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कविता ----- दिलबाग विर्क

Written By Dilbag Virk on बुधवार, 11 मई 2011 | 8:20 pm


                 चीरहरण 

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3 टिप्पणियाँ:

***Punam*** ने कहा…

"कुछ-न-कुछ तर्क तो
रहते ही हैं
सबके पास
अपनी बात को
सत्य ठहराने के लिए .
सही कहा आपने ...."
कुछ ऐसे ही तर्क देते हैं तभी तो हम उसके परिणामों से खुद को
मुक्त कर पाते हैं !
बेहतर हुआ तो सेहरा अपने सर और ख़राब हुआ तो दूसरे पर,
जिसमें भाग्य,इंसान,परिस्थिति नहीं तो भगवान तो है ही,
उसी पर डाल कर मुक्त हो जाते हैं !
दुर्योधन,दुश्शासन,भीष्म,ध्रितराष्ट्र और साथ में
धर्मराज युधिष्ठिर जिन्होंने अपनी
पत्नी की मर्यादा को ही दाँव पर लगा दिया,
आज भी समाज में मौजूद हैं बस स्वरुप बदल गए हैं !!
चीरहरण आज भी होता है,अपने आज भी
मूक बने देखते रहते है,आज भी धर्मराज बने पति अपनी
पत्नी की इज्ज़त दाँव पर लगते हैं......
समय बदला है परन्तु सामजिक परिवेश और 'व्यक्ति विशेष'
(मैं सब की बात नहीं कर रही हूँ ) की सोच आज भी नहीं बदली है,
उतनी ही संकुचित है और कहीं-कहीं तो उससे भी ज्यादा.....

आशा ने कहा…

पूनम जी बहुत अच्छी लगी यह रचना |
बधाई
आशा

Richa P Madhwani ने कहा…

http://shayaridays.blogspot.com

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