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नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मौत

Written By नीरज द्विवेदी on गुरुवार, 11 अगस्त 2011 | 11:34 pm



ये प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है कि हमारे नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मौत कैसे हुई? मैं यहां कुछ नया कहने वाला नही हूँ, मेरी ये कोशिश केवल एक समाचार पत्र का एक टुकडा सुरक्षित करने की कोशिश मात्र है,  जय हिन्द।

11 अगस्त 2011 इन्डियाटाइम्स
     वाराणसी -- नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत के रहस्य को सुलझाने के लिए कई कमिटी और कमिशन बिठाए गए, कितनी किताबें लिखी गईं, लेकिन नेताजी के एक सहयोगी और प्रत्यक्षदर्शी से किसी ने कभी संपर्क नहीं किया।
     आजमगढ़ में इस्लामपुरा, बिलरियागंज में रहने वाले 107 साल के निजामुद्दीन खुद को आजाद हिंद फौज में नेताजीका ड्राइवर बताते हैं। निजामुद्दीन के मुताबिक उन्होंने 1942 में आजाद हिंद फौज जॉइन करने के बाद 4 साल नेताजी के साथ गुजारे।
     निजामुद्दीन को यकीन है कि नेताजी की मौत 1945 के प्लेन हादसे में नहीं हुई थी। निजामुद्दीन कहते हैं, ‘यह कैसे हो सकता है क्योंकि प्लेन हादसे के करीब 3-4 महीने बाद मैंने उन्हें कार से बर्मा और थाईलैंड की सीमा पर सितंगपुर नदी के किनारे छोड़ा था।‘

     निजामुद्दीन को इस बारे में कुछ भी पता नहीं कि जब उन्होंने नेताजी को नदी के किनारे छोड़ा, उसके बाद क्या हुआ। निजामुद्दीन के मुताबिक वह नेताजी के साथ ही रहना चाहते थे, लेकिन नेताजी ने उन्हें आजाद भारत में मिलने का वादा करके वापस भेज दिया था।
     करीब 10 साल बाद निजामुद्दीन की मुलाकात नेताजी के करीबी एक स्वामी से हुई थी। स्वामी नेताजी के संपर्क में थे। निजामुद्दीन के पास एक सर्टिफिकेट भी है जो आजाद हिंद फौज से उनका संबंध दिखाता है। इस सर्टिफिकेट से यह भी पता चलता है कि स्वामी का पूरा नाम एसवी स्वामी था और वह राहत और देश - प्रत्यावर्तन काउंसिल , पूर्व आजाद हिंद फौज और गठबंधन , रंगून के चेयरमैन थे। 1969 में निजामुद्दीन अपने परिवार के साथ भारत लौट आए।

ये प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है
Source : Indiatimes

नेहरू की जगह नेता जी होते तो देश नही बंटता



मैं यह पूरे विश्वास मे साथ कह सकता हूँ कि इस देश का हर एक बुद्धिजीवी ये जान चुका है कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की इस देश को कितनी जरूरत है, आज प्रत्येक समझदार व्यक्ति ये कहता है कि अगर नेहरू की जगह नेता जी होते तो आज देश नही बंटा होता, और अगर देश नही बंटा होता तो इस देश की आंतकवाद जैसी विकराल समस्या का नमोनिशान न होता।

उदाहरण आपके सम्मुख है—
24 जनवरी 2011 टाइम्स नेटवर्क
कोलकाता।। ' नेताजी सुभाषचंद्र बोस आज होते तो भारत के विकास की रफ्तार कई गुना तेज होती और हम चीन से आगे होते।' इन्फोसिस के चेयरमैन नारायण मूर्ति का कुछ यही मानना है।

नायारण मूर्ति के मुताबिक जवाहरलाल नेहरू की उद्योगों को न पनपने देने की नीतियों और लाइसेंसी राज के खिलाफ नेताजी बेहद सक्षम साबित होते। नेताजी होते तो शायद भारत का विभाजन भी नहीं हुआ होता। नारायण मूर्ति ने कोलकाता में नेताजी मेमॉरियल ओरिएंटेशन के दौरान यह बात कही। 
सॉफ्टवेयर गुरु मूर्ति ने कहा कि केंद्र नेताजी को उचित सम्मान नहीं दे रहा है। मूर्ति ने कहा कि आजादी के बाद नेताजी होते तो भारत कुछ अलग देश होता। नेताजी, नेहरू, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, और सी. राजगोपालाचारी की टीम अगर एक साथ मिलकर काम करती तो भारत के लिए चमत्कार कर सकती थी।
भारत आज वहां होता, जहां चीन खड़ा है। नेताजी कद्दावर थे। नेताजी ही वह शख्स थे, जिन्होंने महात्मा गांधी से असहमत होने का साहस दिखाया था।
    
       “नेताजी ही वह शख्स थे, जिन्होंने महात्मा गांधी से असहमत होने का साहस दिखाया था”, और किसी मे इतनी हिम्मत नही थी, यह वाक्यांश एक ओर नेहरू और दूसरे नरम दल वाले नेताओं की बुजदली और सत्तालोलुपता दिखाता है और दूसरी तरफ़ गाँधी का महात्म्य युक्त आंतक।

नेता जी की मौत, एक हादसा या हत्या



     ये रहस्य मैं सुलझाने नही जा रहा हूँ, आपको केवल हमारी सरकारों के तथाकथित प्रयासों से अवगत कराने की कोशिश मात्र है, पुन: मैं एक समाचार पत्र के टुकडे आप तक पहुँचाने की कोशिश कर रहा हूँ। जय हिन्द।

23 जनवरी 2009 नवभारत टाइम्स
     नई दिल्ली: नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत कब और कैसे हुई - यह आज तक रहस्य बना हुआ है। इस गुत्थी को सुलझाने के लिए तीन आयोग गठित हुए, तीनों ने अपनी रिपोर्ट भी सौंपी, लेकिन मिस्ट्री अब भी बरकरार है। इस रहस्य की तह तक जाने में जुटे लोगों का कहना है कि सरकार इसे लेकर कतई गंभीर नहीं है और न ही सरकार ने इसे सुलझाने में मुखर्जी कमिशन की मदद की। बावजूद इसके इन लोगों को भरोसा है कि एक न एक दिन सच सामने आएगा। इसी सच को जानने के लिए आरटीआई का सहारा लिया जा रहा है, ताकि नेताजी की मौत से जुड़े कागजात के सहारे सचाई को सामने लाया जा सके।

मौत की मिस्ट्री
नेताजी के बारे में कहा जाता रहा है कि उनकी मौत 18 अगस्त 1945 को ताइपे में एक प्लेन क्रेश में हुई। लेकिन, बाद में इस पर कई सवाल उठने लगे। इस गुत्थी को सुलझाने के लिए 1956 में शाहनवाज कमिटी का गठन किया गया, जिसने ताइवान गए बिना ही सिर्फ जापान में कुछ लोगों से बात करके यह रिपोर्ट दे दी कि नेताजी की मौत प्लेन क्रेश में ही हुई थी। इस रिपोर्ट पर कमिटी में शामिल नेताजी के बड़े भाई सुरेश चंद्र बोस ने कड़ी आपत्ति जताई। ज्यादातर सांसद भी इस रिपोर्ट से सहमत नहीं थे।

1970 में खोसला कमिशन का गठन किया गया, जिसने अपनी रिपोर्ट में यही बात दोहराई। लेकिन 1978 में मोरारजी देसाई ने संसद में यह कहा कि कुछ ऐसे कागजात मौजूद हैं, जिनसे नेताजी की मौत प्लेन क्रेश में होने की बात स्वीकार नहीं की जा सकती। इसके बाद 1999 में मुखर्जी कमिशन ने इस गुत्थी को सुलझाने की जिम्मेदारी ली। कमिशन ने 2005 में अपनी रिपोर्ट में कहा कि नेताजी की मौत प्लेन क्रेश में नहीं हुई थी। ताइवान ऑथॉरिटी ने भी कहा कि 14 अगस्त से 20 सितंबर 1945 के बीच वहां कोई प्लेन क्रेश नहीं हुआ था। लेकिन आयोग यह बताने में सफल नहीं हो पाया कि नेताजी की मौत कब, कैसे और कहां हुई थी।

क्या छुपा रही है सरकार
मिशन नेताजी से जुड़े चंद्रचूड़ घोष कहते हैं कि सरकार इस गुत्थी को सुलझाने में कतई दिलचस्पी नहीं ले रही। मुखर्जी आयोग को भी पूरी मदद नहीं दी गई। जब नेताजी की मौत से जुड़ी कैबिनेट सेक्रेटरी लेवल की एक फाइल मांगी गई तो कहा गया कि वह नष्ट हो चुकी है। सरकार का कोई भी मंत्रालय कोई भी जानकारी नहीं दे रहा है। एक तरफ सरकार कह रही है कि वह कुछ नहीं छुपा रही है और दूसरी तरफ जानकारी मांगने पर सेंट्रल इन्फर्मेशन कमिशन से कहा गया कि वे कागजात इतने संवेदनशील हैं कि अगर उन्हें रिलीज किया गया तो दूसरे देशों से हमारे रिलेशन खराब होंगे और आंतरिक शांति भंग होगी। यह भी कहा गया कि कागजात रिलीज होने पर पश्चिम बंगाल जल उठेगा। घोष कहते हैं कि हम चाहते हैं कि नेताजी से जुड़े जितने डॉक्युमेंट्स हैं वे पब्लिक के सामने आएं, सिटिजन इनक्वायरी हो और इस गुत्थी को सुलझाया जाए।

सच जानना है अधिकार
यूथ फॉर इक्वैलिटी भी मिशन नेताजी की मुहिम में साथ आ गया है। इसके अध्यक्ष डॉ. कौशल कांत मिश्रा का कहना है कि आरटीआई के जरिए हम सच की तह तक पहुंचने की कोशिश करेंगे। नेताजी सुभाष क्रांति मंच के संयोजक वी. पी. सैनी कहते हैं कि यह हमेशा मिस्ट्री नहीं रह सकती। चाहे कितने भी संवेदनशील कागजात हों उन्हें रिलीज करना चाहिए ताकि पूरी साजिश का खुलासा हो सके। सरकार इसे लेकर गंभीर नहीं दिख रही है इसलिए पब्लिक प्रेशर बनाना बेहद जरूरी है।
क्या विचार है आपके? और आप जो भी कर सकते हैं करने की कोशिश करें। ज़य हिन्द।

“मै” मेरी खाल-मेरा ढोल (थाली बजाओ)


दिल में उठा एक जूनून
जोश -खौलता खून
कलयुग की आंधी
is
श्वेत वस्त्र- एक टोपी-
खादी -सूखी रोटी
बड़ी लडाई लड़ते आया
मरते-मरते बचते आया
दो चार लोग पीठ ठोंक
आगे झोंक देते
हम देख लेंगे
पीछे हैं हम आप के
नगाड़ा पीटिये
ढोल बजाइए
थाली बजाइए
Anna-Rocks-Anna-Hazare-Jantar-Mantar
बहरों को जगाइए
आवाज बुलंद हो
संसद हिल जाए
जनता खिल जाए
जनता मालिक है
अपने पसीने की – खाने का
अधिकार है –
भूखे को अनशन का !
खुद बोया तो खुद काटे
काहे काले कौवों को बाँटें !
—————————
भीड़ जुटी -एक-दस-सौ -लाख
people1
रावण का पुतला जलाने को
तमाशा-राम और रावण
महाभारत बनाने को
दो मुहे सांप-मीडिया-बाजीगरी
————————————–
पर अगले कुछ पल थे भारी !
धमाका -धुंआ -धुन्ध
चीख पुकार द्वन्द
रावण – राक्षस बिखर गए !
रक्त-बीज बन -फिर
जम गए -थम गए !!
अँधेरे कोहराम धुन्ध के आदी थे
और उधर मैदान-ए-जँग में -बाकी थे
“एक” अभिमन्यु
चरमराता हमारा ढाँचा
मै -मेरी खाल-मेरी ढोल
जिसमे था बड़ा पोल
आवाज ही आवाज बस
पीछे मेरे दस लाख करोड़ से
करोड़ -लाख-दस जा चुके थे
कहाँ ये कंगाल के साथ कब रहे हैं ???
शिखंडी-दुर्योधन-धृत-राष्ट्र
बेचारी ये जनता ये अधमरा राष्ट्र
————————————–
और पानी की तेज बौछार
ने मेरी आँखें खोल दी
धूल चाटते कीचड में सना पड़ा मै
जन गण मन अधिनायक जय हे !!!
boy
गाता -कराह उठा !!!
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल “भ्रमर”५
००.२३ पूर्वाह्न
१०.०८.२०११ जल पी बी

जागो

Written By नीरज द्विवेदी on बुधवार, 10 अगस्त 2011 | 7:56 pm


देखो आज फिर लहूलुहान है भारत माँ, जागो,
अब सार्थक आजादी माँगती है भारत माँ, जागो,
फिर एक नया सुभाष माँगती है भारत माँ, जागो,
फिर से एक क्रांति माँगती है भारत माँ, जागो॥

जागो अब तो जागो, कब से... जागो (Complete)


पवित्र क़ुरआन का हिन्दी अनुवाद

पवित्र कुरआन का हिंदी अनुवाद और व्याख्या    
हिन्दी पाठकों में, विशेषकर हमारे हिन्दू भाईयों में क़ुरआन को जानने की प्रबल इच्छा पाई जाती है। कुछ वजहों से उनकी यह ख्वाहिश अब और भी शदीद हो गई है। सच्चाई के लिए उनकी तड़प और प्यास को देखते हुए हम आज पवित्र क़ुरआन का हिन्दी अनुवाद उन्हें सप्रेम भेंट कर रहे हैं।
यह रमज़ान का महीना है और रमज़ान क़ुरआन के नाज़िल होने का महीना भी है और इसे ज़्यादा से ज़्यादा पढ़े जाने का महीना भी है। इसे समझकर पढ़ा जाए और पढ़कर इस पर अमल किया जाए तो इंसान की समस्याएं हल हो जाती हैं और जीवन और मृत्यु के बारे में अपने हरेक सवाल का जवाब मिल जाता है।
जिन बातों का जानना ज़रूरी है उन बातों की सही और सच्ची जानकारी शुद्ध रूप में आज केवल क़ुरआन के ज़रिये ही मिल सकती है।
पेश है आपके लिए आपके सवालों का जवाब और आपकी समस्याओं का समाधान :

त्याग तपस्या बलिदान की ट्रेनिंग है रोजा


दोस्तों इस्लाम के जाने और मानने वालों के लियें यह महीना त्याग ,तपस्या और इबादत का है ..और सभी मुस्लिम भाई इस इबादत में लगे हैं खुदा करे उनकी यह दुआ कुबूल हो .कई लोग हमारे देश में ऐसे भी हैं जो दुसरे मजहब से जुड़े होने के बाद भी इस महीने का सम्मान रखते हुए रोज़े रख रहे हैं ..इबादत का यह महीना ट्रेनिंग का महीना भी कहलाता है इसमें एक मुसलमान को गरीब की भूख ,प्यास का अहसास होता है एक अनुशासन सिखाया जाता है सुबह उठाना फिर दिन भर इबादत करना सभी इन्दिरियों को वश में रख कर तहज़ीब के दायरे में आदर्श इंसान बन कर रहने की सीख़ ही रोजा और रमजान है .तीस रोजों की श्रंखला को रमजान कहते हैं जबकि एक रोज़े को रोजा यानी अहद प्रण कहते हैं इस दिन मुसलमान एक विशेह्स वक्त पार सूरज उगने से पहले नियत करता है और फिर सूरज डूबने तक खुद को खुदा के बताये हुए रास्ते पार चलने वाला बना कर खुदा को समर्पित कर देता है ..आँख नाक , कण ,यानि सभी इन्द्रियों को वश में रख कर बुराई से बचता है और दिन भर अपने देनिक काम काज के साथ साथ खुदा की इबादत करता है पुरे तीस रोज़े रखने या इसके पूर्व चाँद दिखने के बाद फितरा जकात देकर गरीबों में समाजवाद का सिद्धांत लागू कर उनकी जरूरत के मुताबिक कपडे और नकदी वितरित किया जाता है और फिर सभी लोग अपनी इस इबादत को बखूबी पूरी होने पर या खुद के पास होने की ख़ुशी में खुशियाँ मनाते हैं जिसे ईद कहा जाता है इस दिन फ़ित्र निकाला जाता है इसलियें इसे इदुल्फित्र कहते हैं ...........रोज़े ली आठ किसमे होती हैं फ़र्जे मुअय्यन,फ्र्ज़े गेर मुअय्यन,वाजिब मुअय्यन, वाजिब गेर मुअय्यन ,सुन्नत ,नफिल, मकरूह , हराम ...साल भार में एक माह के रोज़े यानि रमजान माह के रोज़े रोज़े मुअय्यन हैं ....अगर मजबूरी की वजह से छूटे रोजों को रखे जा रहे हो तो वोह रोज़े गेर मुअय्यन हैं ....किसी मन्नत यानि किसी खास दिन खास ख्वाहिश पूरी होने पार रोज़े मने जाते हैं तब ऐसे रोज़े को वाजिब मुअय्यन कहते हैं ....आशुरे के दो रोज़े ,मुहर्रम के नवीं और दसवीं तारीख के दो रोज़े अर्फे का रोजा और हर महीने की तेरह ,चवदा , पन्द्राह रोज़ा रखना सुन्नत है ..सवाल के महीने के छ रोज़े , शबन के महीने की पन्द्रह तारीख का रोज़ा , जुमे के दिन का रोज़ा पीर के दिन का रोजा ..जुमेरात के दिन का रोजा मुस्तहब रोज़े हैं लेकिन सनीचर का रोजा और बिना शोहर यानि पति की अनुमति के राख गया न्फ्ली रोजा मकरूह हैं ...इसके आलावा दोनों ईद त्श्रीक के दिन के तीन रोज़ेजो हज की ग्यारवीं ,बाहरवीं ,तेरहवीं तारीख को होते हैं अगर रखे जाते हैं तो हराम हैं ......हमारे देश में रोज़े के नाम पार राजनीति भी शुरू हो गयी है सयासी लोग रोज़े अफ्तार के नाम पार लोगों को बुला कर मोलाना मोलवियों की खरीद फरोख्त कर अपने कार्यक्रम बनाते हैं और लुभावनी बातें कर मुसलमानों को इस दिन बहकाते हैं लेकिन आम रोज़ेदार मुसलमानों को इन सियासी लोगों के खेलों से दूर रहना चाहिए और इनकी मजलिस की भीड़ का हिस्सा नहीं बनना चाहिए क्योंकि रोजा अफ्तार हलाल रोज़ी से हो यह ध्यान रखना जरूरी है सियासी रोज़े कोन अफ्तार करा रहा है इसका रुपया कहाँ से आ रहा है हलाल का है या हराम का है कह नहीं सकते लेकिन अगर मजबूरी हो तो खुद की खजूर जेब में रख कर साथ ले जाओ और रोजा अफ्तार उसी खजूर से करो ताकि गुनाह से बच सकों .................अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

भीष्म -शैय्या पर पड़े




भीष्म -शैय्या पर पड़े
आज आप “भीष्म ” शैय्या पर पड़े
इतने दिन सब कुछ सहे
आराम से खून देते जा रहे हैं
high-school-student_~957906


















दीजिये -ख़ुशी है
लेकिन हम मच्छर नहीं
mosquito-feeding_~u15504651















की केवल अपना पेट भर के
आप को छोड़ देंगे
हमारी तो पूरी जमात है
mosquitoes-action_~k6225946


















घर है परिवार है
और जब आप चेतना शून्य हो जायेंगे
तो हम सब आप के चाहने वालों को
घर परिवार को
आप की जमात को
एक -एक कर
बुला लेंगे
सुला देंगे
इसी शैय्या पर
खून देते रहने के लिए
MH900447141


















(सभी फोटो साभार गूगल/नेट से लिया गया )
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
२८.७.२०११ जल पी बी
४.२९ पूर्वाह्न

- ब्लोगर मीट वीकली के माध्यम से भाई अनवर और प्रेरणा ने सभी ब्लोगर्स को एक माला में बाँध लिया है

Written By आपका अख्तर खान अकेला on मंगलवार, 9 अगस्त 2011 | 8:07 am



              दोस्तों आप सभी जानते हैं के ब्लोगिंग की दुनिया में डोक्टर अनवर जमाल की क्या शख्सियत है ..वोह जो लिखते हैं दिल से लिखते हैं ..और लिखते हैं तो बस लिखते ही रहते हैं ..उनके लिखने के अपने अंदाज़ से ब्लोगिंग के कई महाराज उनसे कुछ दिन खफा जरुर रहे ..डोक्टर अनवर जमाल और कुछ लोगों के बीच तकरार रही लेकिन अब खुदा का शुक्र है के माहोल दोस्ताना है परिवाराना हैं और खुश गवार माहोल में ब्लोगिग्न चल रही है ..लेकिन दोस्तों डोक्टर अनवर जमाल ने इन दिनों जो कमाल क्या है उससे ब्लोगिंग के कई लोग जो दबे कुचले कोने में एक तरफ बेठे थे वोह अब सीना ताने खड़े हैं और उन्हें भाई अनवर जमाल ने ब्लोगिग्न की खबरें और खुद के कई ब्लॉग पर स्थान दिया है .साथ ब्लोगरों को अधिक से अधिक लोग पढ़ें इसके लियें भाई अनवर जमाल ने एक कमाल और क्या है ..इधर उधर बिखरे पड़े ब्लोगों को सजा संवार कर एक माला में गूँथ कर उन्होंने अपनी एक महिला ब्लोगर साथी प्रेरणा के साथ ब्लोगर मीट वीकली का प्रसारण शुरू कर दिया है ......भाई अनवर के इस सपने को साकार करने में बहन प्रेरणा अर्गल  ने पूरा सहयोग दिया है बंगाल की रहने वाली प्रेरणा जी सभी ब्लोगर्स के ब्लॉग समेटती हैं और फिर एक वीकली ब्लॉग मीट में हम जेसे लोगों के सामने परोस देती हैं .............दोस्तों भाई अनवर के इस प्रयास ने ब्लोगिग्न की दुनिया में खलबली मचा दी है ..जिस भाई अनवर की पोस्टों को निजी कारणों से एग्रीगेटरों से हटा दिया जाता था आज वोह खुद दुसरे लोगों की पोस्टों का प्रकाशन प्रचार प्रसार कर रहे हैं ..उनकी इसी महनत और लगन का नतीजा है के आज वोह प्रमुख ब्लोगरों में गिने जाने लगे हैं जो लोग उन्हें टिपण्णी देना तो दूर उनके ब्लॉग से खिसक लिया करते थे आज उनके ब्लॉग को वोह पूरा पढ़ कर टिप्पणिया देने के लियें मजबूर हो गए हैं ........भाई अनवर ने खुद तो बहतरीन ब्लोगिरी की ही है साथ ही अपने साथियों के साथ जो सहयोगी ब्लॉग बनाए हैं उसकी कामयाबी से सभी ब्लोगर्स हेरान हैं ..और आज हालात यह हैं के वोह दूसरों के ब्लॉग को वीकली ब्लोगर्स मीट में स्थान दे रहे हैं ...........भाई अनवर की इस कोशिश .इस कामयाम कोशिश और महनत से सभी ब्लोगर भाइयों को एक बात तो सीखने को मिली है के कोई काम नहीं है मुश्किल जब किया इरादा पक्का ..दूसरी बात विकट परिस्थितयों में भी अगर कोई हिम्मत नहीं हरे और पत्थर से टकराने का उसमे होसला हो तो वोह जीतता और सिर्फ जीतता ही है ........भाई अनवर ने खुदी को इतना बुलंद किया है के हर ब्लोगर उनसे पूंछने लगा है के बता तेरी रजा क्या है ....भाई अनवर के ब्लॉग को जब एग्रीगेटरों से हटाया जाने लगा उनके ब्लॉग एक विशेष लोगों के बनाये गए कोकस की उपेक्षा के शिकार हुए तब भाई अनवर हिम्मत नहीं हारे और उन्होंने इस शेर को सही साबित कर दिखाया के ....नशेमन पर नशेमन इस क़दर तामीर करता जा के बिजलियाँ आप बेज़ार हो जाएँ गिरते गिरते और भाई अनवर ने कुछ ऐसी ही महनत की ऐसी ही हिम्मत दिखाई के उन्होंने छोटे ब्लोगर्स को एक साहस दिया , एक ताकत दी , मान सम्मान  और प्रतिष्ठा दी ..टिप्पणियों का कोकस खड़ा कर खुद अपने ही लोगों को टिपण्णी करने की परम्परा के शिकार जो अली बाबा चालीस चोर बने थे उन्हें गिरफ्त में लिया उन्हें  उनकी भूल का एहसास दिलाया और आज देखलो ब्लोगिग्न की दुनिया में फिर से भाईचारा सद्भाव और प्यार कायम है ..भाई अनवर का साथ दे रही हैं प्रेरणा अर्गल जो रोज़ मर्रा ब्लोगर मीट वीकली के लियें ब्लोगों को खुशबूदार फूलों की तरह चुनती है एक माला बनाती है और फिर ब्लोगिंग की दुनिया को प्यार दुलार और अपनेपन की खुशबु से महका देती है ..ब्लोगिंग के इस कामयाब सफ़र के लियें भाई अनवर और प्रेरणा बहन को बधाई .ब्लोगिंग के इस सिपाही का सेल्यूट है ........अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

सुदामा कृष्णा की दोस्ती भुलाकर हम विदेशियों की दोस्ती की बात करते हैं और खुद को शर्मसार करते हैं

Written By आपका अख्तर खान अकेला on रविवार, 7 अगस्त 2011 | 9:09 pm


दोस्तों आज में हेरान और परेशान हूँ आज सुबह से सभी हैप्पी फ्रेंडशिप दे मना रहे है एक दुसरे को संदेश और झंसेबाज़ी दे रहे हैं मन में क्या है लेकिन सन्देश में एक दुसरे के लिए प्यार और दोस्ती की तड़प बता रहे हैं ..बच्चे हैं के शोक में एक दुसरे को फ्रेंडशिप बेंड बाँध रहे हैं ...........देश में अब विदेश की कई बातों का असर खूब आ गया है फ्रेंड शिप दोस्तों ने मनाया हो या ना मनाया हो लेकिन फ्रेंडशिप बेंड और फ्रेंडशिप गिफ्ट बनाने वालों के साथ साथ मोबाइल मेसेज कम्पनियों के मज़े हो गए हैं और आज के दिन उन्होंने करोड़ों करोड़ रूपये हमारे देश के भोले भाले जज्बाती लोगों से कमा लिए हैं .......दोस्तों फ्रेंड शिप दे जो यु के में १९३५ में एक अपराधी को जब वहां के पुलिस ने अगस्त के प्रथम शनिवार को म्रत्युदंड दिया तब उसके एक मित्र ने अपने म्र्तक दोस्त की याद में दुसरे दिन जज्बाती होकर आत्महत्या कर ली और जान दे डाली बस यु के के लोगों को एक दोस्त का दोस्त के लियें जान देने का यही अंदाज़ पसंद आया और जब से ही अगस्त महीने के पहले रविवार को फ्रेंडशिप दे मनाने की घोषणा कर दी ..आर एस एस और भाजपा के लोग जो स्वदेशी आन्दोलन की बात करते हैं गाँधीवादी लोग जो चरखे और खादी की बात करते हैं वोह सभी इस रंग में बस गए हैं ......दोस्तों में नहीं समझता इस दिन को हमारे लियें मनाना गर्व की बात हो लेकिन हाँ दोस्ती की मिसाल हमारे देश में क्रष्ण सुदामा और ना जाने कितने लोग रहे हैं हम हमारे देश में उन लोगों को याद  करके कभी भी उनके नाम पर कोई दिवस नहीं मनाते और इसीलियें हम हमारे देश हमारी संस्क्रती से दूर होते जा रहे हैं और नतीजे घर घर बिखरते परिवारों के रूप में देखने को मिल रहे हैं एक व्यक्ति सडक पर घायल पड़ा रहता है तड़प तड़प कर इलाज के आभाव में जान दे देता है लेकिन मानवता के नाते कोई उसे अस्पताल लेजाने की जुर्रत नहीं करता एक आदमी चाकू की नोक पर सरेआम एक लडकी को उठा कर लेजाता है उसके साथ बलात्कार करता है लेकिन उसे बचने के लियें कोई स्वदेशी नहीं आता .चलो तात्कालिक रूप से बचाना मुश्किल भी हो अगर तो उस अपराधी के पकड़े जाने  पर उसे सजा दिलवाने के लियें कोई भी खुलकर अदालत में ब्यान नहीं देता है ऐसे न जाने कितने किस्से हैं जो हम और हमारे देश वासी राष्ट्रहित में पूरा नहीं करते हैं लेकिन ऐसे दिवस जिसका हमारे देश हमारी संस्क्रती से कोई लेना देना नहीं है उसपर करोड़ों करोड़ रूपये और अपना बेशकीमती वक्त बर्बाद कर डालते हैं तो दोस्तों  नाराज़ ना होना अपना तो रोज़ ही फ्रेंडशिप दिवस है एक दिन तो दिवस वोह लोग मनाते हैं जो साल भर बेवफाई कर केवल एक दिन का दिखावा करते हैं हम और आप तो आजीवन  अटूट दोस्ती के रिश्ते में बंधे हैं इसलियें यह दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे दोस्तों ..............अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

सृजन साहत्यिक -सांस्कृतिक संस्था , लखनऊ का वार्षिकोत्सव व सम्मान समारोह...आमंत्रण पत्र ...ड़ा श्याम गुप्ता

      -आमंत्रण पत्र .....

-समस्त साहित्यकार व साहित्य प्रेमी जन सादर आमंत्रित हैं....

ये आँसू

Written By नीरज द्विवेदी on शनिवार, 6 अगस्त 2011 | 8:47 pm


From: http://movingimages.files.wordpress.com


लोग कहते हैं कि ये आँसू, तो बस ख़ुशी के आँसू हैं,
हमें याद नहीं शायद, हमने ही ऐसा कभी कहा तो नहीं॥

सुबह से ही, अश्क की बातें करो, तो लोग कहते हैं,
जब से उठे हो अभी तक, हाथ मुँह धोया कि नहीं॥
जो सुबह से ही चालू हो गए...



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अन्ना , कोंग्रेस ,भाजपा मिलकर देश में महंगाई और भ्रष्टाचार से ध्यान हटाना चाहते हैं


 जी हाँ जनाब बात बड़ी अजीब सी है लेकिन सच यही है ....अन्ना , कोंग्रेस ,भाजपा मिलकर देश में महंगाई और भ्रष्टाचार से ध्यान हटाना चाहते हैं ...........देश में जब कोंग्रेस सरकार का भ्रस्ताचार चरम सीमा पर था और महंगाई ने सारे रिकोर्ड तोड़ दिए थे जनता त्राहि त्राहि कर रही थी ..भाजपा और कोंग्रेस की सुनारी लड़ाई चल रही थी मनमोहन की भाजपा नेता तारीफ करने में लगे थे और मनमोहन सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद भी काले धन के जमाखोरों की सूचि सार्वजनिक करने को तय्यार नहीं थे तब अचानक अन्ना हजारे का लोकपाल विधेयक का संघर्ष छिड़ा ..मिडिया ने महंगाई से मरते हुए लोगों की खबरों को छोड़ कर ..भ्रष्टाचार से सिसकते देश की हालत को छोड़ कर अन्ना के बिल को प्रमुख खबर बनाया  फिर अन्ना और बाबा रामदेव  के टुकड़े किये अन्ना ने बाबा रामदेव से अलग होकर उन्हें कमज़ोर किया और सरे आम कोंग्रेस ने लाठी के बल पर बाबा रामदेव का गला घोंट कर उनकी बोलती बंद कर दी फिर भ्रष्टाचार और महगाई का जेसे ही बोलबाला शुरू हुआ अन्ना का फिर लोकपाल आ गया ...में कहता हूँ आखिर लोकपाल आ भी गया तो क्या फर्क पढ़ेगा जनता को क्या फायदा मिलेगा सरकार जो लोकपाल लाना चाहती है या अन्ना जो लोकपाल लाना चाहते  हैं अगर वोह आ भी जाए तो देश या देश की जनता को क्या फायदा मिलेगा कुछ नहीं तो फिर जनाब यह हो हल्ला यह सुनारी लड़ाई किस्लियें संसद में भाजपा के सांसद लोकपाल बिल के लियें कुछ नहीं बोलते हैं और बाहर चीखते चिल्लाते हैं तो यह तो सिर्फ एक मजाक ही कहा जा सकता है ..........तो जनाब समझ गए ना यह सब मिडिया मेनेजमेंट के साथ खुले आम डंके की चोट पर किये गए भ्रष्टाचार और मूल्यवृद्धि की काली करतूतों को दबाने के लियें कोंग्रेस , भाजपा,अन्ना का मिला जुला खेल है और जनता इस झांसे में आकर अपने दो वर्ष से भी अधिक समय को बर्बाद कर चुकी है ........
अब हम बात करे देश के भ्रष्ट लोगों को सजा देने की तो जनाब हमारे देश में भ्रष्टाचार निरोधक कानून है उसे कारगर बनाया जाए .हमारे पास भारतीय दंड संहिता है जिसमे दंड के सभी प्रावधान है केवल लोकसेवकों को अपराध किये जाने पर सजा से बचाने के लियें अंग्रेजों के इस कानून में जो दंड प्रक्रिया संहिता की धरा १९७ में बिना सरकार की स्वीक्रति के सरकारी चोरों के खिलाफ मुकदमा चलाने की पाबंदी है उसे हटा दिया जाए फिर चाहे प्रधानमन्त्री हो चाहे सुप्रीमकोर्ट का जज हो चाहे चपरासी हो ,चाहे संत्री हो चाहे मंत्री हो सभी को दंड मिलने लग जाएगा आप सभी को पता है के देश में आज तक जिस भी भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ हुआ है वोह खुद सरकार या सरकार के किसी अधिकारी ने नहीं किया है इसके लियें जनहित याचिकाएं दायर हुईं और सभी जनहित याचिकाओं पर जब सुप्रीमकोर्ट ने अपनी निगरानी में जांच करवाई तब कहीं बेईमान लोगों को पकड़ा जा सका है लेकिन सरकार ऐसे न जाने कितने अपराधों को छुपा कर बेठी है कोंग्रेस , भाजपा और दुसरे दल सभी तू मेरी मत कह में तेरी नहीं खून और मिल जुल कर जनता का शोषण करे इसी पर लगे हैं .तो दोस्तों दंड प्रक्रिया संहिता की धरा १९७ जो सरकारी बेईमान और अपराधियों के खिलाफ कार्यवाही में अडंगा है उसे हत्वा दो और देश के सभी भ्रष्टों को जेल भिजवा दो फिर ना लोकपाल चाहिए ना जोक्पाल चाहिए .......अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

अन्ना , कोंग्रेस ,भाजपा मिलकर देश में महंगाई और भ्रष्टाचार से ध्यान हटाना चाहते हैं



  • पत्रकार-अख्तर खान "अकेला"



  •  जी हाँ जनाब बात बड़ी अजीब सी है लेकिन सच यही है ....अन्ना , कोंग्रेस ,भाजपा मिलकर देश में महंगाई और भ्रष्टाचार से ध्यान हटाना चाहते हैं ...........देश में जब कोंग्रेस सरकार का भ्रस्ताचार चरम सीमा पर था और महंगाई ने सारे रिकोर्ड तोड़ दिए थे जनता त्राहि त्राहि कर रही थी ..भाजपा और कोंग्रेस की सुनारी लड़ाई चल रही थी मनमोहन की भाजपा नेता तारीफ करने में लगे थे और मनमोहन सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद भी काले धन के जमाखोरों की सूचि सार्वजनिक करने को तय्यार नहीं थे तब अचानक अन्ना हजारे का लोकपाल विधेयक का संघर्ष छिड़ा ..मिडिया ने महंगाई से मरते हुए लोगों की खबरों को छोड़ कर ..भ्रष्टाचार से सिसकते देश की हालत को छोड़ कर अन्ना के बिल को प्रमुख खबर बनाया  फिर अन्ना और बाबा रामदेव  के टुकड़े किये अन्ना ने बाबा रामदेव से अलग होकर उन्हें कमज़ोर किया और सरे आम कोंग्रेस ने लाठी के बल पर बाबा रामदेव का गला घोंट कर उनकी बोलती बंद कर दी फिर भ्रष्टाचार और महगाई का जेसे ही बोलबाला शुरू हुआ अन्ना का फिर लोकपाल आ गया ...में कहता हूँ आखिर लोकपाल आ भी गया तो क्या फर्क पढ़ेगा जनता को क्या फायदा मिलेगा सरकार जो लोकपाल लाना चाहती है या अन्ना जो लोकपाल लाना चाहते  हैं अगर वोह आ भी जाए तो देश या देश की जनता को क्या फायदा मिलेगा कुछ नहीं तो फिर जनाब यह हो हल्ला यह सुनारी लड़ाई किस्लियें संसद में भाजपा के सांसद लोकपाल बिल के लियें कुछ नहीं बोलते हैं और बाहर चीखते चिल्लाते हैं तो यह तो सिर्फ एक मजाक ही कहा जा सकता है ..........तो जनाब समझ गए ना यह सब मिडिया मेनेजमेंट के साथ खुले आम डंके की चोट पर किये गए भ्रष्टाचार और मूल्यवृद्धि की काली करतूतों को दबाने के लियें कोंग्रेस , भाजपा,अन्ना का मिला जुला खेल है और जनता इस झांसे में आकर अपने दो वर्ष से भी अधिक समय को बर्बाद कर चुकी है ........
    अब हम बात करे देश के भ्रष्ट लोगों को सजा देने की तो जनाब हमारे देश में भ्रष्टाचार निरोधक कानून है उसे कारगर बनाया जाए .हमारे पास भारतीय दंड संहिता है जिसमे दंड के सभी प्रावधान है केवल लोकसेवकों को अपराध किये जाने पर सजा से बचाने के लियें अंग्रेजों के इस कानून में जो दंड प्रक्रिया संहिता की धरा १९७ में बिना सरकार की स्वीक्रति के सरकारी चोरों के खिलाफ मुकदमा चलाने की पाबंदी है उसे हटा दिया जाए फिर चाहे प्रधानमन्त्री हो चाहे सुप्रीमकोर्ट का जज हो चाहे चपरासी हो ,चाहे संत्री हो चाहे मंत्री हो सभी को दंड मिलने लग जाएगा आप सभी को पता है के देश में आज तक जिस भी भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ हुआ है वोह खुद सरकार या सरकार के किसी अधिकारी ने नहीं किया है इसके लियें जनहित याचिकाएं दायर हुईं और सभी जनहित याचिकाओं पर जब सुप्रीमकोर्ट ने अपनी निगरानी में जांच करवाई तब कहीं बेईमान लोगों को पकड़ा जा सका है लेकिन सरकार ऐसे न जाने कितने अपराधों को छुपा कर बेठी है कोंग्रेस , भाजपा और दुसरे दल सभी तू मेरी मत कह में तेरी नहीं खून और मिल जुल कर जनता का शोषण करे इसी पर लगे हैं .तो दोस्तों दंड प्रक्रिया संहिता की धरा १९७ जो सरकारी बेईमान और अपराधियों के खिलाफ कार्यवाही में अडंगा है उसे हत्वा दो और देश के सभी भ्रष्टों को जेल भिजवा दो फिर ना लोकपाल चाहिए ना जोक्पाल चाहिए .......अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

    ऐसे हैं भगवान !

    Written By रेखा श्रीवास्तव on शुक्रवार, 5 अगस्त 2011 | 8:41 am

    चिकित्सा क्षेत्र के सभी लोग एक विशेष महत्व रखते हैं और डॉक्टर तो भगवान कहे जाते हैं और होते भी हैं। मैंने देखे है ऐसे डॉक्टर - मरीजो की सेवा किसी भी हद तक करने में संलग्न हैं। सबसे पहले ऐसे समर्पित डॉक्टरों के लिएनमन और नीचे दी जा रही शर्मनाक घटना के लिए लोगों की जितनी भी भर्त्सना की जाय कम है।

    ये घटना उत्तर प्रदेश के बहुत पुराने अस्पताल "स्वरूपरानी नेहरु चिकित्सालय" इलाहाबाद की है। जिसने क़ानून और मानवता को ताक पर रख कर ये घृणित काम किया और फिर उसके खिलाफ जंग भी छेड़ दी है।
    इस अस्पताल के कर्मचारियों ने कुछ मरीजों को अस्पताल से उठा कर दूर जंगल में झाड़ियों में फ़ेंक दियाक्योंकि उनकी हालात में सुधार नहीं हो रहा था। इसमें जिम्मेदार माने जा रहे कर्मचारियों का कहना है कि ऐसा उन्होंनेयहाँ के डॉक्टरों के कहने पर किया था। वही डॉक्टर जिन्हें भगवान मानकर मरीज अस्पताल आता है और उसके घर वालेआशाभरी निगाहों से उसको देखते रहते हैं। इस कथन में कितनी सच्चाई है - इस बात को सिद्ध नहीं किया जा सकता हैलेकिन फिर भी चाहे जो हो उसके अन्दर एक आत्मा होती है और वह क्या ऐसे घृणित कार्य करने के लिए विरोध नहींकरती है । शायद नहीं , नहीं तो उनकी दया पर निर्भर मरीज को ऐसे जंगल में कौन फ़ेंक सकता है? अगर डॉक्टर ने ऐसाकहा है तो वह और भी शर्मनाक है लेकिन कोई भी कर्मचारी बगैर किसी ऊपर हाथ रखने वाले के ऐसा कदम नहीं उठासकता है। इसके पीछे उच्च कर्मचारी वर्ग का समर्थन या शह जरूर ही हैं।
    शर्मनाक इस लिए तो है ही --साथ ही जब इसके लिए दोषी पाए गए वार्ड बॉय के खिलाफ कार्यवाहीकी गयी तो सभी चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी हड़ताल पर चले गए और बाद में उनके साथ जूनियर डॉक्टर भी मिल गए। इसके विषय में क्या कहा जा सकता है? ये कि इस कार्य को अंजाम देने वाले लोगों के साथ जूनियर डॉक्टर की भी साजिशरही होगी। एक तो चोरी और ऊपर से सीनाजोरी। अब होगी कार्यवाही - जांच के लिए समिति का गठन और इस समितिमें कौन लोग होंगे? वही अस्पताल वाले न फिर वे क्यों इसके खिलाफ रिपोर्ट देंगे और दी भी तो हम क्या कर लेंगे? मानवता के मुँह पर कालिख पोतते हुए ये भगवान इनके लिए जो भी दंड निर्धारित किया जाय काम है।
    एक तरफ हमारा सुप्रीम कोर्ट अरुणा शानबाग जैसे मरीज को दया मृत्यु के लिए सहमत नहीं है औरउस अस्पताल के डॉक्टर और कर्मचारी भी उसके लिए प्रतिबद्ध है और दूसरी ओर जीवित लोगों को मरने के लिए जंगलमें फ़ेंक दिया गया क्योंकि वे अब कभी ठीक नहीं हो सकते हैं या फिर उनकी हालात में सुधार नहीं हो सकता है। अगरऐसा ही हो तो हमारे देश की आबादी बहुत जल्दी काम हो सकती है क्योंकि टाटा मेमोरिअल जैसे अस्पतालों में तोलाइलाज मरीज ही आते हैं और फिर अस्पताल सबको बाहर फिंकवा दे और डॉक्टरों की कोई जिम्मेदारी नहीं है। क्योंकिवहाँ आने वाले कम से कम ८० प्रतिशत मरीज को पूरी तरह से कभी ठीक होना ही नहीं होता है। कुछ वर्षों कि जिन्दगी केलिए क्यों जहमत उठाई जाए। लाखों रुपये खर्च किये जाय। ये महज एक खबर नहीं है बल्कि कुछ सोचने के लिएमजबूर करने वाली बात है और इसको सिर्फ विभागीय स्तर पर निपटाने वाली बात भी नहीं बल्कि इसको सरकार केसंज्ञान में लिया जाना चाहिए और अगर सरकार इसके लिए मजबूर है क्योंकि इसमें कुछ सम्मिलित लोग वर्ग विशेष केभी हो सकते हैं जिनपर मुख्यमंत्री जी की विशेष कृपा रहती है तो फिर उनके खिलाफ कार्यवाही हो ही नहीं सकती है। तबइसको हमें सर्वोच्च न्यायालय कि दहलीज पर ले कर जाना होगा।

    श्रावण - श्राव अणुओं का

    श्राव होता है जब अणु का उसे कहते हैं श्रावण | श्रावण में अणुओं का श्राव होता है | यह अणु बाद में अलग-अलग जीव जन्तु, पेड़-पोधे, मनुष्य, पशु, पक्षी, के रूप में जन्म लेते हैं | श्रावण में पृथिवी का गर्भ खुल जाता है और परमात्मा के अणु पृथ्वी के गर्भ में गर्भ धारण करते हैं | यह श्रावण मास में पृथिवी में भी अणुओं का श्राव होता है | और पृथिवी मासिक धर्म से होती है | उसके बाद गर्भ धारण करती है | तो जिस प्रकार मासिक धर्म के समय स्त्री को घर पर ही रहना चाहिए | उसी प्रकार जब पृथ्वी का मासिक धर्म आता है तो सबको घर पर रहना चाहिए | इस समय अणुओं का पृथ्वी में सामना होता है | और जो साल भर की गंदगी पृथ्वी में होती है, वह गंदगी निकल जाती है | तथा पृथ्वी पुनः तारो ताज़ा और नयी हो जाती है | नदी, तालाब, कुएँ, और जल स्त्रोत भी नए और ताज़े हो जाते हैं | गंदगी सब निकल जाती है | पृथ्वी को परमात्मा स्वस्छ और सुन्दर बना देता है | तथा जिस प्रकार खेती होने के लिए खेत तैयार होता है, उसी प्रकार पृथिवी भी नए गर्भ के लिए तैयार होती है | इस श्रावण मास में बहुत से प्राणी गर्भ धारण करते हैं | यह श्रावण मास में ही गुरु भी शिष्य को अपने गर्भ में धारण करता है, और श्रावणी के समय जनेऊ संस्कार होता है |
     
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    हम तो हँसते जा रहे थे

    Written By नीरज द्विवेदी on गुरुवार, 4 अगस्त 2011 | 10:27 pm



    जिंदगी के अब तो सारे पर्त खुलते जा रहे थे,
    हम उनमें और भी यूँ ही उलझते जा रहे थे,
    देखना होता किसी को, तो देख लेता दर्द मेरा,
    हम यही सोचकर बस यूँ ही हँसते जा रहे थे॥


    चाहत इनमें भी है

    Written By नीरज द्विवेदी on बुधवार, 3 अगस्त 2011 | 10:54 pm







    ये जो अनदेखे, छोटे बच्चे हैं,
    दुनिया में सबसे अच्छे हैं,
    एक बार इन्हें मौका तो दो,
    आसमाँ छूने की ताकत इनमें भी है॥

    भूख ने इन्हे बेहाल कर रखा है,
    हमने इन्हें बदहाल कर रखा है,
    इक हाथ पकड सहारा तो दो,
    (ये अनाथ बच्चे नहीं, इन्हीं मे से कुछ देश के सबसे चमकते सितारे बनेंगे।)


    बात उस दिन की है

    बात उस दिन की है,
    जब आँख पहली बार मिली थी,
    हाँ वो अपनी सहेली के संग थी,
    कनखियों से देख रही थी,
    आगे को चल रही थी,

    फिर उसके बाद सिलसिला सा शुरू हो गया,
    मैं उसके पीछे दीवाना सा हो गया,
    रोज़ उसी सड़क पर आना-जाना हो गया,
    अब तो नैनो से नैन बतियाना हो गया,

    आखों ने जब पड़ ली आखों की बोली,
    फिर एक दिन वो बोली,
    जरा इधर तो आओ,
    कोन हो बताओ,

    आज में तुम्हारी शिकायत भाई से करती हूँ,
    घूरते हो तुम मुझे, तुम पर न मरती हूँ,
    मेरा तो कोई और है,
    तुम से पुरजोर है,

    जला रही है, समझ गया,
    इम्तिहान का वक्त है, समझ गया,
    उससे कुछ न बोला,
    अपना मुंह न खोला,

    हंल्का सा मुस्कुरा दिया,
    एक तरफ चल दिया,
    उसे कुछ वक्त दिया,
    आज न कुछ किया,

    बस हम निकल लिए,
    अपने दिल को थाम लिए,
    अब उसकी बैचैनी थी,
    रोज़ राह पर नैनी थी,

    कुछ दिन निकल गए,
    उसके अरमाँ मचल गए,
    सही ये वक्त था,
    मैं कुछ सख्त था,

    उससे अनजान अपनी राह चला,
    उसे देखे बिना अनमना चला,
    वो अब भी चल रही थी,
    अपनी राह छोड़, मेरी राह पर चल रही थी,

    पीछे से उसने, हाथ पकड़ा,
    दिया मुझे एक, लफड़ा,
    यूँ वो लिपट गयी,
    सरे बाज़ार यूँ पट गयी,

    .

    अमिताभ ध्यान मुद्रा

    Amitabh Meditation Mudra

    यह मुद्रा ध्यान की बनी हुई स्थिति को और स्थायित्व प्रदान करने के लिए है | जब ध्यान में उर्जा का संचार होने लगता है | तो उस संचार में किसी प्रकार की कोई बाधा न आये और वह संचार लगातार होता रहे, उसके लिए यह मुद्रा होती है | जिससे ध्यान करने वाला और अधिक देर तक बैठा रहता है ध्यान में | और इस मुद्रा में बैठने के कारण उर्जा को पूरे शारीर में संचारित होने में सहायता मिलती है  जिससे ध्यान करनेवाला अपने आपको बहुत हल्का और उर्जा से भरपूर पाता है | इस मुद्रा में बैठने के कारण धीरे-धीरे उसको शरीर का भारीपन समाप्त हो जाता है | और वह बिना किसी दर्द के काफी देर तक ध्यान में बैठ सकता है | जब भी कोई ध्यान में बैठता है तो उसे पहले घुटनों में दर्द होता है | और उसे लगता है की वह तो यूँ ही फालतू बैठा है | किन्तु यह मुद्रा उसका दर्द और उसकी बोरियत समाप्त कर देती है | अतः जिसको भी ध्यान में अधिक समय तक बैठना है उसके लिए यह मुद्रा है | वैसे और भी मुद्राएं है ध्यान में बैठने के लिए किन्तु इस मुद्रा को अमिट आभा नाम से जाना जाता है | और यह मुद्रा बोद्ध धर्म के वज्रयान में इसी नाम से जानी जाती है | आमिट आभा यानी मिट न सके ऐसी आभा | और ध्यान में आभा के लिए ही बैठा जाता है  कि जो भोजन हमने किया है उस भोजन को कैसे ओज में आभा में बदला जाए यह काम ध्यान में किया जाता है | नहीं तो वह उर्जा शरीर से बाहर किसी भी रूप में जा सकती है | अतः उस उर्जा को आभा जो मिट न सके ऐसी आभा में परिवर्तित करने के लिए यह ध्यान मुद्रा है | यह मुद्रा बड़े-बड़े ध्यानियों ने ध्यान करने के लिए उपयोग में ली है |

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    अच्छा किया दगा दी तूने

    Written By नीरज द्विवेदी on मंगलवार, 2 अगस्त 2011 | 8:03 pm



    अच्छा किया दगा दी तूने,
    इस जिन्दगी को सजा दी तूने,
    अपनी कीमत भूल गया था,
    मेरी औकात बता दी तूने॥

    अच्छा किया दगा दी तूने,
    मेरी हर चीज़ ठुकरा दी तूने,

    समुद्रगुप्त

    समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा जाता है । वह अपनी जिंदगी में कभी भी पराजित नही हुआ । उसका विजय अभियान भारत के हर क्षेत्र में कामयाब रहा । प्रथम आर्यावर्त के युद्ध में उसने तीन राजाओं को हराकर अपने विजय अभियान की शुरुआत की । इसके बाद दक्षिणापथ के युद्ध में दक्षिण के बारह राजाओं को पराजित कर उन्हें अभयदान दिया । यह उसकी दूरदर्शी निति का ही परिणाम था ,वह दक्षिण के भौगोलिक परिस्थितियों को भलीभांति समझता था । आर्यावर्त के द्वितीय युद्ध में उसने नौ राजाओं को हरा कर उन्हें अपने साम्राज्य में मिला लिया । बाद में उसने सीमावर्ती राजाओं और कई विदेशी शक्तियों को भी पराजित कर अपनी शक्ति का लोहा मानने पर मज़बूर कर दिया।

    समुद्रगुप्त ही गुप्त वंश का वास्तविक निर्माता था । उसका प्रधान सचिव हरिसेन ने प्रयाग प्रशस्ति की रचना की जिसमे समुद्रगुप्त के विजयों के बारें में विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । समुद्रगुप्त ने अश्वमेघ यज्ञ भी करवाया । वह वीणा बजाने में भी कुशल था । उसके दरबार में बुधघोष जैसे विद्वान् आश्रय पाते थे ।

    हाइकु गीत --- दिलबाग विर्क

    Written By डॉ. दिलबागसिंह विर्क on सोमवार, 1 अगस्त 2011 | 8:48 pm

    http://sahityasurbhi.blogspot.com/2011/07/blog-post_27.html
                     
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