नियम व निति निर्देशिका::: AIBA के सदस्यगण से यह आशा की जाती है कि वह निम्नलिखित नियमों का अक्षरशः पालन करेंगे और यह अनुपालित न करने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से AIBA की सदस्यता से निलम्बित किया जा सकता है: *कोई भी सदस्य अपनी पोस्ट/लेख को केवल ड्राफ्ट में ही सेव करेगा/करेगी. *पोस्ट/लेख को किसी भी दशा में पब्लिश नहीं करेगा/करेगी. इन दो नियमों का पालन करना सभी सदस्यों के लिए अनिवार्य है. द्वारा:- ADMIN, AIBA

Home » » आत्महत्या का अधिकार-

आत्महत्या का अधिकार-

Written By Vibhor Gupta on बुधवार, 22 जून 2011 | 6:52 pm

ना चहिये मुझे सूचना का अधिकार,
ना ही चहिये मुझे शिक्षा का अधिकार
गर कर सकते हो मुझ पर कोई उपकार
तो दे दो मुझे आत्महत्या का अधिकार

क्या करूँगा मैं अपने बच्चों को स्कूलों में भेजकर
जबकि मैं खाना भी नही खिला सकता उन्हें पेटभर
भूखा बचपन सारी रात, चाँद को है निहारता 
पढ़ेगा वो क्या खाक, जिसे भूखा पेट ही है मारता

और अगर वो लिख-पढ़ भी लिए ,तो क्या मिल पायेगा उन्हें रोजगार
नही थाम सकते ये बेरोजगारी तो दे दो मुझे आत्महत्या का अधिकार

मेरे लिए, सैकड़ो योजनाये चली हुई है, सरकार की
सस्ता राशन, पक्का मकान, सौ दिन के रोजगार की
पर क्या वास्तव में मिलता है मुझे इन सब का लाभ
या यूँ ही कर देते हो तुम, करोड़ो-अरबो रुपये ख़राब

अगर राजशाही से नौकरशाही तक, नही रोक सकते हो यह भ्रष्टाचार,
तो उठाओ कलम, लिखो कानून, और दे दो मुझे आत्महत्या का अधिकार.

कभी मौसम की मार, तो कभी बीमारी से मरता हूँ
कभी साहूकार, लेनदार का क़र्ज़ चुकाने से डरता हूँ
दावा करते हो तुम कि सरकार हम गरीबों के साथ है
अरे सच तो ये है, हमारी दुर्दशा में तुम्हारा ही हाथ है 

मत झुठलाओ इस बात से, ना ही करो इस सच से इंकार 
नहीं लड़ सकता और जिन्दगी से, दे दो मुझे आत्महत्या का अधिकार

मैं अकेला नही हूँ, जो मांगता हूँ ये अधिकार,
साथ है मेरे, गरीब मजदूर, किसान और दस्तकार
और वो, जो हमारे खिलाफ आवाज उठाते है
खात्मा करने को हमारा, कोशिशें लाख लगाते है

पूर्व से पश्चिम तक, उत्तर से दक्षिण तक, मचा है हाहाकार
खत्म कर दो किस्सा हमारा, दे दो मुझे आत्महत्या का अधिकार

क्यों कर रहे हो इतना सोच विचार
जब चारो और है बस यही गुहार
खुद होंगे अपनी मौत के जिम्मेदार
अब तो दे ही दो, आत्महत्या का अधिकार.
 
- विभोर गुप्ता (9319308534)
Share this article :

4 टिप्पणियाँ:

रविकर ने कहा…

फेंक देती एक पत्थर

शान्त से ठहरे जलधि में-

और फिर चुप-चाप लहरों

का मजा लेते रहें |

मेंढक-मछलियाँ-जोंक-घोंघे

आ गए ऊपर सतह पर-

आस्था पर व्यर्थ ही

व्यक्तव्य सब देते रहे ||

जबरदस्त आक्रोश |

पर मत खोना होश--

गरजो और जोर से

होना मत खामोश ||


निकम्मी सरकार से कुछ मत मांगो |

खुद क्यूँ मरे ?

इसी को सलीब पर टांगो ||

वह दोस्त बधाइयाँ ||


देखो एक शहीद की पुकार --


पंजाब एवं बंग आगे, कट चुके हैं अंग आगे
लड़े बहुतै जंग आगे, और होंगे तंग आगे
हर गली तो बंद आगे, बोलिए, है क्या उपाय ??
व्यर्थ हमने सिर कटाए, बहुत ही अफ़सोस, हाय !

सर्दियाँ ढलती हुई हैं, चोटियाँ गलती हुई हैं
गर्मियां बढती हुई हैं, वादियाँ जलती हुई हैं
गोलियां चलती हुई हैं, हर तरफ आतंक छाये --
व्यर्थ हमने सिर कटाए, बहुत ही अफ़सोस, हाय !

सब दिशाएँ लड़ रही हैं, मूर्खताएं बढ़ रही हैं
नियत नीति को बिगाड़े, भ्रष्टता भी समय ताड़े
विषमतायें नित उभारे, खेत को ही मेड खाए
व्यर्थ हमने सिर कटाए, बहुत ही अफ़सोस, हाय !

मंदिरों में बंद ताला, हर हृदय है कुटिल-काला
चाटते दीमक-घुटाला, झूठ का ही बोलबाला
जापते हैं पवित्र माला, बस पराया माल आये--
व्यर्थ हमने सिर कटाए, बहुत ही अफ़सोस, हाय !

हम फिरंगी से लड़े थे , नजरबंदी से लड़े थे
बालिकाएं मिट रही हैं , गली-घर में लुट रही हैं
होलिका बचकर निकलती, जान से प्रह्लाद जाये --
व्यर्थ हमने सिर कटाए, बहुत ही अफ़सोस, हाय !

बेबस, गरीबी रो रही है, भूख, प्यासी सो रही है
युवा पहले से पढ़ा पर , ज्ञान माथे पर चढ़ाकर
वर्ग खुद आगे बढ़ा पर , खो चुका संवेदनाएं
व्यर्थ हमने सिर कटाए, बहुत ही अफ़सोस, हाय !

है दोस्तों से यूँ घिरा, न पा सका उलझा सिरा,
पी रहा वो मस्त मदिरा, यादकर के सिर-फिरा
गिर गया कहकर गिरा, भाड़ में ये देश जाए
व्यर्थ हमने सिर कटाए, बहुत ही अफ़सोस, हाय !


त्याग जीवन के सुखों को, भूल माता के दुखों को
प्रेम-यौवन से बिमुख हो, मातृभू हो स्वतन्त्र-सुख हो
क्रान्ति की लौ थे जलाए, गीत आजादी के गाये
व्यर्थ हमने सिर कटाए, बहुत ही अफ़सोस, हाय !

veerubhai ने कहा…

विभोर गुप्ता जी यह व्यवस्था तो १९४७ से ही लागू है -आत्म -हत्या और ह्त्या दोनों को यहाँ इम्युनिटी प्राप्त है -
हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था ,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है (दुष्यंत कुमार )
और भाई विभोर जी यह भी -
हम जला दूकान बैठे हाट की बातें न कर ,डूबने वाले से पगले घाट की बातें न कर ।
कौन सी सरकार की बात कर रहे हो यहाँ तो हर तरफ "बिजूके खड़ें हैं ".पक्षी आतें हैं इन पर बीट करके उड़ जातें हैं ।
जैसे उड़ी घाट को पंछी उड़ी घाट पे आवे .

Dr. shyam gupta ने कहा…

"पूर्व से पश्चिम तक, उत्तर से दक्षिण तक,
मचा है हाहाकार--"-सुन्दर सटीक, सामयिक भाव व रचना ...बधाई ..

Pallavi ने कहा…

लिखा कफ़्फ़ी हद तक ठीक गया है । किन्तु शिक्षा का भ्रष्टाचार से कोई तालुक नहीं लगता मुझे,एसा मेरा मत है ,देश को प्रगतीशील बनाने के लिए शिक्षा बेहद जरूर हतियार है। यदि आज हमारे देश में सभी शिक्षित होते तो शायद आज हमारे देश में यह भ्रष्टाचार इस कदर न पसरा होता ,क्यूंकि देश की भोली-भली मासूम जनता अधिकांश अनपढ़ है। और इसलिए यह नेता और खुद को देश का ठेकेदार मानने वाले लोग उनका फायदा उठा लिया करते हैं इसलिए किसी भी देश की बरबादी के लिए सिर्फ उस देश के नेता ही नहीं अपितु जनता भी उतनी ही जीमेदार है जितना की की भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले यह लोग ॥जय हिन्द...

एक टिप्पणी भेजें

Thanks for your valuable comment.