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सफ़र....काव्य दूत से ....

Written By shyam gupta on सोमवार, 30 मई 2011 | 4:36 pm



       सफ़र....

                                                                              ..
तुम जो भूलपाते ज़माने को अगर,
तो क्या ये प्यार , सच नहीं होता |
फिर तो  क्या रंज था,  जमाने में,
दर्दे -दिल,  यूं  बयाँ नहीं   होता ||

अब न आती हैं बहारें,न खुशी,
बेकरारी में  दिल  नहीं होता  |
तुम जो होते सफ़र में साथ मेरे,
दिल ये  बेज़ार यूं  नहीं होता ||

जी रहा  हूँ  यूं ही  जीने के लिए,
इश्क  हर बार  तो  नहीं  होता |
तुम जो भूलजाते ज़माने की नज़र ,
तो क्या ये  प्यार सच नहीं होता ||
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2 टिप्पणियाँ:

prerna argal ने कहा…

अब न आती हैं बहारें,न खुशी,
बेकरारी में दिल नहीं होता |
तुम जो होते सफ़र में साथ मेरे,
दिल ये बेज़ार यूं नहीं होता ||
bahut achchi gajal.bahut achche shabdon ka chyan.badhaai aapko.

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद प्रेरणा जी...

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