धर्म अर्थ काम मोक्ष

धर्म कहते हैं ड्यूटी को | यानी की करनी ही करनी है | मना नहीं कर सकते हैं | चाहे आंधी हो, तूफान हो कुछ भी हो वह करना ही है, वह धर्म होता है |

अर्थ कहते है धन को जो की धर्म को ख़त्म कर देता है | किसी को उसके धर्म से गिराना हो, तो उसे धन दे दो, वह अपने धर्म से गिर जाएगा ,जैसे कहीं भी काम नहीं बन रहां है, तो धन दे दो वह अपने धर्म को छोड़ देगा पहले धन देने वाले का काम करेगा | यह है अर्थ |

काम कहते हैं ईक्षा को जो की धन को ख़त्म कर देती है, जैसे कोई वस्तु पसंद आयी तो, उसे हम धन से खरीद लेते हैं, और अगर धन न हो तो उसे फिर छीन लेते हैं | यह है काम | जब तक काम पूरा नहीं होता है तब तक मोक्ष का द्वार नहीं खुलता है | यही है काम |

मोक्ष यानी म ओ क्ष | यानी जब मन की रक्षा ओमकार से होती है उसे मोक्ष कहते हैं | सन्यासी को अपने मन की रक्षा करनी है की उसका मन भटके नहीं | जब यह अपने मन की रक्षा ओमकार से करता है | यानी ओमकार का जप करता है, तो उसे मोक्ष कहते हैं |

दिल का जख्म

दिल का

दिल का जख्म, तो, यूँ सीने से उभर आया है |
किसी ने दिल थोडा, दिल से लहू बह आया है |
दिखा न रहे थे, जमाने को, पर अब तो सब ने देखा है |
तेरी बेवफाई का, खौफनाक नतीजा ज़माने ने देखा है |

دل کا جخم، تو، یوں سینے سے ابھر آیا ہے
کسی نے دل تودہ، دل سے لہو بہ آیا ہے
دکھا ن رہے تھے، جمانے کو، پر اب تو سب نے دیکھا ہے
تیری بیوافی کا، کوفناک نتیجہ نمانے نے دیکھا ہے

Dil Ka Jakhm, To, Yun Seene Se Ubhar Aaya hai
Kisi Ne Dil Toda, Dil Se Lahoo Bah Aaya Hai
Dikha Na Rahe The, Jamane Ko, Par Ab To Sab Ne Dekha Hai
Teri Bewafai Ka, Kaufnaak Nateeja Jamane Ne Dekha Hai

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आंसू यूँ बह गए किसी कि बेवफाई से |
दरिया जैसे बह गया हो बड़ी रुखाई से |

آنسو یوں بہ گئے کسی کی بیوافی سے
دریا جیسے بہ گیا ہو بدی رکھی سے

Aansu Yun Bah Gaye Kisi Ki Bewafai Se
Dariya Jaise Bah Gaya Ho Badi Rukhai Se


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आखें न छुपाओ हांथों से, कुछ तो देख लेने दो |
रो रही हैं, कि खो रही हैं, इतना तो देख लेने दो |

اکھیں نہ چھپاؤ ہانتھوں سے، کچھ تو دیکھ لینے دو
رو رہی ہیں، کی کھو رہی ہیں، اتنا تو دیکھ لینے دو

Akhen Na Chhupao Hanthon Se, Kuch To Dekh Lene Do.
Ro Rahi Hain, Ki Kho Rahi Hain, Itna To Dekh Lene Do.

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हया नज़रों में होती है, ये आज मैंने देखा है |
झुकी जब नज़रें उसकी, हया को मैंने देखा है |

ہی نظروں میں ہوتی ہے، یہ از مہینے دیکھا ہے
جھکی جب نظریں اسکی، ہی کو مہینے دیکھا ہے

Haya Nazron Mein Hoti Hai, Ye Aaz Maine Dekha Hai
Jhuki Jab Nazren Uski, Haya Ko Maine Dekha Hai

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Yuva - MSN India | भोले भंडारी का प्रिय श्रावण मास

Written By पंडित दयानन्द शास्त्री on रविवार, 17 जुलाई 2011 | 4:27 pm

ग़ज़लगंगा.dg: इन्हीं सड़कों से रगबत थी......

इन्हीं सड़कों से रगबत थी, इन्हीं गलियों में डेरा था.

यही वो शह्र है जिसमें कभी अपना बसेरा था.


सफ़र में हम जहां ठहरे तो पिछला वक़्त याद आया

यहां तारीकिये-शब है वहां रौशन शबेरा था.


वहां जलती मशालें भी कहां तक काम आ पातीं

जहां हरसू खमोशी थी, जहां हरसू अंधेरा था.


खजाने लुट गए यारो! तो अब आंखें खुलीं अपनी

जिसे हम पासबां समझे हकीकत में लुटेरा था.


कोई तो रंग हो ऐसा कि जेहनो-दिल पे छा जाये

इसी मकसद से मैंने सात रंगों को बिखेरा था.


अंधेरों के सफ़र का जिक्र भी मुझसे नहीं करना

जहां आंखें खुलीं अपनी वहीं समझो शबेरा था.


वो एक आंधी थी जिसने हमको दोराहे पे ला पटका

खता तेरी न मेरी थी ये सब किस्मत का फेरा था.


मैं अपने वक़्त से आगे निकल आता मगर गौतम

मेरे चारो तरफ गुजरे हुए लम्हों का घेरा था.


-----देवेंद्र गौतम

भय और भक्ति

भय से ही भक्ति होती है | बिना भय के भक्ति नहीं होती है | भक्ति के लिए भय जरूरी है | जैसे हम किसी अनजान रास्ते से जाते हैं तो वहां पर अनायास ही हमको भय लगता है और उस भय को दूर करने के लिए हम हनुमान चालीसा पड़ते हैं, या फिर सीटी बजाते हैं और अपने आपको को यह आहसास दिलाते हैं की मैं अभी हूँ | यानी अपने आपको अपने आपसे एक करते हैं जिससे उसको बल मिलता है | इसलिए भक्ति करने के लिए भय जरूरी है | जब तक हम किसी से भयभीत होते हैं तभी तक हम उसकी भक्ति करते हैं और जब हमारा भय दूर हो जाता है तो फिर हम उसकी निंदा करते हैं | इसलिए भक्ति को जिन्दा रखने के लिए हमें अज्ञात भय को जिन्दा रखना पड़ेगा | क्यूंकि जब तब भय नहीं होगा भक्ति नहीं होगी | तो जो लोग भी भक्ति करवाना चाहते हैं तो फिर वह सबसे पहले भय बनाते हैं और भय बनाने के लिए उनको अपना बल दिखाना पड़ता है क्यूंकि बल ही तो भय बनाता है | बल नहीं होगा तो भय भी नहीं होगा | इसलिए लोक में शरीर को बलवान बनाने का यह सबसे बड़ा कारण है | क्यूंकि पहले आदमी किसी का शरीर ही देखता है और उस शरीर के हिसाब से किसी से बात आगे करता है | वह देखता है की शरीर से तो यह दुबला पतला है तो फिर उस पर चढ़ बैठता है और अगर देखता है की यह तो तगड़ा है तो फिर वह उससे मिमयाते हुए बात करता है | इसलिए लोग शरीर बनाते हैं जिससे वह दुसरे को भयभीत कर सकें | और जो लोग शरीर नहीं बनाते तो फिर वह तगड़े लोगों को अपना पहरेदार बना लेते हैं | यह पहरेदारी भी भय को फ़ैलाने के लिए है | इसलिए जहां भी भक्ति है वहां पहले भय जरूर है | और बल से ही भय होता है तो फिर वहां बल भी है | बल पहले बनाया जाता है फिर उस बल से किसी को भयभीत किया जाता है फिर उस भय से वह भक्ति करता है |

ज़माने से नफरत करो

ज़माने से नफरत करो, हमसे क्यूँ करते हो |
हमसे मोहब्बत करो, ज़माने से क्यूँ डरते हो || 1 ||


جمانے سے نفرت کرو، ہمسے کیوں کرتے ہو،
ہمسے موحبّت کرو، جمانے سے کیوں ڈرتے ہو،


Jamane Se Nafart Karo, Hamse Kyun Karte Ho.
Hamse Mohabbat karo, Jamane Se Kyun Darte Ho.




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न कुछ कहो, नैनों को कहने दो |
न कुछ सुनो, सांसों को बहने दो || 2 ||


نہ کچھ کہو، نینو کو کہنے دو.
نہ کچھ سنو، سانسوں کو بہنے دو.


Na Kuch Kaho, Naino Ko Kahne Do.
Na Kuch Suno, Sanson Ko Bahne Do.




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ऐसे तो उदास न बनो, दिल के तलबगार न बनो |
गर हो गयी खता हमसे, उसे अब माफ़ करो || 3 ||


ایسے تو اداس ن بنو، دل کے طلبگار ن بنو
گر ہو گیے کھاتا ہمسے، اسے اب معاف کرو


Aise To Udaas Na Bano, Dil Ke Talabgaar Na Bano.
Gar Ho Gayee Khata Hamse, Use Ab Maaf Karo.




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क्यूँ ये परवाना इस तरह जान देता है,
जलती शमाँ में अपने को डुबो देता ये |
गर इश्क में इसका भी बस चलता तो,
जान देने पर शमाँ को मजबूर करता ये || 4 ||


کیوں یہ پروانہ اس طرح جان دیتا ہے،
جلتی سما میں اپنے کو دبا دیتا یہ،
گر اشک میں اسکا بھی بس چلتا تو،
جان دینے پر شمع کو مزبور کرتا یہ.


Kyun Ye Parwana Is Tarah Jaan Deta Hai,
Jalti Shama Mein Apne Ko Dubo Deta Ye.
Gar Ishk Mein Iska Bhi Bas Chalta To,
Jaan Dene Par Shama Ko Mazboor Karta Ye.


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आप बोलिए और बताइये इस भटकाव का अंत होगा कैसे ?

इंसान केवल इंसान है और अगर उसके दिल से ख़ुदा का डर निकल जाए तो वह केवल हैवान है। आज नेता, पत्रकार और पुलिस के बारे में ही लोग टीका-टिप्पणी कर रहे हैं जबकि सुरक्षा बलों में नौकरी करने वाले भी इन्हीं जैसे हैं। ये लोग भी कम ग़ज़ब नहीं ढाते हैं बल्कि इनमें से कुछ तो ऐसे काम कर देते हैं कि विदेशी आतंकवादियों भी पनाह मांग जाएं। एक गूंगी बहरी लड़की के साथ बलात्कार करने के जुर्म में ऐसे ही जवानों को सज़ा की ख़बर पढ़ी तो हमने एक इस पर कुछ लिखा और जब हम अपनी पोस्ट के लिए गूगल के ज़रिए फ़ोटो ढूंढ रहे थे तो एक फ़ोटो में भारतीय नारियों को बिल्कुल नंगा खड़े देखा। नारी पवित्र है और यह धरती भी।
तब यह क्यों नंगी खड़ी हैं यहां ?
यह जानने के लिए जब उस पोस्ट पर पहुंचे तो वहां भारतीय रक्षकों का एक और काला कारनामा नज़र आया। उस फ़ोटो को तो हम अपने ब्लॉग पर नहीं दे सके लेकिन उसका लिंक अपनी पोस्ट में ‘शर्मनाक घटनाएं‘ शब्दों में टांक दिया है।
ऐसी घटनाएं आए दिन सामने आती रहती हैं और इनसे कई गुना वे घटनाएं हैं जो कि सामने नहीं आ पाती हैं।
क्या होगा इस देश का जिस पर विदेशी आतंकवादी तो हमले कर ही रहे हैं लेकिन इस देश के नागरिक और रक्षक भी जघन्य कांड कर रहे हैं।
अब आप सोचिए कि क्या बीएसएफ़ और सेना के जवान भी नहीं भटक रहे हैं ?
क्या भारतीय नारी भी नहीं भटक गई है ?
क्या आज हरेक तबक़े के लोग भटक नहीं रहे हैं ?
कब और कैसे ख़त्म होगा यह भटकाव ?
इन पर मौन मत रहिए आप।
आप बोलिए और बताइये इस भटकाव का अंत होगा कैसे ?
एक दूसरे को दोष देने का समय नहीं है यह, समाधान बताइये और फिर उसमें जुट जाइये।
आइये इस पोस्ट पर !

समलैंगिकता और बलात्कार की घटनाएं क्यों अंजाम देते हैं जवान ? Rape

वो खड़ी है

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on शनिवार, 16 जुलाई 2011 | 6:56 am

वो खड़ी है,
किसी के इंतज़ार में,
कोई तो आने वाला है,
आखें गडी हैं, राह पर,
तक रही हैं, हर राही को,
दिल बेचैन हो रहा है,
अमन चैन खो रहा है,
बार-बार घडी वो देख रही है,
पर वो खड़ी है,
किसी के इंतज़ार में,

वक्त कुछ गुज़र रहा है,

दिल उसका बैठ रहा है,
सोच कुछ न रही है,
मन अटकलों में जा रहा है,
वो होश खो रही है,
जोश वो खो रही है,
पर जज्बा न खो रही है,
वो अभी न रो रही है,
वो अभी तक खड़ी है,
किसी के इंतज़ार में,

गुरूपूर्णिमा पर विशेष - अपना उद्धार स्वयं करें

Written By Bharat Swabhiman Dal on शुक्रवार, 15 जुलाई 2011 | 5:34 pm

अपने उद्धार और पतन में मनुष्य स्वयं कारण है , दूसरा कोई नहीं । परमात्मा ने मनुष्य शरीर दिया है तो अपना उद्धार करने के साधन भी पूरे दिये है । इसलिए अपने उद्धार के लिए दूसरे पर आश्रित होने की आवश्यकता नहीं है । भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्पष्ट कहा है कि - अपने द्वारा अपना उद्धार करें , अपना पतन न करें । क्योंकि आप ही अपने मित्र है और आप ही अपने शत्रु है । 
इस बात में कोई संदेह नहीं कि दिव्यभूमि भारतवर्ष में ऐसे असाधारण गुरू आज भी मौजूद है जो लोगों की बेचैनी , व्याकुलता और कुंठा का समाधान साधारण तरीके से करने की क्षमता रखते है । साथ ही ये आध्यात्मिक गुरू लोगों के जीवन को कठिन बनाने वाली चुनौतियों का समाधान भी कर रहे है । 
शिष्य को गुरू की जितनी आवश्यकता रहती है , उससे अधिक आवश्यकता गुरू को शिष्य की रहती है । जिसके भीतर अपने उद्धार की लगन होती है जो अपना कल्याण करना चाहते है तो उसमें बाधा कौन दे सकता है ? और अगर आप अपना उद्धार नहीं करना चाहते तो आपका उद्धार कौन कर सकता है । कितने ही अच्छे गुरू हों , सन्त हों पर आपकी इच्छा के बिना कोई आपका उद्धार नहीं कर सकता । 
गुरू , सन्त और भगवान भी तभी उद्धार करते हैं , जब मनुष्य स्वयं उन पर श्रद्धा - विश्वास करता है , उनको स्वीकार करता है , उनके सम्मुख होता है , उनकी देशनाओं का पालन करता है । अगर मनुष्य उनको स्वीकार न करें तो वे कैसे उद्धार करेंगे ? नहीं कर सकते । स्वयं शिष्य न बने तो गुरू क्या करेगा ? जैसे दूसरा कोई व्यक्ति भोजन तो दे देगा , पर भूख स्वयं को चाहिए । स्वयं को भूख न हो तो दूसरे के द्वारा दिया गया बढिया भोजन भी किस काम का ? ऐसी ही स्वयं में लगन न हो तो गुरू का , सन्त - महात्माओं का उपदेश किस काम का ? 
भारत भूमि में गुरू , सन्त और भगवान का कभी अभाव नहीं होता । अनेक सुविख्यात सन्त हो गये , आचार्य हो गये , गुरू हो गये पर अभी तक हमारा उद्धार नहीं हुआ है । इससे सिद्ध होता है कि हमने उनको स्वीकार नहीं किया । अतः अपने उद्धार और अपने पतन में हम ही कारण है । जो अपने उद्धार और पतन में दूसरे को कारण मानता है , उसका उद्धार कभी हो ही नहीं सकता । वास्तव में मनुष्य स्वयं ही अपना गुरू है । इसलिए उपदेश स्वयं को ही दें । दूसरे में कमी न देखकर अपने में ही कमी देखें और उसे दूर करने की चेष्टा करें । तात्पर्य यह है कि वास्तव में कल्याण न गुरू से होता है और न ईश्वर से ही होता है , प्रत्युत हमारी सच्ची लगन से होता है । स्वयं की लगन के बिना तो भगवान भी कल्याण नहीं कर सकते । 
गुरू बनाने से अधिक महत्वपूर्ण है गुरू की देशनाओं पर चलना । यदि गुरू बनाने मात्र से कल्याण हो जाता तो दत्तात्रेय 17 गुरू न बनाते । स्वामी रामतीर्थ ने तो यहां तक कह डाला कि न तो राम तुम्हारा कल्याण कर सकते है न ही कृष्ण । तुम्हें अपना रास्ता स्वयं चुनना होगा और उस पर चलना होगा । 
गुरू की महिमा कौन नहीं जानता ? इसमें कोई संदेह नहीं कि गुरू का समय - समय पर दिशा - निर्देश पाते रहना चाहिए । गुरू तो हमें अध्यात्म का मार्ग दिखाता है , अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है । हमें सत्य के मार्ग पर चलने तथा मानसिक विकारों से मुक्ति की युक्ति बताता है । वह हमारा मददगार है । हम उसका सम्मान करें । हम उसको नमन करें । उनके प्रति कृतज्ञ रहें । जहां तक परमात्मा का स्थान है उसे कोई नहीं ले सकता । 
स्वामी सत्यमित्रानंद जी कहते है कि मैं तो तुम्हारी तरह साधक हूँ । आपका विश्वास ही आपकी प्राप्ति है । ऐसे सच्चे महापुरूषों का , सद्गुरूओं का सान्निध्य मिल जाये तो साधक भाग्यशाली है । याद रखों आपका उद्धार गुरू के अधीन है , न सन्त - महात्माओं के अधीन है और न भगवान के अधीन है । अपना उद्धार तो स्वयं के ही अधीन है । 
आज गुरूपूर्णिमा का महापर्व है , गुरू की देशनाओं को जीवन में उतारने का संकल्प लेने का दिन है । सभी को गुरूपूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ । 
- विश्वजीतसिंह

अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए

(मित्रों, क्षमा चाहता हूँ कि आज एक ऐसी रचना पोस्ट कर रहा हूँ, जिसमे से कायरता की बू आ रही हो. पर मजबूरी है, ऐसा लिखना पड़ रहा है, क्योंकि हमारी सरकार और हमारे कानून तो आतंकियों को सजा नहीं दिला सकते है. आप सभी जानते ही है कि अजमल कसाब और अफजल गुरु के साथ क्या हो रहा है....अगर मैंने कुछ सच लिखने की कोशिश की हो या आप मुझसे सहमत हो तो मुझे बताये, आपके सुझाव एवं प्रतिक्रिया का स्वागत है....) -विभोर गुप्ता

एक और मुद्दा राजनीतिक केंद्र बनने को तैयार है
एक बार फिर मुंबई पर हुआ आतंकियों का वार है
फिर ना कहीं आतंकी दोषियों पर सियासत गरमाए
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए

वैसे भी, आजकल देश में महंगाई का दौर बढ़ा है
इन दिनों मुर्गों और बकरों का भाव भी चढ़ा है
फिर ना कोई जेलों में ताजा चिकन-बिरयानी खाए
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए

आवाम देश की गरीबी, भूखमरी से जूझ रही है
और सिंहासन को दोषियों को पकड़ने की सूझ रही है
फिर ना किसी की सुरक्षा पर करोड़ों-अरबों रूपये बहायें
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए

आतंकी हमले के दोषी को पकड़ने से भी क्या होगा
चलेंगे सालो साल मुक़दमे, इससे ज्यादा क्या होगा
फिर ना जेल में कोई आतंकी बेख़ौफ़ आराम फरमाए
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए

अफजल को फांसी मुक़र्रर, मिली नहीं अब तक भी
आतंक से थर्राया देश, पर सत्ता हिली नहीं अब तक भी
फिर अफजल, कसाब जैसे कानून को ठेंगा दिखलायें
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए.
-विभोर गुप्ता (9319308534)

शौच

योग के नियम का पहला अंग है शौच |

शौच और सोच दोनों एक ही तरह से हैं |

शौच करने जब कोई जाता है तभी वह सोचता भी है |

शौच करने के समय उसको बहुत से सोच आते हैं |

और जब गाँव में शौच करने जाते हैं तो कोई

कहीं बैठा होता है और कोई कहीं बैठा होता है |

तो उस समय जो चर्चा होती है उसी चर्चा को

गुफ्तगु कहते है यानी गु (शौच ) करते समय की गयी चर्चा |

और यह गुफ्तगु बहुत ही महत्तवपूर्ण होती है |

तो शौच और सोच तथा गुफ्तगु यह जीवन में बहुत मायने रखते हैं |

कई लोग तो शौच करते हुए ही अपने सारे दिन का प्लान सोच लेते हैं |

और वह प्लान भी अच्छा होता है |

और अक्सर अच्छे-अच्छे प्लान शौच में ही आते हैं |

इसलिए अक्सर लोग शौच में घुसे रहते हैं |

देखिए ‘तकनीकी एग्रीगेटर‘ लिंक पर

जहां एक तरफ़ बहुत से पुराने ब्लॉगर विदा हो चुके हैं, वहीं दूसरी तरफ़ नए ब्लॉगर लगातार आ रहे हैं। 
‘हिंदी ब्लॉगिंग गाइड‘ के ज़रिए भी नए नेट यूज़र्स अब हिंदी ब्लॉग बना रहे हैं। ऐसे में उन्हें तकनीकी ज्ञान की ज़रूरत पड़ती है। उनमें से सभी लोग इतने सक्षम नहीं होते कि वे गूगल के ज़रिए अपनी ज़रूरत की जानकारी ढूंढ सकें। बहुत से तकनीकी विशेषज्ञों ने समय समय पर अपनी पोस्ट्स के ज़रिए हिंदी ब्लॉगर्स को अच्छी जानकारी उपलब्ध कराई है लेकिन ‘साधारण एग्रीगेटर‘ पर प्रदर्शित होने के बाद वह जानकारी ग़ायब सी हो जाती है। ऐसे में एक एक विशेष एग्रीगेटर की ज़रूरत महसूस की गई। एक ऐसा एग्रीगेटर जो केवल तकनीकी पोस्ट को ही संकलित करे। इस तरह तकनीकी ज्ञान देने वाली पोस्ट्स भी गुमनामी में डूबने से बच जाएंगी और बिल्कुल नौसिखिया ब्लॉगर्स के लिए भी तकनीकी जानकारी पाना आसान हो जाएगा। खिलाड़ी ब्लॉगर्स का ट्रैफ़िक बढ़ेगा और अनाड़ी ब्लॉगर्स को ज्ञान मिलेगा। फ़ायदा दोनों को होगा और नुक्सान किसी का भी नहीं।
जिन विद्वानों ने तकनीकी लेखन किया है, उनसे अनुरोध है कि अपनी बेहतरीन पोस्ट्स (जितनी भी चाहें) का और अपने ब्लॉग या वेबसाइट का लिंक इस पोस्ट्स के कमेंट में या फिर ईमेल के द्वारा उपलब्ध करा दें ताकि उन्हें ‘टेक एग्रीगेटर‘ में सजाया जा सके।
हिंदी ब्लॉगिंग को बढ़ावा देने के लिए सभी को अपने पूर्वाग्रहों से उबरना होगा।
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क्यों है न बिल्कुल नया आयडिया ?

ये बुज़दिल हरामी आतंकवादी क्या पाना चाहते हैं ? Solution

Written By DR. ANWER JAMAL on गुरुवार, 14 जुलाई 2011 | 8:47 pm

Photo : http://piyush.jainji.com/tag/13th-july-2011-serial-blasts-photos/
मुंबई में कल 13 जुलाई 2011 को हुए बम ब्लास्ट के संदर्भ में हमारे प्रिय प्रवीण जी यह सवाल पूछ रहे हैं कि
ये आतंकवादी दरअसल अमन के दुश्मन हैं। इनके कुछ आक़ा हैं, जिनके कुछ मक़सद हैं। ये लोकल भी हो सकते हैं और विदेशी भी। जो कोई भी हो लेकिन इनके केवल राजनीतिक उद्देश्य हैं। ये लोग चाहते हैं कि भारत के समुदाय एक दूसरे को शक की नज़र से देखें और एक दूसरे को इल्ज़ाम दें। कुछ तत्व नहीं चाहते कि जनता अपनी ग़रीबी और बर्बादी के असल गुनाहगारों को कभी जान पाए। जनता का ध्यान बंटाने और उन्हें बांटकर आपस में लड़ाने की साज़िश है यह किसी की। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं, उन तक पहुंचना भी मुश्किल है और उन्हें खोद निकालना भी। कुछ जड़ों से तो लोग श्रृद्धा और समर्पण के रिश्ते से भी जुड़े हुए हैं। ऐसे में कोई क्या कार्रवाई करेगा ?


इस बार भी बस ग़रीब ही पिसेगा !
उसी का ख़ून पानी है वही बहेगा !!


दोस्तो ! आज लोगों ने दौलत को ही सब कुछ समझ लिया है। आज देश में ऐसे बहुत से लोग हैं जो कि दौलत की ख़ातिर कुछ भी कर सकते हैं। इनमें ग़रीबी से जूझते हुए लोग भी हैं और वे लोग भी हैं जिनकी तोंद पर हद से ज़्यादा चर्बी जमा है यानि कि ख़ूब खाते-पीते हैं। इन आतंकवादियों में नास्तिक भी हैं और धर्म की विकृत समझ रखने वाले आस्तिक भी। इन लोगों के दिलो-दिमाग़ का प्यूरिफ़िकेशन ज़रूरी है। हमारे लिए करने का काम यही है। जब तक यह काम नहीं किया जाएगा तब तक आतंकवाद का सिलसिला थमने वाला नहीं है। इसे सेना, पुलिस और क़ानून की मदद से रोकना मुश्किल है। विकसित देश तक इसके सामने लाचार हैं। आतंकवाद जीवन के सही बोध के अभाव से जन्म लेता है। जब तक मानव जाति को वह बोध उपलब्ध नहीं कराया जाएगा, मानव जाति को आतंकवाद से मुक्ति मिलने वाली नहीं है। हमें गर्व और अफ़सोस से आज तक कुछ हासिल नहीं हुआ है। हमें अब वह काम करना होगा जिससे कि कुछ हासिल हो। हमें मानव जाति को उसके जीवन के सही उद्देश्य का बोध कराना होगा, उसे सही ग़लत की तमीज़ देनी होगी और ऐसे लोगों का बहुमत बनाना होगा। जब ऐसे लोगों का बहुमत हो जाएगा, दुष्ट लोग ख़ुद ही क्षीण हो जाएंगे और तब भी वे कुछ करेंगे तो उन्हें राजनैतिक संरक्षण देने वाला कोई न होगा। उनका विनाश निश्चित होगा, यह तय है।

इस विषय पर यह लेख भी आतंकवादियों के मददगारों की शिनाख्त में उपयोगी है :

शाम ढलने लगी है, अँधेरे को थोडा भगा दूँ

खुदा करे तेरे नूर की नूरानी कम न होने पाए |
कुछ जतन करो ऐसा कि कोई गम तुम्हें न होने पाए |
बशर्ते जिन्दगी का फलसफा तुम कुछ समझ पाए |
उससे पहले यह न जिन्दगी खत्म होने पाए |

गर तुझे खुदा मिल जाए तो कहना न किसी से |
नूर खुद अपनी कहानी कह देगा इस जहां से |

वक्त न जाया कर कुछ खुदा को भी याद कर |
मुद्दतें बीत जाती हैं खुद को खुद से भरमा कर |

मौत के दरवाजे पर मुत्त्सर नहीं होता लम्हा एक |
याद कर खुदा को बन जा बन्दा अब नेक |

नवाजिस है जुस्तुजू है रूह की इन्तहा है |
मत पूछ की तू कहाँ है तू कहाँ है तू कहाँ है |

यह जिन्दगी का नहीं, मौत का सफ़र है |
जिन्दगी बस मौत को भुलाने का कफर है |

शाम ढलने लगी है, अँधेरे को थोडा भगा दूँ |
शमा की रौशनी से चिरागों तो थोडा जला दूँ |

मौत से मत पूछ जिन्दगी किसे कहते हैं |
रुखसत हुआ इस जहाँ से लोग यूँ कहते हैं |
मौत का यह सफ़र है जिन्दगी का नहीं |
इसकी मंजिल तो मौत है जिन्दगी नहीं |

किस्सा ये साफगोई का यूँ ही ख़तम नहीं होता |
मंज़र पर मंज़र चले जाते हैं पर माजरा ख़तम नहीं होता |
रौशनी की रोशनाई में इबारतें लिख दी जाती हैं |
रौशनी ख़त्म हो जाती हैं पर किस्सा ख़तम नहीं होता |

वह ऐतबार ही क्या जो उठ जाए हकीकत से |
पेश कर हकीकतें उन मसीहाओं की ||
जानकर हकीकत उस खुदा की |
तेरा भी ऐतबार उस खुदा पर हो जाएगा ||

खुदा से न पूँछ अपने से सवाल कर |
सुर्रे को छककर पी फिर बवाल कर ||
रहयिक का स्वाद चख फिर मलाल कर |
है खुदा तेरे साथ इतना तो ख्याल कर ||

सुर्रा - नाभि
रहयिक - अमृत

विखरी हुई सासों को सम्हालने का वक्त आ गया |
सांसों के दरमियाँ रहने का वक्त आ गया |


                                               ------- बेतखल्लुस


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मनोदशा अर्थात मन की दशा, मन की दशा क्या होती है, यह कहना थोड़ा मुश्किल है। क्यूंकि मन तो चंचल होता है, पल-पल में बदलता रहता है, मन पर काबू पाना बहुत ही मुश्किल बात है। किन्तु नामुमकिन नहीं, परंतु मन की कुछ बातों पर तो आप काबू पा सकते हैं। मगर हर बार, हर बात में मन पर काबू पा सकना या पा लेना यह एक आम इंसान के लिए मुमकिन नहीं और यहाँ मुझे एक गीत की एक लाइन याद आ रही है। जैसा कि आप सभी जानते हैं मेरे हर लेख में कोई न कोई फ़िल्मी गीत जरूर जुड़ जाता है। J पता नहीं क्यूँ जब भी मैं कुछ लिखने जाती हूँ उस पर आधारित कोई न कोई फ़िल्मी गीत मेरे ज़हन में आ ही जाता है।

जीत लो मन को पढ़ कर गीता मन ही हारा तो क्या जीता, तो क्या जीता हरे कृष्ण हरे राम

कहने का मतब यह है कि गीता में भी कहा गया है कि अगर जीवन में सफलता पानी है और मोह माया से छुटकारा पाना है, तो सब से पहले अपने मन को जीत लो फिर सब कुछ तुम्हारे हाथ होगा। अर्थात मन के हारे, हार है और मन के जीते जीत

खैर यह तो थी गीता की बात हम तो बात कर रहे थे, साधारण परिस्थिति में मनोदशा की बात आपने देखा होगा कि जब कभी हम कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेने जाते है। तो हमारा मन अकसर दो भागों में बंट जाता है और हमको निर्णय लेनें में बहुत असुविधा महसूस होती है, कि क्या सही है क्या गलत, दिल कुछ और कहता है, दिमाग कुछ और, कहने वाले कहते हैं ऐसे हालात में हमको हमेशा अपने मन की सुनना चाहिए, मगर कुछ लोग यह भी कहते हैं कई बार दिल से लिए फ़ैसले भी गलत हो सकते है क्यूंकि दिल भावनाओं से बंधा होता है और भगवान ने खुद इंसान को दिमाग का दर्जा दिल से ऊपर का दिया है। मगर क्या करें

दिल है कि मानता नहीं

ऐसे ही आपने कई बार यह भी देखा होगा कि जब हम कोई निर्णय लेने वाले होते हैं या लेने के विषय मे हनता से सोच रहे होते है, तो उस विषय के हर बिन्दु पर गौर किया करते हैं कि उस के क्या परिणाम हो सकते है और बहुत सोचने समझने के बाद जब हम किसी नतीजे पर पहुँचते हैं, तो मन मे एक बार आता है, अब जो होगा सो देखा जाएगा और हम फैसला ले डालते है। मगर फिर कुछ दिनों बाद हमको ऐसा क्यूँ लगता है कि काश ऐसा हो पता तो कितना अच्छा होता। मतलब हमको हमारे द्वारा लिए गये निर्णय पर ही मलाल होने लगता है और यह जानते हुये भी कि अब वो निर्णय बदला नहीं जा सकता, पर फिर भी हमारा मन है कि हमको अंदर से एहसास कराता रहता है कि बदल सकता तुम्हारा निर्णय तो शायद ज्यादा अच्छा होता। क्यूँकि कभी-कभी हमारा मन स्वार्थी भी हो जाया करता है।

कुछ दिनों पहले की ही बात है। जब हम ने इंडिया आने के लिए टिकिट बुक की थी, तब सारी स्थिति को देख परख कर कि इतने दिनों में कब कहना रहना संभव हो सकेगा यह सब सोच कर हमने सभी (प्लेन) हवाई जहाज और ट्रेन के टिकिट बुक किये थे। मगर उस के बावजूद भी कुछ दिनों बाद मुझे लगने लगा था, कि काश मैं अपने मायके में थोड़े और ज्यादा दिन रुक पाती तो अच्छा होता, जबकि मुझे खुद पता था कि ऐसा होना संभव नहीं है। तभी तो जो सोच कर निर्णय लिया था वो इसलिए लिया था कि बाद में ऐसा कोई पछतावा न हो, मगर मन का क्या है वो तो कभी पूर्णरूप से संतुष्ट होता ही नहीं, ना कभी हुआ है, और ना ही कभी होगा। इसे ही तो कहते है न मन का स्वार्थी होना J

अब मैं आप को एक और मनोदशा से अवगत करती हूँ। वो है (करेंसी) अर्थात मुद्रा को लेकर उत्पन्न होने वाली मनोदशा आप को शायद पता हो, जब कोई भी इंसान नया-नया इंडिया से यहाँ आता है मतलब केवल यहीं नहीं बल्कि इंडिया से बाहर कभी भी, कहीं भी जाता है, तो उस देश में पैसे को लेकर उसकी मनोदशा क्या होती है। जब भी वो कुछ खरीदने की द्रष्टी से बाजार जाता है, तो पूरे समय उसका दिमाग इस ही उधेड़ बुन में लगा रहता है कि यदि यह चीज यहाँ (1) एक पाउंड की है, तो इंडियन रुपयों के हिसाब से कितने की हुई। फिर चाहे वो चीज उसके लिए कितनी भी साधारण या कितनी भी महत्वपूर्ण क्यूँ न हो, हर छोटी बड़ी चीज में उसका मन इस ही बात को लेकर उलझा रहता है। यहाँ तक की जब कोई और अपनी खरीदी हुई किसी चीज के बारे में बात करें या बताएं, तब भी सामने वाले का दिमाग तुरंत उस चीज के मूल्य को भारतीय रुपयों में बदल कर देखना शुरू कर देता है।

खैर जो लोग यहाँ नए-नए आयें है, उनका ऐसा करना तो समझ में आता है। हम भी किया करते थे, जब हम यहाँ नए-नए आये थे। मगर अब इतने साल गुजर जाने के बाद अब हमको ऐसा कुछ नहीं लगता जो सामान जितने का है, उसे हम यहां की (करेंसी) अर्थात मुद्रा के हिसाब से ही देखते है और लेते है। मगर आश्चर्य तो तब होता है, जब हम उन लोगों को देखते है, जो हम से भी पहले से यहाँ रह रहें हैं, वो लोग आज भी इस उधेड़बुन से नहीं निकल पाये हैं। बल्कि अगर मैं अपनी बात करूँ और सच कहूँ तो मेरे साथ तो अब उल्टा ही हो गया है। अब जब मैं इंडिया आकर कुछ ख़रीदती हूँ तो अब उस चीज के मूल्य को मैं पाउंड की नज़र से देखने लगी हूँ J यह भी तो एक प्रकार की मनोदशा ही है। है ना J

अंतत बस इतना ही कि आज शायद मैं अपने इन अनुभवों से आप सभी को मनोदशा अर्थात मन की दशा का अर्थ समझा पाई हूँ या शायद नहीं भी, मगर मेरे हिसाब से और मेरे विचार से मन की दशा पर आज तक न कोई काबू कर पाया है और न ही कभी कर पाएगा जिस दिन जिस किसी ने भी मन की इस परिस्थिति पर काबू पा लिया उस दिन वो इंसान, इंसान रह कर भगवान बन जाएगा। क्यूंकि इंसान तो भावनाओं से मिलकर बना है और यह भावनाएं ही हैं जो इंसान को जानवर से अलग करती हैं। तो जहां भावनायेँ होगी वहाँ स्वार्थ भी होगा और जहां स्वार्थ होगा वहाँ कभी मन पर काबू किया ही नहीं जा सकेगा। ऐसा मेरा मत है। जय हिन्द....

Founder

Founder
Saleem Khan