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आस्था पर हमला

Written By Shalini Kaushik on शुक्रवार, 6 मई 2011 | 2:30 pm


   १ मई २०११ को हिंदुस्तान दैनिक में प्रकाशित समाचार ''कांधला के ऐतिहासिक मंदिर में चोरी''और ४ मई २०११ को प्रकाशित समाचार ''चोरी हुई मूर्ति खंडित अवस्था में मिली''से कांधला में पुलिस व्यवस्था की खामियों का सहजता से पता चलता है क्योंकि ये चोरी वहां सुबह और शाम की पूजा के बीच में हुई और दिनदहाड़े हुई इस वारदात को खोलने में पुलिस अभी तक नाकाम है.जबकि चोरी हुई कुछ मूर्तियों में से लक्ष्मी ,कुबेर, हनुमान की मिश्रित धातु की प्रतिमाएं तथा राधा कृष्ण की चोरी की प्रतिमा चोर खंडित अवस्था में मंदिर में पोलीथिन में वापस सफलता पूर्वक पहुंचा चुके हैं.
                    अन्दोसर नाम के इस शिवालय की पृष्ठभूमि यह है किवर्तमान में स्थित शिवालय के उत्तर में एक बाग़ था  बाग़ के उत्तर में एक सरोवर था जिसमे कमलगट्टे आदि का उत्पादन किया जाता था इस सरोवर का नाम आनंद सरोवर था .इस प्रकार यह वर्तमान शिवालय ''आनंद सरोवर शिवालय ''के नाम से विख्यात था इसका अपभ्रंश ही अब ''अन्दोसर शिवालय'' है.
                   वर्तमान  में  अन्दोसर शिवालय के नाम से विख्यात यह मंदिर कांधला का सबसे विशाल क्षेत्र में फैला मंदिर है जिसकी काफी भूमि कृषि कार्य में प्रयुक्त की जाती है .मंदिर के इतिहास के बारे में यहाँ के स्थानीय संवाददाता अधूरी व् असत्य जानकारियां समाचार पत्रों में अपने नाम से प्रकाशित करते रहे हैं जबकि अधिकांशतया समाचारपत्रों में इस सम्बन्ध में भ्रामक जानकारी ही दी गयी है.अब जब यहाँ मेरे जीवन में पहली बार चोरी की कुत्सित घटना घटित हुई तब मेरे मन में इस मंदिर के इतिहास के बारे में जानने की जिज्ञासा जाग्रत हुई और मैंने इस सम्बन्ध में खोजबीन कर कुछ तथ्य एकत्र किये जो आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ.-
       राजस्व अभिलेखों में यह शिवालय ''शिवाला हकीम शिवनाथ''के नाम से भी दर्ज था. क्योंकि १८०० इसवी के प्रारंभ में इस शिवालय के स्थापना हकीम शिवनाथ निवासी कांधला ने की थी जो पुर्सिवाडा[पंजाब] से आकर क़स्बा कांधला के निवासी हो गए थे.अंग्रेजी शासनकाल में शामली में मुंसिफ शामली का न्यायालय स्थित था .इस शिवालय की भूमि के दक्षिण भाग के मालिक हकीम शिवनाथ थे तथा इस शिवालय में उत्तर कीभूमि की मालिक मोहल्ला सरावज्ञान क़स्बा कांधला निवासी एक महिला थी कागजात में ये दर्ज है कि हकीम शिवनाथ ने उक्त महिला वाले भाग में भगवान शिव के लिंग[पिंडी]की स्थापना करा दी थी जिस पर उक्त महिला व् मोहल्ला सरावज्ञान के जैन बिरादरी के दो व्यक्तियों ने मुंसिफ शामली के यहाँ एक दीवानी वाद प्रतिनिधि के रूप में दायर किया था जिसमे मुंसिफ शामली ने तहसीलदार बुढ़ाना को आयुक्त नियुक्त करके  ये आदेश दिया था कि वे मौका मुआयना करके न्यायालय को ये रिपोर्ट दें कि क्या शिवलिंग की स्थापना जैन महिला के भाग में हुई है ?तहसीलदार बुढ़ाना ने विवादित  स्थल का निरीक्षण करने के बाद न्यायालय को ये रिपोर्ट दी थी कि शिवलिंग की स्थापना जैन महिला की भूमि में हुई है परन्तु शिवलिंग को वहां से हटाया जाना उचित नहीं है क्योंकि इससे क़स्बा कांधला के हिन्दू समाज की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचेगी इसलिए जैन महिला को एक आना मुआवजा दिलाया जाये.न्यायालय ने तहसीलदार बुढ़ाना की रिपोर्ट स्वीकार कीथी और जैन महिला को एक आना मुआवजा दिला दिया गया था .तभी से उक्त शिवालय स्थापित चला आ रहा है .
ये तथ्य श्री कौशल प्रसाद एडवोकेट जी द्वारा मुझे पता चले हैं श्री कौशल प्रसाद एडवोकेट जी हकीम शिवनाथ जी के वंशज हैं और उन्होंने ये बताया कि उन्हें ये तथ्य अपने ही पूर्वज पंडित श्री ताराचंद जी से पता चले और ये भी कहा कि उनके पास मुंसिफ शामली के आदेश की डिक्री भी है जो उर्दू में लिखी गयी है.
             अंत में मैंने उनसे जानना चाहा कि जैसे कि लगभग हर मंदिर का प्रबंध स्थापना करने वालों के वंशजों के हाथ में होता है तो हकीम शिवनाथ जी ने इस मंदिर का प्रबंध अपने वंशजों के हाथ में क्यों नहीं दिया तो वे मुस्कुरा कर कहते हैं वे जानते थे कि ऐसी सम्पदा से बाद में विवाद पैदा होते हैं और वे नहीं चाहते थे कि उनके परिवार के लोग आर्थिक स्थिति बिगड़ने की स्थिति में मंदिर से कोई अनुचित आर्थिक लाभ उठायें इसलिए उन्होंने मंदिर का प्रबंध किसी वैश्य परिवार के हाथों में सौंप दिया.
                     इस प्रकार की भावना रखने वाले स्थापक द्वारा स्थापित ये मंदिर आज ऐसी स्थिति से जूझ रहा है ऐसे में वर्तमान प्रबंधकों और पुलिस विभाग दोनों का कर्त्तव्य है कि जल्द से जल्द चोरी खोलें और मंदिर को उसके प्राचीन भव्य स्वरुप में लाने में सहयोग करें.
                                                           शालिनी कौशिक [एडवोकेट]
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