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अर्वाचीन बोधकथाएँ -१.

Written By Markand Dave on सोमवार, 14 मार्च 2011 | 11:03 am

अर्वाचीन बोधकथाएँ -१.

http://goo.gl/XYOzs

" बीरबल, `आ बैल मुझे मार`, लोकोक्ति का अर्थ क्या है?"

" जहाँपनाह, आपकी शादी में, बेगम साहिबा के साथ आपका साला (Brother in low)गीफ्ट में साथ आया है । उसको महल से, निकाल फेंकने की  जद्दोजहद में, आपकी सास भी  हमेशा यहाँ  रहने के लिए आ धमके उसे,`आ बैल मुझे मार..!!` कहते हैं ।"
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कथा -१. सुखद अकस्मात ।

( एक नवयुवक भागता हुआ आकर, गुरूजी के चरणों में लोटते हुए ।)

युवक-" गुरूजी, मुझे बचाईए,बचाईए,बचाईए..!!"

गुरूजी-" क्यों वत्स, क्या हुआ?"

युवक-" गुरूजी, कल मेरी शादी में अचानक  पावर-कट ( फ़ेल ) होने की वजह से, मौके का फायदा उठाकर, मेरी विधवा सास ने मेरे साथ फेरे लगा लिए..!! अब मैं क्या करु?"

गुरूजी-"समाधान सरल है । तेरी सास  से  विवाह विच्छेद  कर दे, समस्या ख़तम..!!"

युवक -" परंतु प्रभो, मेरी सास करोड़पति है, और मैं मेरे भाग्य की लक्ष्मी को ठुकराना नहीं चाहता..!!"

गुरूजी-" हं...म्म...म । समस्या गंभीर है । सुनो बेटे, मेरे लिए आश्रम में ऍअर कन्डिशन कुटिर निर्माण करनी है । तेरी ओर से कोई दान-पून्य?"

युवक-" गुरूजी, आपके लिए ए.सी.कुटिर बन गई समझो । मुझे जल्दी उपाय दर्शाइए..!! मैं उस विधवा की लड़की (प्रेमिका) से पांच साल से प्रेम करता हूँ । प्रेमिका के बगैर मैं मर जाउँगा..!!"

गुरूजी-" परंतु वत्स, तेरी प्रेमिका से, अब तेरा संबंध बाप- बेटी (पुत्री) का हो गया है ना?"

युवक-" यही तो सब से बड़ी समस्या है ?"

गुरूजी- "उदास मत हो वत्स । एक काम कर, तुझे  तेरी प्रेमिका को पाना है और पत्नी (सास?) को  भी  छोड़ना  नहीं  है । यही समस्या है ना?"

युवक -"जी गुरूजी..!!"

गुरूजी- " बेटे, समझ ले, आज से तेरी समस्या ख़तम..!! मेरी ए.सी.कुटिर बनाकर, तेरी युवा प्रेमिका को उसी कुटिरमें साध्वी बनाकर यहाँ आश्रम में  छोड़ दे । "

युवक-"गुरूजी..!! यह आप क्या कह रहे हैं?"

गुरूजी-" शास्त्रकथन अनुसार साध्वी बनते ही, संसार के सारे रिश्ते-नाते ख़तम हो जाएगें । अर्थात तुम्हारी पत्नी (उर्फ़ सास ) की बेटी, मतलब की तेरी प्रेमिका से तेरा बाप-बेटी का रिश्ता भी ख़तम । और फिर यहाँ रहने वाली तेरी प्रेमिका उर्फ़ साध्वी के साथ सत्संग करने, ( ही...ही...ही...ही...!! कौन बंदा हँसता है?) जब  मन चाहे, आते जाते रहना..!! कुछ समझे की, विस्तार से समझाना पड़ेगा? "

युवक-" समझ गया, प्रभो, सबकुछ समझ गया..!! जैसी आपकी आज्ञा । आप तो बड़े विद्वान और समर्थ  गुरु  हैं । बहुत खुशी हुई..!! मुझे मेरी समस्या का बहुत बढ़िया समाधान मिला ।  मैं तो चला मेरी प्रेमिका को यहाँ आश्रममें  लाने के लिए..!! O.K. गुरूजी बा..य..!!"

अर्वाचीन बोध -

हाथ में आने वाले किसी भी मौके को हाथ से जाने मत देना । जीवन में शादी में,  फेरे के सही वक़्त पर पावर फ़ेल हो,  ऐसा सुखद अकस्मात, सब के साथ, बार-बार नही दुहराता..!!

मार्कण्ड दवे । दिनांक -१४-०३-२०११
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1 टिप्पणियाँ:

वन्दना ने कहा…

पता नही कैसा बोध है ये?

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