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समर्पण

Written By Minakshi Pant on शनिवार, 19 फ़रवरी 2011 | 3:40 pm


चाँद तारों की बात करते हो 
हवा का  रुख  बदलने की  
बात करते हो 
रोते बच्चों को जो हंसा दो 
तो मैं जानूँ |
मरने - मारने की बात करते हो 
अपनी ताकत पे यूँ इठलाते  हो  
गिरतों को तुम थाम लो 
तो मैं मानूँ |
जिंदगी यूँ तो हर पल बदलती है
अच्छे - बुरे एहसासों से गुजरती है  
किसी को अपना बना लो 
तो में मानूँ |
राह  से रोज़ तुम गुजरते हो 
बड़ी - बड़ी बातों  से दिल को हरते हो 
प्यार के दो बोल बोलके  तुम 
उसके चेहरे में रोनक ला दो 
तो मैं जानूँ |
अपनों के लिए तो हर कोई जीता है 
हर वक़्त दूसरा - दूसरा  कहता है |
दुसरे को भी गले से जो तुम लगा लो 
तो मैं मानूँ |
तू - तू , मैं - मैं तो हर कोई करता है 
खुद को साबित करने के लिए ही लड़ता है 
नफ़रत की इस दीवार को जो तुम ढहा दो 
तो मैं मानूँ |

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4 टिप्पणियाँ:

सदा ने कहा…

अपनों के लिए तो हर कोई जीता है
हर वक़्त दूसरा - दूसरा कहता है |
दुसरे को भी गले से जो तुम लगा लो
तो मैं मानूँ |

वाह ...बहुत ही खूबसूरत प्रस्‍तुति ।

Dilbag Virk ने कहा…

नफ़रत की इस दीवार को जो तुम ढहा दो
तो मैं मानूँ |

bhut sunder, kash ! nafrat ki diwar gir ske

JAGDISH BALI ने कहा…

बहुत अच्छा संगम शब्दॊं का !GoooooooD.

JAGDISH BALI ने कहा…

बहुत अच्छा संगम शब्दॊं का !GoooooooD.

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