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अगज़ल ----- दिलबाग विर्क

Written By Dilbag Virk on मंगलवार, 1 नवंबर 2011 | 12:15 pm


     माना  कि  जुदाई  से  गए  थे  बिखर  से  हम 
     नामुमकिन तो था मगर, संभल गए फिर से हम. 
                           साहित्य सुरभि 
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3 टिप्पणियाँ:

mridula pradhan ने कहा…

aur chara bhi kya tha.....

Rajesh Kumari ने कहा…

bahut achcha raha jo sambhal gaye.
achchi panktiyan.

दिलबाग विर्क ने कहा…

ye to pahli do panktiyan hain ,
poori gazal to link pr thi.

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