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और हो गयी भेंट मेरी जड़ की चेतन से मेरे...

Written By नीलांश on गुरुवार, 5 मई 2011 | 7:46 am


एक टूटते तारे सी
आई और गयी
वो
पतझड़ जैसे,
छोड़कर
लाखों सवाल
हर तरफ,
कर के सूना
मेरी यादों के वृक्ष को
सींचा था जिसे
मैंने
अश्कों से अपने,
लहलहाने
उसके जवाबों के
हरे भरे पत्तों को..

उम्मीद थी
वो आएगी
एक वसंत बनकर
मेरे पीले पड़े हुए
पत्तों को रंगनें
अपने हरे रंग में

नहीं पता था
मुझको
उसे तो था प्रेम
मेरी जड़ों से
मेरे पत्तों से नहीं
और वो
मेरे यादों के वृक्ष को
झकझोर कर
मेरे जड़ के
पोषण हेतु
भेंट कर गयी
मेरे ही कुछ पुराने पत्तों को

और हो गयी भेंट
मेरी जड़ की
चेतन से मेरे...

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3 टिप्पणियाँ:

शालिनी कौशिक ने कहा…

और हो गयी भेंट
मेरी जड़ की
चेतन से मेरे..
nishant ji ,jitni jaldi jad kee chaitan se bhent ho jaye utna hi sahi rahta hai.bahut sundar bhavabhivyakti.

prerna argal ने कहा…

नहीं पता था
मुझको
उसे तो था प्रेम
मेरी जड़ों से
मेरे पत्तों से नहीं
और वो
मेरे यादों के वृक्ष को
झकझोर कर
मेरे जड़ के
पोषण हेतु
भेंट कर गयी
मेरे ही कुछ पुराने पत्तों को
bahut sunder rachanaa.dil ko choo lenewaali abhibyakti.badhai aapko

निशांत ने कहा…

bahut dhanyavaad aap sab ka ..

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