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रहस्य

Written By तरूण जोशी " नारद" on बुधवार, 28 सितंबर 2011 | 2:21 pm

इन राहों में, चलते चलते,
अचानक,
दूर कहीं से कोई आवाज आई,
सुनो! प्रिय सुनो!
फिर एक अट्टहास 
मैं चकित हो, थोड़ा घबराया,
सूनसान सडक, वीरान राहें,
और पूस की ये रात, 
भयावह समां
ये कौन हैं ?, इस वक्त यहां,
किसने हमें पुकारा,
चांद भी आज उगेगा नही,
राह है अभी काफी लंबी,
केवल इन तारों का है साथ,
मगर इस समां में कौन है ?
इस राह का मेरा ये हमराह
हिम्मत करके मैने पूछ ही लिया, 
कौन, कौन हो तुम, कौन, अरे तुम हो कौन, 
कुछ देर के लिए छा गया मौन,
अब है मेरे साथ,
केवल ये समां,
विरान, सूनसान, शीतकाल
और केवल अंधकार,
कुछ देर बाद
सब कुछ
सामान्य,
तभी फिर से
सुनाई दी
वही आवाज,
वही अट्टहास......
फिर उसने दिया मेरे सवालो का 
जवाब....
मै..... मैं हंु तुम्हारा 
जमीर...
तुम्हारी हर राह में,
हर मंजिल में 
तुम्हारा हमसफर, हमराही....
मैंने कहा...
तुम कुछ बताओ
कि इन राहों 
पर चलते रहे
इसी तरह तो 
क्या मुकां होगा
क्या अंजाम होगा 
मेरे मुल्क का 

जबाब आया 
मैं बसा हूं हर एक के सीने में,
इसलिए मैं बताता हूं सबका हाल
आजकल बहुत बदलाव आ गया हैं।
दिलों में फैल गया है अलगाव
विकसित हो रहा है हिंसा का बाजार...

अब सुनो मेरी बात,
ध्यान से सुनो मुझसे ना डरो
मेरी बात समझो,
इस हिंसा के बाजार का नाश
हमें करना होगा,

इससे पहले हमें 
कुछ काम नया करना होगा,
दिलों में बसे अलगाव को मिटाना होगा।
सभी के दिल में प्यार को बसाना होगा।
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3 टिप्पणियाँ:

वन्दना ने कहा…

काश ऐसा हो जाये।माता रानी आपकी सभी मनोकामनाये पूर्ण करें और अपनी भक्ति और शक्ति से आपके ह्रदय मे अपनी ज्योति जगायें…………सबके लिये नवरात्रि शुभ हों।

Atul Shrivastava ने कहा…

बेहतरीन प्रस्‍तुति।

तरूण जोशी " नारद" ने कहा…

dhanyawaad aap sabhi ko

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