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Written By Anurag Anant on बुधवार, 13 अप्रैल 2011 | 12:30 pm

जब संगदिल के संग लगा ये दिल ,
इसे टूटना ही था , टूट गया ,
जो साथी कभी न साथ रहा ,
उसे छूटना ही था ,छूट गया ,

अब रह - रह कलम चलता हूँ ,
गम से ग़ज़ल बनता हूँ ,
हर्फों के अश्क बहता हूँ ,
खुद से खुद को समझाता हूँ ,
अब प्यासा जीवन जीना है ,
मेरे हाँथों का प्याला छूट गया ,

जब संगदिल के संग लगा ये दिल ,
इसे टूटना ही था टूट गया ,

जब कोई साँसों के जैसा हो जाये ,
धड़कन के संग घुल मिल जाये ,
उसे यूँ ही भूलाना मुश्किल है ,
जिस सपने में उसको पाया था ,
वो सपना शायद कच्चा था ,
उसे टूटना ही था ,टूट गया ,
जो साथी कभी न साथ रहा ,
उसे छूटना ही था , छूट गया ,

तुम्हारा -- अनंत 

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1 टिप्पणियाँ:

Dr. shyam gupta ने कहा…

सुन्दर कविता---- कुछ संशोधन---

(मेरे--अनावश्यक) हाँथों का प्याला छूट गया ,

जब संगदिल(सन्गे-दिल) के संग लगा (ये--अनवश्यक) दिल ,

जिस सपने में उसको पाया (था-अनावश्यक) ,

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