नियम व निति निर्देशिका::: AIBA के सदस्यगण से यह आशा की जाती है कि वह निम्नलिखित नियमों का अक्षरशः पालन करेंगे और यह अनुपालित न करने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से AIBA की सदस्यता से निलम्बित किया जा सकता है: *कोई भी सदस्य अपनी पोस्ट/लेख को केवल ड्राफ्ट में ही सेव करेगा/करेगी. *पोस्ट/लेख को किसी भी दशा में पब्लिश नहीं करेगा/करेगी. इन दो नियमों का पालन करना सभी सदस्यों के लिए अनिवार्य है. द्वारा:- ADMIN, AIBA

Home » » नेहा ये तुमने ठीक नहीं किया

नेहा ये तुमने ठीक नहीं किया

Written By pratibha on सोमवार, 9 मई 2011 | 12:32 pm

रात के ढाई बजे हैं लेकिन नींद नहीं आ रही है। अचानक तुम्हारी याद आ गई। मुझे नहीं पता की तुम मुझे याद करती हो की नहीं, पर मुझे तुम्हारें बारे में खबरें मिलती रहती है। मिलने वाली खबरे हरदम अच्छी नही होती। एक बार पहले भी मैंने तुम्हारे बारे में लिखा था क्योंकि उस वक्त मुझे लगा था कि तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है।

नेहा तुम जो कुछ भी कर रही हो, वह किसी के लिए भी ठीक नहीं है। न तुम्हारे लिए, न तुम्हारे युवा होते बेटे के लिए और न ही उस पिता के लिए जिसने तुम्हारे कारण पूरी दुनिया से दुश्मनी मोल ले ली। वो चाहते तो तुम्हारे मोह को त्यागकर एक अच्छी जिंदगी जी सकते थे पर उन्होंने ऐसा नहीं किया, जानती हो क्यों, क्योंकि वो तुम्हें बहुत प्यार करते थे, तुम्हें दुखी नहीं देख सकते थे। पर ये बात तुम्हारे ऊपर लागू क्यों नहीं होती...तुमने बार-बार ऐसे काम क्यों किए, जिसके कारण उन्हें समाज में लज्जित होना पड़ा। नेहा बुरा मत मानना पर सच यही है की तुमने हरदम अपनी मनमानी की है। जब पढ़ाई का वक्त था, सुमित के प्यार में पड़ कर घर से भागकर शादी कर ली। हम सब जानते थे कि तुममे और सुमित में कोई साम्यता नहीं है। सिवाय एक के की तुम दोनों ही अपने बाप के पैसों पर ऐश कर रहे थे। तुम्हें अपने रूप पर गर्व था, लड़कों के सामने नाज-नखरे दिखाकर कैसे उन्हें अपनी ओर आकर्षित करना, इस कला में तुम माहिर थी और सुमित जैसे साधारण रंग-रूप के व्यक्ति के लिए तुम्हारा सौन्दर्य और तुम्हारा बिंदास स्वभाव एक चुंबक की तरह थे। जिसमें वह खिंचता चला गया। पर ऐसे आकर्षण प्रायः स्थायी नहीं होते। यही तुम लोगों के साथ भी हुआ। तुम्हारी ज़िदगी में आया वह मासूम सा बच्चा भी, जिसे तुम अपने प्यार की निशानी कहते थे, तुम लोगों के रिश्ते को स्थायित्व नहीं प्रदान कर सका। जैसा कि हम लोग सोचते थे।

वैसे अंकल का दोष भी कम नहीं था। उन्हें तुम्हारे प्यार के आगे कभी कुछ दिखा ही नहीं। सबने समझाया था। कुछ समय के लिए आप अपने मोह को नियंत्रित कीजिए। जीने दीजिए उसे अपनी ज़िदगी। पर वे नहीं माने। अपने साये की तरह तुम्हें खुद में समेटे रहे। तुम्हें खुद को ग्रो करने का मौका ही नहीं दिया। तुम छोटी बच्ची की तरह मचलती रही और वे तुम्हारी हर इच्छा पूरी करते रहे। कभी नहीं सोचा कि इस तरह वो तुम्हें ही नहीं तुम्हारे पति और बच्चे को खुद पर निर्भर बनाते जा रहे हैं। और वही हुआ जिसका डर था। बहुत जल्द दिशाहीन ज़िदंगी तुम्हें बोर करने लगी। कुछ भी तो नहीं था, तुम्हारे पास करने के लिए। हर काम के लिए नौकर थे। और उन्हें पेमेंट करने के लिए पिताजी। आखिर तुम कितनी शॉपिंग करती। सड़कों पर कितनी गाड़ियां भगाती। हर चीज की एक हद होती है। और आखिर एक दिन वो आया जब तुम्हें नींद आना बंद हो गई। और आती भी कैसे। शरीर और मस्तिष्क दोनों थकना चाहते हैं, ताकि वे रात में आराम करें और सुबह फ्रेश काम पर लग जाए। लेकिन न तो तुम शारीरिक काम करती थी न मानसिक। ऐसी स्थिति में नींद आती भी तो कैसे। पर किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं कि तुम्हें नींद क्यों नहीं आती। सीधा मनोचिकित्सक की शरण ली और दवाइयों के झोलों के साथ घऱ वापस आ गए। यह तुम्हारी ज़िदगी की सबसे बड़ी भूल थी। क्योंकि इस तरह तुम्हारा अपने परिवार के साथ जो थोड़ा बहुत रिश्ता था, वह भी खत्म हो गया। बच्चे को स्कूल और पति को ऑफिस भेजने की ज़िम्मेदारी जो तुम्हें अपने परिवार के साथ जोड़े हुए थी। नींद की गोलियों के हत्थे चढ़कर नौकरानी के पास चली गई। रात में नींद की गोलियां खाते समय तुमने कभी नहीं सोचा कि इसका परिणाम क्या होगा।

अपनी जानकारी के आधार पर कह सकती हूं कि दुनिया में ऐसी कोई भी गोली नहीं है जो हर रोज आपको दोपहर में दो बजे तक सोने के लिए बाध्य करे। और न ही कोई मनोचिकित्सक कभी भी अपने मरीज को दिन चढ़े तक सोने की सलाह देता है। वह हरदम सुबह उठकर सैर और योग करने की सलाह देता है। साथ ही वह आपको व्यस्त रहने की भी सलाह देता है। खैर छोड़ो अब इन सब बातों का कोई फायदा नहीं। इन सब बातों से तुम बहुत आगे निकल चुकी हो।

अपने पति के स्वभाव के बारे में जानती थी। तुम जानती थी कि तुम्हारा पति रूप का लोभी है, पर नहीं तुम्हें अपने सौन्दर्य और बाप की दौलत का घमंड था। इसीलिए एक दिन जब तुम्हारा पति तुम्हें छोड़ कर नौकरानी के साथ कहीं चला गया, तो तुम्हें बहुत चोट पहुँची, पर अफसोस यह चोट पत्नी को कम, उस औरत को ज्यादा पहुँची जिसे अपने रूप का घमंड का। वह औरत तिलमिला उठी कि कैसे उसका पति एक साधारण औरत के लिए इतनी रूपवान पत्नी को छोड़ सकता है।

और यही से एक नयी नेहा का जन्म हुआ। जो समाज के सामने यह सिद्ध करना चाहती थी कि एक बच्चे की मां बनने के बाद भी उसके रूप में इतना दम है कि वह एक साथ कई मर्दों को अपनी उंगलियों पर नचा सकती है। और तुमने किया भी वही।

परिवार द्वारा ठुकराया गया बीमार पिता जब बिस्तर पर पड़ा था। उस समय उनकी सेवा करने के बजाय तुमने एक और घिनौनी हरकत की। तुम्हें आर्थिक परेशानियों से बचाने केलिए उन्होंने जो Joint account खोला था, और तुमने बिना उनसे पूछे उसमें से छह लाख निकाल कर अपने दोस्तों के साथ सैर-सपाटे के लिए कार खरीद ली। ऐसा करते हुए एक बार भी तुम्हारे हाथ नहीं कांपे। एक बार भी नहीं सोचा कि बीमार पिता के इलाज के लिए पैसे कहां से आएंगे। और वो भी उन लफंगे दोस्तों के लिए जो बात-बात पर लड़ाई पर उतारू हो जाते थे। पर शायद अपनी सुरक्षा के लिए तुम्हें ऐसे लोग ही रास आ रहे थे। नेहा तुम्हारी दोस्तियां लोगों को उतनी तकलीफ नहीं पहुंचा जा रही थी, जितनी तकलीफ पहुंचा रही थी तुम्हारी इस तरह की हरकते और बीमार पिता की उपेक्षा। मुझे तो लगता है कि तुम अपने पिता को कभी समझी ही नहीं। वे तुम्हारे लिए मनी मेकिंग मशीन से ज्यादा कुछ थे नहीं ।

एक दिन गुस्से में यह क्या कह दिया कि इतनी बेहयाई से तो अच्छा है। शादी कर लो। और दो घंटे के अंदर तुम शादी के जोड़े में उनके सामने हाजिर थी। ऐसा होता है क्या नेहा कि बच्चों के बड़े हो जाने मां-बाप उन पर से अपने सभी अधिकार खो देते है। अमेरिका और इंग्लैण्ड की बात तो मैं नहीं जानती, पर हमारे मुल्क में ऐसा नहीं होता। यह मैं दावे से कह सकती हूं। तुम्हे तो पता ही होगा कि अस्पताल से छुट्टी मिलने बाद भी वो घर आने के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि अब वे तुम्हारे साथ घर मे अकेले नहीं थे। तुम्हारा तथाकथित पति भी वहां रहने आ गया था और तुम्हारे कारण दूसरे भाई-बहन उन्हें अपने साथ रखने को राजी नहीं थे। उस वक्त उनकी आँखों में जो पीड़ा मैंने देखी थी, उसे मैं कभी नहीं भूल सकती। फिर वही हुआ जिसका हम सब को डर था। तुम्हारी बड़ी बहन उन्हें अपने साथ तो ले गई, पर घर नहीं, सीधे अस्पताल। जहां उहें एडमिट करा दिया गया। मृत्यु के एक दिन पूर्व उन्होंने तुम्हारी बड़ी बहन यानी अपनी बड़ी बेटी से अनुरोध किया था कि वह उन्हें अपने घर ले चले, वे अस्पताल में नहीं घर में मरना चाहते हैं। पर बेटी का तर्क था की कि अस्पताल में उनकी जितनी देखभाल संभव है, घर में नहीं। वैसे इसमें गलत कुछ भी नहीं था पर शायद बेटी की बात ने उन्हें कहीं अंदर से तोड़ दिया । इसके बाद उन्होंने न तो किसी से कुछ कहा और न ही किसी से मिलने की इच्छा व्यक्त की। । उसी रात उनकी मृत्यु हो गई। जहां मुझे याद है तुम उनसे मिलने अस्पताल नहीं गई थी, और तेहरवीं के दिन तुम्हारे भाई ने तुम्हें अपने घर के अंदर घुसने नहीं दिया था। हो सकता है पिता की मृत्यु पर तुम भी रोई हो, शोक मनाया हो। पर अब वो इस दुनिया में नहीं थे। जिसके लिए तुम्हारे आँसू सबसे बहुमूल्य हुआ करते थे। तुम अपने आपको लाख समझा लो, पर सच यही है कि तुनमे ठीक नहीं किया।

हो सकता है ये तुम्हारा नया पति तुम्हें एक अच्छी ज़िदगी दे, पर क्या वो तुम्हारे बेटे को भी अपना लेगा? क्या सुमित अपने बेटे को पाने के लिए कोर्ट नहीं जाएगा। वैसे भी तुम्हारी यह शादी वैध तो है नहीं। क्योंकि सुमित से तुम्हारा तलाक होना बाकी है। मैं तो तुम्हारी हिम्मत की दाद देती हूं कि इतना सब होने के बाद भी तुम अपने पति की अनुपस्थिति में उसी के घर में अपने प्रेमी पति के साथ रह रही हो। तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए सुखद भविष्य की कामना की थी। जिसे तुमने खुद अपने पैरों तले रौंद डाला। आज नहीं, पर कुछ दिनों के बाद तुम्हें इस बात का अहसास जरूर होगा कि तुमने सिर्फ पिता नहीं, बल्कि जीवन की सबसे अनमोल निधि खोई है। जो लाख सिर पटकने पर भी तुम्हें कभी वापस नहीं मिलेगी।

-प्रतिभा वाजपेयी.

Share this article :

4 टिप्पणियाँ:

pratibha ने कहा…

चर्चा मंच पर जो लिंक आपने दिया है। वह लिंक अब उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे यहां पोस्ट कर रही हूं। आशा है अन्यथा नहीं लेंगी।

वन्दना ने कहा…

बेहद कारुणिक स्थिति मगर जो भटक गया हो उसे वक्त ही सही राह पर ला सकता है।

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

मार्मिक कहानी, लेकिन क्या इसके लिए घर वाले खुद दोषी नहीं हैं, महत्वाकांक्षाओं के लिए अगर हम अपने बच्चों के आगे झुक कर ये न सोचें कि क्या सही है और क्या गलत ? बस उनको अपने सामने रोता नहीं देख सकतेकि झूठी ममता के साये में पालते रहें और खुद को भी भुलावे में रखे रहें. ये दोष हमारा है न कि नेहा का. कच्ची मिट्टी से बर्तन वैसे ही बनते हैं जैसे हम चाहते हैं. अपवाद इसके भी होते हैं और शायद नेहा अपवाद ही थी.

तीसरी आंख ने कहा…

दिल को छू जाने वाली रचना है, साधुवाद

एक टिप्पणी भेजें

Thanks for your valuable comment.