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सच की तावीज - बंधा दे मेरी 'दादी' -'अम्मा'

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on बुधवार, 6 अप्रैल 2011 | 9:55 am


सच की तावीज
दादी माँ मै सोना चाहूं
दे-ना चाहे तो लोरी गाये
मुझे सुला दे !!
दुल्हन दे -या -चाँद खिलौना
थाली में परछाईं या फिर
तारों की बारात दिखा दे
दूध दही टानिक मन चाहे
मुस्काए तो दादी अम्मा
चूने का ही घोल पिला दे
रंग -बिरंगे परिधानों से सज-
गाडी चढ़
कान्वेंट स्कूल भिजा दे
मन क्यों बोझिल??
कागज़ दे लकड़ी के टुकड़े -
प्राईमरी पैदल पहुंचा दे
हवा चले भी कुछ टूटे ना
मुस्काए वे घूम रहे हैं
नम क्यों आँखें -पट्टी बाँधे
चलूँगा मै भी बोझ उठाये 
चलें वे उड़कर वर्दी सजकर -
मेवे खाएं !!
पेट तुम्हारा मै भी भरकर
सर आँखों में तुझे बिठाकर -
चलूँ उठाये !!
महल उठाये नाम कमाए
‘धन’-‘ लालच’ कुछ शीश झुकाए
रोशन तेरा नाम करूँगा -"कुटिया " में
दुनिया खिंच आये
गर्व भरे तू शीश उठाये !!
‘दादी’ –‘माँ’ -सपने ना मुझको
सच की तू तावीज बंधा दे
हंसती रह तू दादी अम्मा
आँचल सर पर मेरे डाले
मार पीट कर उसे गिराकर
‘पहलवान’ जो ना बन पाऊँ
दे ऐसाआशीष’ मुझे माँ
‘आँखों का तारा’ बन जाऊं

 सत्यम शुक्ल के बाल झरोखा में 
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५
२०.०८.१९९४( लेखन हजारीबाग-झारखण्ड
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2 टिप्पणियाँ:

mridula pradhan ने कहा…

सच की तू तावीज बंधा दे bahut achchi lagi.

Surendrashukla Bhramar-सुरेन्द्र शुक्ल भ्रमर५ ने कहा…

आदरणीय मृदुला जी बहुत बहुत धन्यवाद बच्चे उनके मन की बातें होती ही हैं ऐसे जो दिल को छू जाती हैं
आओ इनको गले से लगा प्यार दें आप की प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद आप हमारे अन्य ब्लॉग पर भी आयें अपना प्यार व् समर्थन दें
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५

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