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हर चश्म ए दीदार खुदा तेरे नूर से है

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on मंगलवार, 6 अगस्त 2013 | 12:42 pm

Durgashakti Nagpal
यह वास्तव में कांग्रेस के सेकुलरिज्म की जीत है, जो उसने भाजपा के हिंदूवाद के साथ मिलकर देश में पैदा किया है, कि हर मामले के मूल, तना, फल, पत्ती से लेकर पुंकेसर तक धर्म रमा, जमा है। यूं कहिए कि हर चश्म ए दीदार खुदा तेरे नूर से है। हर घटना, व्यक्ति, बात, विचार, आचार, खाना, मरना सब कुछ धर्म के चश्मे से ही देखा जाता है। मामला बहुत छोटा है दुर्गाशक्ति नागपाल का निलंबन। लेकिन इसने जो पैर फैलाए हैं, वह देश के लिए घातक हंै। यूपी की सरकार जैसे यह मान रही है कि यूपी उनका कोई पर्सनल राज्य है, तो वहीं केंद्र से सोनिया ने महिला अफसर होने के नाते चिमटी काटने की कोशिश भी कुछ ऐसी ही धारणा की उपज है। भाजपा इसमें क्या करे वह तय नहीं कर पा रही, सामान्य प्रोटेस्ट के अलावा कोई वैचारिक पृष्ठ इसका उसके पास है नहीं।
ऐसे में जिसको जो मिल रहा है वह किए जा रहा है। जिक्र है कि रायपुर में भी अधिकारी की जाति नागपाल के बारे में तहकीकात की जा रही है, कि वह अगर सिंधी है तो सिंधी समाज की सियासी विंग इसमें एक एंगल यह जोड़ दे या फिर वह ठाकुर है तो क्षत्रिय समाज की विंग कुछ करने लगे। यानी दुर्गाशक्ति नागपाल कम से कम यूपी राज्य सरकार की अफसर तो नहीं है। वह यूपी सरकार की नजरों में आतातायी हिंदू अफसर है, जो मुस्लिमों पर कुल्हाड़ी लेकर वार करने को तत्पर है, तो सोनिया की नजरों में पीडि़त महिला अफसर, भाजपा की नजरों में कुछ नहीं है, तो सिंधियों की नजरों में सिंधी, ठाकुरों के नजरों में ठाकुर, तो पंजाबियों की नजरों में पंजाबी है। कुछ आजीवन छात्रों की नजरों में वह चश्माधारी पढ़ाकू मैरिटोरियस है, जो उसे मैरिटोरियस कहकर यह बताना और जताना चाहते हैं कि देश में पढ़ाकुओं की कद्र नहीं है।
यह कोई नई बात नहीं है, देश में लगभग हर मामले को इसी दूरबीन से ताड़ा जाता है, फिर उसमें संभावनाएं देखी जाती हैं। ऐसा होता ही है, तो होने दीजिए। इसे रोकने के लिए कुछ तथाकथित लिख्खाड़ों और विचारों के गुब्बारों को फूटना होगा, अपने कंफर्ट से बाहर आना होगा, वह चूंकि संभव ही नहीं है, तो जाने दीजिए।
बेशक यह कांग्रेस के यूरोपियन शब्द सेकुलर से उपजी गंदगी है, लेकिन इसमें भाजपा की भूमिका भी कम नहीं है। चूंकि वे दूसरी तरफ एक अजीब सी बात रचते गए, अपने फायदे के लिए गढ़ते गए। अंतराल में सेकुलरिज्म को खतरा संप्रदायवाद से नहीं रहा, बल्कि हिंदूवाद से हो गया।
-सखाजी

चरणदास महंत के बाद मजबूत होगी कांग्रेस

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on बुधवार, 31 जुलाई 2013 | 6:58 pm

Charan Das Mahant, Prez. Cg Congres.
छत्तीसगढ़ में भाजपा के 10 सालों से काबिज होने की दो मुख्य वजहें हैं। पहली तो यहां पर कांग्रेस का वेरी वर्नाकुलर सियासी होना और आपसी झगड़ा है, तो दूसरी वजह भाजपा सरकार के खिलाफ मोटा मोटी स्तर पर कोई नकारात्मक लहर का न होना। इनमें से एक वजह तो खत्म सी होती दिख रही है और दूसरी किसी भी वक्त खत्म हो सकती है। पहली वजह आपसी झगड़े को चरणदास महंत के पूर्णकालिक अध्यक्ष बनने से जोड़कर देखा जाना चाहिए। यह समझना होगा कि जोगी की अपनी ताकत थी, राहुल गांधी से उनका सीधा व्यक्तिगत कनेक्शन। लेकिन पिछले तीन महीनों में देखा गया है, कि उनकी स्थिति साल 2003 के नतीजों के बाद जैसी है। उस वक्त जोगी छत्तीसगढ़ में हारे थे, विधायकों की खरीदपरोख्त के कारण पार्टी की छवि पर भी भारी पड़े थे, तो सोनिया गांधी ने पूरी तरह से उनका 10 जनपथ में प्रवेश बंद कर दिया था। यह अखबारी सुर्खियां भी थीं। ठीक इसी वक्त मध्यप्रदेश के तत्कालीन सीएम दिज्विजय सिंह के साथ भी हुआ था। उन्हें एमपी की जनता की मूर्खता पर इतना भरोसा था, कि वे 2003 में हारने पर 10 सालों तक सियासी सन्यास की घोषणा कर चुके थे। परंतु हमने पिछले 10 सालों में दिज्विजय सिंह का कद इतना बढ़ते हुए देखा है, जितना कि उनका सीएम के तौर पर नहीं था। इसे ही सियासी सन्यास कहते होंगे?
जोगी पर आते हैं। जोगी बहुत ही ताकतवर और उम्दा सीएम साबित हो सकते थे। किंतु वे तिकड़मों में लगे रहे। और छत्तीसगढ़ के 3 सालों में वे यूं हो गए कि जैसे उनके न रहते हुए कोई और माइका लाल सीएम नहीं बन सकता। और इसी जद्दोजहद ने राज्य में कांग्रेस की डे टू डे कमजोर कर डाला। साल 2008 में भी कांग्रेस की बागडोर महंत के हाथ में थी, किंतु दो कार्यकारी साथ में थे। माहौल जोगी के लिए था। यानी जोगी की 10 जनपथ में पैठ को यूं समझा जा सकता है, कि कांग्रेस 10 सालों तक सरकार से बाहर खड़ी रही, लेकिन भरोसा जोगी के प्रति खत्म नहीं हुआ।
अब लेकिन जोगी को भी हाई कमान ने पूरी तरह से एहसास करवा दिया कि आप जो कुछ भी हैं, वह पार्टी के लिए ठीक नहीं है। आपका पूरा परिवार है, तीन सीटें आप अकेले परिवार के बूते जीत सकते हो, कुछ और सीटों पर विधायकों को जितवा सकते हो। किंतु कांग्रेस को एक जुट नहीं कर सकते। ऐसे में अच्छा होगा जोगी जी आप जरा साइड लाइन हो जाइए। चरणदास महंत के स्वागत और सत्कार के बाद स्ट्रेटजी को देखें तो मुमकिन है, कि पार्टी और मजबूत हो।
दूसरा कारण भाजपा की कोई नकारात्मक छवि न होना है, यह बड़ी बात है। किंतु छवियों का क्या, रातों रात बदल जाती हैं। यानी कहने का मतलब भाजपा की राह अब जरा कांटों भरी होने को है। फिर विकास का जो मामला है, वह भी करीब-करीब लोग समझ ही सकते हैं, कि राज्य में इतनी संपदा है कि कोई भी सरकार होती अगर वह काम करने की मंशा रखती है, तो उसको यहां लोकप्रिय बनना कठिन नहीं है। खैर यह देखना होगा कि बीजेपी अपने फेवर में बने गुब्बारी माहौल को पंक्चर होने से कैसे बचाती है।
- सखाजी

आजकल ज़मीनों और कमीनों का ज़माना है, AIBA condemns Forbesganj killing, demands suspension of police officers.

Written By Saleem Khan on शनिवार, 23 जुलाई 2011 | 12:45 pm

6 महीने के बच्चे को भी गोलिओं
का शिकार बना डाला  
फ़ोर्ब्सगंज में 90 लाख की ज़मीन के लिए बिहार सरकार ने 4 करोड़ की चहारदीवारी लगवा दी वो भी मुफ़्त में ! और तो और बिहार पुलिस ने हद तो तब कर दी जब इसी ज़मीन की ख़रीद-फ़रोख्त के विरोध करने पर एक मासूम और गर्भवती महिला समेत 4 लोगों गोलिओं से सरेआम भून भी डाला और ये सब होता रहा हमारे बिहार के सुशासन बाबू कहलाने वाले मुख्यमंत्री नितीश कुमार जी की नाक के नीचे. सबसे अफ़सोसनाक तो यह रहा कि इस मसअले पर न तो मानवाधिकार आयोग ने कोई तत्परता दिखाई और न ही महिला संगठनों ने कोई हलचल.... क्यूँ? आगे बताता हूँ कि क्यूँ?







भारत में तो कोई कुछ न बोला मगर सात समंदर पार अमेरिका के एक इंडियन मुस्लिम संगठन ने इस बात की सुध ली और यह जागरण किया कि मुख्यमंत्री नितीश कुमार जी के फ़ोन नम्बर पर कॉल करके इस मुद्दे के बाबत कोई फ़ैसला लेने पर मजबूर किया जाए.



बताते चलें कि पूरे देश ने IBN7 न्यूज़ चैनल के ज़रिये ये जाना कि किस तरह से ज़मीन को गैर कानूनी तरीके से कानून के नुमाइंदों ने हथिया लिया और विरोध करने पर जवाब में गोलिओं से भून डाला. अब सुशासन का डंका पीटने वाले नीतीश कुमार की सरकार से और क्या अपेक्षा की जा सकती है. बीजेपी MLC सौरभ अग्रवाल ने अरारिया ज़िले के फ़ोर्ब्सगंज इलाके के भजनपुर गाँव में 33 एकड़ ज़मीन को 90 साल के लिए मात्र 90 लाख में ले लिया. यही नहीं हमारे सुशासन बाबू की सरकार ने सरकारी खर्चे से इसके चारो ओर 4 करोड़ की लागत लगा कर चहारदीवारी खिंचवा दी और सौरभ अग्रवाल को यूँ ही दे दी, उनसे एक भी पैसा नहीं लिया. ये ज़मीन बिहार इंडस्ट्रियल एरिया डेवेलपमेंट अथोरिटी (BIADA) जो कि बिहार सरकार की एक बॉडी है ने दिया.


यही वह ज़मीन है जिसने भजनपुर गाँव की रोड को हड़प लिया जिसके विरोध में भजनपुर गाँव के वासियों ने 3 जून 2011 को आवाज़ उठाई तो उन्हें इस दुनिया से ही उठा दिया गया. 4 लोग मारे गए-- चारों के चार मुसलमान - उनमें एक मासूम बच्चा और एक गर्भवती महिला !!! प्रदेश के मुख्यमंत्री नितीश कुमार न तो मरने वालों को एक भी पैसा देने का ऐलान किया और न ही उस गाँव ही गए. हाँ मुख्यमंत्री होने के नाते उन्होंने न्यायिक जांच का आदेश तत्परता से दिया.


कहते है कि कुर्बानी कभी व्यर्थ नहीं जाती और यही हुआ भी अब नितीश सरकार अपनी जदयू-भाजपा सरकार के मंत्रियों के क़रीबी रिश्तेदारों को ज़मीन औने-पौने दाम में देने के मामले में बुरी तरह से फंसती दिखाई दे रही है. फ़ोर्ब्सगंज की उक्त ज़मीन भी नितीश कुमार के क़रीबी रिश्तेदार को दिए जाने के कारण भी विवाद में आयी, नितीश कुमार ने निजी रूप से विरोध के विरोध गोलियां चलवा दीं.


इस भूमि घोटाले के खुलासे के बाद सरकार की चुप्पी और निष्क्रियता इस बात की चुगली कर रही है बिहार सरकार सिर्फ घोटालेबाज़ ही नहीं बल्कि मुस्लिम विरोधी भी है क्यूंकि चार निर्दोष मुसलामानों के खून से नहाने के बावजूद नितीश कुमार एक भी इन्च ज़मीन वापस करने के मूड में नहीं दिखाई दे रही है.

मैं AIBA के माध्यम से आप सभी से अनुरोध करता हूँ कि बेहद सभ्य व शालीन और नायाब तरीके से बिहार पुलिस के इस अमानवीय कृत्य की निंदा करें और बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार के निम्न  नम्बर पर सधे व सही शब्दों में अपना विरोध दर्ज कराएं. आपके विरोध में निम्न तथ्य होने चाहिए:::



  • 3 जून 2011 को फ़ोर्ब्सगंज के नरसंहार में शामिल पुलिसवालों का तत्काल बर्ख़ास्त किया जाए.
  • तत्काल प्रभाव से मारे गए लोगों के परिवार को आर्थिक सहायता प्रदान करना.
  • CBI जांच की मांग करना.
कोई भी फ़ोन उठाये आप अपनी बात रखें, हो सके तो अपना नाम पता व नम्बर भी दें ताकि शिकायत वास्तविक व वाजिब नज़रिए की लगे. भावावेश में कदापि न आये.


मुख्यमंत्री नितीश कुमार का नम्बर है-

  • +91-612-2201000
  • +91-612-2222079
हो सके तो निम्न चित्र पर क्लिक कर इसे अपने दोस्तों को ईमेल के ज़रिये से सूचित करें.




सम्बंधित खबरें:::

TwoCircles.net:
Forbesganj Firing: Police killed women, infant at pointblank range
Rediff:
Forbesganj firing: A tale of police brutality
IBN Live:
Sharad Yadav says judicial probe in Forbesganj firing “discourages private investment”
http://ibnlive.in.com/generalnewsfeed/news/sharad-disapproves-judicial-probe-in-forbesganj-police-firing/731444.html
Ummid.com:
Indian Muslim leaders' apathy towards Forbesganj killing painful.
http://www.ummid.com/news/2011/June/18.06.2011/indian_muslims_n_forbesganj_killing.htm
By Google Search:
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सलीम ख़ान
संस्थापक
ऑल इंडिया ब्लॉगर्स एसोशियेशन 

अरे भई साधो......: सपेरा बनते फिर सांप के बिल में हाथ डालते बाबा

Written By devendra gautam on बुधवार, 8 जून 2011 | 12:06 pm

बाबा रामदेव की सभा में पुलिस ने जिस बर्बरता का तांडव किया वह हैवानियत का चरम प्रदर्शन था. यूपीए सरकार का अक्षम्य अपराध. लेकिन यह सच है कि एक योग गुरु से आन्दोलनकारी नेता के रूप में अपने व्यक्तित्व के रूपांतरण में बाबा चूक गए. पुलिस के दमन पर उतरने के बाद अपने हजारों समर्थकों को उनके हाल पर छोड़कर उनका आयोजन स्थल से भाग खड़े होना अपरिपक्वता का परिचायक था.

आखिर उमा को थूक कर चाट ही लिया भाजपा ने

सिद्धांतों की दुहाई दे कर पार्टी विथ दि डिफ्रेंस का तमगा लगाए हुए भाजपा समझौता दर समझौता करने को मजबूर है। पहले उसने पार्टी की विचारधारा को धत्ता बताने वाले जसवंत सिंह व राम जेठमलानी को छिटक कर गले लगाया, कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा व राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की बगावत के आगे घुटने टेके और अब उमा भारती को थूक कर चाट लिया। असल में उन्हें पार्टी में वापस लाने के लिए तकरीबन छह माह से पार्टी के शीर्षस्थ नेता लाल कृष्ण आडवानी कोशिश कर रहे थे।
हालांकि राजनीति में न कोई पक्का दोस्त होता और न ही कोई पक्का दुश्मन। परिस्थितियों के अनुसार समीकरण बदलने ही होते हैं। मगर भाजपा इस मामले में शुरू से सिद्धांतों की दुहाई देते हुए अन्य पार्टियों से कुछ अलग कहलाने की खातिर सख्त रुख रखती आई है, मगर जब से भाजपा की कमान नितिन गडकरी को सौंपी गई है, उसे ऐसे-ऐसे समझौते करने पड़े हैं, जिनकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। असल में जब से अटल बिहारी वाजपेयी व लाल कृष्ण आडवाणी कुछ कमजोर हुए हैं, पार्टी में अनेक क्षत्रप उभर कर आ गए हैं, दूसरी पंक्ति के कई नेता भावी प्रधानमंत्री के रूप में दावेदारी करने लगे हैं। और सभी के बीच तालमेल बैठाना गडकरी के लिए मुश्किल हो गया है। हालत ये हो गई कि उन्हें ऐसे नेताओं के आगे भी घुटने टेकने पड़ रहे हैं, जिनके कृत्य पार्टी की नीति व मर्यादा के सर्वथा विपरीत रहे हैं।
लोग अभी उस घटना को नहीं भूले होंगे कि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ में पुस्तक लिखने वाले जसवंत सिंह को बाहर का रास्ता दिखाने के चंद माह बाद ही फिर से गले लगा लिया गया था। कितने अफसोस की बात है कि अपने आपको सर्वाधिक राष्ट्रवादी पार्टी बताने वाली भाजपा को ही हिंदुस्तान को मजहब के नाम पर दो फाड़ करने वाले जिन्ना के मुरीद जसवंत सिंह को फिर से अपने पाले में लेना पड़ा। इसी प्रकार वरिष्ठ एडवोकेट राम जेठमलानी का मामला भी थूक कर चाटने के समान है। भाजपाइयों के आदर्श वीर सावरकर की तुलना पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना से करने, जिन्ना को इंच-इंच धर्मनिरपेक्ष तक करार देने, पार्टी की मनाही के बाद इंदिरा गांधी के हत्यारों का केस लडऩे, संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु को फांसी नहीं देने की वकालत करने और पार्टी के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ ही चुनाव मैदान में उतरने वाले जेठमलानी को पार्टी का प्रत्याशी बनाना क्या थूक कर चाटने से कम है।
पार्टी में क्षेत्रीय क्षत्रपों के उभर आने के कारण पार्टी को लगातार समझौते करने पड़े हैं। राजस्थान में अधिसंख्य भाजपा विधायकों का समर्थन प्राप्त पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के सामने आखिरकार भाजपा का शीर्ष नेतृत्व आखिरकार नतमस्तक हो ही गया। पहले उन्हें विधानसभा में विपक्ष का नेता पद से हटाने में पार्टी को काफी जोर आया। उन्हें राष्ट्रीय महामंत्री बना कर संतुष्ट किया गया, मगर उन्होंने राजस्थान नहीं छोड़ा। हालत ये हो गई कि संघ ने अपनी पसंद के अरुण चतुर्वेदी को प्रदेश अध्यक्ष पद पर तो तैनात कर दिया, मगर पूरी पार्टी वसुंधरा के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। तकरीबन एक साल तक विधानसभा में विपक्ष का नेता पद खाली रहा और आखिरकार पार्टी को वसुंधरा को ही फिर से पुरानी जिम्मेदारी सौंपनी पड़ी। उसमें भी हालत ये हो गई कि वे विधानसभा में विपक्ष का नेता दुबारा बनने को तैयार ही नहीं थीं और बड़े नेताओं को उन्हें राजी करने के लिए काफी अनुनय-विनय करना पड़ा। इसे राजस्थान भाजपा में व्यक्ति के पार्टी से ऊपर होने की संज्ञा दी जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। प्रदेश भाजपा के इतिहास में वर्षों तक यह बात रेखांकित की जाती रहेगी कि हटाने और दुबारा बनाने, दोनों मामलों में पार्टी को झुकना पड़ा। पार्टी के कोण से इसे थूक कर चाटने वाली हालत की उपमा दी जाए तो गलत नहीं होगा। चाटना क्या, निगलना तक पड़ा।
पार्टी हाईकमान वसुंधरा को फिर से विपक्ष नेता बनाने को यूं ही तैयार नहीं हुआ है। उन्हें कई बार परखा गया है। ये उनकी ताकत का ही प्रमाण है कि राज्यसभा चुनाव में दौरान वे पार्टी की राह से अलग चलने वाले राम जेठमलानी को न केवल पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी बनवा लाईं, अपितु अपनी कूटनीतिक चालों से उन्हें जितवा भी दिया। ये वही जेठमलानी हैं, जिन्होंने भाजपाइयों के आदर्श वीर सावरकर की तुलना पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना से की, जिन्ना को इंच-इंच धर्मनिरपेक्ष तक करार दिया, पार्टी की मनाही के बाद इंदिरा गांधी के हत्यारों का केस लड़ा, संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु को फांसी नहीं देने की वकालत की और पार्टी के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ ही चुनाव मैदान में उतर गए। जेठमलानी को जितवा कर लाने से ही साफ हो गया था कि प्रदेश में दिखाने भर को अरुण चतुर्वेदी के पास पार्टी की फं्रैचाइजी है, मगर असली मालिक श्रीमती वसुंधरा ही हैं।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के मामले में भी पार्टी को दक्षिण में जनाधार खोने के खौफ में उन्हें पद से हटाने का निर्णय वापस लेना पड़ा। असल में उन्होंने तो साफ तौर पर मुख्यमंत्री पद छोडऩे से ही इंकार कर दिया था। उसके आगे गडकरी को सिर झुकाना पड़ गया।
उमा भारती के मामले में भी पार्टी की मजबूरी साफ दिखाई दी। जिन आडवाणी को पहले पितातुल्य मानने वाली मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने उनके ही बारे में अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल किया, वे ही उसे वापस लाने की कोशिश में जुटे हुए दिखाई दिए। पार्टी से बगावत कर नई पार्टी बनाने को भी नजरअंदाज करने की नौबत यह साफ जाहिर करती है कि भाजपा सिद्धांतों समझौते करने को लगातार मजबूर होती जा रही है। हालांकि मध्यप्रदेश से दूर रखने के लिए उन्हें उत्तरप्रदेश में काम करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, मगर एक बार पार्टी में लौटने के बाद उन्हें धीरे-धीरे मध्यप्रदेश में भी घुसपैठ करने से कौन रोक पाएगा।
-तेजवानी गिरधर, अजमेर

घूंघट में सन्यासी : भारत के इतिहास में पहली बार, बाबा रामदेव जी का अनोखा 'योग'-दान

Written By DR. ANWER JAMAL on मंगलवार, 7 जून 2011 | 2:22 am


ब्रह्माकुमारी मिशन  की बहनें और Dr. Anwer Jamal


इसमें कोई शक नहीं है कि मंदिरों और मज़ारों पर चढ़ावे में जो धन संपत्ति दान दी जाती है उसे वहाँ के ज़्यादातर व्यवस्थापक लोकसेवा में लगाने के बजाय अपनी ऐशो इशरत में ख़र्च करते हैं और यह सरासर धार्मिक भ्रष्टाचार है । इसे दूर करना भी उतना ही ज़रूरी है जितना कि विदेशों में जमा काले धन का राष्ट्रीयकरण करना।
...और यह काम बाबा रामदेव जी  के बस का है नहीं !


नकारा सरकार ने सोते हुवे निहत्थे लोगों पर लाठी चार्ज कर के जो बर्बर कार्यवाही की उसकी जितनी  निंदा की जाया कम ही है | आधी रात को दिल्ली पुलिस बल ने आक्रमण किया और सत्याग्रहियों को मैदान से बाहर निकाल फेंका ! कितने घायल हुए , कुछ गायब , बाबा रामदेव को सलवार - समीज में छुप कर भागना पडा ! वाह रे सरकार ! ये कैसी नकारा सरकार है  ?
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घूंघट में सन्यासी : भारत के इतिहास में पहली बार, बाबा रामदेव जी का अनोखा 'योग'-दान

मनमोहन सिंह ने नर्सिंग्घा राव का अधुरा काम पूरा किया ...............

Written By आपका अख्तर खान अकेला on सोमवार, 6 जून 2011 | 3:58 pm

मनमोहन सिंह ने नर्सिंग्घा राव का अधुरा काम पूरा किया ...............

मनमोहन सिंह ने नर्सिंग्घा राव का अधुरा काम पूरा किया ...... जी हाँ यह सच है ..कई वर्षों से प्रधानमन्त्री का पद हथियाने का सपना देखने वाले आर एस एस के स्वयम सेवक नर्सिंग्घा राव को राजिव गाँधी की हत्या के बाद प्रधानमन्त्री बनाया गया और उस वक्त सीताराम केसरी सहित वोह सोनिया गान्धी के दुश्मन हो गये थे उन्होंने राजिव गाँधी हत्याकांड तक की जांच  नहीं करवाई थी और आज जो चिदम्बरम , जो मनमोहन है वोह राव के मंत्रिमंडल के नो रत्न थे ..अमेरिका के दबाव में अमेरिका नीतियों को देश में लागू कर देश का रुपया विदेशों में पहुँचाने की निति बनाने के लियें ही राव ने मनमोहन की विश्व बेंक की नोकरी देख कर देश की आर्थिक व्यवस्था खत्म करने का काम सोंपा था और मनमोहन को वित्तमंत्री बनाया था आप आंकड़े उठा कर देख लें तब से आज तक मनमोहन की निति देश को डूबा रही है जनता को रुला रही है व्यापारियों,विदेशियों,विदेश   में रुपया जमा करने वालों और भ्रष्ट लोगों के मजे हैं खुद आंकड़े उठा लो देश तबाही और बर्बादी की तरफ है आज देश में गृह युद्ध की स्थिति है ...राव जो विश्व के सबसे भ्रष्ट प्रधानमन्त्री साबित हुए और प्रधानमन्त्री रहते हुए उनके खिलाफ देश की अदालत में मुकदमा चलाया गया तब उन्हें कुटिल कपिल सिब्बल मिले और उन्होंने इन्हें भी देश की बर्बाद करने की टीम में शामिल कर लिया राव गंध परिवार के दुश्मन थे इसलियें राजीव गाँधी की हत्या के बाद वोह किसी भी हालत में सोनिया गाँधी को राजनीती में नहीं आने देना चाहते थे और उन्हें खूब द्र कर रख रहे थे उस वक्त मनमोहन राव के हमजोली थे ..राव देश के नक्शे और इतिहास से कोंग्रेस को खत्म करना चाहते थे लेकिन कोंग्रेस एक बढ़ा सन्गठन था उनकी म्रत्यु के बाद फिर से सोनिया और राहुल की जांबाजी से उठ खड़ा हुआ राव की बाबरी मस्जिद लापरवाही के बाद भी मुसलमान फिर से कोंग्रेस से जुड़ गए दलित कोंग्रेस के साथ आये और सोनिया गाँधी महिलाओं को साथ लाने में कामयाब हुई जबकि राहुल गांधी ने युवाओं को एक नई दिशा दी और मुर्दा कोंग्रेस में जान फूंक दी लेकिन मनमोहन को प्रधानमन्त्री बना कर सबसे बढ़ी गलती कर डाली . मनमोहन सिंह जो कभी चुनाव नहीं जीत सकते इसलियें उन्हें चोर दरवाजे यानि राज्यसभा से लाया गया और अब वोह कोंग्रेस को बर्बाद और खत्म करने का जो काम नर्सिंग्घा राव जो अधुरा कम छोड़ गए थे उसे पूरा करने में लगे है देश में महा भ्रस्ताचार और महा अत्याचार के उदाहरणों की पराकाष्ठा है दिल्ली रामलीला मैदान और अन्ना की घटना ने देश की जनता को कोंग्रेस के खिलाफ बगावत करने को मजबूर कर दिया  है अकेले एक मनमोहन और उनकी टीम ने देश में कोंग्रेस को स्थापित करने के लिए महात्मा गाँधी ,नेहरु ,इंदिरा जी ,राजीव जी ने जो खून बहाया है उसे मनमोहन की नीतियों ने उसे मिटटी में मिला दिया है कोंग्रेस को फिर से जिंदा करने के लियें सोनिया ,राहुल और प्रियंका ने जो पसीना बहाया है उसे भी मनमोहन ने अपनी कुटिल चालों से पानी पानी कर दिया है और सच यही है जो भविष्य का इतिहास बतायेगा के कोंग्रेस को बर्बाद करने की कसम जी नर्सिंग्घराव ने खायी थी उनके अधूरे काम को आज मनमोहन सिंह ने प्रधानमन्त्री रहते पूरी कर डाली है और कोंग्रेस को अब शायद लोग हाशिये पर तलाश करते रह जायेंगे अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है सोनिया ओर राहुल राष्ट्रहित में सोच कर कोंग्रेस को बचाने के लियें भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देने के लियें देश और कोंग्रेस को मनमोहन मुक्त कर दें वरना सही यही होगा के लोग कोंग्रेस को एक सफेदी के दाग की तरह ढूंढ़ते रह जायेंगे और हम भी इसमें पिस जायेंगे .....अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान 

अरे भई साधो......: गांधी के असली हत्यारे

रामलीला मैदान की घटना ने यह साबित कर दिया कि विदेशी बैंकों में काला धन रखने वाले भारतीय खाताधारी काफी ताक़तवर हैं. वे अब जन आंदोलनों की धार को को बर्दाश्त करने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं. उनकी सत्ता पर मज़बूत पकड़ है और वे दमनचक्र की किसी सीमा तक जा सकते हैं. ठीक उसी तरह जैसे पूर्व जमींदारों ने जमींदारी उन्मूलन कानून बनने के बाद भी भूमि सुधार कार्यक्रमों को अमली जामा पहनाने के सरकारी प्रयासों को अभी तक सफल नहीं होने दिया.

बाबा ने निकम्मी सरकार को लाजवाब किया ...........

Written By आपका अख्तर खान अकेला on शनिवार, 4 जून 2011 | 7:38 pm

बाबा ने निकम्मी सरकार को लाजवाब किया ...........

बाबा ने निकम्मी  सरकार को लाजवाब किया ........... देश में भ्रस्ताचार और काले धन के मामले में निर्णायक लड़ाई में लेट लतीफ करने वाली सरकार और उसके एजेंट बाबा रामदेव पर अनर्गल आरोप लगा रहे है उनका आन्दोलन आर एस एस से प्रायोजित बताया जा रहा है लेकिन उन कोंग्रेसी मानसिक रोगियों को पता नहीं के बाबा जो कह रहे हैं जो मांग रहे हैं वोह देश और देशवासियों के लियें मांग रहे हैं अगर इसमें आर एस एस या कोई भी संगठन पर्दे के पीछे मददगार है तो राष्ट्रहित में उसे स्वीकार करने में सरकार को या देश के किसी भी नागरिक को कोई आपत्ति नहीं होना चाहिए ....
बाबा ने सरकार की कभी हाँ कभी ना के बाद कोंग्रेस सरकार और उनके एजेंटों को लताड़ पिलाते हुए कहा के बोहत कह लिया अब अगर कोई गलत आरोप लगाया तो उसका सीधा जवाब दिया जायेगा बाबा ने आज अपने उद्बोधन में शबी कोंग्रेसियों और सरकार के आएजेंतों की झांप बाँध दी और एक बार बाबा देश की राजनीतिक जनहित सतह पर सबसे ऊपर सबसे बढ़े राष्ट्रीय हीरों बन क्र उभरे हैं ............अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

बाबा रामदेव तो चमत्कारिक राष्ट्रीय पुरुष निकले .....

बाबा रामदेव तो चमत्कारिक राष्ट्रीय पुरुष निकले .....

बाबा रामदेव तो चमत्कारिक राष्ट्रीय पुरुष निकले .....जी हाँ सएह सच है एक केसरिया धोती में लम्बी दाड़ी मूंछों वाला एक योग पुरुष जिसे लो महंगे दामो में दवा बेचकर ठगने वाला कहते रहे हैं लेकिन उसने तो आज विश्व को बता दिया के वोह तो एक चमत्कारिक पुरुष राष्ट्रिय पुरुष है और आज सभी षड्यंत्रों के बाद भी विश्व का सबसे बढ़ा सत्याग्रह देश में दिल्ली की रामलीला मैदान में राष्ट्रहित में शुरू किया गया है ..चारों तरफ बाबा जिंदाबाद के नारे हैं बाबा का जादू  करोड़ों करोड़ हिन्दुस्तानियों के मन और मस्तिष्क में छा गया है और बाबा की इस लोकप्रियता को देख कर सभी राजनीतिक दलों सभी नेताओं की बोलती बंद हैं उन्हें सांप सूंघ गया है .
दोस्तों में खुद बाबा को दवा बेचने का व्यापारी समझ कर उनसे नाराज़ रहता था  लेकिन देश हित में बाबा ने आज जो कर दिखाया है वोह तो कोई चमत्कारिक पुरुष और कोई जादूगर ही कर सकता है मेरी तरफ से भी बाबा को प्रणाम ...मेने आज से २५ वर्ष पहले जब वकालत शुरू की तो एंटी करप्शन एक्ट यानि भ्रष्ट लोगों को पकड़ने का कानून पढ़ा उसमे एक एफ आई आर लिखवाने के लियें आम आदमी को अधिकार नहीं दिया गया है ..इस कानून में केवल ढाई पेज नोकरशाहों ने तय्यार किये ..और खुद को बचाने के लियें अपराध में पहले सरकारी स्वीक्रति की बाध्यता ..एफ आई आर की जटिलता ..जांच एजेसियों पर सरकारी अंकुश और फिर सेशन जज स्तर के अधिकारी सुनवाई लेकिन मामला थाने पर ही जमानत लिए जाने का अपराध मेरा दिमाग खराब हो गया के एक ऐसा बचकाना केवल रस्म अदायगी वाला कानून जहाँ देश भ्रस्ताचार से त्रस्त हो वहा इस तरह की व्यवस्था भ्र्स्ताचारियों को प्रोत्साहन ....तब से में खुद भी इस लड़ाई को अपने स्तर पर लड़ता रहा हूँ ..फिर दुसरा कानून भारतीय शपथ अधिनियम जिसमे देश में कोई भी कर्मचारी, अधिकारी,चिकित्सक ,सांसद,विधायक ,नेता,पालिका अध्यक्ष,पंच सरपंच , मंत्री ,प्रधानमन्त्री ,जज जो कोई भी हो शपथ लेते हैं संविधान और भारतीय कानून की मर्यादाओं की बात करते हैं फिर शपथ तोड़ते हैं भ्रस्ताचार फेलाते हैं ..बेईमानी करते हैं जनता को लुटते हिं साम्प्रदायी दंगे भड़काते हैं आतंकवाद फेलाते हैं और फिर भी पदों पर बने रहते हैं ऐसी शपथ का क्या ..जिस शपथ के उलंग्घन पर दंड और कठोर दंड के प्रावधान ना हो ....हमारे देश में प्रधानमन्त्री चोर रहे हैं ,जज चोर हैं मुख्यमंत्री और मंत्री चोर हैं सामोर्दायिक हैं इसका उदाहरन नार्सिम्मारव से लेकर महराष्ट्र और दुसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों के उदाहरन है ..जजों का उदाहरन सब जानते हैं ..बाबरी मस्जिद में कल्याण मुख्यमंत्री जी ने किया किया सब ने देखा है ....८४ के दंगों में और गुजरात के दंगों में मंत्रियों और मुख्यमंत्री ने किया किया सबने देखा है फिर आज जब बाबा अकेला बाबा रष्ट्रीय हित के मुद्दों को लेकर बिना किसी लोभ लालच के जनता को साथ लेकर सरकार के खिलाफ खड़े हैं सरकार से वोह सभी जायज़ मांगे जायज़ तरीके से कर रहे हैं जो सरकार को खुद पक्ष विपक्ष के नेताओं को खुद राष्ट्रहित में बहुत पहले कर लेना चाहिए था ..आज बाबा ने जो किया सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चल कर खुद को तकलीफ देकर राष्ट्र के हित में अपनी बात मनवाने का हो योग हठ है  उसने बाबा को अंतर्राष्ट्रीय हीरो बना दिया है ..बाबा ने एक काम और किया खुद आगे रहकर आरोपों से बचने के लियें राजनीति पद नहीं लेने और चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा आकर डाली इसलियें बाबा रामदेव की जय हो ...अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

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भ्रष्टाचार की गंगोत्री

Written By Sadhana Vaid on मंगलवार, 31 मई 2011 | 5:58 pm


अपने बचपन की याद है कि स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर जब देश भर में जश्न मनाया जाता था और आज़ाद भारत के प्रथम प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू तथा राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का भाषण रेडियो पर प्रसारित होता था या पिक्चर हॉल में न्यूज़ रील में दिखाया जाता था तो मन गर्व से भर उठता था ! हृदय में अगाध श्रृद्धा की तरंगें उठने लगती थीं और इस बात का अहसास मन को हमेशा चेताता रहता था कि कितनी मंहगी कीमत चुका कर यह आज़ादी हमें मिली है ! आज जिस आज़ाद हवा में हम साँस ले रहे हैं उसके लिये कितने वीरों ने अपनी जान की बाज़ी लगाई है और कितने उदारमना नेताओं और महापुरुषों ने अपने सभी सुखों को देश हित के लिये न्यौछावर कर वर्षों जेल की सलाखों के पीछे यातना भरे दिन बिताये हैं ! दिल में यह भावना रहती थी कि गाँधी, नेहरू, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, सुभाषचंद्र बोस, मदनमोहन मालवीय, वल्लभ भाई पटेल, वीर सावरकर, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, दादा भाई नोरोजी, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और अनेकों अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों के प्रशस्त किये मार्ग पर अग्रसर होते हुए देश को विकास और सफलता के शिखर पर पहुँचाना है और सम्पूर्ण विश्व में इसके गौरव को स्थापित करना है !

लेकिन आज़ाद भारत की यह मनमोहक तस्वीर बहुत दिनों तक अपने आकर्षण को बनाये नहीं रख सकी ! अंदर ही अंदर भ्रष्टाचार की दीमक इसको चाट कर खोखला करने की तैयारी में जुट चुकी थी ! कहते हैं कि सत्ता यदि पूर्ण बहुमत के साथ मिले तो अधिकार के साथ भ्रष्टाचार को पनपने के लिये भी भरपूर खाद पानी मिल जाता है ! लोकतंत्र के लिये यह अच्छा शगुन नहीं है ! स्वतन्त्रता के बाद दिसंबर 1947 में महात्मा गाँधी ने भी यह भाँप लिया था कि राजनेता पैसा कमाने के लिये अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर रहे हैं और भ्रष्टाचार में लिप्त हो रहे हैं ! उन्होंने आंध्र प्रदेश के अपने एक वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी मित्र श्री वैन्कटपैया के एक उल्लेखनीय पत्र के बाद, जिसमें उन्होंने गाँधीजी को लिखा था कि कॉंग्रेस पार्टी का नैतिक पतन हो रहा है ! उसके नेता अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर पैसा कमाने में लगे हैं और लोगों में यह धारणा पनपने लगी है कि इससे तो ब्रिटिश रूल ही अच्छा था, गांधीजी ने यह सुझाव दिया था कि कॉंग्रेस पार्टी को भंग कर देना चाहिये पर उनकी यह बात मानी नहीं गयी ! भ्रष्टाचार की आमद की यह पहली दस्तक थी !

भारतीय राजनीति के हिमालय से भ्रष्टाचार की गंगोत्री का उदगम वी के कृष्णामेनन के जीप काण्ड से माना जा सकता है ( 1948 ) ! इसके बाद इस गंगोत्री का आकार कुछ बढ़ा और हरिदास मूंदडा काण्ड प्रकाश में आया जिसकी पोल श्री फिरोज गाँधी ने 1958 में संसद में खोली थी ! के. डी. मालवीय एवं सिराजुद्दीन का ऑइल स्कैम तथा धरम तेजा काण्ड भी नेहरू जी के कार्यकाल में ही हुए थे ! उन दिनों देश भावनात्मक रूप से इन नेताओं पर इतना निर्भर था कि ऐसी कोई भी बात आसानी से उसके विश्वास को डिगा नहीं सकती थी और आज की तरह उस समय मीडिया भी इतना सक्रिय नहीं था ! इसलिए इन घोटालों की चर्चा बहुत अधिक नहीं हुई और बातें वहीं दब गयीं !

समय के साथ भ्रष्टाचार की इस गंगोत्री में कई धाराएं और उपधाराएं मिलती चली गयीं और इसके रूप रंग आकार को और अधिक विस्तार और गहराई प्रदान करती गयीं ! 1971 के नागरवाला काण्ड और मारुती उद्योग की धाँधलियों को बांग्लादेश की विजय के सामने अनदेखा कर दिया गया ! 1981 में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ए. आर. अंतुले के सीमेंट स्कैम जैसे अनेक घोटाले सामने आने लगे परन्तु 1987 में राजीव गाँधी के कार्यकाल में जब बोफोर्स तोप घोटाला प्रकाश में आया तो जनता का मोहभंग होना शुरू हुआ ! इसके बाद तो घोटालों का लंबा सिलसिला आरम्भ हो गया ! गंगोत्री अब पहाड़ों से उतर कर मैदानों में आ गयी थी और वृहद स्वरुप धारण कर चुकी थी ! यूरिया काण्ड (1990), हर्षद मेहता केतन पारेख काण्ड (1992), हवाला काण्ड (1993), सुखराम का टेलीकॉम घोटाला (1996), बिहार का चारा घोटाला (1996), जे. एम.एम. का रिश्वत काण्ड (1996) सबने राजनीति में भ्रष्टाचार की गहराई और विस्तार को इस तरह से उजागर किया कि आम जनता स्वयं को ठगा हुआ महसूस करने लगी ! तमाम बड़े बड़े नेताओं और उच्च पादासीन अधिकारियों के घरों से, यहाँ तक कि उनके बिस्तर के गद्दों तक से काला धन बरामद होने लगा ! जनता को समझ आने लगी कि उसका मेहनत से कमाया हुआ धन ये चंद भ्रष्ट और पतित नेता हड़प किये जा रहे हैं और जनता को नित नये करों के बोझ से लादते जा रहे हैं ! मंहगाई सुरसा की तरह बढ़ती ही जा रही है ! संसद तथा टीवी चैनलों के टॉक शोज़ में निरंतर चलने वाली अंतहीन, अर्थहीन, और निरुद्देश्य बहसें जनता को कोई दिलासा या दिशा नहीं दे रही हैं !

मीडिया फिर भी सक्रियता के साथ अपनी भूमिका निभाता रहा है ! आरम्भ में नेताओं की ये खबरें प्राय: दबा दी जाती थीं ! अशिक्षा के कारण अखबारों की पहुँच बहुत कम लोगों तक सीमित थी लेकिन टी.वी. के आगमन तथा गाँव देहात तक फ़ैल जाने का एक फ़ायदा यह हुआ कि भष्टाचार की सारी खबरें घर घर पहुँचने लगीं ! नेताओं का कद घटने लगा ! उनके प्रति जनता के मन में मान सम्मान कम होने लगा और आक्रोश की आँच सुलगने लगी !

सत्ता में गहराई तक ऊँची पहुँच, धीमी न्याय प्रक्रिया और प्रशासन की मिलीभगत ने भ्रष्टाचार की जड़े और गहरी कीं और स्वार्थी नेताओं की ढिठाई और हौसले बुलंद होते चले गये ! अधिकार का दुरुपयोग कर कई नेताओं ने अनुचित तरीकों से अपने स्वार्थ साधने की कोशिश की और कतिपय बड़े लोगों को लाभ दिला कर अपना बैक बलैंस खूब मज़बूत किया ! प्रमोद महाजन का टेलीकॉम घोटाला (2002) इसी श्रेणी में आता है ! भ्रष्टाचार की यह गंगोत्री अब आकार प्रकार में सागर का रूप ग्रहण करने लगी ! पहले किये जाने वाले कुछ लाखों करोड़ों के घोटाले अब हज़ारों करोड़ों तक के आँकड़े को छूने लगे ! (2006) का अब्दुल करीम तेलगी का स्टैम्प घोटाला, (2009) का मधु कोड़ा काण्ड, (2010) का ए. राजा का टू जी स्पेक्ट्रम काण्ड, (2010) का कलमाड़ी का राष्ट्र मण्डल खेल घोटाला, (2010) का ही सत्यम घोटाला अब महासागर का रूप ले चुके हैं !

दिमाग में सवाल उठता है क्या इस समस्या का कोई निदान है ? आशा करते हैं कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे जुझारू कर्मठ एवं देशभक्त व्यक्तियों का प्रयास अवश्य रंग लायेगा और आज़ादी के बाद से लगातार चलने वाला यह सिलसिला अब ज़रूर टूटेगा ! हम सभी भारतीय उनके साथ हैं और उनके इस अभियान को अशेष शुभकामनायें देते हैं !

साधना वैद

अंदाज ए मेरा: आत्‍मसमर्पित नक्‍सली की कहानी........ उसी की जुबान...

Written By Atul Shrivastava on रविवार, 29 मई 2011 | 12:23 am

अंदाज ए मेरा: आत्‍मसमर्पित नक्‍सली की कहानी........ उसी की जुबान...: "उसकी उमर कोई 21 साल है। वैसे तो 21 साल की उमर कोई बडी उमर नहीं होती लेकिन इस कम उम्र में उसने काफी कुछ झेला है। उसका नाम संध्‍या है। आज..."

मतदाता के बदलते मूड का संकेत हैं ये चुनाव परिणाम

Written By तेजवानी गिरधर on शनिवार, 21 मई 2011 | 7:58 am

माकपा विचारधारा की राष्ट्रीय प्रासंगिकता पर लटकी तलवार
कांग्रेस को भुगतनी पड़ी अपनी खुद की गलतियां
भाजपा के अकेले दिल्ली पहुंचना सपना मात्र
पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव नतीजों ने यह एक बार फिर साबित कर दिया है कि आम मतदाता का मूड अब बदलने लगा है। वह जाति, धर्म अथवा संप्रदाय दीवारों को लांघ कर वह विकास और स्वस्थ प्रशासन को प्राथमिकता देने लगा है। राजनीति में घुन की तरह लगे भ्रष्टाचार से वह बेहद खफा हो गया है। अब उसे न तो धन बल ज्यादा प्रभावित करता है और न ही वह क्षणिक भावावेश के लिए उठाए गए मुद्दों पर ध्यान देता है। चंद लफ्जों में कहा जाए तो हमारा मजबूत लोकतंत्र अब परिपक्व भी होने लगा है। अब उसे वास्तविक मुद्दे समझ में आने लगे हैं। कुछ ऐसा ही संकेत उसने कुछ अरसे पहले बिहार में भी दिया था, जहां कि जंगलराज से उकता कर उसने नितीश कुमार की विकास की गाडी में चढऩा पसंद किया। कुछ इसी प्रकार सांप्रदायिकता के आरोपों से घिरे नरेन्द्र मोदी भी सिर्फ इसी वजह से दुबारा सत्तारूढ़ हो गए क्योंकि उन्होंने अपनी पूरी ताकत विकास के लिए झोंक दी।
सर्वाधिक चौंकाने वाला रहा पश्चिम बंगाल में आया परिवर्तन। यह कम बात नहीं है कि एक विचारधारा विशेष के दम पर 34 साल से सत्ता पर काबिज वामपंथी दलों का आकर्षण ममता की आंधी के आगे टिक नहीं पाया। असल में इस राज्य में वामपंथ का कब्जा था ही इस कारण कि मतदाता के सामने ऐसा कोई दमदार विकल्प मौजूद नहीं था जो राज्य के सर्वशक्तिमान वाम मोर्चे के लिए मजबूत चुनौती खड़ी कर सके। जैसे ही मां, माटी और मानुस की भाषा मतदाता के समझ में आई, उसने ममता का हाथ थाम लिया और वहां का लाल किला ढ़ह गया। असल में ममता का परिवर्तन का नारा जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप था। कदाचित ममता की जीत व्यक्तिवाद की ओर बढ़ती राजनीति का संकेत नजर आता हो, मगर क्या यह कम पराकाष्ठा है कि लोकतंत्र यदि अपनी पर आ जाए तो जनकल्याणकारी सरकार के लिए वह एक व्यक्ति के परिवर्तन के नारे को भी ठप्पा लगा सकता है।
इस किले के ढ़हने की एक बड़ी वजह ये भी थी कि कैडर बेस मानी जाने वाली माकपा के हिंसक हथकंडों ने आम मतदाता को आक्रोषित कर दिया था। सिंगुर और नंदीग्राम की घटनाओं के बाद ममता की तृणमूल कांग्रेस ने साबित कर दिया कि वही वामपंथियों से टक्कर लेने की क्षमता रखती है। एक चिन्हित और स्थापित विचारधारा वाली सरकार का अपेक्षाओं का केन्द्र बिंदु बनी ममता के आगे परास्त हो जाना, इस बात का इशारा करती है कि आम आदमी की प्राथमिकता रोटी, कपड़ा, मकान और शांतिपूर्ण जीवन है, न कि कोरी विचारधारा।
तमिलनाडु चुनाव ने तो एक नया तथ्य ही गढ दिया है। इस चुनाव ने यह भी साबित कर दिया है कि आम मतदाता अपनी सुविधा की खातिर किसी दल को खुला भ्रष्टाचार करने की छूट देने को तैयार नहीं है। मतदाता उसको सीधा लालच मिलने से प्रभावित तो होता है, लेकिन भ्रष्ट तंत्र से वह कहीं ज्यादा प्रभावित है। चाहे उसे टीवी और केबल कनैक्शन जैसे अनेक लुभावने हथकंडों के जरिए आकर्षित किया जाए, मगर उसकी पहली प्राथमिकता भ्रष्टाचार से मुक्ति और विकास है। भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोपों से घिरे वयोवृद्ध द्रमुक नेता एम. करुणानिधि ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि वे लोक-लुभावन हथकंडों के बाद भी अकेले भ्रष्टाचार के मुद्दे की वजह से इस तरह बुरी कदर हार जाएंगे। कदाचित इसकी वजह देशभर में वर्तमान में सर्वाधिक चर्चित भ्रष्टाचार के मुद्दे की वजह से भी हुआ हो।
जहां तक पांडिचेरी का सवाल है, वह अमूमन तमिलनाडु की राजनीति से प्रभावित रहता है। यही वजह है कि वहां करुणानिधि के परिवारवाद और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी उनकी पार्टी से मतदाता में उठे आक्रोश ने अपना असर दिखा दिया। कांग्रेस को करुणानिधि से दोस्ती की कीमत चुकानी पड़ी। इसके अतिरिक्त रंगासामी के कांग्रेस से छिटक कर जयललिता की पार्टी के साथ गठबंधन करने ने भी समीकरण बदल दिए।
वैसे हर चुनाव में परिवर्तन का आदी केरल अपनी आदत से बाज नहीं आया, मगर अच्युतानंदन की निजी छवि ने भी नतीजों को प्रभावित किया। यद्यपि राहुल गांधी की भूमिका के कारण कांग्रेस की लाज बच गई और यही वजह रही कि वहां कांग्रेस की जीत का अंतर बहुत कम रहा।
रहा असम का सवाल तो वह संकेत दे रहा है कि अब छोटे राज्यों में हर चुनाव में सरकार बदल देने की प्रवत्ति समाप्त होने लगी है। मतदाता अब विकास को ज्यादा तरजीह देने लगा है। हालांकि जहां तक असम का सवाल है, वहां लागू की गईं योजनाएं तात्कालिक फायदे की ज्यादा हैं, मगर आम मतदाता तो यही समझता है कि उसे कौन सा दल ज्यादा फायदा पहुंचा रहा है। उसे तात्कालिक या स्थाई फायदे से कोई मतलब नहीं है। असम में सशक्त विपक्ष का अभाव भी तुरुण गोगोई की वापसी का कारण बना। एक और मुद्दा भी है। असम की जनता के लिए मौजूदा हालात में अलगाववाद का मुद्दा भाजपा के बांग्लादेशी नागरिकों के मुद्दे से ज्यादा असरकारक रहा। तरुण गोगोई की ओर से उग्रवादियों पर अंकुश के लिए की गई कोशिशों को मतदाता ने पसंद किया है। असल में अलगाववादियों की वह से त्रस्त असम वासी हिंसा और अस्थिरता से मुक्ति चाहते हैं।
कुल मिला कर इन परिणामों को राष्ट्रीय परिदृश्य की दृष्टि से देखें तो त्रिपुरा को छोड़ कर अपने असर वाले अन्य दोनों राज्यों में सत्ता से च्युत होना माकपा के लिए काफी चिंताजनक है। इसकी एक वजह ये भी है कि वह वैचारिक रूप से भले ही एक राष्ट्रीय पार्टी का आभास देती है, केन्द्र में उसका दखल भी रहता है, मगर वह कुछ राज्यों विशेष में ही असर रखती है और राष्ट्रीय स्तर पर वह प्रासंगिकता स्थापित नहीं कर पा रही। ताजा चुनाव कांग्रेस के लिए सुखद इसलिए नहीं रहे कि उसने खुद ने ही कुछ मजबूरियों के चलते गलत पाला नहीं छोड़ा। करुणानिधि की बदनामी के बावजूद उसने मौके की नजाकत को नहीं समझा और अन्नाद्रमुक के साथ हाथ मिलाने का मौका खो दिया। भाजपा की दिशा हालांकि ये चुनाव तय नहीं करने वाले थे, लेकिन फिर भी नतीजों ने उसे निराश ही किया है। पार्टी ने असम में जोर लगाया, मगर उसकी सीटें पिछली बार की तुलना में आधी से भी कम हो गई हैं। कुल मिला कर उसके सामने यह यक्ष प्रश्न खड़ा का खड़ा ही है कि वह आज भी देश के एक बड़े भू भाग में जमीन नहीं तलाश पाई है, ऐसे में भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त मतदाता को लुभाने के बावजूद राजनीतिक लाभ उठा कर देश पर शासन का सपना देखने का अधिकार नहीं रखती।
-तेजवानी गिरधर, अजमेर

भट्टा पारसौल कांड-माओवाद का एक और अध्याय या मध्यम वर्ग के लिए खतरे की घंटी..

Written By आशुतोष की कलम on मंगलवार, 17 मई 2011 | 10:28 pm

ग्रेटर नोयडा ,भट्टा पारसौल में मायावती सरकार के पुलिसिया गुंडों ने लगभग ८० किसानों को मारकर वहीँ जला दिया...गांव की सारी फसल जला दी गयी.महिलाएं शौच के लिए घर से बाहर नहीं निकल रही लगभग ११० महिलों के साथ पुलिसिया गुंडों ने बलात्कार किया...हाँ उत्तर प्रदेश सरकार के रिकॉर्ड में कोई लापता नहीं है और सिर्फ २ किसान मरे..
लगभग ५०० ग्रामीण लापता हैं...मीडिया चुप बैठा है...और खबर दिखाई भी तो जिन पे जुल्म हुआ उनका कवरेज कम और राहुल बाबा का ज्यादा...
आज भारत में जिस तरफ देखें जमींन की लूट चल रही है...कुछ परदे के पीछे ,कुछ लालच से,कुछ मायावती सरकार की तानाशाही के रास्ते पर चलकर हत्याएं करवाकर.. विकास की चकाचौध और अर्थव्यवस्था का गणित समझकर हमारी माननीय केंद्र सरकार भी एक के बाद एक परियोजनाओं को हरी झंडी दिखा रही है और अब किसी से छिपा नहीं है की इन सबकी दलाली भी ये नेता और कार्पोरेट खा रहें हैं...किसान से जमीन ली जाती है १ लाख रूपये या उससे कम के मुआवजे पर और बेचीं जाती है २ करोण रूपये एकड़ बिल्डरों को..अब तो मुझे लगता है हमे अरब खरब नील या मिलियन ट्रिलियन से आगे जा कर कोई नयी इकाई बनानी पड़ेगी सरकारों की इस दलाली की गाड़ना के लिए ..
अगर नोएडा की बात करे तो नोएडा रूपी राक्षस बढ़ता ही जा रहा है..कभी फेज -२,कभी नोएडा एक्सटेंसन तो कभी ग्रेटर नोएडा तो कभी ग्रेटर नोएडा एक्सटेंसन...किसनो की खेती की जमीन का अधिग्रहण औने पौने दामों पर करके सरकारें सद्दाम हुसैन और हुस्नी मुबारक की तरह अपना घर भर रही हैं..काहिरा और इराज के लोग सौभाग्यशाली थे की एक ही मुबारक या एक ही सद्दाम था ..भारत की विडंबना ये है की यहाँ तो सददामों और हुश्नियों की पूरी फ़ौज ही है..मायावती ,राहुल गाँधी ,शरद पवार,अमर सिंह,कर्णाटक के रेड्डी ऐसे कुछ गिद्धों के नाम हैं जो इस देश को नोच नोच कर खा रहें हैं और हम अपने वातानुकूलित घरों में बैठे जश्न मना रहे हैं..भले ही ८० करोड़ लोगो को रोटी नहीं मिले २ जून की, नोएडा से आगरा तक दिल्ली-आगरा एक्सप्रेस वे बनेगा वो भी किसानों की लाश पर उनकी घरों की महिलाओं की इज्जत की कीमत पर..कारण सिर्फ इतना है की सरकार को तो बिल्डर और दलाल चलातें हैं..अब ये जमीन जो अधिग्रहित की जा रही है हजारगुना जयादा दाम पर बिल्डरों को बेचीं जाती है..उसमें भी दलाली खाते है हमारे जनसेवक और नेता जी लोग..उसके बाद इन दलाली के पैसों को रियल इस्टेट में इन्ही बिल्डरों के यहाँ लगा देते हैं इस देश के कर्णधार बिल्डर से फ्लैट खरीदने वाला भी आम आदमी, जो पुरे जीवन किश्त भरता है और वो दलाली की कमाई अब तक १० गुना बढ़ चुकी होती है...वो भी बिलकुल सफ़ेद धन...
पिछले कुछ सालों में इस आर्थिक चकाचौंध की दौर में बिल्डरों और दलालों की एक पूरी व्यवस्था भी बन गयी है जो प्रकारांतर से सरकारी और पुलिसिया सहयोग से निरीह ग्रामीणों का सुनियोजित दमन कर रहा है और चुकी ये खबर समाज के सबसे कमजोर तबके से है इसलिए बहुत आसनी से इसे दबा दिया जाता है..इस कार्य में सभी पार्टिया सामान रूप से भागीदारी कर रही हैं...अगर यही खरोंच किसी युवराज की गाड़ी पर आई होती तो हम आप और मीडिया शुरू कर देता चिल्ल पों मचाना ..मगर जो मरा,जो जलाया गया वो किसान है..क्या हुआ जो हम उसकी मेहनत का पैदा किया हुआ अन्न ठूस ठूस कर कहते हैं हम सब तो अब नमकहराम होते जा रहे हैं..मरने दो उसे..होने दो उसकी बेटियों का बलात्कार किसान होता ही है इसलिए...
अब न तो उन किसानों के लिए कोई जंतर मंतर पर धरना होगा न ही ब्लॉग लिखा जाएगा न ही कोई कैंडिल मार्च होगा..क्यूकी आज की व्यवस्था और परिवेश में हमारी सोच है की "IT HARDLY MATTERS TO US "
अब मेरी उम्र का किसी किसान का लड़का हाथ में बन्दूक उठा ले तो उसे माओवादी कहा जाएगा..क्या करेगा वो..बाप की लाश भी नहीं छोड़ी इस सरकार ने ..माँ और बहन का सामूहिक बलात्कार पुलिसिया गिद्धों ने उसके सामने किया फिर भी हम कहेंगे की अहिंसा परमो धर्मः....किसान किसी को मारे तो वो मुख्य समाचार बन जाता है और ८० किसानों को जला दिया गया उसकी चर्चा भी नहीं..ये SEZ बना कर दलाली खाने का जो खेल सरकार ने शुरू किया है वो कई नंदीग्राम और सिंगूर पैदा करने वाला है...क्यूकी व्यवस्था से असहाय व्यक्ति के पास शस्त्र उठाने के अलावा कोई चारा नहीं रहता है...
आज जो भी व्यक्ति ये ब्लाग या ईमेल पढ़ रहा होगा उसे शायद कोई लेना देना नहीं होगा इस किसानो से मगर बंधू उन किसानो के बाद आप का ही नम्बर है क्यूकी उसके बाद सबसे कमजोर आप हैं..
जरा परिकल्पना करें की आप के घर में १०-१२ सरकार समर्थित पुलिस वाले गुंडे आते हैं..आप को गोली मार देते हैं और बेटी का सामूहिक बलात्कार ,बेटे को जेल और पत्नी को नंगा करके सड़क पे परेड करते हैं ..अभी तो ये एक भयावह कल्पना लग रही है मगर समाज के सबसे आखिरी तबके के साथ ये शुरू हो चूका है अगला नंबर आप का है....
में ज्यादा कुछ तो नहीं कहूँगा मगर इतना जरुर कहूँगा की विरोध की आदत डाले अपने स्वार्थ से थोडा ऊपर उठकर ..शायद वो विरोध बौधिक मानसिक या सामाजिक किसी भी स्तर पर हो...हम देश नहीं बदल सकते इस भावना से ऊपर आयें..वरना इस देश में आप और हम ही नहीं रहेंगे...देश के लिए नहीं अपने लिए विरोध करें अपने बच्चों के लिए विरोध करें...संचार क्रांति आप के साथ है क्यूकी आप गांव के किसान नहीं है ..ईमेल ,ब्लॉग,ट्विटर फेसबुक,मेसेज या कोई और साधन से..अपनी भावना व्यक्त करना शुरू करें ..नियति समझकर भूले नहीं...वरना वो दिन दूर नहीं जब भारत में सोमालिया जैसे हालत पैदा हो जाएँगे...

व्यवस्था में परिवर्तन चाहिए , हमे स्वराज चाहिए /

Written By Rajesh Sharma on सोमवार, 16 मई 2011 | 9:08 am



by Rajesh Sharma on Monday, 16 May 2011 at 09:01
फिर से चुनाव आएगा / फिर से वोट देने की मजबूरी, व्यथित हूँ क्या करू ? वोट न दूं तो ऐसा लगता हैं जैसे अपने अधिकार का प्रयोग नहीं किया और वोट दू तो ऐसा लगता हैं अपने अधिकार का उपयोग नहीं किया / प्रयोग और उपयोग, अजीब कशमकश हैं / वोट किसको दे , सारे दल फेल हो चुके हैं / भारत की जनता ने सबको मौका दिया लेकिन कोई भी जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा / आजादी के बाद से हम एक ही तरह की बुनियादी समस्याओ से निजात नहीं पा सके हैं / जस की तस कड़ी हैं बेरोजगारी और भुखमरी- गरीबी / गिने चुने लोग अमीर और अमीर होते जा रहे हैं और कृषक मजदूर किसी तरह दो बेला चावल रोटी का जुगाड़ कर पाते हैं / रोटी कपडा और मकान सबसे बुनियादी जरुरत से भी भारत की अधिकतर जनता वंचित हैं / हमारे चुने ही जन प्रतिनिधि ही हम से विश्वासघात करते हैं , चुनाव के वक़्त भीख का कटोरा लिए घुमते हैं , दारु , नोटों की गड्डिया, टेलीविजन और मंगलसूत्र साडी बांटते हैं / साम दाम दंड भेद से हमसे हमारा वोट छिनते हैं और अगले पांच वर्ष तक देश का खजाना लूटते हैं / हमारे हक के साथ अन्याय करते हैं और जनता को गुलाम समझते हैं / व्यवस्था में परिवर्तन चाहिए , हमे स्वराज चाहिए /

राजस्थान के कुप्रबंध के कारण तीन हजार करोड़ के विकास खत्म

Written By आपका अख्तर खान अकेला on सोमवार, 9 मई 2011 | 10:00 pm

राजस्थान के कुप्रबंध के कारण तीन हजार करोड़ के विकास खत्म

राजस्थान के कुप्रबंध के कारण तीन हजार करोड़ के विकास खत्म हो गए हैं ..केंद्र सरकार के योजना आयोग ने राजस्थान सरकार को विकास के लियें करोड़ों करोड़ रूपये दिए थे जिसमे से राजस्थान सरकार की भावी योजनायें तय्यार नहीं होने और सरकार की खींचतान के चलते सरकार ने तीन हज़ार करोड़ रूपये स्वीक्रत होने के बाद भी राजस्थान के विकास के काम में नहीं लगाये हैं ,स्थिति यह है के अब यही राजस्थान सरकार विकास में तीन हजार करोड़ रूपये का नुकसान कर चुकी है .................................अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

"अब भारत की बारी-"


(अभी हाल ही में अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को मार गिराया है, पूरे देश में जैसे एक ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी, हमारे देश के समस्त न्यूज़ चैनल अमेरिका की इस जीत पर ख़ुशी के ढोल बजाने लगे. परन्तु मैं सोचता हूँ इस तरह ढोल बजाने का हमारा कोई मतलब नही है, क्योंकि हमारी जेलों में सैकड़ों आतंकवादी आज भी बंद है, पर हमारी सरकार उन्हें आज तक भी कोई सजा नही दिला सकी है, और अफज़ल जैसे आतंकी जिसे फाँसी की सजा भी मिल चुकी है, उसे आज भी जेल में मटन और बिरयानी परोसी जा रही है. जब हम अपनी जेलों में कैद आतंकियों को भी सजा नही दे पा रहे है, तो हमें एक लादेन के मरने पर इतनी ख़ुशी क्यों हो रही है? जिस दिन जेल में पड़े सभी आतंकवादियों को सजा मिलेगी, वो दिन हमारे ढोल बजाने का दिन होगा, और उस दिन शायद मैं भी खुशियों के ढोल बजाऊंगा.
मैं एक रचना प्रस्तुत करता हूँ, अगर आपके दिल तक मेरे एहसास पहुंचे तो मुझे अवश्य सूचित करे.)
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"अब भारत की बारी-"

अब तो अमेरिका ने ओसामा को भी मार दिया
और पाकिस्तानी चेहरे से भी नकाब उतर दिया
तो तुम क्यों बैठे हो चुपचाप आतंकी कडवाहट को चख कर
अफज़ल की  फाईल  को  राष्ट्रपति  की तिजोरी  में रख कर
अब तो तुम भी अफजल को फांसी देकर न्याय करो
उसको क्षमादान देकर न देश के साथ  अन्याय करो
तुम कसाब को जेल  में  बिरयानी जो  खिला रहे हो
उसकी सुरक्षा पर रूपया पानी की तरह जो बहा रहे है
ये नही है कोई बड़प्पन, बल्कि मुंह पर तमाचे है
लकड़ी के महल को  दीमक खा जाने वाले ढांचे है
कल कोई फिर विमान अपहरण कर तुमको धमकाएगा
विमान की रिहाई के बदले में  कसाब को मुक्त कराएगा
मत भूलो, पाकिस्तान ने भारत में आतंकी बीज बोये है
पिछले बीस सालों में हमने अस्सी हज़ार व्यक्ति खोये है
जवान बेटों की लाशें बूढ़े बापों के कन्धों ने भी ढोयी है
ना जाने  कितने सुहागनों  की आँखें  गम  में  रोई  है
उनके आंसुओं को भूलकर, तुम क्यों  ढोल बजा  रहे हो
एक ओसामा के मरने पर इतनी ख़ुशी क्यों मना रहे हो
यदि  तुम  इन आतंकी दरिंदों पर लगाम नहीं कस पायोगे
तो भारत की गलियों में एक नही दस-दस ओसामा पाओगे
तब तुम याद करोगे अपनी पिछली सब भूलों को
कैसे  पाला-पोषा था, तुमने  काँटें लदे  बबूलों  को
अब भी समय  है जागो, दुष्ट  पापियों का संहार  लिखो
राक्षसों के खून को प्यासी माँ भवानी की तलवार दिखो
क्षमादान देकर मत  पृथ्वीराज वाली भूल को दोहराओ
आतंक का  नाश कर वीर  शिवाजी के वंशज कहलाओ
कह  दो  सागर के  लहरों से, कह  दो  क्रूर  हवाओं  को
आँख उठा कर भी न देख ले कोई भारत की सीमाओं को
जागो मनमोहन पगड़ी सभाल कर जट सरदार बनो
लेकर  कृपाण  आतंकी  दुष्ट हवाओं  पर प्रहार  बनो
हिजबुल लश्कर के आगे अपनी पूंछ हिलाना बंद करो
आस्तीन  के जहरीले नागों को दूध पिलाना बंद करो
फिर ना संसद पर हमला हो, फिर ताज ना घायल हो
ट्रेन के  बम धमाके में, फिर  ना रोती कोई पायल हो
फिर ना कोई अपहरण कर आतंकियों को छुड़ाने की मांग आएगी
गर जेलों में  बंधक आतंकियों  की गर्दन  फाँसी पर टांगी जाएगी
मत रहना  इस भूल  में, अमेरिका  तुम्हारे  साथ होगा
मिटने आतंकी अंधियारे को, उसका भी कोई हाथ होगा
किसने पोंछा है पसीना, आक्रोश में दहकते अंगारों का
शेर  अकेला  ही शिकार  किया  करता  है  सियारों का
तो तुम एक बार  पुराने  असहाय दुर्बल  कानूनों को  झटका दो
अफज़ल, कसाब समेत सभी आतंकियों को शूली पर लटका दो
और तुम  सेना से  कह दो, माँ काली का रौद्र  रूप धरे
जहाँ मिले जो आतंकी, उसकी गर्दन धड से अलग करे
तो लाहौर, कराची, रावलपिंडी तक सेना को बढ़ जाने  दो
सीमा पार  आतंकी अड्डों पर  रणचंडी  को चढ़  जाने दो
दिखला दो  एक बार  दुष्ट पडौसी को उसकी औकात
काट डालो जिह्वा उसकी गर करे वो कश्मीर की बात
ओसामा की मौत पर  भारत  में जो  मातम  मना  रहे  है
और ओसामा-बिन-लादेन को अपना सुपर हीरो बना रहे है
उनको भी तुम एक बार उनकी औकातें दिखला  दो
राष्ट्रद्रोह की कोशिशों का परिणाम  उनको बतला दो
फिर देखो भारत  पर  कोई आतंकी  हमला  कैसे  हो  सकता है
और भारत की पवन भूमि पर कोई विष बीज कैसे बो सकता है
खात्मा कर आतंक का जन-जन में खुशियों के दीप जलाओ
और फिर पूरी दुनिया में अपनी  जीत के तुम  ढोल बजाओ


-विभोर गुप्ता (मोदीनगर)
09319308534

नेहा ये तुमने ठीक नहीं किया

रात के ढाई बजे हैं लेकिन नींद नहीं आ रही है। अचानक तुम्हारी याद आ गई। मुझे नहीं पता की तुम मुझे याद करती हो की नहीं, पर मुझे तुम्हारें बारे में खबरें मिलती रहती है। मिलने वाली खबरे हरदम अच्छी नही होती। एक बार पहले भी मैंने तुम्हारे बारे में लिखा था क्योंकि उस वक्त मुझे लगा था कि तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है।

नेहा तुम जो कुछ भी कर रही हो, वह किसी के लिए भी ठीक नहीं है। न तुम्हारे लिए, न तुम्हारे युवा होते बेटे के लिए और न ही उस पिता के लिए जिसने तुम्हारे कारण पूरी दुनिया से दुश्मनी मोल ले ली। वो चाहते तो तुम्हारे मोह को त्यागकर एक अच्छी जिंदगी जी सकते थे पर उन्होंने ऐसा नहीं किया, जानती हो क्यों, क्योंकि वो तुम्हें बहुत प्यार करते थे, तुम्हें दुखी नहीं देख सकते थे। पर ये बात तुम्हारे ऊपर लागू क्यों नहीं होती...तुमने बार-बार ऐसे काम क्यों किए, जिसके कारण उन्हें समाज में लज्जित होना पड़ा। नेहा बुरा मत मानना पर सच यही है की तुमने हरदम अपनी मनमानी की है। जब पढ़ाई का वक्त था, सुमित के प्यार में पड़ कर घर से भागकर शादी कर ली। हम सब जानते थे कि तुममे और सुमित में कोई साम्यता नहीं है। सिवाय एक के की तुम दोनों ही अपने बाप के पैसों पर ऐश कर रहे थे। तुम्हें अपने रूप पर गर्व था, लड़कों के सामने नाज-नखरे दिखाकर कैसे उन्हें अपनी ओर आकर्षित करना, इस कला में तुम माहिर थी और सुमित जैसे साधारण रंग-रूप के व्यक्ति के लिए तुम्हारा सौन्दर्य और तुम्हारा बिंदास स्वभाव एक चुंबक की तरह थे। जिसमें वह खिंचता चला गया। पर ऐसे आकर्षण प्रायः स्थायी नहीं होते। यही तुम लोगों के साथ भी हुआ। तुम्हारी ज़िदगी में आया वह मासूम सा बच्चा भी, जिसे तुम अपने प्यार की निशानी कहते थे, तुम लोगों के रिश्ते को स्थायित्व नहीं प्रदान कर सका। जैसा कि हम लोग सोचते थे।

वैसे अंकल का दोष भी कम नहीं था। उन्हें तुम्हारे प्यार के आगे कभी कुछ दिखा ही नहीं। सबने समझाया था। कुछ समय के लिए आप अपने मोह को नियंत्रित कीजिए। जीने दीजिए उसे अपनी ज़िदगी। पर वे नहीं माने। अपने साये की तरह तुम्हें खुद में समेटे रहे। तुम्हें खुद को ग्रो करने का मौका ही नहीं दिया। तुम छोटी बच्ची की तरह मचलती रही और वे तुम्हारी हर इच्छा पूरी करते रहे। कभी नहीं सोचा कि इस तरह वो तुम्हें ही नहीं तुम्हारे पति और बच्चे को खुद पर निर्भर बनाते जा रहे हैं। और वही हुआ जिसका डर था। बहुत जल्द दिशाहीन ज़िदंगी तुम्हें बोर करने लगी। कुछ भी तो नहीं था, तुम्हारे पास करने के लिए। हर काम के लिए नौकर थे। और उन्हें पेमेंट करने के लिए पिताजी। आखिर तुम कितनी शॉपिंग करती। सड़कों पर कितनी गाड़ियां भगाती। हर चीज की एक हद होती है। और आखिर एक दिन वो आया जब तुम्हें नींद आना बंद हो गई। और आती भी कैसे। शरीर और मस्तिष्क दोनों थकना चाहते हैं, ताकि वे रात में आराम करें और सुबह फ्रेश काम पर लग जाए। लेकिन न तो तुम शारीरिक काम करती थी न मानसिक। ऐसी स्थिति में नींद आती भी तो कैसे। पर किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं कि तुम्हें नींद क्यों नहीं आती। सीधा मनोचिकित्सक की शरण ली और दवाइयों के झोलों के साथ घऱ वापस आ गए। यह तुम्हारी ज़िदगी की सबसे बड़ी भूल थी। क्योंकि इस तरह तुम्हारा अपने परिवार के साथ जो थोड़ा बहुत रिश्ता था, वह भी खत्म हो गया। बच्चे को स्कूल और पति को ऑफिस भेजने की ज़िम्मेदारी जो तुम्हें अपने परिवार के साथ जोड़े हुए थी। नींद की गोलियों के हत्थे चढ़कर नौकरानी के पास चली गई। रात में नींद की गोलियां खाते समय तुमने कभी नहीं सोचा कि इसका परिणाम क्या होगा।

अपनी जानकारी के आधार पर कह सकती हूं कि दुनिया में ऐसी कोई भी गोली नहीं है जो हर रोज आपको दोपहर में दो बजे तक सोने के लिए बाध्य करे। और न ही कोई मनोचिकित्सक कभी भी अपने मरीज को दिन चढ़े तक सोने की सलाह देता है। वह हरदम सुबह उठकर सैर और योग करने की सलाह देता है। साथ ही वह आपको व्यस्त रहने की भी सलाह देता है। खैर छोड़ो अब इन सब बातों का कोई फायदा नहीं। इन सब बातों से तुम बहुत आगे निकल चुकी हो।

अपने पति के स्वभाव के बारे में जानती थी। तुम जानती थी कि तुम्हारा पति रूप का लोभी है, पर नहीं तुम्हें अपने सौन्दर्य और बाप की दौलत का घमंड था। इसीलिए एक दिन जब तुम्हारा पति तुम्हें छोड़ कर नौकरानी के साथ कहीं चला गया, तो तुम्हें बहुत चोट पहुँची, पर अफसोस यह चोट पत्नी को कम, उस औरत को ज्यादा पहुँची जिसे अपने रूप का घमंड का। वह औरत तिलमिला उठी कि कैसे उसका पति एक साधारण औरत के लिए इतनी रूपवान पत्नी को छोड़ सकता है।

और यही से एक नयी नेहा का जन्म हुआ। जो समाज के सामने यह सिद्ध करना चाहती थी कि एक बच्चे की मां बनने के बाद भी उसके रूप में इतना दम है कि वह एक साथ कई मर्दों को अपनी उंगलियों पर नचा सकती है। और तुमने किया भी वही।

परिवार द्वारा ठुकराया गया बीमार पिता जब बिस्तर पर पड़ा था। उस समय उनकी सेवा करने के बजाय तुमने एक और घिनौनी हरकत की। तुम्हें आर्थिक परेशानियों से बचाने केलिए उन्होंने जो Joint account खोला था, और तुमने बिना उनसे पूछे उसमें से छह लाख निकाल कर अपने दोस्तों के साथ सैर-सपाटे के लिए कार खरीद ली। ऐसा करते हुए एक बार भी तुम्हारे हाथ नहीं कांपे। एक बार भी नहीं सोचा कि बीमार पिता के इलाज के लिए पैसे कहां से आएंगे। और वो भी उन लफंगे दोस्तों के लिए जो बात-बात पर लड़ाई पर उतारू हो जाते थे। पर शायद अपनी सुरक्षा के लिए तुम्हें ऐसे लोग ही रास आ रहे थे। नेहा तुम्हारी दोस्तियां लोगों को उतनी तकलीफ नहीं पहुंचा जा रही थी, जितनी तकलीफ पहुंचा रही थी तुम्हारी इस तरह की हरकते और बीमार पिता की उपेक्षा। मुझे तो लगता है कि तुम अपने पिता को कभी समझी ही नहीं। वे तुम्हारे लिए मनी मेकिंग मशीन से ज्यादा कुछ थे नहीं ।

एक दिन गुस्से में यह क्या कह दिया कि इतनी बेहयाई से तो अच्छा है। शादी कर लो। और दो घंटे के अंदर तुम शादी के जोड़े में उनके सामने हाजिर थी। ऐसा होता है क्या नेहा कि बच्चों के बड़े हो जाने मां-बाप उन पर से अपने सभी अधिकार खो देते है। अमेरिका और इंग्लैण्ड की बात तो मैं नहीं जानती, पर हमारे मुल्क में ऐसा नहीं होता। यह मैं दावे से कह सकती हूं। तुम्हे तो पता ही होगा कि अस्पताल से छुट्टी मिलने बाद भी वो घर आने के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि अब वे तुम्हारे साथ घर मे अकेले नहीं थे। तुम्हारा तथाकथित पति भी वहां रहने आ गया था और तुम्हारे कारण दूसरे भाई-बहन उन्हें अपने साथ रखने को राजी नहीं थे। उस वक्त उनकी आँखों में जो पीड़ा मैंने देखी थी, उसे मैं कभी नहीं भूल सकती। फिर वही हुआ जिसका हम सब को डर था। तुम्हारी बड़ी बहन उन्हें अपने साथ तो ले गई, पर घर नहीं, सीधे अस्पताल। जहां उहें एडमिट करा दिया गया। मृत्यु के एक दिन पूर्व उन्होंने तुम्हारी बड़ी बहन यानी अपनी बड़ी बेटी से अनुरोध किया था कि वह उन्हें अपने घर ले चले, वे अस्पताल में नहीं घर में मरना चाहते हैं। पर बेटी का तर्क था की कि अस्पताल में उनकी जितनी देखभाल संभव है, घर में नहीं। वैसे इसमें गलत कुछ भी नहीं था पर शायद बेटी की बात ने उन्हें कहीं अंदर से तोड़ दिया । इसके बाद उन्होंने न तो किसी से कुछ कहा और न ही किसी से मिलने की इच्छा व्यक्त की। । उसी रात उनकी मृत्यु हो गई। जहां मुझे याद है तुम उनसे मिलने अस्पताल नहीं गई थी, और तेहरवीं के दिन तुम्हारे भाई ने तुम्हें अपने घर के अंदर घुसने नहीं दिया था। हो सकता है पिता की मृत्यु पर तुम भी रोई हो, शोक मनाया हो। पर अब वो इस दुनिया में नहीं थे। जिसके लिए तुम्हारे आँसू सबसे बहुमूल्य हुआ करते थे। तुम अपने आपको लाख समझा लो, पर सच यही है कि तुनमे ठीक नहीं किया।

हो सकता है ये तुम्हारा नया पति तुम्हें एक अच्छी ज़िदगी दे, पर क्या वो तुम्हारे बेटे को भी अपना लेगा? क्या सुमित अपने बेटे को पाने के लिए कोर्ट नहीं जाएगा। वैसे भी तुम्हारी यह शादी वैध तो है नहीं। क्योंकि सुमित से तुम्हारा तलाक होना बाकी है। मैं तो तुम्हारी हिम्मत की दाद देती हूं कि इतना सब होने के बाद भी तुम अपने पति की अनुपस्थिति में उसी के घर में अपने प्रेमी पति के साथ रह रही हो। तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए सुखद भविष्य की कामना की थी। जिसे तुमने खुद अपने पैरों तले रौंद डाला। आज नहीं, पर कुछ दिनों के बाद तुम्हें इस बात का अहसास जरूर होगा कि तुमने सिर्फ पिता नहीं, बल्कि जीवन की सबसे अनमोल निधि खोई है। जो लाख सिर पटकने पर भी तुम्हें कभी वापस नहीं मिलेगी।

-प्रतिभा वाजपेयी.

Founder

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Saleem Khan