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शूर्पणखा काव्य उपन्यास----सर्ग ६- शूर्पणखा-- प्रथम भाग -- -डा श्याम गुप्त...

Written By shyam gupta on शनिवार, 2 अप्रैल 2011 | 8:34 pm





   शूर्पणखा काव्य उपन्यास-- नारी विमर्श पर अगीत विधा खंड काव्य .....रचयिता -डा श्याम गुप्त  
                       
                                 विषय व भाव भूमि
              स्त्री -विमर्श  व नारी उन्नयन के  महत्वपूर्ण युग में आज जहां नारी विभिन्न क्षेत्रों में पुरुषों से कंधा मिलाकर चलती जारही है और समाज के प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति की  ओर उन्मुख है , वहीं स्त्री उन्मुक्तता व स्वच्छंद आचरण  के कारण समाज में उत्पन्न विक्षोभ व असंस्कारिता के प्रश्न भी सिर उठाने लगे हैं |
             गीता में कहा है कि .."स्त्रीषु दुष्टासु जायते वर्णसंकर ..." वास्तव में नारी का प्रदूषण व गलत राह अपनाना किसी भी समाज के पतन का कारण होता  है |इतिहास गवाह है कि बड़े बड़े युद्ध , बर्बादी,नारी के कारण ही हुए हैं , विभिन्न धर्मों के प्रवाह भी नारी के कारण ही रुके हैं | परन्तु अपनी विशिष्ट क्षमता व संरचना के कारण पुरुष सदैव ही समाज में मुख्य भूमिका में रहता आया है | अतः नारी के आदर्श, प्रतिष्ठा या पतन में पुरुष का महत्त्वपूर्ण हाथ होता है | जब पुरुष स्वयं  अपने आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक, धार्मिक व नैतिक कर्तव्य से च्युत होजाता है तो अन्याय-अनाचार , स्त्री-पुरुष दुराचरण,पुनः अनाचार-अत्याचार का दुष्चक्र चलने लगता है |
                 समय के जो कुछ कुपात्र उदाहरण हैं उनके जीवन-व्यवहार,मानवीय भूलों व कमजोरियों के साथ तत्कालीन समाज की भी जो परिस्थिति वश भूलें हुईं जिनके कारण वे कुपात्र बने , यदि उन विभन्न कारणों व परिस्थितियों का सामाजिक व वैज्ञानिक आधार पर विश्लेषण किया जाय तो वे मानवीय भूलें जिन पर मानव का वश चलता है उनका निराकरण करके बुराई का मार्ग कम व अच्छाई की राह प्रशस्त की जा सकती है | इसी से मानव प्रगति का रास्ता बनता है | यही बिचार बिंदु इस कृति 'शूर्पणखा' के प्रणयन का उद्देश्य है |
                   स्त्री के नैतिक पतन में समाज, देश, राष्ट्र,संस्कृति व समस्त मानवता के पतन की गाथा निहित रहती है | स्त्री के नैतिक पतन में पुरुषों, परिवार,समाज एवं स्वयं स्त्री-पुरुष के नैतिक बल की कमी की क्या क्या भूमिकाएं  होती हैं? कोई क्यों बुरा बन जाता है ? स्वयं स्त्री, पुरुष, समाज, राज्य व धर्म के क्या कर्तव्य हैं ताकि नैतिकता एवं सामाजिक समन्वयता बनी रहे , बुराई कम हो | स्त्री शिक्षा का क्या महत्त्व है? इन्ही सब यक्ष प्रश्नों के विश्लेषणात्मक व व्याख्यात्मक तथ्य प्रस्तुत करती है यह कृति  "शूर्पणखा" ; जिसकी नायिका   राम कथा के  दो महत्वपूर्ण व निर्णायक पात्रों  व खल नायिकाओं में से एक है , महानायक रावण की भगिनी --शूर्पणखा | अगीत विधा के षटपदी छंदों में निबद्ध यह कृति-वन्दना,विनय व पूर्वा पर शीर्षकों के साथ  ९ सर्गों में रचित है |
             पिछले पोस्ट  सर्ग-५-भाग तीन में..राम, लक्ष्मण, सीता- पन्चवटी में जन जागरण अभियान में संलग्न होते हैं।  प्रस्तुत सर्ग-६--शूर्पणखा --में इस जन जागरण अभियान के बारे में राक्षस-प्रशासन को भनक लगती है और विभिन्न गतिविधियां प्रारम्भ होजाती हैं....कुल छंद ..४५ ...जिन्हें तीन पोस्टों में वर्नित किया जायगा । प्रस्तुत है प्रथम भाग..छंद -१ से १५ तक...
१- 
शान्त सौम्य सुन्दर था वन का-
वातावरण, था स्थिर  जीवन |
जाग चुका था वन-प्रदेश अब,
विविध सूचना लगीं पहुचने;
जनस्थान तक इस हलचल की ,
सह न सके जिसको राक्षसगण ||
२-
रावण के अधिग्रहीतक्षेत्र में,
रहती थी भगिनी शूर्पणखा | 
मिली सूचना गुप्तचरों से,
दो मानव पुरुषोंका अक्सर;
घूमते रहना दंडक वन में,
जो थे अति सुन्दर बलशाली ||
३-
जनस्थान की स्वामिनि थी वह,
था अधिकार दिया रावण ने  |
पर, पति की ह्त्या होने पर,
घृणा द्वेष का जहर पिए थी |
पूर्ण राक्षसी भाव बनाकर,
अत्याचार लिप्त रहती थी || 
४-
कैकसि और विश्रवा मुनि की,
थी सबसे कनिष्ठ संतान |
अतिशय प्रिय,परिवार दुलारी,
सारी  हठ  पूरी होती  थी |
मीनाकृति सुन्दर आँखें थीं,
जन्म नाम मीनाक्षी पाया ||
५-
लाड-प्यार में पली-बढ़ी वह,
माँ कैकसि सम रूप गर्विता | 
शूर्प व लम्बे नख रखती थी,
शूर्पनखा इसलिए कहाई |
शुकाकृति थी सुघढ़ नासिका,
शूर्पनका भी कहलाती थी ||
६-
शूर्प सुरुचिकर लम्बे नख थे,
रूपवती विदुषी नारी थी |
साज-श्रृंगार ,वेश-भूषा से,
निपुण विविध रूप सज्जा में |
नित नवीन रूप सजाने में,
उसको अति प्रसन्नता होती ||
७-
दूर दूर से साज श्रृंगार के ,
और केश विन्यास कला के ;
कुशल शिल्पियों को बुलवाकर,
नित प्रति नव श्रृंगार कराती |
जाने कितने पुरुषों को नित,
काम ज्वार में जला डालती ||
८-
अश्मक द्वीप,अश्मपुर शासक,
कालिकेय दानव, विद्युत्जिह्व ;
प्रेमी था वह,  शूर्पणखा का ,
रावण को स्वीकार नहीं था |
हत्यारा था लंकापति के,
प्रमुख रक्ष-मंत्री सुकेतुका ||
९-
पर भगिनी  ने त्याग के लंका,
हठ कर रचा लिया था स्वयंबर |
दानव से राक्षस का रिश्ता,
क्रोधित होकर दशकंधर   ने-
सिरोच्छेद कर विध्युत्जिह्व का,
 नष्ट  कर दिया अश्मकपुर को ॥
१०-
वेवश क्रोधित शूर्पणखा ने,
 त्याग दिया था लंकापति को|
जनस्थान के सेनापति वे,
भ्राता-खर, दूषण, त्रिशिरा थे |
रहने लगी वहीं निश्चय कर,
पूर्ण रूप स्वच्छंद भाव से ||
११-
यद्यपि कहा दशानन ने था,
वीर हजारों हैं,  शूर्पणखा !
जिससे कहे , उसी से वर दूं |
पुनर्विवाह, विधवा विवाह भी,
वेद-विहित, शास्त्र सम्मत है ;
अथवा जैसा भी प्रिय तुमको ||
१२-
पर भ्राता ! यह प्रथम-प्रीति तो,
सदा एक से  ही  होती  है |
बिकने वाली वस्तु राह में,
प्रीति नहीं होती है रावण |
कोइ तोड़ नहीं है अब तो,
इस विछोह पीड़ा का जग में ||
१३-
स्त्री के मन के भावों को,
मन की इच्छा को, पीड़ा को ;
कभी न तुमने समझा भ्राता |
उत्प्रीडन ही सदा किया है,
तुमने नारी मर्यादा का;
फल भी तुम्हें भुगतना होगा ||
१४-
काश आपने, राज्य दंभ में,
जग विजयी, अभिमान भावसे-
परे, प्रेम भी समझा होता |
नारी, बहन, माँ, पत्नी मन को-
महानता तज, देखा होता ,
दे न सका उत्तर दशकंधर ||
१५-
पति ह्त्या से आग क्रोध की,
लगी धधकने शूर्पणखा में |
पुरुष जाति प्रति घृणा भाव में,
शीघ्र बदलकर तीब्र होगई |
कामदग्ध रूपसी बन गयी,
एक वासना की पुतली वह ||   ----  क्रमश:  सर्ग ६-शूर्पणखा..द्वितीय भाग .......
 
[ कुंजिका--  (१)= लंकापति रावण ने विन्ध्य के दक्षिण का अधिकाँश  प्रदेश अपने अधिकार में कर लिया था, कुछ बलशाली राज्यों को मित्र  या स्वतंत्र सत्ता मान लिया था | शायद वास्तव में सारे झगड़े  व कहानी की वजह यही राजनैतिक स्थिति थी |...(२) = राम व लक्षमण..जो स्थान व स्थिति का जायजा लेने घूमते रहते थे ..  (३) = वन प्रदेश व आबादी वाले रावण के अधिग्रहीत क्षेत्र का शासन रावण के शूर्पनखा को दिया हुआ था -खर के सेनापतित्व में ..  ४= माली-सुमाली दीपों के अधिष्ठाता राक्षस राज सुमाली की पुत्री कैकसी जो रावण व कुम्भकरण की माँ थी ... ५= विश्रवा -ब्रह्मा के पौत्र (  पुलस्त्य मुनि के पुत्र )--जिनकी पत्नी देवपर्णी( ऋषि भारद्वाज की पुत्री ) से कुबेर का जन्म हुआ था , जिन्हें लोकपाल   धनेश और लंकापति बनाया  गया | ऐसे ही पुत्र प्राप्ति की इच्छा से  कैकसी ने पिता के कहने पर विश्रवा से अनुनय -विनय कर के विवाह किया अपनी अन्य तीन बहनों-राका, मालिनी व पुष्पोत्कटा  के साथ | क्योंकि ऋषि ने शाम ( दिन ) के समय अनिच्छा से सम्बन्ध स्थापित किया था अतः संतति राक्षस-भाव हुई | राका से -खर व शूर्पणखा, मालिनी से--विभीषणपुष्पोत्कटा से --दूषण व त्रिसिरा |... (६) = लंका के निकट की छोटे छोटे द्वीपों में से एक द्वीप ....(७)...रावण का राक्षस-कुल  मंत्री जिसे अपनी माता से सम्बन्ध रखने पर नाराज होकर विद्युत्जिह्व --जो दानव-कुल का था -- ने दोनों को मार डाला था | अतः रावण नाराज था |...(८) = खर के प्रधान सेनापतित्व में तीनों भाई राक्षसों द्वारा अधिग्रहीत  भारतीय भूभाग के रक्षक थे |

 
 
 
 

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1 टिप्पणियाँ:

Dilbag Virk ने कहा…

nari man ka sunder varnn
ravn ke vansh ki upyogi jankari

bdhaai ho
kavita-kaarn

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