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कुंडलिया ----- दिलबाग विर्क

Written By Dilbag Virk on बुधवार, 20 अप्रैल 2011 | 8:00 pm

बेटी मरती गर्भ में ,हम सब जिम्मेदार 
चुप्पी धारण की तभी ,होता अत्याचार .
होता अत्याचार , हुई प्रताड़ित नारी 
वेदों का है देश  ,लगाते कलंक भारी .
कहत 'विर्क' कविराय , हो रही इससे हेठी 
कहलाओ इन्सान , मारो गर्भ में बेटी .

                 * * * * * 
                        हेठी --- अपमान ,बेइज्जती 
                       * * * * *
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4 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत बढ़िया!

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

विर्क भाई आप ने आज के सामाज की विसंगति पर कडा कटाक्ष किया है| छंदों के प्रति आप का रुझान सराहनीय है|

RameshGhildiyal"Dhad" ने कहा…

Bahut sundar, prabhavshali rachna virk ji...
bete jab dhakiya dete hai,maa-baap ko pyaar samman deti hain betiyaan!
bete anaathalay pahunchaate, do-do kulon ka maan rakhti hain betiyaan!
rukha-sukha khakar bhi khush hain,
fir bhi paati hain apmaan betiyaan!
kahte the kabhi laxmi jise,karte garbh me katl, ab apmaan betiyaan!
are! bachalo vinaash se khud ko,
dharm dharinni ka samman betiyaan!
ab to samjho hai insaan betiyaan!!

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

आपकी रचना पढ़ कर दिल बाग-बाग हो गया।
दिलबाग जी! आपकी प्रेरणादायक यह रचना दूसरों
के लिए मार्ग-दर्शक सिद्ध होंगी।
साधुवाद!
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"डंडा" संत स्वभाव की, यही मुख्य पहचान।
दीप जला कर ज्ञान का, करते जन कल्याण॥
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सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

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