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माँ जैसे थपकी दे जाती

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on मंगलवार, 17 मई 2011 | 9:08 pm


माँ जैसे थपकी दे जाती “jagran junction forum”
एक नन्हा बालक जो किहाँ किहाँ -उहाँ उहाँ- रो रहा मोती छलकाते माँ की गोदी में चिपका माँ की आँखों में झांकता है और विश्व दर्शन सा कहीं खो जाता है -आइये आज आप सब को उस दुनिया में ले चलें जहाँ से कभी आप भी गुजरे होंगे -आइये याद कर लें वो पल -
अम्मा जब मै तेरी गोदी
रो रो किहाँ -किहाँ करता
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(फोटो साभार गूगल से )
तेरी आँखों में छवि अपनी
देख देख कुछ खो जाता
मायावी आँखों का जादू
सागर की गहराई में !
जल तरंग कुछ जल परियां
आ गोदी भर ले जाती हैं !
लोरी गा गा मैया मुझको
चांदी के पलने में देखो !
घूम नाच कुछ घुंघरू जैसे
पांवों में छनकाती हैं !!
तेरी ऊँगली थिरक थिरक
“माँ”-जैसे -थपकी दे जाती !
कुछ हंसती कुछ लिए कटोरा
सोने के चम्मच से मुख में
मुझको दूध पिलाती हैं !!
तेरा आँचल लहरा कर माँ
ज्यों ही पलकों मेरे पड़ता
ऊँगली पकडे जोर तभी मै
पलक खोल कर चिहुंक उठा !
जाग गया मै देखा मैया
क्या क्या रूप गढ़ा तूने !!
तू देवी है तू सागर है
तू सीपी है तू मोती है
नील गगन तू चंदा तू है
सूरज तू है चाँद सितारा
रजनी दिवस सभी तो तू है !!
तू माया है ममता तू है
राग रागिनी सब माँ तू है
नींद हमारी तू है मैया
पलक हमारी छू ले फिर से
फिर सपनों में खो जाऊं !
दिल में तेरे छुपा रहूँ मै
वहीँ घरौंदा एक बनाऊं !!
तेरी सांस से मेरी साँसे
तेरी धड़कन मेरी माँ !
कितना प्यार करे तू अम्मा
वहीँ देख -मै सो जाऊं !!
किहाँ किहाँ फिर नहीं करूँगा
तुझको नहीं रुलाऊंगा
तू रोएगी जो अम्मा तो
पलक खोल ना पाऊंगा !!
हंस दे तू -फूलों सी अम्मा
खिली रहे शाश्वत इस बगिया !
तुझे निहारूं जब भी मै तो
हो आबाद हमारी दुनिया !!
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तेरे दिल का टुकड़ा हूँ मै
कभी बिछड़ ना जी पाऊँ
इस टुकड़े को जोड़े रखना
कभी जुदा ना करना माँ !!

(फोटो साभार गूगल से )

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
प्रतापगढ़ उ.प्र.
१७.५.२०११
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2 टिप्पणियाँ:

तरुण भारतीय ने कहा…

सूरज तू है ...चंदा तू है ...तू सागर है ...तू सीपी है तू मोती है ......बहुत खूब ..............इस दुनियाँ माँ का स्थान कोई नही ले सकता | कवि हरिओम पवांर जी की पंक्तियां मुझे याद आ रही हैं ....माँ कुमकुम माँ केशर की क्यारी ...माँ हर की फुलवारी..माँ की उपमा माँ ही है ,,माँ हम सब को प्यारी ..........

Surendrashukla" Bhramar" ने कहा…

तरुण जी नमस्कार बहुत खूब रचना आप को भायी और आप ने कवि हरी ॐ पंवार की सुन्दर पंक्तियों का जिक्र भी किया मजा आ गया -धन्यवाद आप का सच माँ की उपमा दूसरा कोई नहीं माँ अतुलनीय है माँ भगवान और प्राण के बाद सब कुछ है



सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५

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