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स्वर्ग.....कविता...ड़ा श्याम गुप्त.....

Written By shyam gupta on रविवार, 31 जुलाई 2011 | 4:29 pm


घुसते ही घर में कानों में ,
सरगम स्वर में सुर-ताल बही |

खिड़की के एक झरोखे से ,
झन झन पायल झनकार रही |
कमरे में झांका तो देखा,
थी राजकुमारी नाच रहीं ||

बैठक के एक किनारे से ,
सप्तम कानों में टकराया |
झांझर तबला, मटका गिटार -
का मिला जुला सा स्वर आया ||

देखा तो कुंवर कन्हैया जी,
अपनी ही धुन में खेल रहे |
चिमटा थाली,चम्मच गिलास,
पर वे रियाज़ थे पेल रहे ||

लो अहा ! किचन से ये कैसी,
खुशबू सी तिरती आई है |
साथ साथ उनके स्वर की-
मृदु-वीणा सी लहराई है ||

कोई पूछे मुझसे आकार ,
इस दुनिया में स्वर्ग कहीं है ?
यह सुनकर लगता है ऐसा,
स्वर्ग यहीं है स्वर्ग यही है ||
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5 टिप्पणियाँ:

vidhya ने कहा…

आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें
बहुत ही खुबसूरत शब्दों का समायोजन....
लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/
अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

रविकर ने कहा…

सुन्दर रचना |
बधाई |

Anil Avtaar ने कहा…

Bahut hi man-bhavan rachna Gupta Ji.. Badhai..

Neeraj Dwivedi ने कहा…

Bahut sundar .. Bahut sundar

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद, अनिल जी, रविकर जी,नीरज एवं विद्या जी....

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