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अंडमान के आदिवासियों की कैसे हो गणना?

Written By RAJKUMAR BHATTACHARYA on शनिवार, 5 मार्च 2011 | 7:20 pm

भारत की 15 वीं जनगणना के दो चरण पूरे हो चुके हैं। लगभग 10 करोड़ वर्गमील क्षेत्रफल वाले इस देश के लगभग 1 अरब 20 करोड़ लोगों की गणना में 20 लाख से अधिक लोग लगे हुए हैं। दुनिया की इस सबसे बड़ी जनगणना प्रक्रिया में जुटे कर्मचारियों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। खास तौर पर उन कर्मचारियों की परेशानियों के बारे में तो पूछिए ही नहीं जिन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वालों की  गणना करने के लिए दूर-दराज के गांवों में जाना पड़ता है। इन दिनों यह सवाल लोगों के मन में उत्पन्न हो चुका है कि देश की कौन-सी जगह है जहां जाना हर प्रगणक के लिए दु:स्वप्न होता है? इसका दिलचस्प उत्तर है अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का नॉर्थ सेंटिनेल द्वीप। अफ्रीकी मूल की निकोबारीज और सेंटिनेलीज जनजातियों के लोग उस द्वीप के प्रमुख बाशिंदे हैं। आज भी उनका जीवन आदिम मानवों के ढर्रे पर ही चल रहा है। सभ्य दुनिया को यह जनजाति किसी भी तरह बर्दाश्त नहीं कर पाती। इन जनजातियों को पूरी दुनिया में सबसे अधिक अलग-थलग रहने वाले समुदाय के रूप में जाना जाता है। आम तौर पर होता यह है कि जनगणना के काम में जुटे लोगों को कागज और कलम से काम करना पड़ता है लेकिन जिन लोगों को अंडमान के सेंटिनेल द्वीप की जनगणना के लिए भेजा जाता है, उन्हें नाव, वीडियो कैमरे, नारियल और हाथों की ताकत से काम करना पड़ता है। नाव इसलिए कि प्रगणक उस द्वीप तक इसके ही सहारे पहुंच और वापस लौट सकते हैं। वीडियो कैमरे इसलिए क्योंकि द्वीपवासी अपना नाम, माता-पिता के नाम, अपनी उम्र, पेशा और अन्य विस्तृत विवरण प्रगणकों  को नहीं दे सकते हैं तो हर व्यक्ति की वीडियोग्राफी ही गिनती का एकमात्र तरीका रह जाता है। इसे घने जंगलों में शेरों की गिनती जैसी तकनीक कही जाए तो गलत नहीं होगा। फिर नारियल की जरूरत यूं होती है कि दोनों जनजातियों के लोगों का यह प्रमुख भोज्य पदार्थ होता है। उन्हें नारियल का तोहफा देकर प्रगणक अपने साथ सहयोग करने को मना सकते हैं। अगर नारियल लेने के बाद भी जनजातीय लोग किसी बात पर गणनाकर्मियों पर हमला कर ही बैठे तो वे खुद को बचाने के लिए अपने हाथों की ताकत से पत्थर फेंक सकते हैं। आश्चर्य नहीं कि इस द्वीप पर जाकर जनजातीय समुदायों के लोगों की गणना करने के लिए बहुत कम सरकारी कर्मचारी उपलब्ध होते हैं। इसका एक कारण यह भी है कि बंगाल की खाड़ी में स्थित अंडमान निकोबार द्वीपसमूह जाकर गणना कार्य में भाग लेने का मतलब है इस द्वीपसमूह में शामिल लगभग 500 द्वीपों पर बसे जनजातीय समूहों का सामना करना। यह आसान काम तो कतई नहीं है। गणनाकर्मियों को भारत और थाईलैंड के बीच के समुद्र में ही अपना अधिकांश समय गुजारना पड़ता है और समुद्री आबोहवा कभी भी अपना रुख बदल लेती है। जरूरी नहीं कि भारत की मुख्यभूमि से वहां जाने वालों को हर प्रकार का बदलाव रास आ ही जाए। इन सबके साथ ही अंडमान निकोबार जाने की सहमति देने का अर्थ है लगभग चार लाख लोगों का ब्यौरा दर्ज करना जिसमें काफी समय खप जाता है। फिर चूंकि भारतीय कानून के तहत इन लोगों की निजता या एकान्तवासी जीवन पद्घति में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप गुनाह माना गया है तो जनगणना के लिए जाने वालों को संबंधित कानूनों का खयाल भी रखना पड़ता है। इस पूरे इलाके के ऊपर से किसी विमान को उड़ान भरने की अनुमति नहीं दी जाती है।
अंडमान की विडंबना यह है कि वर्ष 2001 की जनगणना के पहले चरण में वहां मात्र 31 लोगों को गिना गया था और दूसरे दौर में अतिरिक्त आठ लोगों की जानकारियां जोड़ी जा सकी थीं। गणना कर्मचारियों ने जनजातीय समुदायों के साथ बातचीत करने की कोशिश भी की थी। इसके लिए उन्हें अंडमान की एक विशेष जनजाति की भाषा का प्रशिक्षण दिया गया था लेकिन उस प्रयास का कोई फायदा नहीं मिला। इस बार सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश की वजह से गणना करने के लिए जाने वाली टीम को जनजातीय समुदायों से दूरी बनाए रखने को कहा गया है। जनगणना टीमें पोर्ट ब्लेयर से आधी रात के बाद मोटर बोट पर विभिन्न द्वीपों की तरफ रवाना होते हैं और सुरक्षित दूरी से सेंटिनलीज जनजाति के लोगों की वीडियोग्राफी कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने सेंटिनलीज जनजाति को बाहरी समाज  के प्रति शत्रुता का भाव रखने वाली जनजाति के रूप में चिन्हित कर रखा है इसलिए गणनाकर्मियों को उनसे सुरक्षित दूरी बनाए रखने की हिदायत दी गई है। चूंकि पहले की जनगणनाओं के दौरान गणनाकर्मियों पर इन समुदायों के द्वारा तीरों से हमला करने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं इसलिए प्रगणक हर प्रकार की सावधानी बरत रहे हैं। हालांकि वे आदिवासियों को लुभाने के लिए कपड़े, नारियल और फल लेकर जाते हैं लेकिन नॉर्थ सेंटिनलीज द्वीप पर मोटरबोट से नहीं उतरते। सफेद रेत वाले इस द्वीप के घने जंगलों में रहनेवाले आदिवासियों को जंगल से बाहर निकलने को आकर्षित करने के कई तरीके आजमाए जाते हैं और फिर मोटरबोट पर लगे वीडियो कैमरों से उनकी फोटोग्राफी की जाती है। इन तस्वीरों को तब तक कड़ी सुरक्षा में रखा जाता है जब तक कि उन्हें दिल्ली नहीं भेज दिया जाता। बताया जाता है कि  कई बार वीडियो कैमरे आदिवासियों की वस्त्रहीन तस्वीरें कैद कर लेते हैं और इन तस्वीरों को ऐसे तत्वों से बचाने की जरूरत होती है जो अंडमान में जनजातीय पर्यटन को बढ़ावा देकर गैर-कानूनी धंधा करना चाहते हैं।
दुनिया की इस सबसे व्यापक जनगणना प्रक्रिया का करीब से अध्ययन करने के लिए पहुंचे एक अमेरिकी दल के सदस्यों ने बताया कि जनगणना तो अमेरिका में भी होती है लेकिन वहां यह प्रक्रिया इतनी जटिल नहीं होती क्योंकि इसका एक बहुत बड़ा भाग तो ई-मेल से ही निपटा लिया जाता है।  इन सदस्यों को अंडमान की स्थिति अधिक दिलचस्प लगी क्योंकि अमेरिका में  आबादी का कोई ऐसा हिस्सा नहीं है जिसके संबंध में जानकारी जुटाने के लिए उनके संपर्क में आने पर कानूनी रोक लगाई गई हो।
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1 टिप्पणियाँ:

akhtar khan akela ने कहा…

aek jlta huaa khtrnaak prshn he jiskaa jvaab kisi ke paas nhin. akhtar khan akela kota rajsthan

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