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जेहाद

Written By आशुतोष की कलम on सोमवार, 14 मार्च 2011 | 9:09 pm

ये कविता पोस्ट करने से पहले कई विचार चल रहे थे मन में की पोस्ट करूँ या नहीं..फिर अंतर्मन में ख्याल आया की थोड़े स्पष्टीकरण के साथ लिख देता हूँ..तो ये कविता पूरी तरह से हमारे पडोसी देश पाकिस्तान और वहां के लोगो पर लिखी गयी है...इसकी कुछ पंक्तियों में मैंने जिस इस्लाम का वर्णन किया है वो धर्म नहीं धर्म का छलावा है जो पडोसी देश में तालिबानी कर रहें है.. मैंने उसका विवरण मात्र दिया है..मैं भारत में अब्दुल कलाम और वीर अब्दुल हामिद जैसे सच्चे मुसलमानों को आदर्श और सम्मानित मानता हूँ .... अतः आप सभी से आग्रह है इसे धर्म विशेष पर टिप्पड़ी के रूप में न लें..
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जेहाद जेहाद जो करते है,जेहाद का मतलब क्या जाने?
ये रक्त पिपाशु दरिन्दे है,मानवता क्या है,क्या जाने?
इन्सान की बलि चढाते है,ये मजहब क्या है,क्या जाने?
ये झूठे मुस्लिम बनते है,इस्लाम का मतलब क्या जानें ?
कश्मीर मे हो या अमरीका,इनका तो इक ही नारा है,
हत्या ही हमारा पेशा है, हत्या ही धर्म हमारा है|
ये नर मुंडो की मस्जिद मे खूनी नमाज को पढ़ते है.
अपने पापों का प्रश्चित भी गोहत्या करके करते है |

गौहत्या ये करवाते हैं.ये राष्ट्रधर्म को क्या जाने?
ये बाबर की औलादें हैं.., हिंदुत्व की गरिमा क्या जाने ??
कश्मीर ये हमसे ले लेंगे,इस दिवास्वप्न मे जीतें हैं...
कश्मीर हमारी गरिमा है,नामर्द मुजाहिद क्या जाने..
कुछ खैराती डालर से तुम.कितने भी बम बनवाओगे
गौरी अब्दाली भीख मिली,ब्रम्होश कहाँ से लाओगे ….
गौरी गजनी और शाहीन से कश्मीर भला क्या पाओगे,
तब बंगलादेश गंवाया था,अब पाकिस्तान गँवाओगे

ये फिदायीन ये मानव बम, कुछ काम नहीं आ पायेंगे..
भों भों करते ये जेहादी कुत्ते..
शिव तांडव से क्या टकरायेंगे...
गर अबकी मर्यादा लांघी,तो अपनी कब्र बनाओगे ..
इकहत्तर मे था छोड़ दिया,इस बार नहीं बच पाओगे..

ऐ धूर्त पडोसी खुद देखो,
अपने आँगन की लाशों को
घुट घुट कर जो दम तोड़ रहे
उन बच्चो के एहसासों को
अब अपने कितने बच्चों की
तुम बचपन बलि चढाओगे
खुद की दुनिया तो जल ही गयी
क्या बच्चों को भी जलाओगे ………

इन नन्हे नाजुक हाथों में
कुछ गुड्डे गुडिया ला कर दो..
जेहाद, फ़िदायीन, मानव बम
ये नन्हा बचपन क्या जानें.........

जेहाद जेहाद जो करते है,जेहाद का मतलब क्या जाने?



"आशुतोष नाथ तिवारी"
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