नियम व निति निर्देशिका::: AIBA के सदस्यगण से यह आशा की जाती है कि वह निम्नलिखित नियमों का अक्षरशः पालन करेंगे और यह अनुपालित न करने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से AIBA की सदस्यता से निलम्बित किया जा सकता है: *कोई भी सदस्य अपनी पोस्ट/लेख को केवल ड्राफ्ट में ही सेव करेगा/करेगी. *पोस्ट/लेख को किसी भी दशा में पब्लिश नहीं करेगा/करेगी. इन दो नियमों का पालन करना सभी सदस्यों के लिए अनिवार्य है. द्वारा:- ADMIN, AIBA

Home » » ग़ज़लगंगा.dg: इन्हीं सड़कों से रगबत थी......

ग़ज़लगंगा.dg: इन्हीं सड़कों से रगबत थी......

Written By devendra gautam on रविवार, 17 जुलाई 2011 | 12:25 pm

इन्हीं सड़कों से रगबत थी, इन्हीं गलियों में डेरा था.

यही वो शह्र है जिसमें कभी अपना बसेरा था.


सफ़र में हम जहां ठहरे तो पिछला वक़्त याद आया

यहां तारीकिये-शब है वहां रौशन शबेरा था.


वहां जलती मशालें भी कहां तक काम आ पातीं

जहां हरसू खमोशी थी, जहां हरसू अंधेरा था.


खजाने लुट गए यारो! तो अब आंखें खुलीं अपनी

जिसे हम पासबां समझे हकीकत में लुटेरा था.


कोई तो रंग हो ऐसा कि जेहनो-दिल पे छा जाये

इसी मकसद से मैंने सात रंगों को बिखेरा था.


अंधेरों के सफ़र का जिक्र भी मुझसे नहीं करना

जहां आंखें खुलीं अपनी वहीं समझो शबेरा था.


वो एक आंधी थी जिसने हमको दोराहे पे ला पटका

खता तेरी न मेरी थी ये सब किस्मत का फेरा था.


मैं अपने वक़्त से आगे निकल आता मगर गौतम

मेरे चारो तरफ गुजरे हुए लम्हों का घेरा था.


-----देवेंद्र गौतम

Share this article :

2 टिप्पणियाँ:

vidhya ने कहा…

आप का बलाँग मूझे पढ कर अच्छा लगा , मैं भी एक बलाँग खोली हू
लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/

आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.

अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।
--
hai

Vikas Garg ने कहा…

वहां जलती मशालें भी कहां तक काम आ पातीं
जहां हरसू खमोशी थी, जहां हरसू अंधेरा था.

बहुत सुन्दर रचना
कभी हमारे ब्लॉग पर आकर हमारी कमियों के बारे में हमें भी बताये
vikasgarg23.blogspot.com

एक टिप्पणी भेजें

Thanks for your valuable comment.