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गवाही

Written By sadhana vaid on मंगलवार, 5 अप्रैल 2011 | 10:53 pm

आज मैंने जागी आँखों
एक भयावह दु:स्वप्न देखा है !
बोलो क्या तुम मेरे उस कटु अनुभव को बाँट सकोगे ?
पिघलते सीसे सी उस व्यथा कथा की
तेज़ धार को काट सकोगे ?

मैने यथार्थ के निर्मम बीहड़ में
नंगे पैरों दौड़ते लहुलुहान
उसके दुधमुँहे सुकुमार सपनों को देखा है ।

मैंने निराशा के अंधड़ में यहाँ वहाँ उड़ते
उसकी योजनाओं के डाल से टूटे हुए
सूखे पत्तों को देखा है ।

मैंने दर्द के दलदल में आकण्ठ डूबी
उसकी महत्वाकांक्षाओं की
घायल नियति को देखा है ।

मैंने कड़वाहट के तपते मरुथल में
जिजीविषा की मरीचिका के पीछे भटकते
उसकी अभिलाषाओं के जीवित शव को देखा है ।

मैने नफरत के सैलाब में
अपने मूल्यों की गहरी जड़ों से विच्छिन्न हो
उसे क्षुद्र तिनके की तरह बहते देखा है ।

मैंने उसे संशय और असमंजस के
दोराहे पर खड़े हो अपनी अंतरात्मा के
विक्रय पत्र पर हस्ताक्षर करते देखा है ।

मैंने कुण्ठाओं के अवगुण्ठन में लिपटी
सहमती झिझकती सिसकती
उसकी मूर्छित चेतना को देखा है ।

मैंने ज़रूरतों के लौहद्वार पर दस्तक देती
उसकी बिकी हुई अंतरात्मा का उसीके हाथों
पल-पल तिल-तिल मारा जाना देखा है ।

मैंने आदर्शों के चटके दर्पण में
उसके टूटे हुए व्यक्तित्व का
दरका हुआ प्रतिबिम्ब देखा है ।

मैने आज एक मसीहा को
मूल्यों से निर्धन इस समाज की बलिवेदी पर
अपनी मर्यादा की बलि देते देखा है ।
अपनी आत्मा का खून करते देखा है ।

क्या मेरी यह चश्मदीद गवाही
समाज की अन्धी न्यायव्यवस्था के
बहरे नियंताओं के कानों में जा सकेगी ?

क्या मेरी यह गवाही
उस बेबस लाचार मजबूर इंसान की झोली में
इंसाफ के चन्द टुकड़े डलवा सकेगी ?


साधना वैद
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3 टिप्पणियाँ:

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

मैंने आदर्शों के चटके दर्पण में
उसके टूटे हुए व्यक्तित्व का
दरका हुआ प्रतिबिम्ब देखा है ।

क्या बात है..बहुत खुबसुरत।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

क्या मेरी यह गवाही
उस बेबस लाचार मजबूर इंसान की झोली में
इंसाफ के चन्द टुकड़े डलवा सकेगी ?


जहाँ न्याय व्यवस्था बिकी हुई हो वहाँ इस गवाही की कौन सुनेगा ...अच्छी और मार्मिक रचना ..

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

baat rachna ki kee jaye to..... is rachna ke srijan me jitni anubhootiyon se srijankarta guzra hoga aur un anubhootiyon ko jaisi sashakt shabdaawali se goonth kar itna prabhaavshaali banaya, us srijankarta ki is pratibha ko naman aur uske is srijan me upyog hui anubhootiyon ke liye man dravit ho utha.

ab rachna me uthaye gaye sawaal par...
kahte hain kanoon andha hota hai? aur mana ki bhaavnao ki koi jagah nahi hoti..lekin kya kanoon us upar wale se bhi upar hai? aur mere khayal se kanoon itna be-raham bhi nahi....kahin to apki, hamari gavahi kaam kar hi jayegi.

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