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नव युगीन प्रश्नो्पनिषद--सखि कैसे...डा श्याम गुप्त....

Written By shyam gupta on शनिवार, 5 फ़रवरी 2011 | 6:40 am

बसंत का पदार्पण होने को है , समस्त प्रकृति बसंतमय होती जारही है | बसंत -पंचमी ---यह ही वह दिवस है जब ....
---जब आदि-शक्ति  महा सरस्वती ने आदि स्वर देवी सरस्वती का रूप अवतरण करके ब्रह्मा के हृदयान्तर में प्रवेश किया और ब्रह्मा को पुरा-सृष्टि के सृजन का ज्ञान  हुआ ...
---जब ब्रह्मा सृष्टि सृजन करते करते थक गए एवं स्वयं को नर- नारी के रूप में विभक्त करके नारी सृष्टि का सृजन किया ...
---जब स्वतः स्वचालित मैथुनी-प्रज़नन की प्रक्रिया(automated sexual reproduction system)  के निश्चित क्रम संचालन हेतु स्वयंभू रूद्र ( भगवान शिव ) ने अर्धनारीश्वर-लिंग महेश्वर  रूप  प्रकट किया तथा शीला-अशीला , गौरी-श्यामा, रूपा-अरूपा , सौम्य-क्रूर, शांत-अशांत , राग-विराग ....आदि ११-११  भाव नारियां व भाव नर --भाव प्रकट हुए जो ब्रह्मा का मूल स्वयं भाव के नर-नारी  रूप (समस्त प्रकृति में --- मनुष्य में मनु-शतरूपा रूप ) में प्रविष्ट होकर प्रथम -काम स्फुरणा की उत्पत्ति हुई....
   " कर्पूर गौरं करुणावतारम संसार सारं, भुजगेन्द्र हारं, सदा बसंतम हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि ||"
----जब पुष्पधन्वा ने कामशर  से अपने स्वयं के उत्पत्तिकर्ता  भगवान शिव को काम पीड़ित करने के प्रयत्न में मानवीय/देवीय शरीर खोया और भष्म होकर अनंग नाम पाया .....और वह नर-नारी के ह्रदय में व्याप्त रह सके...
----जब समस्त प्रकृति  रागमयी होकर बसंतमय होजाती है , हरी-पीली साड़ी पहन कर धरती इठलाने लगती है ,जड़-जंगम, जन- जन , नर-नारी ,प्राणी , पशु-पक्षी, भी राग भाव से उद्वेलित होने लगते हैं ; संसार अनंगमय , रसोद्रेक  से  परिपूरित , रस-श्रृंगार के गीत गाने लगता है----सुनिए डा श्याम गुप्त का एक---रस श्रृंगार सिक्त गीत....
सखि कैसे ....
सखि री तेरी कटि छीन ,
पयोधर भार भला धरती हो कैसे ?
बोली सखी मुसुकाइ , हिये-
 उर भार तिहारो धरतीं हैं जैसे॥

भोंहें बनाई कमान भला , 
हैं तीर कहाँ पै ,निशाना हो कैसे ?
नैनन के तूरीण में बाण-
धरे उर ,पैनी कटार के जैसे॥

कौन यहाँ मृग-बाघ धरे , कहो-
बाणन वार शिकार हो कैसे ?
तुम्हरो हियो मृग भांति पिया,
जब मारै कुलांच,शिकार हो जैसे॥

प्रीति तेरी मनमीत प्रिया ,
उलझाए ये मन, उलझी लट,जैसे |
लट सुलझाय तौ तुम ही गए,
प्रिय मन उलझाय गए कहो कैसे ?

ओठ तेरे विम्बा फल भांति, 
किये रचि लाल , अंगार के जैसे |
नैन तेरे प्रिय प्रेमी चकोर ,
रखें मन जोरि अंगार से जैसे॥

अनहद नाद को गीत बजै,
संगीत प्रिया अंगडाई लिए से |
कंचन काया के ताल-मृदंग पै,
थाप तिहारी कलाई दिए ते॥

प्रीति भरे रस-बैन तेरे,कहो-
कोकिल कंठ भरे रस कैसे ?
प्रीति की बंसी तेरे उर की ,
पिय देती सुनाई मेरे उर में से॥

पंकज नाल सी बाहें प्रिया,
उर बीच धरे क्यों, अँखियाँ मीचे ?
मत्त-मतंग की नाल सी बाहें ,
भरें उर बीच रखें मन सींचे ||
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3 टिप्पणियाँ:

सलीम ख़ान ने कहा…

welcom in AIBA

अख़्तर खान 'अकेला' ने कहा…

dr. saahb shyam ji bhut khub achha khaa mubark ho . akhtar khan akela kota rasjthan

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद सलीम जी व अख्तर खान जी....

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