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बजट को समझें, फिर घिसें कलम

Written By RAJKUMAR BHATTACHARYA on मंगलवार, 1 मार्च 2011 | 12:50 pm

हिंदी समाचार पत्रों में संपादक की कुर्सी ऐसी बांबी बन गई है जहां से समाचारों का उदय और अस्त दोनों होता है. बहुत अच्छी बात है, यही होना भी चाहिए लेकिन ज़रा इन होनहार संपादकों की समझ तो देखिए...केंद्रीय बजट पर जितने मुंह, उतनी बातें कह दी गईं - पूरी तरह बिना सोचे और बिन विचारे. किसके पास इतना समय है और कौन बेवज़ह के बजट विश्लेषण का झमेला उठाए...इससे भी बड़ा सवाल यह की अपनी बांबी में बैठकर २४/७ का राग गुनगुनाने वालों को इतना शऊरकहाँ जो बजट की सही समझ विकसित कर सकें?

ज़रा जागरण के संपादक की हालत देखिये...उन्होंने लिखा, बड़ी शिद्दत से, 
आम बजट आम आदमी की उम्मीदों पर मुश्किल से ही खरा उतरता है और जब अपेक्षाएं बहुत अधिक हों तो इसके आसार और भी कम हो जाते हैं। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने यह स्पष्ट कर दिया कि केंद्र सरकार से नाखुश आम जनता को बजट के जरिये खुश करने का उनका कोई इरादा नहीं था। उनकी ज्यादातर रियायतें एक हाथ से देने और दूसरे हाथ से लेने वाली हैं। बेलगाम महंगाई को देखते हुए आयकर में दी गई छूट एक तरह से न के बराबर ही है। लगता है कि वित्त मंत्री अपने सहयोगियों की इस धारणा से सहमत नहीं कि बढ़ती महंगाई से बुरा और कोई टैक्स नहीं या फिर वह चाहकर भी अपेक्षित रियायतें नहीं दे सके। सच्चाई जो भी हो, इस बजट से केंद्र सरकार के प्रति आम आदमी की नाराजगी दूर होने की संभावना शून्य है। हालांकि वित्त मंत्री ने महंगाई थामने के कुछ उपाय किए हैं, लेकिन समस्या यह है कि इन उपायों के नतीजे मिलने में समय लगेगा और यदि मध्य एशिया में उथल-पुथल के कारण पेट्रोलियम पदार्थो के दाम बढ़े तो इन उम्मीदों पर पानी ही फिरेगा। वित्त मंत्री ने जिन उपायों के जरिये लंबे समय से उपेक्षित कृषि क्षेत्र को सुधारने की पहल की है वे अभी भी अपर्याप्त नजर आ रहे हैं। अच्छा होता कि सरकार कृषि क्षेत्र में आमूल-चूल बदलाव करने का साहस जुटाती और साथ ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नया आयाम प्रदान करती। जिस तरह कृषि क्षेत्र में सुधार के उपाय उल्लेखनीय होते हुए भी अपर्याप्त हैं उसी तरह अन्य क्षेत्रों में भी सुधार की झलक ही पेश की गई है. 
साफ़ है वे एक दिन पहले से ही संपादकीय लिखकर तैयार बैठे थे...काम तो काम है, कल करन को आज कर...इस फेर में वे इस जानकारी की कमी नहीं छिपा सके कि केंद्रीय बजट जो है वह सिर्फ कंसोलिडेटेड फंड के आय-व्यय का लेखा-जोखा होता है. इससे उम्मीदें सड़क पर खड़े होकर नहीं की जा सकती हैं. जागरण की बजाय दैनिक भास्कर ने बेहतर किया  कि जल्दबाजी में बजट विचार देने से परहेज किया. 
अमर उजाला ने अपने पहचान के अनुरूप काम किया लेकिन वह जाने-अनजाने में बजट प्रस्तावों के कुछेक सन्दर्भों की अनदेखी की. इसने लिखा, 
अगर साढ़े बारह लाख करोड़ रुपये से ऊपर के बजट में नए करों, करों की दर में बदलाव और माफी का हिसाब-किताब आकर मात्र 200 करोड़ रुपये पर टिक जाए, तो इसे वित्त मंत्री की आर्थिक बाजीगरी भर मानना गलत होगा। कोई भी वित्त मंत्री सिर्फ आंकड़ों का हेर-फेर नहीं करता और प्रणब मुखर्जी जैसा अनुभवी और तेज वित्त मंत्री हो, तो यह उम्मीद और भी नहीं की जा सकती। फिर क्या यह चुनाव के मौसम के बगैर चुनावी बजट है? एक अर्थ में ऐसा भी लगता है, क्योंकि सबके लिए कुछ न कुछ करने के साथ लोक लुभावन कार्यक्रमों के लिए खजाना खोल दिया गया है। सामाजिक क्षेत्र और ग्रामीण विभाग के कई मदों में तो बजट का प्रावधान 30-40 फीसदी तक बढ़ा है। शिक्षा, स्वास्थ्य और खेती के लिए सरकार की चिंता साफ दिखती है। पौने पांच लाख करोड़ के ऋण के इंतजाम के साथ समय पर ऋण चुकाने वालों को मात्र चार फीसदी के प्रभावी दर पर ऋण उपलब्ध कराना बड़ी बात है। 

इस समाचार पत्र के संपादक को लगा  कि इस बजट में लोक लुभावन कार्यक्रमों के लिए खजाना खोल दिया गया है। अव्वल तो यह पूरी तरह सच नहीं और अगर यह सच भी होता तो यह सच कहने का कौन सा तरीका है? जब सामाजिक और ग्रामीण विकास के बजटीय प्रावधानों में ३५-४० फीसदी वृद्धि की गयी है तो फिर नज़र तत्काल राज्यों की सरकारों पर केन्द्रित करनी चाहिए थी. इस स्टार पर विकास कार्यों के क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी राज्यों की होती है. क्या अमर उजाला को यह उम्मीद है  कि बजट में कार्यपालिका से सम्बंधित घोषनाए की जाएं जबकि बजट पूरी तरह एक आर्थिक-वित्तीय कवायद है? 


हिंदी भाषा के ऐतिहासिक समाचार पत्र नई दुनिया से बजट के बेहतर विश्लेषण की उम्मीद थी. उसके पहले पृष्ठ का समाचार देखा, जिसमें शीर्षक ही था दादा की बाजीगरी तो संपादकीय पृष्ठ से छेड़-छाड़ करने का मन नहीं हुआ. इस समाचार पत्र के पहले ही पेज पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के हवाले से कहा गया था, बजट किसान विरोधी. क्या संपादक की सोच उससे कुछ अलग रही होगी? पता नहीं, कृपया आप नै दुनिया पढ़ते हों तो संपादकीय पेज की खबर हमें भी देने का कष्ट करें. 


देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से प्रकाशित होने के कारण बजट पर नवभारत टाइम्स की प्रतिक्रिया  औरों से बेहतर है. हालांकि यह अखबार अपनी कांग्रेस समर्थक सोच के कारण बजट की भूल-चूक, लेनी-देनी का हिसाब नहीं मांगता है फिर भी अन्य हिन्दी अखबारों के चमत्कार और पूर्वाग्रह ग्रस्त सम्पादकीय पढने के बाद यह एक संतुलित विचार देता है. नवभारत टाइम्स लिखता है, 

सरकार से जनम की अदावत रखने वाले आलोचकों के लिए यूपीए-द्वितीय के तीसरे बजट में जिक्र करने लायक कुछ भी नहीं है। लेकिन जो लोग इस बार के बजट की मुश्किलों से वाकिफ हैं, वे प्रणव मुखर्जी के इस प्रयास को इज्जत की नजर से देखेंगे। पूरी दुनिया में रोलबैक का हल्ला मचा है। खुद भारत सरकार के इकनॉमिक सर्वे में फिस्कल डेफिसिट और करेंट अकाउंट डेफिसिट को लेकर गंभीर चिंता जताई गई थी। 
ऐसे में आशंका यह थी कि इस बार का बजट हर किसी के लिए कुनैन की टिकिया साबित होगा। लेकिन प्रणव दा ने बजट बनाने में सचमुच मेहनत की है और अर्थव्यवस्था के दूरगामी हितों का ध्यान रखने के अलावा समाज के सबसे पिछड़े, उपेक्षित तबकों तक भी इसका कुछ न कुछ फायदा पहुंचाने की कोशिश की है। 
बहरहाल, इस समाचार पत्र के शीर्षक से विरोध जताया जा सकता है. इसका शीर्षक है, गरीबों का बजट जो सच्चाई से परे है. बांबी में बैठे सम्पादक को किसने यह भ्रामक शीर्षक सुझाया?
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5 टिप्पणियाँ:

हरीश सिंह ने कहा…

उम्दा पोस्ट, कम कम से संपादको को वस्तुस्थिति की जानकारी लेकर ही लिखना चाहिए.. हम देखते है की वजट चाहे कैसा भी हो विरोधी पार्टिया विरोध में ही बोलेंगी. यह प्रवित्ति मिडिया में नहीं होनी चाहिए.... आभार.

antakshari ने कहा…

दरअसल पत्र-पत्रिकाएँ, चाहे वे राष्ट्र स्तर के हों या स्थानीय स्तर के, वास्तव में गंभीर नहीं है. उनके दफ्तरों में अक्सर घटिया बातों का समय होता है लेकिन किसी विषय कों ढंग से समझने के लिए कभी सही लाइन में चर्चा नहीं होती. ऐसे में किसी से उम्मीद भी कैसे की जाए? जहां तक संपादन विभागों में काम करनेवालों की शैक्षणिक योग्यता का सवाल है तो उसके बारे में कुछ न कहना ही बेहतर होगा

शिखा कौशिक ने कहा…

bahut sateek v sarthak aalekh .shayad sampadkon ki neend tod de ki aapke sampadkiy ab stary nahi rahe .

antakshari ने कहा…

आखिर संपादकीय स्तरीय हों भी तो कैसे? डीएनए जैसे अंग्रेज़ी अखबार इसे फालतू मानकर बंद करने का कदम उठा चुके हिं...बनिए कों अधिक गहराई में पैठने से हमेशा दिक्कत होती है...

Swarajya karun ने कहा…

कड़वी हकीकत .अच्छी प्रस्तुति. आभार .

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