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Written By Akhtar khan Akela on बुधवार, 23 मार्च 2011 | 5:51 pm

राईट टू रिकोल या मजाक हे जनता के साथ

राईट टू रिकोल या मजाक हे जनता के साथ मजाक बन गया हे राजस्थान में संविधान के अनुच्छेद २४३ के तहत नगरपालिका कानून में वर्ष २००९ में संशोधन किया था लेकिन धारा ५३ में सभी अध्यक्षों को दो तिहाई पार्षदों द्वारा अविश्वास जताने पर एक वर्ष बाद अध्यक्षों को हटाने का प्रावधान था जिसे सरकार ने बदला लेकिन हाईकोर्ट ने ख़ारिज कर दिया अब फिर नया विधेयक पेश  किया गया हे .
राजस्थान में नगरपालिका अध्यक्षों को सीधे जनता द्वारा चुनने का पहली बार कानून बनाया गया था और इसीलियें सभी जगह सीधे चुनाव हुए जयपुर सहित कई पालिकाओं और नगर निगमों में हालत यह रहे के महापोर और अध्यक्ष तो कोंग्रेस के थे लेकिन   पार्षदों का बहुमत भाजपा के पास था निर्धारीं कानून के प्रावधान के तहत जयपुर सहित दूसरी पालिकाओं में निगम महापोर के खिलाफ एक साल बीतते ही सरकार ने धारा ५३ के प्रावधान को हटा दिया इस निर्देश आदेश के खिलाफ भाजपा के एक पदाधिकारी और चेयरमेन हाईकोर्ट गये हाईकोर्ट ने इसे हठधर्मिता और तानाशाही कानून माना और ख़ारिज कर दिया अब कोंग्रेस को कई निकायों में अविश्वास मत का दर सता रहा था बस इसीलियें कोंग्रेस ने कल एक विधेयक पारित कर नगरपालिका कानून की धारा ५३ में हाईकोर्ट के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए एक नई पहल की हे जो हास्यास्पद सी स्थिति हे नये पारित विधेयक में कहा गया हे के तीन चोथाई पार्षद दो वर्ष बाद अगर चाहेंगे तो कलेक्टर को अविश्वास देंगे और फिर उसकी कलेक्टर जांच करवा कर बैठक बुलाएगा जिसमें अगर यह अविश्वास मत दो तिहाई मतों से पारित हो जाता हे तो फिर यह कार्यवाही रेंडम होगी और छ माह में इस प्रतिनिधि को रिकोल किया जाए या नहीं इस मामले में चुनाव आयोग चुनाव करवाएगा अगर दो तिहाई वोह उसके खिलाफ हे तो फिर उस प्रतिनिधि को हटा दिया जाएगा कहने को यह कानून कोंग्रेस के वर्तमान निगम और बोर्डों को बचाने के लियें तो काफी हे लेकिन इतनी जटिल प्रक्रिया संविधान के प्रावधानों के खिलाफ होने से लोकतंत्र का मुंह चिडाता यह कानून हे . अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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