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अनिवार्य हिन्दी कापी और कवि कौ जनमु दिन.......कविता ..डा श्याम गुप्त ....

Written By shyam gupta on बुधवार, 14 सितंबर 2011 | 10:28 pm


अनिवार्य हिन्दी कापी और कवि कौ जनमु दिन.....    
        ( ब्रज भाषा )
कवि गोरखाधंधा जी के 
जनमु दिना पे आयोजित गोष्ठी में ,
कविवर  पांडे जी नै -
बडी सकुचाहट ते याद दिलायौ ;
  अबहि छै महीना पहलै ही तौ ,
आपने आपुनि जनम दिना हतो  मनायौ |
कवि जी सकपकाय गए , हडबड़ाये , फिरि-
मुसुकावत भये बोले-
पर भैया !, कवि तौ -
अखिल भारतीय कहिलाबै है ;
वाकौ तौ केन्द्र सरकार की नीतिन ते ही,
नातौ होबै है , और -
केन्द्रीय भाषा नीति तौ ,
द्विभाषी है ;
वा जनमु दिना तौ -
असल अंगरेजी आलेख हतो ,
ये तौ वाकी -
अनिवार्य हिन्दी कापी है ||
 

कहते है हिन्दूस्तानी है हम....

कहते है हिन्दूस्तानी है हम,
पर जुबान पे अंग्रेजों की भाषा बसती है,
देख के अपनी विलायती तेवर,
हिन्दी हम पर यूँ हँसती है।
क्या बचपन में पहला अक्षर,
माँ कहने में शर्माया था,
रोता था जब जब तू प्यारे,
लोरी ने चैन दिलाया था।

अब बढ़ी बुद्धि,अब बढ़ा ज्ञान,
हिन्दी को क्यों बदनाम किया,
जिसके साये में पल पल कर,
हम सब ने जग में नाम किया।

मीठी भाषा,प्यारी भाषा,
हिन्दी को बस आत्मसात करो,
अंग्रेजी भाषा है अपनी गुलामी,
उस भाषा में मत बात करो........।

"साहित्य प्रेमी संघ" की ओर से आप सभी हिन्दी प्रेमीयों को हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.....
www.sahityapremisangh.com

अंजलि ने आत्महत्या कर ली , क्यों ?


लिव इन रिलेशनशिप  को लेकर यूरोप में कैसी भी दीवानगी देखने में आ रही हो, लेकिन भारतीय संस्कृति में यह अभी तक पूरी तरह से घूल-मिल नहीं पाई है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि भारतीय समाज पारिवारिक बंधनों में बहुत भरोसा करता है। ऐसे में दो युवाओं द्वारा अगर लिव इन रिलेशनशिप  जैसा कदम उठाया भी जाता है, तो भी पारिवारिक बंधनों के चलते ऐसे रिश्ते  कामयाब नहीं हो पाते हैं। ऐसा ही एक वाकिया हाल ही में टीवी और समाचार चैनलों पर सुर्खियों में बना हुआ है। यह मामला है एयरफोर्स की बर्खास्त पूर्व फ्लाइंग ऑफिसर अंजलि गुप्ता का, जिनके सूइसाइड के मामले में उनके प्रेमी ग्रुप कैप्टन अमित गुप्ता पर पुलिस का शिकंजा कसता जा रहा है। पुलिस का कहना है कि लिव-इन रिलेशनशिप में धोखा मिलने की वजह से अंजलि ने सूइसाइड किया है। अंजलि के परिवार वालों के मुताबिक, अंजलि और अमित पिछले सात सालों लिव-इन रिलेशनशिप में थे। उनका कहना है कि अमित ने अपनी पहली पत्नी से तलाक के बाद अंजलि से विवाह करने का वादा किया था, लेकिन अब वह इससे मुकर रहा था। अंजलि भी पिछले एक साल से भोपाल में ही रह रही थी। अंजलि की मां ने आरोप लगाया है कि अमित ने ही अंजलि को अपने सीनियरों के खिलाफ शारीरिक उत्पीड़न करने का आरोप लगाने के लिए उकसाया था। और, अंजलि ने 3 सीनियर अधिकारियों के खिलाफ एयरफोर्स के अधिकारियों से शिकायत की थी। इसके बाद उसका कोर्ट मार्शल कर दिया गया था। उसके बाद से अंजिली और अमित साथ रह रहे थे। अमित का पत्नी से तलाक होने वाला था। 
जाहिर है, लिव इन रिलेशनशिप  के चक्कर में अपनी जिंदगी को बर्बाद कर लेने वाली अंजलि गुप्ता इस रिष्ते की जटिलताओं का ही शिकार हुई है। अंजलि गुप्ता का कॅरिअर अच्छा चल रहा था, लेकिन अपने प्रेमी अमित के चक्कर में उन्होंने अपने सीनियर अधिकारियों के उपर झूठे इल्जाम लगाए। इसका नतीजा ये निकला कि उनका कॅरिअर पूरी तरह चैपट हो गया, उनके खिलाफ कोर्ट मार्शल भी हुआ। हालांकि इसके बाद भी अंजलि संभल गई थी और वो एक खुशहाल जिंदगी जी सकती थी, अगर अमित लिव इन रिलेशनशिप  के रिष्ते को पूरी ईमानदारी के साथ निभाता और उसका साथ देता। लेकिन अमित ने सिर्फ अंजलि का इस्तेमाल किया और जैसा कि अंजलि की मां के बयानों से लगता है कि उसने बरसों तक अंजलि का यौन शोषण करने के बाद भी अपनी पहली पत्नी को छोड़कर उससे शादी करने का इरादा नहीं जताया। इसी के चलते अब अंजलि आत्महत्या पर मजबूर हुई है।
Source :
http://khabarindiya.com/index.php/articles/show/3279_desh_dunia?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+khabarindiya+%28KhabarIndiya.Com%२९
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सीनियर अधिकारियों ने अंजलि के साथ क्या किया ?
इसे केवल अंजलि और उसके अधिकारी ही जानते हैं।
नौकरी और रूपये को औरत की मज़बूती के लिए आज ज़रूरी माना जाता है लेकिन यह सब होने के बावजूद भी अंजलि ने आत्महत्या कर ली , क्यों ?
केवल एक सही सोच और एक सही तरीक़े के अभाव में।

लिव इन रिलेशनशिप भी इसी अभाव की कोख से जन्मा है और समय के साथ साथ और बहुत से मसले सामने आते चले जाएंगे।
अंजलि उनमें से एक बानगी भर है।
क्या नौकरी करने के बावजूद भी औरत को सुरक्षा और सम्मान नहीं मिल पाता ?

चंद्रमुखी चौटाला का भी है एक फ़साना


तेरे लट्ठ पन ने तुझे एक मुकाम दिला दिया |
तुझे सारे ज़माने में इस कदर चमका दिया |
तेरी अक्ल की दाद देता है यह जमाना | 
चंद्रमुखी चौटाला का भी है एक फ़साना || १ ||
.
इतनी सफाई से केश को सोल्व करती हो |
की किसी को भी भनक नहीं लगने देती हो |
रुसवा नहीं होता कोई, ऐसा इन्साफ दिलाती हो |
अंदाज़ तुम्हारा निराला है, सबसे बड़े सलीके से पेश आती हो ||२ ||
.
इस तरह तू मुझे न देख, मुझे तुझसे लगता है डर |
बात सिर्फ इतनी सी नहीं है, दिल का तो तू है समंदर |
पर तेरी आवाज़ और तेरे अंदाज़ से मुझे लगता है डर |
इज़हार तो करना चाहता हूँ, अपने दिल का मन्ज़र || ३ ||
.

गुरुरे हुस्न, मैं तुझे ताकीद न कर पाया |

देखता रहा तुझे, तस्लीम न कर पाया |
खता माफ़ हो, या सजा दे दो |
पर नज़र न हटे तुझसे, ऐसी जगह दे दो || ४ ||
.

वाह वाह ! ताबे हयात लग रही हो |

इस लिबास में भी, नूर-ए-हयात लग रही हो || ५ ||

.



जी हाँ ..में हिंदी यानी भारत माता की राष्ट्र भाषा हूँ ..


जी हाँ ..में हिंदी यानी भारत माता की राष्ट्र भाषा हूँ .....में संविधान की अनुसूची में शामिल हूँ .मुझे बोलना ..मुझे लिखना .मेरे साहित्य का प्रकाशन करना ..मेरे शब्दों में देश के सभी कानून कायदे प्रकाशित करना देश की सरकार की संवेधानिक ज़िम्मेदारी है .....आज़ादी से आज तक मुझे देश भर में लागू करवाने के लियें अरबों नहीं अरबों नहीं खरबों रूपये खर्च किये जा चुके हैं ...............लेकिन अफ़सोस में सिर्फ और सिर्फ सितम्बर महीने की १४ तारीख की एक यादगार बन गयी हूँ .मेरी भाषा में चलने वाले स्कूलों को सभी शिक्षाबोर्ड खासकर केन्द्रीय शिक्षा बोर्ड में उपेक्षित रखा गया है . विदेशी भाषा में गिटपिट करने वाले लोगों के बीच में अगर में फंस जाऊं तो मेरा ही नाम लेकर मेरी खिल्ली उडाई जाती है लोगों का उपहास और मजाक उढ़ाने पर मेरा नाम लेकर कहावत बनाई गयी है ..दोस्तों आपको तो सब पता है आप से क्या छुपाऊं जब किसी का मजाक उढ़ाया जाता है तो साफ तोर पर कहा जाता है के इसकी हिंदी हो गयी है .मेरे दुःख दर्द को न तो मेरे प्रधानमन्त्री ने समझा ना मेरे देश के राष्ट्रपति ने और नहीं सांसद विधायक मेरी तकलीफ समझ पाए हैं जनता का क्या कहें महाराष्ट्र में मुझे उपेक्षित किया है दक्षिण में अगर मुझे बोला जाये तो कोई बात नहीं करता बेल्लारी में अगर मुझे लागू करने की बात की जाए तो दंगे फसादात किये जाकर कत्ले आम हो जाते हैं .संविधान के रक्षकों की सांसदों वकीलों और जजों की बात करें तो वहां तो मेरा कोई वुजूद ही नहीं है ....मेरे देश मेरे भारत महान में सवा करोड़ लोग हैं और यकीन मानिये तीस करोड़ भी मुझे ठीक से बोलने और लिखने का दावा नहीं कर सकते हैं मेरा इस्तेमाल अगर केवल तीस करोड़ लोग करते हैं तो फिर में केसी राष्ट्रिय भाषा मेने देखा अल्पसंख्यक कल्याण के नाम पर देश में कथित योजनायें बनाकर अल्पसंख्यकों का जेसे शोषण हो रहा है धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का देश में जेसे ढिंढोरा पीट कर मनमानी की जा रही है गरीबी उन्मूलन का नारा देकर गरीबों पर जो अत्याचार क्या जा रहा है बस उसी तरह से देश में मेरे नाम पर राजनीति की जा रही है .अफ़सोस तो मुझे इस बात पर है के संसद में ५४४ सांसद और २७२ राज्यसभा सदस्यों में से गिनती के लोग हैं जो मुझे समझते हैं .सांसद में भाषण होता है तो अंग्रेजी में मशीने कन्वर्टर लगी हैं आम आदमी से हिंदी इस्तेमाल की बात की जाती है विधान में सातवीं अनुसूची की भाषा बना कर मेरा उपयोग आवश्यक किया जाता है लेकिन सांसद में न तो मेरी भाषा में शपथ ली जाती है और ना ही लिखा पढ़ी बात चीत की जाती है ..जितने भी लोग मेरे प्रचारक हैं सभी के बच्चे पैदा होते ही विदेशी भाषा अंग्रेजी के स्कूलों में पढने जाते हैं मेरी भाषा में चल रहे स्कुल बंद हों इसके लियें देश के सभी कोर्स की किताबें मेरी भाषा में छपवाना बंद कर दी गयीं है चाहे डॉक्टरी हो चाहे इंजीनियरिंग चाहे वैज्ञानिक हो चाहे कानून की पढाई..चाहे प्रबंधन की पढाई हो सभी तो विदेशी भाषा अंग्रेजी और अंग्रेजी में है फिर मुझे कोन और क्यूँ पसंद करेगा जब मुझे सांसद में बोलने के लियें पाबन्द नहीं किया जाता ..जब मुझे अदालतों में बोलने और लिखने के लियें पाबन्द नहीं किया जाता जब मुझे आधे से भी कम राज्यों और जिलों में बोला जाता है जब मेरे वित्तमंत्री ..कानून मंत्री ..मेरे देश को चलाने वाली सोनिया गाँधी मुझे नहीं समझती मुझे नहीं जानतीं मेरे देश के कोंग्रेस भाजपा या दुसरे कोई भी दल हो उनकी कार्यालय भाषा विदेशी अंग्रेजी है तो भाइयो क्यूँ मुझे हर साल यह दिवस बनाकर अपमानित करते हो या यूँ कहिये के कियूं मेरी हिंदी की और हिंदी करते हो ......अगर तुम्हे मुझसे प्यार हिया ....मुझे तुम इमानदारी से देश में लागू करना चाहते हो तो सबसे पहले देश में एक कानून हो जिसमें किसी भी चुनाव लड़ने वाले के लियें हिंदी जानना आवश्यक रखा जाए सभी प्रकार के चुनाव चाहे वोह लोकसभा हों .चाहे राज्यसभा ..चाहे विधानसभा चाहे पंच सरपंच चाहे पालिका चाहे कोलेज स्कूलों के चुनाव हों सभी के आवेदन पत्र हिंदी में हों और प्रत्याक्षी के द्वारा स्वयंम भरकर देना आवश्यक किया जाए सांसद और राज्यसभा .विधानसभाओं की भाषा केवल हिंदी हो और सुप्रीम कोर्ट से लेकर निचली अदालतों की भाषा हिंदी की हो ....देश में केंद्र और राज्य सरकार से सम्बंधित विभागों में हिंदी का ही चलन हो और सभी कर्मचारियों अधिकारीयों के लियें पाबंदी हो के वोह हिंदी के जानकर होंगे सभी प्रतियोगी परीक्षाएं हिंदी भाषा में ही ली जाएँ तब कहीं में थोड़ी बहुत जी सकूंगी वरना मुझे सिसका सिसका कर राजनीती का शिकार न बनाओ यारों ॥ मेरे देश के नोजवानों .मेरे देश के नेताओं ..मेरे देश के अन्ना ..मेरे देश के अन्ना समर्थकों ...मेरे देश के कथित राष्ट्रवादी लोगों .पार्टियों क्या तुम ऐसा कर सकोगे नहीं ना इसिलियिएन में कहती हूँ के मुझे बख्शो मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो मेरे नाम पर हर साल करोड़ों रूपये बर्बाद कर गरीबों का गला मत काटो .......या तो मुझे इमादारी से लागू करो वरना दोहरा चरित्र निभाने वालों तुम चुल्लू भर पानी में ड़ूब मरो ....जय हिंदी .......जय भारत .......हम हिंदी है हिंदुस्तान हमारा क्योंकि सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा और सारे जहां से चोर बेईमान दगाबाज़ नेता हमारा .....अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

ये मदिरालय

Written By नीरज द्विवेदी on मंगलवार, 13 सितंबर 2011 | 6:30 pm


थोड़े गम जो सह नही पाते हैं,
बस मय में ही डूबे जाते हैं।
पीकर खुद को बादशाह समझ,
मदिरालय में झुकने जाते हैं।

मदिरामय होकर, स्वप्नों में,
सच्चे दुःख दर्द, भुलाये जाते हैं।
मृतप्राय पड़े इस जीवन के,
सत्यासत्य बखाने जाते हैं। 

दो चार ग़मों के ही खातिर,
ये मदिरालय जाया करते हैं।
स्वाभिमान गिरवी रख कर,
मय की ठोकर खाया करते हैं।

ये तो अपने कर्मों का ही,
बोझ नहीं ढ़ो पाते हैं।
ये तुच्छ और असहाय जीव,
दार्शनिक बनाये जाते हैं। 

हम प्रश्न नहीं उठाते दुःख पर,
जीवन के पहलू होते हैं।
पर इनसे लड़ने की ताकत,
मदिरा से कायर ही लेते हैं।

हम निपट अकेले हैं फिर भी,
साथ न इसका लेते हैं।
हम अपने जख्मों का दर्द,
हँस, स्वयं गर्व से पीते हैं।


लोकपाल ही भारत के बादशाह बनेंगे ?????

Written By Brahmachari Prahladanand on सोमवार, 12 सितंबर 2011 | 9:20 am

चाँद से चांदनी गिरी,
पनाह कहीं न मिली,
समाँ गयी धरती में,
फिर खोद-खोद मिली,

भारत जिसे स्वतन्त्रता नहीं,

परतंत्रता ही अच्छी लगती है,
तब किस-किस के दास बने,
अब लोकपाल से आस लगे,

फरियाद यह करना जानती है,

खुद से कुछ न करना चाहती है,
किसी बादशाह की गुलाम थी,
फरियाद उसी से होती थी,

अब आगे के वक्त में, शिकायत लोकपाल से करेगी,

लोकपाल ही बादशाह बनेंगे, ये फिर गुलामी करेगी,

न रहना आता इसे आज़ादी से,

बस रहना आता फरियादी से,
रहकर गुलाम कई सदियों से,
सांस लेना न आता खुली हवा से,

अब क्या आगे की बात कहूँ,

दिखता है नज़ारा, बात साफ़ कहूँ,
सोने की अब आदत सी हो गयी है,
जबसे रियाया भी शाह हो गयी है,

काम कौन करे, जब सब राजा हो गए,

गुलाम कौन बने, जब सब बादशाह हो गए,
गर पेट की मजबूरी न होती,
सारी रियाया फिर मज़े से सोती,

हैं सब राजा यहाँ लोकतंत्र में,

करते राजनीति लोकतंत्र में,
फिर से गुलाम होना चाहते हैं,
लोकपाल किसी को बनाना चाहते हैं,


                                          ------- बेतखल्लुस


.

अंदाज ए मेरा: अध्‍ययन यात्रा बनाम दारू पार्टी.... !!!!!

Written By Atul Shrivastava on रविवार, 11 सितंबर 2011 | 6:53 pm

अंदाज ए मेरा: अध्‍ययन यात्रा बनाम दारू पार्टी.... !!!!!: दारू जो कराए कम है ! और दारू की लत.... पूछो मत ! ! लोग अपना मान सम्‍मान और बाकी सब भूलकर दारू के लिए सब कुछ करने तैयार हो जाते हैं ! ! ...

God Created Man

ये मायावी आँकड़े

Written By बेनामी on शनिवार, 10 सितंबर 2011 | 1:21 pm

बहुत दिनों से थोक में आँकड़े आ रहे हैं। फलाना इतने अरब खा गया, ढिकाना इतने करोड़ दबा गया, अमके ने इतने लाख की रिश्वत ले ली, ढिमके के डबल बैड में इतने करोड़ नगद और उतने करोड़ के जे़वर निकले। हाल ही में प्रधानमंत्री समेत तमाम केन्द्रीय मंत्रियों ने गाजे-बाजे के साथ अपनी सम्पत्ति की घोषणा की, छोटे-बड़े कई आँकड़े अखबारों में मुख्य पृष्ठ पर प्रकट हुए। पढ़े-लिखे लोग पढ़-पढ़कर चमत्कृत हो रहे हैं और अपनी तुच्छ सम्पत्ति से उन मायावी आँकड़ों की तुलना कर, सिर पटक-पटक कर अफसोस कर रहे हैं- हाय, हम क्यों न समय रहते राजनीति में घुस पड़े! कुछेक लाख हम भी छाप लेते, कुछ गाड़ियाँ-बंगले हमें भी नसीब हो जाते।

जिन्होंने ठीक से स्कूल-कॉलेज का मुँह देखा है, उन्होंने तो आँकड़ों को सही-सही पढ़ लिया और उनके आयतन को आत्मसात भी कर लिया, मगर एक सौ इक्कीस करोड़ में से, देश की अधिकांश पढ़ने-लिखने से पूरी तौर पर बरी आम जनता इन आँकड़ों की माया से एकदम अप्रभावित है। उसका सौभाग्य है कि ये लम्बे-लम्बे, चौड़े-चौड़े आँकड़े पढ़कर उन्हें अपनी छाती नहीं कूटना पड़ रही है। कारण उन्‍हें अखबार पढ़ना ही नहीं आता। कहीं से अगर इन आँकड़ों की खबर लग भी गई तो उनके लिये समझना नामुमकिन है कि इतना धन वास्तव में कितना धन होता है। वे अपनी बीस रुपये औसत रोज़न्दारी से खुश है, उनके दिमाग को कोई फालतू टेन्शन नहीं है।

देश के कर्णधारों ने अधिकांश जनता को इसी दिन के लिये तो अनपढ़-गँवार बनाए रखा है, ताकि जब नेताओं की पोलों के समाचार अखबारों में छपें, टीवी पर सनसनी फैलाएँ तो बेचारी को उन्हें पढ़ने-समझने की ज़हमत न उठाना पडे़ और न ही गुस्से और आक्रोश की अगांधीवादी भावना से दो-चार होना पड़े। लोग यदि अपनी रोटी-रोज़ी की जुगाड़ की चिन्ता छोड़कर इस आँकड़ेबाज़ी की चिन्ता करने लगें तो देश का विकास कितना प्रभावित होगा!

इसमें विरोधी ताकतों की मुश्किलें बढ़ाने की सियासी चाल भी है। जाओ बेटा घर-घर और समझाओ गँवार जनता को कि हमने कितना माल दबाया है। जनता तुम्हारे दुष्प्रचार को समझे इस लायक उसे छोड़ा ही नहीं गया है, कर लो बेटा क्या करते हो।


साभार - http://vyangya।blog।co।in/ लेखक - प्रमोद ताम्बट

अगजल--- दिलबाग विर्क


http://sahityasurbhi.blogspot.com/2011/08/24.html

                                        * * * * *

तुम दोनों ....



कितना मुश्किल है
ये हर  वक्त का बहना 
रुकना चाहूँ भी 
तो कैसे रुकूँ ......
तुम दोनों भी तो 
चल रहे  हो 
साथ मेरे 
लेकिन -
अलग अलग छोरों पर .....
जो कभी  मिलोगे 
तुम दोनों 
तभी तो रुक पाऊँगी
अन्यथा यूँही
अनवरत बहना होगा ......
कभी देखती हूँ
उस क्षितिज पर
जहाँ तुम दोनों
दिखते हो मिलते हुए
लेकिन तब
मै नहीं आती
नजर -
ख़त्म हो जाता है
मेरा अस्तित्व ....
पतली सी खिची रेखा
जो तुम दोनों में
ही समा जाती है ........
शायद -
अभी वक्त नहीं है
मेरे लीन होने का
वजूद के समर्पण का .....
तभी तुम दोनों
साथ साथ होकर भी
बहुत दूर हो .....................




प्रियंका राठौर

न यूँ इतिहास का हास करो

Written By Brahmachari Prahladanand on शुक्रवार, 9 सितंबर 2011 | 5:17 pm



न यूँ इतिहास का हास करो, न यूँ किसी का पर्दाफास करो,
इत के इह में ही तो आस है, तभी तो जिन्दगी खास है,

खास-ओ-खास जिन्दगी का, इतिहास लिखा जाता है,
आम-ओ-आम तो उसमें यूँ, जगह भी न बना पाता है,
उनकी खास जिन्दगी की, कुछ हमें भी आस होती है,
देखते सपने, कास ऐसी जिन्दगी हमारे पास होती है,

तभी तो इतिहास की कक्षा में, नींद है खास होती,
उनके जिन्दगी के सफ़र का सफरनामा है होती,
खोजो अपनी जिन्दगी में, क्या हमारा इतिहास होगा,
कोई हमारी जिन्दगी का पर्दाफास करनेवाला होगा,

जब हम खास होंगे, नज़र में सबके लिए आस होंगे,
कोई इतिहास लिखेगा, किसी के लिए बकवास होंगे,
कोई हमारे इतिहास पे हास करेगा, कई यूँ रोते होंगे,
कई हमसे प्रेरणा लेंगे, कई वक्त-वे-वक्त भूल गए होंगे,

.
तारीखें बन गयी कुछ तारीखें, वक्त के बीतते-बीतते,
याद कोई जब इनको करेगा,वक्त के बीतते-बीतते,
सोचेगा, कौन थे वो, जो इस तरह जिए जिन्दगी को,
जिनकी तारीख सबक बन गई, सबकी जिन्दगी को,


                                                         ------- बेतखल्लुस


.

विवादों से घिरते जा रहे हैं स्वामी अग्निवेश


हाल ही अन्ना हजारे की टीम से अलग हुए स्वामी अग्निवेश एक बार फिर विवादों से घिरने लगे हैं। वस्तुस्थिति तो ये है कि उनकी विश्वसनीयता ही संदिग्ध हो गई है। अन्ना की टीम में रहने के दौरान भी कुछ लोग उनके बारे में अलग ही राय रखते थे। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर उनके बारे में अंटशंट टिप्पणियां आती रहती थीं, लेकिन जैसे ही वे अन्ना से अलग हुए हैं, उनके बारे में उनके बारे में सारी मर्यादाएं ताक पर रख कर टीका-टिप्पणियां होने लगी हैं। हालत ये है कि आजीवन सामाजिक क्षेत्र में काम करने का संकल्प लेने वाले अग्निवेश को अब कांगे्रस का एजेंट बन कर सियासी दावपेंच चलाने में मशगूल बताया जा रहा है।
असल में स्वामी अग्निवेश मूलत: अन्ना हजारे की टीम में शामिल नहीं थे। वैसे भी उनका अपना अलग व्यक्तित्व रहा है, इस कारण अन्ना हजारे के आभामंडल को पूरी तरह से स्वीकार किए जाने की कोई संभावना नहीं थी। कम से कम अरविंद केजरीवाल व किरण बेदी की तरह अन्ना हजारे का हर आदेश मानने को तत्पर रहने की तो उनसे उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी। सामाजिक क्षेत्र में पहले से सक्रिय स्वामी अन्ना से जुड़े ही एक मध्यस्थ के रूप में थे। वे उनकी टीम का हिस्सा थे भी नहीं, मगर ऐसा मान लिया गया था कि वे उनकी टीम में शामिल हो गए हैं। और यही वजह रही कि उनसे भी वैसी ही उम्मीद की जा रही थी, जैसी कि केजरीवाल व किरण से की जा सकती है।
जहां तक मध्यस्थता का सवाल है, उसमें कोई बुराई नहीं है। मध्यस्थ का अर्थ ही ये है कि जो दो पक्षों में बीच-बचाव करे और वह दोनों ही पक्षों में विश्वनीय हो। तभी तो दोनों पक्ष उसके माध्यम से बात करने को राजी होते हैं। मगर समस्या तब उत्पन्न हुई, जब इस बात की जानकारी हुई कि वे पूरी तरह से कांग्रेस का साथ देते हुए मध्यस्थता कर रहे हैं तो अन्ना व उनकी टीम को ऐतराज होना स्वाभाविक था। जैसा कि आरोप है, वे तो अन्ना की टीम को ही निपटाने में जुट गए थे। जाहिर तौर पर उनकी यह हरकत अन्ना टीम सहित उनके सभी समर्थकों को नागवार गुजरी। बुद्धिजीवियों में मतभेद होना स्वाभाविक है, मगर यदि मनभेद की स्थिति आ जाए तो संबंध विच्छेद की नौबत ही आती है। कदाचित कुछ मुद्दों पर स्वामी अन्ना से सहमत न हों, मगर उन्हीं मुद्दों को लेकर अन्ना के खिलाफ काम करना कत्तई जायज नहीं ठहराया जा सकता। संतोष हेगड़े को ही लीजिए। उनके भी कुछ मतभेद थे, मगर उन्होंने पहले ही स्पष्ट कर दिया था। उनको लेकर कोई राजनीति नहीं कर रहे थे।
जैसी कि जानकारी है, अन्ना टीम को पता तो पहले ही लग गया था कि स्वामी क्या कारस्तानी कर रहे हैं, मगर आंदोलन के सिरे तक पहुंचने से पहले वह चुप रहने में ही भलाई समझ रही थी। जानती थी कि अगर मतभेद और विवाद पहले ही उभर आए तो परेशानी ज्यादा बढ़ जाएगी। और यही वजह रही कि जब अन्ना का आंदोलन एक मुकाम पर पहुंच गया और उसकी सफलता का जश्न मनाया जा रहा था तो दूसरी ओर इस बात की समीक्षा की जा रही थी कि कौन लंका ढ़हाने के लिए विभीषण की भूमिका अदा कर रहा है। उसमें सबसे पहले नाम आया स्वामी अग्निवेश का। इसी सिलसिले में उनका का एक कथित वीडियो यूट्यूब पर डाल दिया गया। जिससे यह साबित हो रहा था कि वे थे तो टीम अन्ना में, मगर कांग्रेस का एजेंट बन कर काम कर रहे थे। वीडियो में उन्हें कथित रूप से हजारे पक्ष को पागल हाथी की संज्ञा देते हुए दिखाया गया है। वीडियो में वह कपिल जी से यह भी कह रहे हैं कि सरकार को सख्ती दिखानी चाहिए ताकि कोई संसद पर दबाव नहीं बना सके।
जहां तक वीडियो की विषय वस्तु का प्रश्न है, स्वयं अग्निवेश भी स्वीकार कर रहे हैं कि वह गलत नहीं है, मगर उनकी सफाई है कि इस वीडियो में वे जिस कपिल से बात कर रहे हैं, वे केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल नहीं हैं, बल्कि हरिद्वार के प्रसिद्ध कपिल मुनि महाराज हैं। बस यहीं उनका झूठ सामने आ गया। मौजूदा इंस्टंट जर्नलिज्म के दौर में मीडिया कर्मी कपिल मुनि महाराज तक पहुंच गए। उन्होंने साफ कह दिया कि उन्होंने पिछले एक वर्ष से अग्निवेश से बात ही नहीं की। साथ ये भी बताया कि हरिद्वार में उनके अतिरिक्त कोई कपिल मुनि महाराज नहीं है। यानि कि यह स्पष्ट है कि स्वामी सरासर झूठ बोल रहे हैं। जाहिर तौर पर इस प्रकार की हरकत को धोखाधड़ी ही कहा जाएगा।
जहां तक अग्निवेश का अन्ना टीम छोडऩे का सवाल है, ऐसा वीडियो आने के बाद ऐसा होना ही था, मगर स्वयं अग्निवेश का कहना है कि वे केजरीवाल की शैली से नाइत्तफाकी रखते थे, इस कारण बाहर आना ही बेहतर समझा। इस बात में तनिक सच्चाई भी लगती है, क्यों कि अन्ना की टीम में दूसरे नंबर के लैफ्टिनेंट वे ही हैं। कुछ लोग तो यहां तक भी कहते हैं कि अन्ना की चाबी भी केजरवाल ही हैं। बहरहाल, दूसरी ओर केजरीवाल का कहना है कि स्वामी इस कारण नाराज हो कर चले गए क्योंकि आखिरी दौर की बातचीत में अन्ना की ओर से उन्हें प्रतिनिधिमंडल में शामिल नहीं किया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि अन्ना को उनके बारे में पुख्ता जानकारी मिल चुकी थी, इसी कारण उनसे थोड़ी दूरी बनाने का प्रयास किया गया होगा।
यहां यह उल्लेखनीय है कि हजारे पहली बार अनशन पर बैठे तो स्वामी ही मध्यस्थ के रूप में आगे आए थे, मगर उनकी भूमिका पर संदेह होने के कारण ही उन्हें लोकपाल विधेयक का ड्राफ्ट बना कर सरकार से बात करने वाली टीम में शामिल नहीं किया गया, जब कि स्वामी ने बहुत कोशिश की कि उन्हें जरूर शामिल किया जाए। बस तभी से स्वामी समझ गए कि अब उनकी दाल नहीं गलने वाली है। इसी कारण जब हजारे ने 16 अगस्त से अनशन पर बैठने का फैसला किया तो अग्निवेश ने आलोचना की थी। अनशन शुरू होने से लेकर तिहाड़ जेल से बाहर आने तक स्वामी गायब रहे, मगर फिर नजदीक आने की कोशिश की तो अन्ना की टीम ने उनसे किनारा शुरू कर दिया।
खैर, यह पहला मौका नहीं कि उनकी ऐसी जलालत झेलनी पड़ी हो। इससे पूर्व आर्य समाज, जो कि उनके व्यक्तित्व का आधार रहा है, उस तक ने उनसे दूरी बना ली थी। ताजा मामले में भी आर्य समाज के प्रतिनिधियों ने उन्हें धोखेबाज बताते हुए सावधान रहने की सलाह दी है। माओवादियों से बातचीत के मामले में भी उनकी कड़ी आलोचना हो चुकी है। अब देखना यह है कि आगे वे क्या करते हैं? सरकार की किसी पेशकश को स्वीकार करते हैं या फिर से सामाजिक क्षेत्र में जमीन तलाशते हैं?
tejwanig@gmail.com

आतंकवाद के ख़ात्मे का सही तरीक़ा

आतंकवाद के ख़ात्मे का सही तरीक़ा
आज लोग आतंकवाद को ख़त्म होते हुए देखना चाहते हैं।
लेकिन सच्चाई यह है कि फ़िलहाल आतंक का अंत तो क्या यह कम होता हुआ भी नहीं लग रहा है।
विदेशी लोग इस क्षेत्र को अशांत देखना चाहते हैं और इस क्षेत्र के राजनीतिज्ञ उनकी नीति को जानते हुए भी उन्हें बुरा तक नहीं कह सकते।
धर्म-मत और क्षेत्रीय अलगाव को आधार बनाकर ये विदेशी शक्तियां एशिया को आपस में लड़ाती आ रही हैं बहुत पहले से।
ईरान इराक़ को लड़ाया और अब पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान को लड़ा रहे हैं। इसी तरह वे भारत को पाकिस्तान और चीन से लड़ाना चाहते हैं। एक दूसरे के प्रति आशंका के चलते ही वे अपने बेकार हथियारों को यहां भारी क़ीमत पर बेच पाते हैं और इसी ख़रीद फ़रोख्त में मोटा माल कमीशन के रूप में हमारे रक्षक ले लेते हैं। अलगाववादी नेता और अभ्यस्त बलवाई भी विदेशों से करोड़ों रूपया हवाला के ज़रिये लाते हैं तो कुछ कर दिखाना उनकी भी मजबूरी होती है। सो आतंकवाद आज एक उद्योग का रूप ले चुका है। जिसमें शिक्षित लोग अच्छा मुनाफ़ा कमा रहे हैं।
हक़ीक़त तो यह है।
ऐसे नारे भी सुनने में आते है कि अमुक देश पर हमला कर देना चाहिए। इस तरह की बातों को बेवक़ूफ़ी के बजाय राष्ट्रवाद का नाम दिया जाता है।
उन्हें नहीं मालूम कि ऐसे हमले जब कभी किये जाते हैं तब भी राजनीतिज्ञ यह सब अपने हितों के मददेनज़र ही करते हैं न कि जनता के व्यापक हित के लिए।
जब सरकार घरेलू मोर्चे पर हार रही होती है तो वह अपने नागरिकों को ध्यान बंटाने के लिए किसी न किसी पर हमला कर भी देती है। अमेरिका भी ऐसे ही करता है।
इस तरह आतंकवाद घटने के बजाय और बढ़ जाता है।
फिर उस आक्रमण के बाद स्थिति शांत होने के बजाय पीड़ित पक्ष प्रतिशोध के लिए खड़ा हो जाता है जैसे कि बांग्लादेश विभाजन के बाद हुआ।
अब यह क्षेत्र इसी राजनीति, कूटनीति और प्रतिशोध के जाल में फंसा हुआ चल रहा है।
जो सच बोलता है, जनता उसकी सुनती नहीं है और जो उसे धोखे देता है उसे यह अपना नेता चुनती है।
जो फ़रेब देकर एमएलए और एमपी बन जाते हैं, उन्हें क्या चिंता है कि जनता में कौन मरेगा या कौन जिएगा ?
जब तक आतंकवाद है, उनसे जनता विकास कार्यों के बारे में पूछेगी नहीं और न ही उनके भ्रष्टाचार को देखेगी।
कांग्रेस भ्रष्टाचार के मुददे पर बुरी तरह नंगी हो चुकी है।
जनता उससे नाराज़ है।
ऐसे में जनता का ध्यान कैसे बंटाया जाए ?
ये धमाके जिसने भी किए हैं, उसने कांग्रेस को लाभ ही पहुंचाया है।
अब भ्रष्टाचार और जन लोकपाल की चर्चा को मीडिया में दबाना आसान है।
लोग मरते हैं और नेता उनकी चिताओं पर अपनी रोटियां सेकते हैं।
यही असल वजह है जिसकी वजह से आतंकवाद है और आतंकवाद इसी वजह से बना भी रहेगा।
बेहतर नेता चुनने के लिए जनता को खुद भी बेहतर बनना होगा।
धर्म-मत, भाषा-क्षेत्र और राजनैतिक विचारधारा के अंतर के बावजूद हमें आपस में एक दूसरे के अधिकारों का सम्मान करना सीखना होगा।
हम बेहतर होंगे तो हमारे बीच से निकलने वाला हमारा नेता बदतर हो ही नहीं सकता।
आतंकवाद का ख़ात्मा ऐसे ही होगा और इस बदलाव को लाने में लंबा समय लगेगा।
जो इस बात को नहीं जानता और नारे लगा रहा है, वह सत्य को न जानकर व्यर्थ की आशा में जीवन गंवा रहा है और जो किसी समुदाय के विरूद्ध भड़काऊ नारे लगा रहा है, वह भी आतंकवाद की बुनियादों को ही मज़बूत कर रहा है।

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जुलुस ,धार्मिक स्थल और पथराव फिर नफरत ही नफरत इसे जरा रोक लो यारों ...........


दोस्तों एक तरफ तो देश के दुश्मन आतंकवादी हाई टेक हैं कड़ी सुरक्षा के बीच चेलेंज देकर , विस्फोट कर सभी धर्म के लोगों को चोटिल और आहत कर रहे हैं और दूसरी तरफ हम गली छाप गुंडों के कहने में आकर वही पुराना दकियानूसी राजनितिक खेल खेल रहे हैं जिसमे धार्मिक जुलुस का एक धार्मिक स्थल से निकलना फिर वहां धूम धडाका होना शोर शराबे के बाद पथराव फिर तोड़फोड़ और दंगे फसाद का माहोल और एक खास पार्टी को फायदा होता है .हम कल भी पागल थे आज भी पागल हैं हमारी इक्कीसवीं सदी और आज का हमारा वही पिछड़ा पन हमारी लानत के लियें काफी है ...........कल कोटा के नजदीक मोड़क में जब यही घिसी पिटी केसिट चलाई गयी जल झुलनी का जुलुस एक मस्जिद के पास से निकला वहन रुका और फिर पथराव के आरोप के बाद भगदड़ तोड़फोड़ के बाद तनाव हो गया अमन पसंद लोग और प्रशासन परेशान हो गया लोगों की धडकने थम गयी और पुलिस तथा जिला प्रशासन भाग्दोड़ में लग गया लेकिन मुख्य दोषी कोन था पता ही नहीं चल सका और पता भी केसे चले इनका उद्देश्य तो योजनाबद्ध होता है कभी राजनीति से यह प्रेरित होते हैं तो कभी विदेशी ताकतों से यह मिले रहते हैं या कट्टर पंथी बुखार से यह पीड़ित रहते हैं .लेकिन एक शोध से हमारे देश में दंगों का एक ख़ास बहाना एक खास बुनियात जुलुस का धार्मिक स्थल के पास से निकलना और फिर उस पथराव होना फिर भगदड़ और फिर दंगे फसाद एक पक्ष नारेबाजी के आरोप लगाता है तो दुसरा पक्ष पथराव का आरोप लगाता हैं जाने जाती हैं सम्पत्ति को नुकसान पहुंचता है बड़े दंगों में आयोग बेठता है फिर सब वेसा का वेसा ही दोहराया जाता है .दोस्तों हम और देशवासी इस घिसी पिटी केसिट से तंग आ गये हैं लेकिन प्रशासन और पुलिस ने इससे कोई सबक न तो लिया है और ना ही कोई एहतियाती कार्ययोजना तय्यार की हैं .इसके लियें एक फार्मूला है अगर आपको ठीक लगे तो मुझे थोड़ी शाबाशी देने के लिए एक पत्र प्रधानमन्त्री ,,राष्ट्रपति ,राज्यपाल और मुख्यमंत्री को अवश्य डालना ....
फार्मूला नम्बर एक ............जब भी धार्मिक जुलूसों का आयोजन हो धार्मिक स्थलों के मार्ग से जुलुस निकलने को जितना टाला जा सकता हों टाला जाए ...........अगर मुख्य मार्ग पर ही धार्मिक स्थल हो तो जुलुस पहुंचने के आधे घंटे पहले ऐसे धार्मिक स्थल को खाली करवा कर पुलिस धार्मिक अदब के साथ अपने कब्जे में ले और सम्बंधित धार्मिक स्थान के बाहर जुलुस का ठहराव प्रदर्शन वर्जित हो और तुरंत वहां से जुलुस को निकाल कर वापस सम्बंधित धार्मिक स्थल धर्म से जुड़े लोगों के सुपुर्द कर दिया जाए ऐसा देश के हर छोटे बढ़े जुलुस में हो और इस मामले में आवश्यक दिशा निर्देश जारी होकर कानून बना कर इसकी पालना हो ताकि देश के किसी भी कोने में कमसे कम किसी भी धार्मिक जुलुस पर धार्मिक स्थल से पथराव करने का बहाना लेकर किसी भी आसामाजिक तत्व द्वारा दंगा फसाद नहीं करवाया जा सके .............दोस्तों आज हाईटेक युग है जुलुस .प्रदर्शनों की विडियोग्राफी अनिवार्य रूप से की जाती है फिर कहां किसकी गलती है उसे नामज़द कर दंडित क्यूँ नहीं क्या जाता उन कमरों में बंद साक्ष्य को सार्वजनिक क्यूँ नहीं क्या जाता जो पुलिस के पास सुरक्षित रहते हैं और अगर पुलिस का केमरामेन जुलुस पथराव की घटना मामले में ऐसे आपराधिक तत्वों की विडियोग्राफी करने में अक्षम रहता है तो उसे भी दंडित करना चाहिए ........तो जनाब करो कुछ ऐसा करिश्मा के यह देश ऐसा लगे थोडा तुम्हारा थोड़ा हमारा है इस देश के प्रति मान सम्मान थोड़ा तुम्हारा है तो थोडा हमारा है .यहा इसी देश की मिटटी में तुम्हे मिलजाना हिया तो हमें भी इसी देश की मिटटी में दब कर खुदा के घर जाना है इसलियें जाती धर्म राजनीति से बढ़ा देश और देश की सुक्ख शान्ति देश का भाईचारा है बस इसीलियें अपनी अक्ल से काम लोग खुदा इश्वर भगवान और अल्लाह से डरो और इस संकट के वक्त देश और देशवासियों के साथ खड़े होकर देश का साथ दो ..........अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

गीली बाती: बोलो स्वदेश के स्वाभिमान

Written By नीरज द्विवेदी on गुरुवार, 8 सितंबर 2011 | 9:34 pm

गीली बाती: बोलो स्वदेश के स्वाभिमान:

बोलो स्वदेश के स्वाभिमान

नगराज हिमालय कटा, सिन्धु की धार बँटी, कश्मीर लुटा
कैलास, मानसर, हिंगुलाज तीरथ का पावन तीर बँटा
संगीत आरती का, पूजा की शंख ध्वनि खो गयी कहाँ
माँ ढाकेश्वरी पूछने आती है हमसे हर रोज यहाँ
क्यों हुआ नहीं विक्षुब्द सिन्धु, क्यों मौन अभी तक आसमान।
बोलो स्वदेश के स्वाभिमान॥ [१]

अँधियारे में भारत भटका, लटकी क्यों तौंक गुलामी की
क्यों स्वाभिमान को भूल हाथ, आदत लग गयी सलामी की
क्यों विश्व गुरु का सिंहासन, आसन बन गया खिलौनों का
मृगराज भूल शार्दूल....

पतन { कविता }---दिलबाग विर्क

एक किताब का दो दो बार आवरण उतारना क्या उसका चीर हरण नहीं माना जाएगा ?

Written By DR. ANWER JAMAL on बुधवार, 7 सितंबर 2011 | 11:39 pm

Reader Blogs - Navbharat Times - India Times

चित्र प्रतीकात्मक है , गूगल से साभार
बड़ा ब्लॉगर कमाता ज़रूर है। यह बड़े ब्लॉगर का मुख्य लक्षण है।
कोई नाम कमाता है, कोई इज़्ज़त कमाता है और कोई पैसा कमाता है।
कोई ईमानदारी से कमाता है और धोखाधड़ी से कमाता है।
कोई एक पम्फ़लैट तक नहीं लिख पाता लेकिन बड़ा ब्लॉगर सारा इतिहास लिख देता है। कोई अपनी किताब लिखकर बिना विमोचन के ही बांट कर धन्य हो जाता है लेकिन बड़ा ब्लॉगर अपनी एक किताब का दो दो बार विमोचन करा लेता है और वह भी दो दो राजधानियों में।
बड़े ब्लॉगर की बड़ी बात होती है।
‘एक से भले दो‘ की मिसाल सामने रखते हुए, वह अपने ही जैसा एक और पकड़ लेता है। बंगाल के तो जादूगर मशहूर हैं और दिल्ली के ठग भी एक ज़माने में काफ़ी मशहूर थे लेकिन बिहार के चोर ज़्यादा मशहूर नहीं हैं।
बहरहाल बंगाल के जादूगर भी बग़लें झांकने लगेंगे अगर दिल्ली का ठग और बिहार का चोर मिलकर काम करने पर आ जाएं तो...
और अगर ये ब्लॉगिंग में आ जायें तो बिना किताब छापे ही बेचकर दिखा दें और जो बड़े बड़े तीस मार खां बने फिरते हैं हिंदी ब्लॉगर, वे पैसे देंगे पहले और किताब उन्हें मिलेगी 4 माह बाद और वह भी 2 बार विमोचन होने के बाद।
जिस किताब का 2 बार विमोचन हो चुका हो, उसकी आबरू तो पहले ही तार तार कर दी गई है, अब उसमें क्या बचा है ?
कोई शरीफ़ आदमी तो उसे अपनी किताबों के साथ रखेगा नहीं और न ही कोई शरीफ़ किताब उसके पास रहने के लिए तैयार होगी।
ज़्यादातर किताबें बिना विमोचन की होती हैं।
उनका विमोचन बस पाठक ही करता है।
चलिए बहुत हुआ तो एक बार उसका आवरण उतारने का हक़ लेखक का भी मान लिया हमने।
बार बार उसका आवरण उतारना क्या उसका चीर हरण नहीं माना जाएगा ?

 

आतंकवाद रोकने के लियें देश में अलग से आतंकवाद निरोधक मंत्रालय स्थापित करना आवश्यक


दोस्तों देश में सभी सुरक्षा प्रयासों के बाद भी अगर आये दिन अचानक बम विस्फोट से निर्दोषों की म़ोत होने लगे और यह सिलसिला इतने शक्तिशाली परमानुधारक देश में रोज़ की घटना बन जाए तो फिर तो हमे नींद से जागना होगा देश के आतंकवाद कारण जानकार उसकी तह तक पहुंच कर या तो आतंकवाद पनपने के कारणों को बातचीत से खत्म करना होगा और जो लोग बातचीत की भाषा नहीं जानते हैं उन्हें हमारे देश में हो तो यहाँ और दुसरे देश में हों तो वहां खोज खोज कर मारना होगा ........दोस्तों हमारा देश और हमारे देश के लोग रोज़ रोज़ के इस युद्ध से तंग आ गये हैं पर्दे के पीछे रहकर निर्दोषों की हत्या एक जघन्य काण्ड है और यह माफ़ी के लायक नहीं .........हमारे देश में आतंकवाद और दूसरी खबरों की पूर्व सूचनाये एकत्रित करने के लियें कई जांच एजेंसिया कार्यरत हैं उनका कार्य घटनाओं को क्रियान्वित करने के प्रयासों को निष्फल करने के लियें सूचनाये एकत्रित करना और ऐसे लोगों को धर दबोचना है लेकिन आप और हम जानते हैं के यह एजेंसियां अब राजनितिक उतार चढाव और आन्दोलन कारियों उनके मुद्दों और उनके नतीजों पर भी आंकड़े और सूचनाये एकत्रित करने में लग गये हैं इनका उपयों राष्ट्र के लियें कम और देश की सत्ताधारी पार्टी के लियें अधिक होगया है एक तो इस राष्ट्रिय अपराध को सबसे पहले रोकना जरूरी है दुसरे हमारे देश में आतंकवाद क्या है .यह विभिन्न समाजों में अचानक क्यूँ पनप रहा है इसके कारण क्या है इसका निस्तारण केसे हो सकता है आतंकवाद से प्रभावित लोग कोन है उन्हें पुनर्वासित करने के लियें क्या योजना है आतंकवाद के दोषी लोगों को सज़ा दिलवाने के लियें सरकार और अधिकारीयों की क्या भूमिका है और आतंकवाद के लियें ज़िम्मेदार कारणों को केसे खत्म कर सकारात्मक माहोल बनाया जाए इन सभी प्रयासों के बाद भी अगर कोई समूह अपनी आतंकवादी हरकतों से बाज़ नहीं आता है तो उसे केसे जड मूल से नष्ट किया जाए ..अगर इसकी जड़े विदेश में हो तो वहां घुस कर आतंकवादियों को और आतंकवाद को पनाह देने वालों को केसे तबाह किया जाए इस पर विचार और कार्य के लियें देश में एक प्रथक से आतंकवाद मंत्रालय की स्थापना करना जरूरी हो गया हैं ...... हमारे कुरान में एक आयत सुरे तोबा है जिसको पढने के पहले बिस्मिला हिर्रहमा निर्राहीम नहीं पढ़ा जाता है यानी इस आयत को पढने के पहले खुदा का नाम नहीं लिया जाता है उसमे दुश्मन से केसे निपटना चाहिए उसका तरीका बताया गया है .श्री भगवत गीता में भी दुश्मन कोई भी हो उसका नरसंहार केसे किया जाए उस बारे आदेश दिया गया है ..तो दोस्तों हमारे नेताओं और अमेरिका के आगे नोकरों की तरह से घुग्घू बन कर रहने वाले लोगों को कुरान और गीता का पाठ पढ़ाया जाना जरूरी है अगर हमारा देश का दुश्मन किसी भी देश में जा कर छुपा हो और वोह देश हमे उस दुश्मन को ना दे तो उस देश से युद्ध करने उसे बर्बाद कर उस दुश्मन को सजा देने का कानून हमारे देश में पारित किया जाए और फिर इस काम में जो भी देश बाधा बने उसे भी दुश्मन मानकर खत्म कर दिया जाए ऐसा एलान हमे विश्व में करना होगा तब कहीं जाकर हमारे देश के लोग सुकून से जी सकेंगे हमारे देश के दुश्मन पाकिस्तान में छुपे हो हमे उनकी सारी करतूतों की जानकारी हो हमारे पास सबूत हों और हम अमेरिका से पूंछे के देख लोग उसे समझा लो और अमेरिका हमे समझाए के बातचीत से मामला सुलझा लोग और चुप बेठ जाए अगर ऐसा होता रहा तो फिर हमे ऐसे हमलों से सिर्फ भगवान खुदा ही बचा सकता है ..तो दोस्तों हमे मजबूत होना होगा हमें ताकतवर बन कर विश्वव्यापी एलान करना होगा के अगर हमारे देश के किसी भी दुश्मन को किसी भी दुसरे देश ने पनाह दी तो उस देश का नक्शा हम मिटा देंगे और ऐसे एक दो करिश्मे कर के हमे बताना भी होंगे तब कहीं हम सुरक्षित रह पाएंगे वरना अमेरिका के आगे घुटने देख कर हम अगर अमन और सुकून की भीख मांगेंगे तो हमे सिर्फ और सिर्फ ठोकरों के सिवा कुछ ना मिलेगा ........अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

हमारी जिद


इस गुस्ताख दिल का, और हस्र क्या करोगी तुम
हम तो ढंग से, रो भी नहीं सके, तेरे आजमाने में।

जिंदगी बड़ी मुबारक चीज है, रब की इनायत है
पर हमें इस तरह जीना, गंवारा नहीं तेरे फंसाने में।

हम बहुत जिद्दी थे कभी, अपने किसी जमाने में,
तुम्हे ही पाने की जिद छोड़ दी, एक बार ठोकर खाने में।
हमारी जिद
My Blog: Life is Just A Life

शुक्रिया जनाब


हम शुक्रगुजार हैं उनके, जिसने ठुकराया है हमें,
अपने भावों को कविता में, पिरोना सिखाया है हमें।

उनके इस तरह जाने का, गम क्या करें रब से,
उसने ही तो रोते हुए मुस्कुराना, सिखाया है हमें।

हम तो उनकी इस अदा को, जुल्म भी न कह सके,
इस अदा ने ही तो, अपना आशिक बनाया है हमें।
शुक्रिया जनाब
My Blog: Life is Just a Life

नल कटा आर एस एस का हाथ ..बिजली गुल आर एस एस का हाथ ..पेट में दर्द मुस्लिम तुष्टिकरण या फिर दाउद इब्राहिम का हाथ हां हाह


दोस्तों आज मेरे पडोस में रहने वाले एक कोंग्रेसी नेता द्वारा नल का बिल जमा नहीं कराने के कारण कनेक्शन काट दिया गया .मेने उससे कहा के यार तुम तो कोंग्रेसी कार्यकर्ता हो सरकार भी कोंग्रेस की है तुम्हारा कनेक्शन केसे कट सकता है जरा सोचो कहीं इसमें आर एस एस का हाथ तो नहीं ..........थोड़ी देर में एक पड़ोसी कोंग्रेसी नेता आया उससे उसने कहा के भाई आपने सिफारिश नहीं की और मेरा कनेक्शन कट गया कोंग्रेसी नेता का वही रता रटाया जवाब भाई मेने तो कोशिश की थी लेकिन आर एस एस की लोबी इतनी हावी थी के उन्होंने अपनी मनमानी कर ली .यह सुन कर में घर आया तो मेरी लाईट बंद थी ..मेने भी सोचा के इसमें भी आर एस एस का हाथ है .मेरे घर का पंखा खराब था काम करने वाली बाई की तबियत खराब होने से वोह नहीं आई थी मेने सोचा इसमें भी आर एस एस का हाथ है॥ ..दोस्तों हमारा देश भी अजीब है किसी भी घटना या कर्यक्रम के पीछे कोन हैं सभी को पहले से पता रहता है लेकिन कोई करता कुछ भी नहीं है .देश में कुछ भी होजाए पाकिस्तानी साज़िश है ..बम फटे दाउद का हाथ है , किसी भी आतंकवादी घटना में मुस्लिम आतंकवादी घटना का हाथ है किसी भी आर एस एस वाले के लियें यह कह भर देना आसान होता है ...............अब दस्तूर बदल गया है अन्ना आन्दोलन करें तो आर एस एस .रामदेव काले धन की बात करें तो आर एस एस ..बम फटे तो आर एस एस कोई भी घटना हो तो आर एस एस .भाई इस देश को कोन समझाये कोई भी संगठन ओई भी पार्टी कोई भी धर्म कोई भी जाती कोई भी समुदाय पूरा का पूरा खराब नहीं होता है किसी दल की संगठन से जुड़े किसी एक व्यक्ति की काली करतूत हो तो उसके लियें सारे धर्म सारे समुदाय को ज़िम्मेदार नहीं ठराया जा सकता लेकिन आजकल सरकार के खिलाफ कोई भी आन्दोलन हो कोई भी पर्दाफाश हो बस एक रटा रटाया आरोप इसके पीछे आर एस एस और साम्प्रदायिक ताकतों का हाथ है ..मुसलमानों को हिफाजत की बात हो तो आर एस एस कहती है के कोंग्रेस की तुष्टिकरण है इस आरोप प्रत्यारोप में जनता का बुरा हाल है देश के हालात फटेहाल हैं और नेता हैं के फाइव स्टार होटलों में अपने बंगलों में सर्व दलीय बैठकों के नाम पर मजे कर रहे हैं एक दुसरे से गले मिल रहे हैं और जनता को आरोप प्रत्यारोप लगा कर उल्लू बना रहे हैं भाई में तो सोचता हूँ देश में जो कुछ भी हो रहा है उसमे कोंग्रेस के हिसाब से तो आर एस एस और हिन्दू आतंकवादियों का हाथ है और भाजपा आर आर एस के हिसाब से कोंग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की निति ..अफज़ल गुरु को फंसी नहीं देने की नियत .दाउद इब्राहीम ..छोटा शकील और पाकिस्तान की आई एस आई का हाथ है कभी कभी सी आई ऐ का भी हाथ हो जाता है तो भाई देश में कोई भी आरोपी नहीं सब बहर वालों के हाथ हैं ऐसे में देश के लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं को तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए क्योंकि शर्म तो इनको किसी भी कीमत पर आती नहीं .....अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

अखिल भारतीय साहित्य परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक......ड़ा श्याम गुप्त.....

Written By shyam gupta on मंगलवार, 6 सितंबर 2011 | 8:58 am




                                                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
                     अखिल भारतीय साहित्य परिषद की  राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक, पुस्तक लोकार्पण एवं सम्मान समारोह  दि १०-११ सितम्बर २०११ को लखनऊ में, मुन्नू लाल धर्मशाला , चौक में  आयोजित की जारही है ....आप सभी आमंत्रित हैं....|

Founder

Founder
Saleem Khan