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वकील और आम आदमी की क़ानूनी जानकारी में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है

Written By आपका अख्तर खान अकेला on शनिवार, 27 अप्रैल 2019 | 6:21 am

वकील और आम आदमी की क़ानूनी जानकारी में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है ,आम आदमी जज़्बात से चलता है ,जबकि वकील क़ानून ,,संविधान ,न्यायलयों की मर्यादाओं का ज्ञाता भी होता है और उनका मुहाफ़िज़ भी ,लेकिन आये दिन जज़्बात में बहकर सुप्रीमकोर्ट के फैसलों के खिलाफ ,संविधान की भावना ,न्यायिक व्यवस्था के खिलाफ जब वोह किसी आपराधिक मामले में पैरवी नहीं करने का फैसला लेता है तो अजीब सा लगता है ,कोई व्यक्ति अंतरात्मा की आवाज़ पर ऐसा फैसला ले तो समझ में आता है ,लेकिन अगर सामूहिक रूप संगठनात्मक अनुशासन में बाँध कर ऐसी व्यवस्था कर ,किसी विशेष मुक़दमे में पैरवी का बहिष्कार करने की घोषणा की जाए तो विधि सम्मत नहीं लगती ,,,,,,,,,,,,जज़्बात के हिसाब से ,मयादाओं के हिसाब से सामजिक सुधार के हिसाब से व्यक्तिगत व्यक्तिगत ऐसे फैसले लेना वाजिब है ,,,लेकिन क़ानूनी संस्थाए ऐसा किसी भी सूरत में नहीं कर सकती ,,देश का संविधान है ,,प्रत्येक व्यक्ति को आपराधिक मामले में उसके पसंद का वकील करने का अधिकार है ,क़ानूनी अधिकार है ,अगर वोह गरीब है तो ऐसे व्यक्ति को सरकारी खर्च पर ,,वकील दिया जाएगा ,,देश में हर ज़िले में ऐसे लोगो की पैरवी के लिए ,लीगल ऑथोरिटी के पेनल बने है ,,सुप्रीमकोर्ट ने बिना पैरवी के अधीनस्थ न्यायलय द्वारा दी गयी कई सज़ाओं के फैसले बदले है ,ऐसे में अगर हम ,,किसी सनसनीखेज़ ,,नृशंस हत्या के मामले में पैरवी नहीं करने का सामूहिक संस्थागत फैसला लेते है ,,तो ऐसा फैसला मुल्ज़िम को ही मदद करता है ,,होना यह चाहिए ,अपना विरोध जताने के लिए ,जो मृतक है उनको इंसाफ दिलाने के लिए ,,समाज को एक सबक़ दिखाने के लिए सामूहिक रूप से निशुल्क ऐसे मामले में फरियादी की कंसेंट लेकर ,,उसकी तरफ से ईमानदारी से पैरवी करने का फैसला लिया जाए ,अभियुक्त का वकील कोई भी हो यह उसकी नैतिकता का मामला है ,,लेकिन अगर हम उसे भी न्याय का पूरा संवैधानिक अधिकार देकर ,अपनी मज़बूत पैरवी करेंगे ,,गवाहों को सुरक्षा दिलवाएंगे ,गवाहों की विधिक मदद कर उनके बयांन दिलवाएंगे ,सफाई में जिरह के दौरान पूंछे जाने वाले सवालों के जवाब अग्रिम दिलवाएंगे ,,मुक़दमे की ठीक से पैरवी करेंगे तो हम ऐसे नृशंस हत्यारे को म्रत्युदंड दिलवाने में कामयाब हो सकेंगे ,किसी मुक़दमे के फैसले के बहिष्कार से हम अखबारों की सुर्खियां तो बन सकते है ,लेकिन दोस्तों हम वकील है ,,जानते है ,ऐसी पैरवी को क़ानूनी रूप से रोक भी नहीं सकते ,,सुप्रीमकोर्ट ने इसे अवमानना भी क़रार दिया है ,क्योंकि ऐसा करके हम उसके मुक़दमे में उसके न्यायमित्र को दबाव की बात कहने का मौक़ा दे रहे है ,तो फिर हो जाए सभी वकील भीमगंजमंडी कोटा के नृशंश हत्याकांड मामले में ज़मीर की आवाज़ सुनकर ,,मुल्ज़िम के खिलाफ फरियादी की तरफ से फरियादी को इंसाफ दिलाने और दोषी लोगों को एक व्यवस्थित विधिक ट्रायल के बाद फांसी के फंदे पर चढ़ाने ,स्पीडी ट्रायल करवाने का संकल्प ,लेंगे ,लेंगे ना ,ऐसा संकल्प ,,,अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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