नियम व निति निर्देशिका::: AIBA के सदस्यगण से यह आशा की जाती है कि वह निम्नलिखित नियमों का अक्षरशः पालन करेंगे और यह अनुपालित न करने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से AIBA की सदस्यता से निलम्बित किया जा सकता है: *कोई भी सदस्य अपनी पोस्ट/लेख को केवल ड्राफ्ट में ही सेव करेगा/करेगी. *पोस्ट/लेख को किसी भी दशा में पब्लिश नहीं करेगा/करेगी. इन दो नियमों का पालन करना सभी सदस्यों के लिए अनिवार्य है. द्वारा:- ADMIN, AIBA

Home » » हम आखरी लम्हों की एक-एक साँसें पी रहे थे

हम आखरी लम्हों की एक-एक साँसें पी रहे थे

Written By Brahmachari Prahladanand on बुधवार, 12 अक्तूबर 2011 | 10:30 am

.
हम आखरी लम्हों की एक-एक साँसें पी रहे थे,
स्वाद एक-एक सांस का लेकर जी रहे थे,

यूँ तो जिन्दगी भर कितनी साँसे हैं गवाईं,
लगता था जैसे मुफ्त में हैं पाईं,

पर आज जब अस्पताल हैं आये,
तब एक-एक सांस की पाई-पाई है चुकाई,

तब लगा की इन साँसों की कीमत क्या है,
जब लगा की इनके बिना न अब जिया है,

यही हालात हर तरफ होते हैं,
मुफ्त मिली चीज़ को न संभाल सोते हैं,

सारी जिन्दगी न जाने क्या-क्या खरीद लाते हैं,
थोडा भी इल्म पाते हैं, अपनी ढपली अपना राग बजाते हैं,

बहस-दर-बहस में उलझ जाते हैं,
जिन्दगी-ए-वक्त यूँ ही काट जाते हैं,

                                         ------- बेतखल्लुस


.
Share this article :

2 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें

Thanks for your valuable comment.