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एक विधुर की व्यथा-कथा ।

Written By Markand Dave on शनिवार, 26 मार्च 2011 | 2:12 pm

एक विधुर की व्यथा-कथा ।

http://mktvfilms.blogspot.com/2011/03/blog-post_26.html
आदमी को आदमी से थकान लगे?
वाह, कैसी अजब सी ये  बात लगे?
तन्हाई को लेता हूँ ,आग़ोश में जब,
चहू ओर  काटती  ये  बदजात लगे ।



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मेरे पचास साल की उम्र के वानप्रस्थ पड़ाव पर ही, एकाएक  मेरी पत्नी का निधन हो जाने के बाद, मेरी आज क्या स्थिति है,इसका ब्यौरा आपको अपना मानकर मैं बताना चाहता हूँ । शायद, मेरा अनसहत दर्द से भारी मन ज़रा सा हल्का हो जाए ।

आप सब ने होली का त्योहार बड़े धूमधाम और आनंद प्रमोद के साथ मनाया होगा, मगर इस साल की होली मेरे लिए मेरे दिल को जलाने वाली होलिका बनकर आई थीं । मेरे घर के पास में ही, ४२ साल आयु की, मेरी प्यारी छोटी बहन रहती है । अपने एकमात्र भाई (मैं), मेरे जवान बेटे-बहु और मेरे पोते, सब को होली की बधाई  देने, सवेरे-सवेरे बहना भी मुझ से मिलने के लिए आ गई ।

मगर मेरे घर में उसके साथ कुछ ऐसी घटना घटी की, आप से कहते हुए भी मेरे हाथ कांप रहे हैं । खैर,अब तो मेरी बहना शायद ही मेरे घर का रुख़ करें । मैं बहना को एक पत्र लिख कर माफ़ी माँगना चाहता हूँ । ये पत्र आप भी पढ़िए ।

" मेरी सब से प्यारी बहना,

होली का त्योहार बीते आज एक सप्ताह हो गया है । मैं अगर चाहता तो तुम्हें फोन भी कर सकता था । मगर तुम्हारे साथ मेरे घर में जो घटना घटी है, अब मेरे हाथ फोन उठाने से कांपते हैं, इसीलिए पत्र के द्वारा मैं, मेरे ज़जबात को बयान कर रहा हूँ ।

प्यारी बहना ,तुम्हें तो पता है, जबसे तुम्हारी भाभी का निधन हुआ है, मेरे ही घर में मेरी स्थिति कैसी दयनीय हो गई है?

होली के पर्व पर तेरा अचानक घर आना और मेरा ध्यान रखने के लिए घर की बहु को कुछ समझाने का प्रयास करना..!! मैं तो उस वक़्त मेरे कमरे में था पर, ऐसा बड़ा क्या गुनाह तुमसे हुआ था की, मेरे बेटे की बहु ने गुस्सा होकर सारा घर सर पर उठा लिया ।

बहु की बड़े जोरों से आती ऊँची आवाज़ सुनकर, जब  मैं  मेरे कमरे से बाहर आया तब, मैंने तुम्हें एक कोने में सहमी सी खड़ी हुई पाया ।

मैं तुम्हें कुछ भी कह पाऊँ उसके पहले, तुम वहाँ से उल्टे पाँव अपने घर को लौट गई । शायद, आज मुझे लगता है
तुमने उस वक़्त ये सही किया था । मेरे लिए तुमने  कई  बार  बहु के अनगिनत अपमान सहे हैं ,पर आज त्योहार के दिन?

तुम्हारे अपमानित होकर चले जाने को, आज एक सप्ताह बीत चुका है, मगर हमारी बहु है की आज भी मुझे और तुम्हें कोई ना कोई बात याद करके,बहुत कोसती रहती है ।

प्यारी बहना ,तुझे तो पता है, जबसे तेरी भाभी का निधन हुआ है, मेरे ही घर में मेरी स्थिति कैसी दयनीय हो गई है?

बहु के ऐसे बर्ताव के बदले में, न फोन-न पत्र सच में, तुम्हारे घर आकर, तुम से रूबरू माफ़ी मांगनी चाहिए । पर मेरी हिम्मत ने जवाब दे दिया है । तुम्हारे घर मैं कौन सा मुंह उठा कर चला आता?

मुझे बाद में पता चला की, होली के दिन बहु ने सारी हदें पार कर दी थीं । तुमने सिर्फ मेरा अच्छे से ध्यान रखने के लिए बहु को कहा और न जाने कैसे, तैश में आकर उसने तुम्हें थप्पड रशीद कर दी । बहुत बुरा हुआ है तेरे साथ । छोटे- बड़ों का लिहाज़ तक भूल गई है, बहु ।

प्यारी बहना ,तुम्हें तो पता है, जबसे तुम्हारी भाभी का निधन हुआ है, मेरे ही घर में मेरी स्थिति कैसी दयनीय हो गई है?

मेरी बहना, आज मुझे तुम्हारी भाभी की बहुत याद आ रही है । 

बहना,तेरी भाभी साक्षात अन्नपूर्णा का अवतार थीं । न जाने कैसे,उसे मेरी भूख-प्यास सब का समय पता था । अभी तो मैं  उसको आवाज़ लगाने की सोचुं, उतने में ही चेहरे पर मधुर मुस्कान के साथ,नाश्ता-पानी लिए मेरे सामने वह खड़ी हो जाती थीं..!!

भोजन के समय भी मेरी थाली, तेरी भाभी के प्यार से सुगंधमय हो जाती थी और उसमें इतने सारी बानगी और व्यंजन, मानो थालीने भी सोलह शृंगार किए हो..!!

आजकल तो मेरी थाली भी गहरी आहें भरती है । अब तो बहु जब चाहे, जो चाहे, जितना चाहें, जैसे परोसे, मैं खा लेता हूँ । शाम को थके हारे ऑफिस से लौटे, अपने बेटे से, बहु की शिकायत करता हूँ, तो दूसरे दिन थालीमें, क्रोधित बिल्ली की तरह बहु सिर्फ गुर्राहट परोसती है ।

प्यारी बहना ,तुम्हें तो पता है, जबसे तेरी भाभी का निधन हुआ है, मेरे ही घर में मेरी स्थिति कैसी दयनीय हो गई है?

वैसे घर के कामकाज करने में शर्म कैसी, बहु के आदेश पर मैं ख़रीददारी लिए बाज़ार भी चला जाता हूँ । पाई-पाई का हिसाब करके रुपया देती है,पाई-पाई का हिसाब लेती है ।

बहु, एक रुपया भी ज्यादा देती नहीं है । मेरे तन में शक्कर वैसे भी कम रहती है, बहु पैसा दे तो मैं अपने लिए दवाईयाँ ख़रीद पाऊँ । आजकल मधुमेह की गोली, बस खाली पत्ती हो कर रह गई है ।


प्यारी बहना ,तुम्हें तो पता है, जब से तेरी भाभी का निधन हुआ है, मेरे ही घर में मेरी स्थिति कैसी दयनीय हो गई है?


आजकल मुझे मेरे पौत्र नानका की चिंता सताये जा रही है । अपनी माँ को मुझ पर गुर्राते देखकर, अब तो, वह भी  ज़िद्दी और उद्धत हो गया है । मुझे  ज़िद्द कर के, आधी चाय पीते-पीते  झूले से उठने पर मजबूर करता है । अगर जोड़ों की जकड़न की वजह से जल्दी उठ न पाऊँ तो मुझे अपनी मम्मी का डर जताता है । दिन-ब-दिन चाय भी कड़वा पानी हो गई  है, कोई बात नहीं बहना, वैसे भी अब तेरी भाभी की जगह, झूले पर ख़ाली हो गई है ।


प्यारी बहना, तुझे तो पता है, जबसे तेरी भाभी का निधन हुआ है, मेरे ही घर में मेरी स्थिति कैसी दयनीय हो गई है?

शुभ त्योहार के दिन, बहु ने तुम्हें थप्पड मारकर ठीक नहीं किया है । बहु के इस बुरे बर्ताव के बदले, मैं तुम से माफ़ी मांगता हूँ । मुझे पता है तुम तो मेरी प्यारी छोटी बहना हो, मुझे अवश्य माफ़ कर देगी और अपने इस अभागे भाई को आशीर्वाद भी देगी ।


मगर मेरी बहना, तु  सही में मेरा भला चाहती है तो, मुझे लंबी आयु के बदले जल्दी मौत का आशीर्वाद ही देना । आज मन करता है काश, मन से या बे-मन से, मैं भी तेरी भाभी के साथ ही चल दिया होता..!!


बहना, देख, तु रो मत । देख ना, मेरा ये  मृतप्राय जीवन अब क्या सजीवन हो पायेगा? प्यारी बहना, जब तक सांस चल रही है मैं एक जिंदा लाश की तरह  हूँ  और मुझे ऐसी सांसों की कोई दरकार नहीं है ।  अब तो लग रहा है, तेरी भाभी भी, अनंत आकाश से आवाज़ देकर बुला रही है मुझे..!! मानो वह भी मुझे मिलने को व्याकुल हो रही है ।

प्यारी बहना, तुम्हें तो पता है, जबसे तेरी भाभी का निधन हुआ है, मेरे ही घर में मेरी स्थिति कैसी दयनीय हो गई है?


प्यारी बहना, चल मेरी बहु मुझे बुला रही है,शायद नानका को स्कूल से वापस लाने का समय हो रहा है । चलता हूँ ।

सदैव तेरी मंगल कामना चाहनेवाला,
 

तेरा अभागा भाई ।

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(सत्य घटना पर आधारित कहानी)

`ANY COMMENT?`

मार्कंण्ड दवे । दिनांकः २६-०३-२०११.
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3 टिप्पणियाँ:

योगेन्द्र पाल ने कहा…

no comment :(

हरीश सिंह ने कहा…

कभी कभी भावो को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं मिलते. अच्छी पोस्ट.

Dr. shyam gupta ने कहा…

no comments...ghar ghar kee kahaanee hai.. कोई काट हो तो बतायें...

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