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तुम बिन........(सत्यम शिवम)

Written By Er. सत्यम शिवम on शनिवार, 12 फ़रवरी 2011 | 4:15 pm

तुम बिन तो हम हरपल उदास है,
हर खुशी पास है, पर जाने किसकी आश है।
वो तो लगता है भूला देगी मुझे,
पर मै कैसे कहूँ, कि साँस तो चल रही है,
लेकिन धडकन उनके पास है।

तुम बिन हर मोर पर तन्हाई है,
महफिल में भी जिंदगी से मिली रुसवाई है।

कमबख्त इश्क भी क्या चीज है,
बिन कहे किसी को दिल दे देता है,
और मिलती है जब प्यास राहों में,
तो दरिया के साथ समंदर भर लेता है।

हर दर्द को दिल में कैद कर,
गम का सैलाब जो बनता है,
आँखे बरसने लगती है,
तुम बिन तो वो कुछ ना करता है।

किनारे पे भी आके मौजे लौट जाती है,
मँजिल के करीब भी आके राही,
रास्ता भूल जाता है।

तुम बिन तूफान आता है, और जाता है,
सदिया आती है, और जाती है,
सब मौसम फलक पे छाती है,
पर दिल से तेरी सूरत कभी ना जाती है।

तुम बिन दिन को रात लिखते है,
अकेले में खुद से ही बात करते है,

पलकों में ख्वाबों का बसेरा होता है,
बस तुम बिन कभी भी ना,
जीवन में सवेरा होता है।

बस तुम बिन, इक तुम बिन, तुम बिन.........
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3 टिप्पणियाँ:

Dr. shyam gupta ने कहा…

क्या टिप्पणी की जाय----भैया कुछ तो गति, यति, लय, तान, मात्रा आदि का ध्यान रखिये----वर्ना कविता और पत्र-स्टेटमेन्ट में क्या अन्तर रह जायगा...

रश्मि प्रभा... ने कहा…

कमबख्त इश्क भी क्या चीज है,
बिन कहे किसी को दिल दे देता है,
और मिलती है जब प्यास राहों में,
तो दरिया के साथ समंदर भर लेता है।
subhanallah

सदा ने कहा…

तुम बिन दिन को रात लिखते है,
अकेले में खुद से ही बात करते है,

बहुत खूब कहा है ...।

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