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लघु कथा ----- जसवंत घारू

Written By Jaswant Gharu on बुधवार, 2 मार्च 2011 | 2:41 pm

                       चोर 

   मैं कई दिनों से देख रहा था कि बस परिचालक आधी सवारियों को टिकट देता और आधी सवारियों की टिकट के रूपये वह अपनी जेब में डाल लेता . मैंने मजाक-मजाक में उससे कह ही दिया :-" कन्डक्टर साहब आप तो हराम की खाते हैं ."
                  वह भी मुझसे हँसते हुए बोला :-" मास्टर जी आपकी बात बिलकुल ठीक है,लेकिन इस समाज में सही कौन है ? कोई हरामखोर है, कोई रिश्वतखोर ,तो कोई कामचोर है . आप भी सही नहीं होंगे .आप भी आधा समय गप्पें मारते होंगे और आधा समय पढ़ाते होंगे और सरकार से पूरी तनख्वाह पाते होंगे."
                     मैंने अपनी चोरी छुपाते हुए झट से कहा:-
" नहीं,नहीं ऐसा नहीं है ,मैं तो पूरा समय पढाता हूँ ."
     उसने कहा :- " मास्टर जी हो सकता है कि आप ईमानदारी से अपना कर्त्तव्य निभाते हों , लेकिन आपके सही होने से पूरा समाज तो सही हो नहीं जाता . हर कोई इस देश को लूट रहा है , अगर मैंने थोड़ी-बहुत चोरी कर ली तो क्या बुरा कर दिया ?
               उसकी बात सुनकर मुझे लगा कि उसने हम सबके भीतर छुपे हुए चोर को आइना दिखा दिया हो . 
 
                      * * * * *
 ----- jaswantgharu.blogspot.com 
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3 टिप्पणियाँ:

शिखा कौशिक ने कहा…

bahut badhiya laghu katha .sach me hum sabhi chor hain .

वन्दना ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (2-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति|
महाशिवरात्री की हार्दिक शुभकामनाएँ|

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