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सरकती रात ।

Written By Markand Dave on रविवार, 13 मार्च 2011 | 4:44 pm

सरकती रात ।
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रात के साथ सरकती जा रही है,सारी उम्मीदें । दोनों का दामन थामकर बैठने को मन करता है । भीड़ भी लगी है यारों की । ना जाने क्यों, मैं ही तन्हा-तन्हा सा बैठा हूँ ।


ग़म-ए-घायल हूँ, हालात का मारा भी । न आया तरस, ना ख़त, ना ख़बर कहीं से फिर, झूठी  आश लगाये । ना जाने क्यों,  मैं ही तन्हा-तन्हा सा  बैठा  हूँ ।


कहते थे मर जायेंगे, मीट जायेंगे । कई वादे, कई कस्में, भूल गये शायद ।  फिर, लगाकर वफ़ा को गले । ना जाने क्यों, मैं ही  तन्हा-तन्हा सा बैठा  हूँ ।


शर्म -ओ- हया, नज़रें झुका कर प्यार जताना । लूटा तो दिया सब, जान भी, और क्या देता,वफ़ा के सिवा? ना जाने क्यों  मैं ही तन्हा-तन्हा सा  बैठा  हूँ ।


हमराही, हम-साया भी, दामन  छुड़ाता  है, क्या  ऐसे कोई? राहें  रोशन हों,यही चाह में दिल जलाता ।  ना जाने क्यों  मैं ही  तन्हा-तन्हा सा  बैठा  हूँ ।


आता है गुस्सा, इस दिल पर मुझे । लगता है क्यों, बेवफ़ा से ? फिर जलता है बेतहाशा ? जाम-ए-ज़हर लिए आज । ना जाने क्यों  मैं ही तन्हा-तन्हा सा  बैठा  हूँ ।


मार्कण्ड दवे । दिनांक -१३-०३-२०११.
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3 टिप्पणियाँ:

वन्दना ने कहा…

जिसने जलाये वफ़ा के चराग
सफ़र उसका तन्हा ही कटा
कभी दिन मे चाँद नज़र आया
कभी अमावस का कहर टूटा

हिमानी ने कहा…

ग़म-ए-घायल हूँ, हालात का मारा भी । न आया तरस, ना ख़त, ना ख़बर कहीं से फिर, झूठी आश लगाये । ना जाने क्यों, मैं ही तन्हा-तन्हा सा बैठा हूँ ।
tanhai bya bya karte karte jo shabdon ki mehfil apne sjai hai ab ap tanha kahan rahe

Hema Nimbekar ने कहा…

बहुत ही उम्दा शाएरी...इस सुंदर अभिव्यक्ति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई |

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